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Published on Apr 01, 2026 Updated 19 Hours ago

वाराणसी में गंगा केवल नदी नहीं बल्कि जीवन, आस्था और व्यवस्था की एक जीवंत धारा है जो घाटों पर हर क्रिया को मौन रूप से दिशा देती है. इस लेख के जरिए जानिए कि कई बार शासन केवल नियमों से नहीं चलता बल्कि प्रकृति और समाज के गहरे संवाद से एक साझा संसार रचता है.

गंगा का शहर: वाराणसी शासन की अद्भुत गाथा

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वाराणसी में घाटों के किनारे होने वाली दैनिक गतिविधियां नदी की भौतिक और प्रतीकात्मक उपस्थिति से गहराई से जुड़ी होती हैं. सुबह के धार्मिक अनुष्ठान, स्नान, दाह-संस्कार और नाव चलाने जैसी गतिविधियां औपचारिक नियमों से कम और नदी की सांस्कृतिक केंद्रीयता से बने साझा सामाजिक मानकों से अधिक संचालित होती हैं. पुजारी आरती की तैयारी करते हैं, स्थानीय लोग पूजन सामग्री लेकर आते हैं और नाविक जलस्तर तथा प्रवाह की बदलती परिस्थितियों के अनुसार अपने काम को समायोजित करते हैं.

इन व्यावहारिक पैटर्न को औपचारिक रूप से लागू नहीं किया जाता, फिर भी वे एक प्रकार के सामाजिक नियमन को जन्म देते हैं, जिसमें नदी एक संगठित संदर्भ बिंदु के रूप में कार्य करती है. विशेष रूप से मौसमी बाढ़ बसावट के पैटर्न को बदल देती है और प्रशासनिक प्रतिक्रिया को प्रेरित करती है, जिससे शहरी आपात-तैयारी और नागरिक प्रबंधन में नदी की भूमिका और मजबूत होती है. उदाहरण के लिए, अगस्त 2025 में वाराणसी में आई भीषण बाढ़ के कारण गंगा नदी उफान पर आ गई, जिससे निचले इलाके जलमग्न हो गए, दैनिक जीवन प्रभावित हुआ और नाव सेवाएँ बंद करनी पड़ीं. इसके जवाब में राज्य सरकार ने राहत दल तैनात किए, आवश्यक आपूर्ति सुनिश्चित की और चौबीसों घंटे निगरानी शुरू की.

यदि शासन को ऐसा प्रक्रिया माना जाए जो लोगों के व्यवहार को दिशा देती है और जिम्मेदारियाँ तय करती है, तो नदी को शहर में एक व्यवस्था स्थापित करने वाली भूमिका निभाते हुए देखा जा सकता है. इससे पता चलता है कि नदियाँ भी नागरिक कारक की तरह शासन और फैसलों को प्रभावित कर सकती हैं. वाराणसी में गंगा केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि सामाजिक प्रथाओं और सरकारी प्रतिक्रियाओं को दिशा देने वाली महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है.

गंगा न तो मानव नागरिक है और न ही सिर्फ संसाधन, बल्कि एक ‘नागरिक कारक’ की तरह समाज और संस्थागत निर्णयों को प्रभावित करती है. यदि शासन को ऐसा प्रक्रिया माना जाए जो लोगों के व्यवहार को दिशा देती है और जिम्मेदारियाँ तय करती है, तो नदी को शहर में एक व्यवस्था स्थापित करने वाली भूमिका निभाते हुए देखा जा सकता है. इससे पता चलता है कि नदियाँ भी नागरिक कारक की तरह शासन और फैसलों को प्रभावित कर सकती हैं. वाराणसी में गंगा केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि सामाजिक प्रथाओं और सरकारी प्रतिक्रियाओं को दिशा देने वाली महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है.

लहरों का स्पर्श और शहरी आचरण

गंगा की नागरिक भूमिका सबसे स्पष्ट रूप से शहर के रोज़मर्रा के जीवन में दिखाई देती है, जहाँ यह केवल सांस्कृतिक गतिविधियों की पृष्ठभूमि नहीं होती, बल्कि सार्वजनिक स्थानों पर लोगों के व्यवहार को भी प्रभावित करती है. कई शहरों के विपरीत, जहाँ सार्वजनिक स्वच्छता नियमों या दंड से संचालित होती है, वाराणसी में यह प्रयास अक्सर सामुदायिक भागीदारी पर आधारित होते हैं. उदाहरण के लिए, अक्टूबर 2018 में लगभग 40 स्वयंसेवकों के एक समूह ने, जिनमें पर्वतारोही बछेंद्री पाल भी शामिल थीं, गंगा के किनारे स्वच्छता अभियान चलाया ताकि नदी प्रदूषण के प्रति जागरूकता बढ़ाई जा सके.

बाढ़ के समय और बाद में मलबा हटाने का काम नमामि गंगे जैसे सरकारी कार्यक्रमों और स्थानीय लोगों की भागीदारी से होता है, जो प्रदूषण कम करने, सीवेज सुधारने और नदी तट के ढांचे को बेहतर बनाने के प्रयासों से जुड़ा रहता है.

अवसंरचना परियोजनाएँ और पुनर्विकास पहल अक्सर नदी की स्थिति के अनुसार प्राथमिकता पाती हैं और उन्हें उसके संरक्षण के संदर्भ में प्रस्तुत किया जाता है. 2014 में शुरू किया गया नमामि गंगे कार्यक्रम, जिसके लिए 40,121 करोड़ रुपये से अधिक का प्रावधान किया गया, इसी नीतिगत प्राथमिकता को दर्शाता है.

नदी शहरी स्थान के संगठन और उपयोग को भी प्रभावित करती है, जिसमें घाटों पर होने वाले दाह-संस्कार भी शामिल हैं. एक नेशनल ज्योग्राफिक के विवरण के अनुसार, वाराणसी में अंतिम संस्कार की रस्में लगातार नदी तट पर होती रहती हैं, क्योंकि यह विश्वास है कि गंगा में अस्थियों का विसर्जन मोक्ष (मुक्ति) दिलाता है. ये स्थितियाँ दिखाती हैं कि वाराणसी में दाह-संस्कार जैसी प्रथाएं लकड़ी की खपत, प्रदूषण और असमान पहुँच की चुनौतियां पैदा करती हैं और नागरिक व्यवहार पर गंगा की मौजूदगी का गहरा प्रभाव होता है.

विकास की अनसुनी ध्वनि

गंगा नदी वाराणसी की अर्थव्यवस्था के केंद्र में है, जहाँ शहर की बड़ी संख्या में गतिविधियां सीधे या परोक्ष रूप से नदी से जुड़ी हुई हैं. 2014 से 2025 के बीच वाराणसी में 451.60 मिलियन से अधिक घरेलू और 2.87 मिलियन विदेशी पर्यटकों का आगमन दर्ज किया गया, जो यह दर्शाता है कि नदी शहर की अर्थव्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण प्रेरक शक्ति है.

भारत का सर्वोच्च न्यायालय ने इस निर्णय पर रोक लगा दी, फिर भी यह शासन ढांचों में प्रकृति को मान्यता देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था. इसी तरह के उदाहरण, जैसे न्यूज़ीलैंड में वांगानुई नदी को कानूनी व्यक्तित्व दिया जाना, यह दर्शाते हैं कि नीतियों के निर्माण में मानव और प्रकृति के संबंधों को नए तरीके से समझने की वैश्विक प्रवृत्ति बढ़ रही है.

गंगा नदी शहरी नियोजन के कई निर्णयों को भी प्रभावित करती है, जैसे सड़कों और जल निकासी (ड्रेनेज) की दिशा तय करना तथा नदी तट के घाटों को विरासत और नियोजन क्षेत्र के रूप में चिन्हित करना. अवसंरचना परियोजनाएँ और पुनर्विकास पहल अक्सर नदी की स्थिति के अनुसार प्राथमिकता पाती हैं और उन्हें उसके संरक्षण के संदर्भ में प्रस्तुत किया जाता है. 2014 में शुरू किया गया नमामि गंगे कार्यक्रम, जिसके लिए 40,121 करोड़ रुपये से अधिक का प्रावधान किया गया, इसी नीतिगत प्राथमिकता को दर्शाता है. हालांकि, लगभग 69 प्रतिशत धनराशि के ही उपयोग और कई हिस्सों में जल गुणवत्ता पर लगातार प्रदूषण के प्रभाव के कारण कार्यान्वयन में कमी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है.

गंगा एक ‘नागरिक कारक’  

आम तौर पर शासन को नियमों और संस्थाओं की ऐसी व्यवस्था माना जाता है जिसके माध्यम से राज्य लोगों, क्षेत्र और संसाधनों को नियंत्रित करता है. इसमें सक्रिय भूमिका मुख्यतः मनुष्यों को दी जाती है, जबकि प्रकृति को प्रबंधन की वस्तु के रूप में देखा जाता है. एंथ्रोपोसीन (Anthropocene) से जुड़ी बहसों ने भी इस दृष्टिकोण को और मजबूत किया है, जिसमें प्रकृति को मुख्यतः उपयोग और दोहन के संदर्भ में देखा जाता है. गंगा का उदाहरण दिखाता है कि नदी सिर्फ नीतियों से प्रभावित नहीं होती, बल्कि खुद भी शासन को प्रभावित करती है. प्रदूषण बढ़ने पर लोग सरकार से कार्रवाई की मांग करते हैं. इसलिए शासन नदी के प्रवाह, बाढ़ और पर्यावरण की स्थिति को ध्यान में रखकर निर्णय लेता है, जिससे गंगा एक महत्वपूर्ण नागरिक कारक बन जाती है.

नदी का कानूनी चेहरा

2017 में उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने गंगा और यमुना नदी को कानूनी व्यक्तित्व (legal person) का दर्जा देते हुए उन्हें एक जीवित इकाई के समान अधिकार, कर्तव्य और दायित्व प्रदान किए थे. हालांकि बाद में भारत का सर्वोच्च न्यायालय ने इस निर्णय पर रोक लगा दी, फिर भी यह शासन ढांचों में प्रकृति को मान्यता देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था. इसी तरह के उदाहरण, जैसे न्यूज़ीलैंड में वांगानुई नदी को कानूनी व्यक्तित्व दिया जाना, यह दर्शाते हैं कि नीतियों के निर्माण में मानव और प्रकृति के संबंधों को नए तरीके से समझने की वैश्विक प्रवृत्ति बढ़ रही है.

हालांकि भारत में यह बदलाव समान रूप से नहीं दिखता. यहाँ नदी शासन अभी भी मुख्य रूप से तकनीकी (टेक्नोक्रेटिक) दृष्टिकोण पर आधारित है, जिसमें सार्वजनिक व्यवहार को प्रभावित करने वाले सामाजिक और सांस्कृतिक पहलुओं का सीमित समावेश होता है. ‘स्वच्छ गंगा, निर्मल गंगा‘ जैसे संदेशों के माध्यम से अभियानों ने लोगों की भागीदारी बढ़ाने और नदी संरक्षण को नागरिक जिम्मेदारी से जोड़ने की कोशिश की है.

गंगा की रक्षा करना मानव-केंद्रित सोच को खत्म करना नहीं, बल्कि उसे नए और बेहतर तरीके से समझना है. इसका मतलब है कि गंगा को महत्वपूर्ण मानते हुए फैसले लेते समय प्रकृति, समाज और संस्थाओं-तीनों बातों को साथ में ध्यान में रखा जाए.

इस तनाव का एक प्रमुख उदाहरण पर्यावरणीय प्रवाह (ई-फ्लो) की अवधारणा है, जिसे नदी पारिस्थितिकी तंत्र को बनाए रखने के लिए आवश्यक जल प्रवाह व्यवस्था के रूप में परिभाषित किया जाता है. व्यवहार में, केंद्रीय जल आयोग जैसी संस्थाएँ ई-फ्लो को निश्चित सीमा और जल मात्रा के लक्ष्यों के माध्यम से लागू करती हैं. यह तरीका जरूरी तो है, लेकिन इसमें नदी को अक्सर सिर्फ एक ढांचे या संसाधन की तरह देखा जाता है. शहरों में लोग नदी को कैसे महसूस करते और इस्तेमाल करते हैं, इस पर कम ध्यान दिया जाता है. वाराणसी में नदी का उपयोग पानी की मात्रा के साथ उसकी गुणवत्ता और निरंतरता पर भी निर्भर करता है, इसलिए केवल आंकड़ों पर आधारित नीति कई पहलुओं को नजरअंदाज कर सकती है. 

21वीं सदी में शासन की पुनर्कल्पना

शासन में नदी की भूमिका मानने का मतलब यह नहीं है कि हमें पूरी तरह मानव-केंद्रित सोच छोड़नी होगी. गंगा को जो महत्व मिलता है, वह हमारी संस्कृति और समाज से जुड़ा है. इसलिए गंगा की रक्षा करना मानव-केंद्रित सोच को खत्म करना नहीं, बल्कि उसे नए और बेहतर तरीके से समझना है. इसका मतलब है कि गंगा को महत्वपूर्ण मानते हुए फैसले लेते समय प्रकृति, समाज और संस्थाओं-तीनों बातों को साथ में ध्यान में रखा जाए.

वाराणसी दिखाता है कि नदी लोगों के व्यवहार और नीतियों को प्रभावित करती है. इससे ऐसा शासन मॉडल बनता है जो मानव-नेतृत्व वाला होते हुए भी पर्यावरण और प्रकृति को ध्यान में रखता है.


प्रज्ञा तिवारी आईआईटी खड़गपुर में समाजशास्त्र की पीएचडी छात्रा हैं और उनका शोध लैंगिक स्थानिक अनुभवों, शहरी साझा संसाधनों और शहरी परिवर्तन पर केंद्रित है.

अमृता सेन आईआईटी खड़गपुर में समाजशास्त्र की सहायक प्रोफेसर हैं और पर्यावरण समाजशास्त्र और राजनीतिक पारिस्थितिकी पर काम कर रही हैं.

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Authors

Pragya Tiwari

Pragya Tiwari

Pragya Tiwari is a PhD Research Scholar in Sociology with the Department of Humanities and Social Sciences at the Indian Institute of Technology, Kharagpur. Her ...

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Amrita Sen

Amrita Sen

Dr. Amrita Sen is an Assistant Professor of Sociology with the Department of Humanities and Social Sciences at the Indian Institute of Technology Kharagpur. Trained ...

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