Author : Shairee Malhotra

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Published on Jan 22, 2026 Updated 5 Days ago

ज़ाइटेनवेंडे यानी जर्मनी की रणनीतिक बदलाव नीति ने भारत को सिर्फ़ व्यापारिक साझेदार नहीं बल्कि सुरक्षा और तकनीक का अहम हिस्सा बना दिया है. जानें यह बदलाव भारत–जर्मनी रिश्तों को कैसे नई दिशा दे रहा है.

ज़ाइटेनवेंडे: जर्मनी का भारत के साथ नया अध्याय

जर्मनी की ज़ाइटेनवेंडे (रणनीतिक बदलाव) नीति ने भारत को केवल एक आर्थिक साझेदार से आगे बढ़ाकर जर्मनी की सुरक्षा, व्यापार, प्रौद्योगिकी और जनसांख्यिकीय रणनीति का एक केंद्रीय स्तंभ बना दिया है. यह बदलाव ऐसे समय में हो रहा है जब वैश्विक व्यवस्था तेजी से बिखरती और अस्थिर होती जा रही है.

नवंबर 2024 में जब तत्कालीन जर्मन चांसलर ओलाफ़ शोल्ज़ भारत आए तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था-Alles klar, Alles gut यानी सब ठीक है, सब अच्छा है. यह कथन 2000 में शुरू हुई भारत–जर्मनी रणनीतिक साझेदारी की मौजूदा स्थिति को सही रूप में दर्शाता है.

मई 2025 में पद संभालने के बाद नए चांसलर फ़्रेडरिक़ मर्ज़ ने भारत को अपनी पहली एशियाई यात्रा का गंतव्य बनाकर रिश्तों को और ऊंचाई दी.

शोल्ज़ के कार्यकाल में जर्मन विदेश मंत्रालय द्वारा जारी फोकस ऑन इंडिया दस्तावेज़ में भारत की बढ़ती वैश्विक भूमिका को स्वीकार किया गया और सहयोग के लिए एक महत्वाकांक्षी रोडमैप प्रस्तुत किया गया. इसी आधार को आगे बढ़ाते हुए, मई 2025 में पद संभालने के बाद नए चांसलर फ़्रेडरिक़ मर्ज़ ने भारत को अपनी पहली एशियाई यात्रा का गंतव्य बनाकर रिश्तों को और ऊंचाई दी. आठवें अंतर-सरकारी परामर्श (IGC) के तहत भारत और जर्मनी के बीच रक्षा, हरित ऊर्जा, प्रौद्योगिकी, शिक्षा और लोगों के बीच संपर्क जैसे क्षेत्रों में 19 समझौता ज्ञापनों (MoUs) पर हस्ताक्षर किए गए.

सहयोग के नए आधार

यूक्रेन युद्ध के बाद रूस के खिलाफ जर्मनी की नीति में आए बदलाव-यानी ज़ाइटेनवेंडे - के तहत हथियार निर्यात से जुड़े सख्त नियमों में ढील दी गई. इसके साथ ही, भारत द्वारा विदेशी रक्षा कंपनियों के लिए नियम आसान किए जाने से दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग तेज़ी से बढ़ा है.

इसका प्रमुख उदाहरण जर्मनी की थिसेनक्रुप मरीन सिस्टम्स (TKMS) और भारत की मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड के बीच भारत में पनडुब्बियों के संयुक्त निर्माण के लिए किया गया लगभग €8 अरब का सौदा है. भारत के लिए यह मेक इन इंडिया के तहत अब तक की सबसे बड़ी रक्षा परियोजना मानी जा रही है जिससे रक्षा आधुनिकीकरण, स्वदेशीकरण और उन्नत तकनीक हस्तांतरण को बढ़ावा मिलेगा. वहीं जर्मनी के लिए यह भारत के बड़े रक्षा बाज़ार में हिस्सेदारी बढ़ाने और भारत की रूसी हथियारों पर निर्भरता कम करने का अवसर है. साथ ही, यूरोप के पुनः सैन्यीकरण के दौर में यह सौदा जर्मनी के घरेलू रक्षा उद्योग को भी मज़बूती देगा क्योंकि भारत में निर्माण की लागत यूरोप की तुलना में कम है.

जैसे-जैसे जर्मनी भारत के लिए एक महत्वपूर्ण सुरक्षा साझेदार बनता जा रहा है, यही उभरता हुआ सुरक्षा आयाम भारत–जर्मनी संबंधों को नई गति दे रहा है और साझेदारी को अधिक रणनीतिक स्वरूप दे रहा है.

TKMS ने संकेत दिया है कि वह भारत को पनडुब्बियों के वैश्विक निर्माण केंद्र के रूप में विकसित करना चाहता है. दोनों देशों के 37-बिंदुओं वाले संयुक्त वक्तव्य में दीर्घकालिक सह-विकास और सह-उत्पादन के लिए एक रोडमैप बनाने पर सहमति बनी है. 2024 में यह सहयोग और स्पष्ट हुआ, जब वर्ष की पहली छमाही में भारत जर्मन हथियारों का तीसरा सबसे बड़ा खरीदार रहा.

इंडो-पैसिफिक में सुरक्षा सहयोग

भारत–जर्मनी सुरक्षा सहयोग अब केवल हथियार सौदों तक सीमित नहीं है. इसमें इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में जर्मनी की बढ़ती सैन्य मौजूदगी जैसे 2024 में जर्मन युद्धपोत बैडेन-वुर्टेम्बर्ग का गोवा बंदरगाह पर आना, दोनों सेनाओं के संयुक्त सैन्य अभ्यास (जैसे आगामी तरंग शक्ति और मिलान अभ्यास), लॉजिस्टिक सहयोग समझौता और इंफॉर्मेशन फ्यूज़न सेंटर–इंडियन ओशन रीजन (IFC-IOR) में जर्मन संपर्क अधिकारी की तैनाती शामिल है.

भारत और जर्मनी, दोनों इंडो-पैसिफिक को वैश्विक व्यापार और समुद्री मार्गों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मानते हैं. चीन की आक्रामक रणनीति के कारण इस क्षेत्र में बढ़ती अनिश्चितता ने दोनों देशों को एक-दूसरे के और करीब ला दिया है. जैसे-जैसे जर्मनी भारत के लिए एक महत्वपूर्ण सुरक्षा साझेदार बनता जा रहा है, यही उभरता हुआ सुरक्षा आयाम भारत–जर्मनी संबंधों को नई गति दे रहा है और साझेदारी को अधिक रणनीतिक स्वरूप दे रहा है.

व्यापार और निवेश इस रिश्ते के अहम स्तंभ बने हुए हैं. जर्मनी यूरोपीय संघ की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और भारत का यूरोप में सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार भी है, जो भारत–ईयू कुल व्यापार का लगभग 25 प्रतिशत हिस्सा है. स्वाभाविक रूप से, जर्मन उद्योग जगत ईयू–भारत मुक्त व्यापार समझौते (FTA) को लेकर उत्सुक है, जिसकी वार्ता आगामी ईयू–भारत शिखर सम्मेलन तक पूरी होने की संभावना है.

चीन के साथ व्यापार जारी रहेगा, लेकिन जर्मनी अब अपने व्यापारिक साझेदारों में विविधता ला रहा है, और भारत एक वैकल्पिक विनिर्माण और निवेश केंद्र के रूप में उभर रहा है.

पारंपरिक रूप से चीन जर्मन विदेश नीति और एशिया में जर्मन कंपनियों का मुख्य केंद्र रहा है लेकिन बीजिंग की अनुचित व्यापार नीतियों और यूरोपीय देशों के साथ बढ़ते व्यापार घाटे के कारण ईयू–चीन व्यापार तनाव बढ़ रहा है. ऐसे में भारत पर जर्मनी का ध्यान बढ़ा है, खासकर तब जब जर्मन अर्थव्यवस्था लगातार तीसरे वर्ष मंदी से मुश्किल से बच पाई. हालाँकि चीन के साथ व्यापार जारी रहेगा, लेकिन जर्मनी अब अपने व्यापारिक साझेदारों में विविधता ला रहा है, और भारत एक वैकल्पिक विनिर्माण और निवेश केंद्र के रूप में उभर रहा है.

भारत में पहले से मौजूद 2,000 से अधिक जर्मन कंपनियां अपने निवेश का विस्तार कर रही हैं. मर्ज़ भी शोल्ज़ की तरह बड़े कारोबारी प्रतिनिधिमंडल के साथ भारत आए, जिसमें 23 शीर्ष जर्मन सीईओ शामिल थे. फिर भी, व्यापार के आँकड़े एक बड़ा अंतर दिखाते हैं-2024 में भारत–जर्मनी द्विपक्षीय व्यापार लगभग 50 अरब अमेरिकी डॉलर था, जबकि उसी वर्ष जर्मनी–चीन व्यापार करीब 275 अरब डॉलर का रहा. ऐसे में मर्ज़ की आगामी चीन यात्रा और वहाँ जर्मनी की व्यापार नीति को लेकर उनके रुख पर सबकी नज़र रहेगी.

प्रौद्योगिकी, हरित ऊर्जा और भविष्य की साझेदारी

महत्वपूर्ण और उभरती तकनीकों के क्षेत्र में दोनों देशों ने सेमीकंडक्टर, महत्वपूर्ण खनिज, दूरसंचार और डिजिटलाइजेशन पर संयुक्त घोषणाएँ की हैं, ताकि आर्थिक मजबूती और तकनीकी आत्मनिर्भरता बढ़ाई जा सके. गुजरात यात्रा के बाद मर्ज़ बेंगलुरु पहुँचे, जहाँ जर्मनी ने स्वच्छ ऊर्जा, इंजीनियरिंग और अन्य तकनीकों में उल्लेखनीय निवेश किया है.

ग्रीन और सतत विकास साझेदारी के तहत जर्मनी ने भारत में सतत विकास परियोजनाओं के लिए अपने €10 अरब के वादे में से €5 अरब अलग रखे हैं. इसके साथ ही हरित हाइड्रोजन के लिए एक रोडमैप भी तैयार किया गया है. कुल मिलाकर, ज़ाइटेनवेंडे के बाद जर्मनी और भारत का रिश्ता केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सुरक्षा, प्रौद्योगिकी और वैश्विक स्थिरता के लिए एक व्यापक और रणनीतिक साझेदारी में बदलता जा रहा है.

आवागमन और प्रवासन भारत–जर्मनी सहयोग के नए और अहम क्षेत्र बनकर उभरे हैं. भारत का कुशल कार्यबल, जर्मनी की वृद्ध होती आबादी के कारण पैदा हुई श्रम कमी को पूरा करने में सक्षम है. आकलनों के अनुसार, जर्मन अर्थव्यवस्था को हर वर्ष विदेशों से लगभग 4 लाख कुशल कामगारों की आवश्यकता होती है. इसी पृष्ठभूमि में 2022 में दोनों देशों ने माइग्रेशन एंड मोबिलिटी पार्टनरशिप एग्रीमेंट (MMPA) पर हस्ताक्षर किए, जिसके तहत भारतीय कामगारों की जर्मनी में आवाजाही आसान हुई. इसके परिणामस्वरूप जर्मन वीज़ा कोटा 20,000 से बढ़कर 90,000 हो गया. यह साझेदारी भारत में बेरोज़गारी की समस्या को कम करने में भी सहायक है.

जर्मनी की तकनीकी ताकत को भारत की आधुनिकीकरण आवश्यकताओं से जोड़ना, जर्मनी की जनसांख्यिकीय कमी को भारत के जनसांख्यिकीय लाभ से संतुलित करना और वैश्विक दक्षिण के साथ जुड़ने की जर्मन इच्छा को उसमें भारत की प्रमुख भूमिका से जोड़ना-यह सब एक स्पष्ट विन-विन स्थिति बनाता है.

जर्मनी में लगभग 3 लाख की भारतीय प्रवासी आबादी है, जिसमें आईटी और STEM पेशेवर, स्वास्थ्यकर्मी, छात्र और शोधकर्ता प्रमुख रूप से शामिल हैं. फ्रेडरिक मर्ज़ की भारत यात्रा के बाद जर्मनी भारतीय नागरिकों को वीज़ा-फ्री ट्रांज़िट सुविधा देगा और MMPA के तहत कुशल कानूनी प्रवासन को और बढ़ाएगा. विशेष रूप से स्वास्थ्य क्षेत्र पर केंद्रित एक ग्लोबल स्किल्स पार्टनरशिप भी स्थापित की जाएगी. हालांकि, जर्मनी के घरेलू राजनीतिक माहौल में आव्रजन के प्रति बढ़ती नाराज़गी, खासकर दक्षिणपंथी दलों की लोकप्रियता को देखते हुए, मर्ज़ के लिए एक बड़ी चुनौती बनी रहेगी.

शिक्षा के क्षेत्र में, उच्च शिक्षा पर एक भारत–जर्मनी रोडमैप तैयार किया गया है. वर्तमान में लगभग 60,000 भारतीय छात्र जर्मनी में पढ़ रहे हैं, जो वहाँ के सबसे बड़े अंतरराष्ट्रीय छात्र समूह हैं. अमेरिका की कड़ी होती छात्र नीतियों के कारण यह संख्या आगे और बढ़ने की संभावना है.

एक सुदृढ़ भारत–जर्मनी साझेदारी

भारत दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है और जल्द ही जर्मनी को पीछे छोड़कर तीसरी सबसे बड़ी वैश्विक अर्थव्यवस्था बनने की ओर अग्रसर है. वहीं, उन्नत तकनीकी क्षमताओं के कारण जर्मनी को भारत के औद्योगिक परिवर्तन और विकास में एक महत्वपूर्ण साझेदार माना जाता है. जर्मनी की तकनीकी ताकत को भारत की आधुनिकीकरण आवश्यकताओं से जोड़ना, जर्मनी की जनसांख्यिकीय कमी को भारत के जनसांख्यिकीय लाभ से संतुलित करना और वैश्विक दक्षिण के साथ जुड़ने की जर्मन इच्छा को उसमें भारत की प्रमुख भूमिका से जोड़ना-यह सब एक स्पष्ट विन-विन स्थिति बनाता है.

जर्मनी के भीतर हुए बदलावों ने भी द्विपक्षीय संबंधों को मजबूती दी है. ज़ाइटेनवेंडे के तहत जर्मनी ने अपनी पारंपरिक सुरक्षा और व्यापारिक निर्भरताओं पर पुनर्विचार किया है और रक्षा निवेश बढ़ाने की दिशा में कदम उठाए हैं. यदि जर्मनी अपने रक्षा खर्च को GDP के 3.5 प्रतिशत तक ले जाता है तो वह यूरोपीय सुरक्षा ढांचे का एक प्रमुख स्तंभ बन सकता है.

वर्तमान वैश्विक भू-राजनीतिक हालात ने भारत–जर्मनी संबंधों को और मजबूत करने की तात्कालिकता बढ़ा दी है. अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल ने न केवल ट्रांस-अटलांटिक संबंधों को प्रभावित किया है बल्कि भारत–अमेरिका संबंधों की दिशा को भी जटिल बनाया है. ऐसे में, भारत–यूरोपीय संघ संबंधों और विशेष रूप से जर्मनी जैसे प्रमुख सदस्य देशों के साथ भारत के रिश्तों को एक अस्थिर होती वैश्विक व्यवस्था में स्थिरता के आधार के रूप में देखा जा रहा है. एक सशक्त और समेकित भारत–जर्मनी साझेदारी, भविष्य में EU–India संबंधों को और गहराई देने की मजबूत नींव बन सकती है.


शाइरी मल्होत्रा   ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में सामरिक अध्ययन कार्यक्रम की उप निदेशक हैं. 

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Shairee Malhotra

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Shairee Malhotra is Deputy Director - Strategic Studies Programme at the Observer Research Foundation.  Her areas of work include Indian foreign policy with a focus on ...

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