अमेरिका की कार्रवाई ने वेनेज़ुएला में रूस की सीमित ताकत को उजागर कर दिया है जहाँ मॉस्को कूटनीतिक विरोध से आगे नहीं बढ़ पाया. यूक्रेन को सर्वोच्च प्राथमिकता मानते हुए रूस ने लैटिन अमेरिका को द्वितीयक मोर्चा माना है-इसका असर क्या है और रूस की रणनीति कैसे सिमट रही है, जानें.
वेनेज़ुएला पर हालिया अमेरिकी हमलों और वहाँ के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की गिरफ्तारी ने इस क्षेत्र में रूस के हितों को झटका दिया है. वाशिंगटन की कार्रवाई को लैटिन अमेरिका में अपनी पकड़ फिर से मजबूत करने के प्रयास के रूप में देखा जा सकता है जिसका उद्देश्य वेनेज़ुएला के तेल संसाधनों पर प्रभाव बढ़ाना और रूस तथा चीन की भूमिका को सीमित करना है. काराकास के प्रमुख समर्थक रूस और चीन ने इस कार्रवाई की निंदा की है और मादुरो की रिहाई की मांग की है. हालांकि, यह संभावना कम है कि इनमें से कोई भी देश वेनेज़ुएला की स्थिति को बदल पाएगा. यूक्रेन को लेकर अमेरिका के साथ चल रही बातचीत को देखते हुए, रूस के लिए यह भी असंभव है कि वह इन वार्ताओं को खतरे में डाले. मादुरो की गिरफ्तारी का मतलब यह नहीं है कि रूस इस क्षेत्र से पीछे हट रहा है क्योंकि मादुरो की सरकार अब भी कायम है. फिर भी, इसके बाद की घटनाएं-जैसे अमेरिकी नौसेना द्वारा वेनेज़ुएला का तेल ले जा रहे रूसी-ध्वज वाले जहाजों की जब्ती-इस क्षेत्र में रूस की सीमित शक्ति को उजागर करती हैं और विदेशों में अपने साझेदारों के हितों की रक्षा करने की रूस की क्षमता पर सवाल खड़े करती हैं.
अब तक रूस की प्रतिक्रिया काफी संयमित रही है. मादुरो की गिरफ्तारी के तुरंत बाद रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने इस कार्रवाई की निंदा की और राष्ट्रपति की तत्काल रिहाई की मांग की. बाद में लावरोव ने वेनेज़ुएला की उपराष्ट्रपति डेल्सी रोड्रिगेज से फोन पर बात कर बोलीवेरियन गणराज्य के प्रति रूस के समर्थन को दोहराया. राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने वेनेज़ुएला पर कोई विस्तृत सार्वजनिक बयान नहीं दिया, सिवाय ब्राज़ील के राष्ट्रपति लुइज़ इनासियो लूला दा सिल्वा से फोन पर हुई बातचीत में स्थिति का संक्षिप्त उल्लेख करने के. मादुरो और पुतिन के करीबी व्यक्तिगत संबंधों को देखते हुए, संकट में रूस की सीमित सक्रियता-हालांकि आश्चर्यजनक नहीं-क्षेत्र में उसके हितों के लिए एक झटका है. रूस की बार-बार की गई निंदा के बावजूद, अमेरिकी नौसेना ने वेनेज़ुएला का तेल ले जा रहे रूसी जहाजों को जब्त करना जारी रखा है.
रूसी विशेषज्ञों के अनुसार, वाशिंगटन की कार्रवाई के दो मुख्य कारण हैं. पहला, अमेरिका के भीतर घरेलू राजनीति-खासतौर पर मध्यावधि चुनावों में क्यूबाई और वेनेज़ुएलाई प्रवासी मतदाताओं का समर्थन हासिल करना. दूसरा, तेल और गैस से समृद्ध लेकिन शत्रुतापूर्ण देश पर नियंत्रण स्थापित करना, ताकि पश्चिमी गोलार्ध में अमेरिकी प्रभुत्व को मजबूत किया जा सके.
मादुरो की गिरफ्तारी का मतलब यह नहीं है कि रूस इस क्षेत्र से पीछे हट रहा है क्योंकि मादुरो की सरकार अब भी कायम है. फिर भी, इसके बाद की घटनाएं-जैसे अमेरिकी नौसेना द्वारा वेनेज़ुएला का तेल ले जा रहे रूसी-ध्वज वाले जहाजों की जब्ती-इस क्षेत्र में रूस की सीमित शक्ति को उजागर करती हैं और विदेशों में अपने साझेदारों के हितों की रक्षा करने की रूस की क्षमता पर सवाल खड़े करती हैं.
इन आकलनों से स्पष्ट होता है कि रूस की व्यापक वैश्विक रणनीति में वेनेज़ुएला का स्थान प्राथमिक नहीं, बल्कि एक द्वितीयक क्षेत्र के रूप में है. यद्यपि लैटिन अमेरिका में रूस की उपस्थिति उसके लिए प्रतीकात्मक और रणनीतिक महत्व रखती है, फिर भी मॉस्को वेनेज़ुएला को ऐसा मोर्चा नहीं मानता जहाँ वह अमेरिका के साथ सीधे टकराव का जोखिम उठाए. ट्रंप प्रशासन के तहत वाशिंगटन ने पश्चिमी गोलार्ध में अपनी पकड़ को दोबारा मजबूत करने के प्रयास तेज किए हैं, विशेष रूप से वे देशों में जहाँ रूस और चीन की उपस्थिति बढ़ी थी. इन प्रयासों को मॉस्को ने खुलकर चुनौती देने के बजाय परोक्ष रूप से स्वीकार किया है.
इस संयम के पीछे सबसे बड़ा कारण यूक्रेन को लेकर अमेरिका के साथ चल रही वार्ता हैं, जिन्हें रूस कहीं अधिक महत्वपूर्ण मानता है. यूक्रेन रूस की सुरक्षा, क्षेत्रीय प्रभाव और यूरोपीय शक्ति-संतुलन से सीधे जुड़ा हुआ मुद्दा है. ऐसे में रूस यह जोखिम नहीं लेना चाहता कि वेनेज़ुएला जैसे अपेक्षाकृत कम महत्वपूर्ण क्षेत्र में आक्रामक रुख अपनाकर वह यूक्रेन पर संभावित अनुकूल समझौते की संभावना को नुकसान पहुँचाए.
इसके अलावा, भौगोलिक दूरी और लैटिन अमेरिका में अमेरिका की पारंपरिक प्रभुता भी रूस की रणनीतिक गणना को प्रभावित करती है. मॉस्को समझता है कि इस क्षेत्र में उसके पास न तो पर्याप्त सैन्य पहुँच है और न ही त्वरित हस्तक्षेप की क्षमता. परिणामस्वरूप, रूस की नीति वेनेज़ुएला के मामले में मुख्यतः कूटनीतिक बयानबाज़ी और राजनीतिक समर्थन तक सीमित रही है. यह स्थिति दर्शाती है कि वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों में रूस अपने संसाधनों और प्राथमिकताओं को सावधानीपूर्वक संतुलित कर रहा है, जहाँ यूक्रेन सर्वोच्च प्राथमिकता बना हुआ है.
सहायता के सवाल पर रूसी विशेषज्ञों ने भौगोलिक दूरी और क्षेत्रीय भू-राजनीतिक सीमाओं की ओर इशारा किया है. उनका मानना है कि रूस का समर्थन मुख्यतः राजनीतिक ही रहेगा-कूटनीतिक संकेतों तक सीमित और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर चिंता जताने तक. कुल मिलाकर, वेनेज़ुएला रूस के लिए एक द्वितीयक मोर्चा है, जहाँ अमेरिका के दबदबे को मॉस्को ने यूक्रेन वार्ताओं के कारण मौन रूप से स्वीकार किया है.
लैटिन अमेरिका में रूस की रणनीति में वेनेज़ुएला का खास स्थान है. 7 मई 2025 को मॉस्को में पुतिन और मादुरो ने रणनीतिक साझेदारी और सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर किए. इस समझौते का उद्देश्य ऊर्जा, रक्षा, खनन, अर्थव्यवस्था और प्रतिबंधों का मुकाबला करने जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाना था. 2000 के दशक से रूस वेनेज़ुएला का प्रमुख सैन्य आपूर्तिकर्ता रहा है, जिसने सु-30एमकेआई लड़ाकू विमान, एमआई-35 और एमआई-17 हेलीकॉप्टर, स्वचालित तोपें और एस-300वीएम जैसी वायु रक्षा प्रणालियाँ उपलब्ध कराईं.
लैटिन अमेरिका में रूस की उपस्थिति उसके लिए प्रतीकात्मक और रणनीतिक महत्व रखती है, फिर भी मॉस्को वेनेज़ुएला को ऐसा मोर्चा नहीं मानता जहाँ वह अमेरिका के साथ सीधे टकराव का जोखिम उठाए.
ऊर्जा क्षेत्र में साझेदारी तब मजबूत हुई जब वेनेज़ुएला ने अपने तेल उद्योग पर राज्य नियंत्रण बढ़ाया, जिससे एक्सॉनमोबिल और कॉनोकोफिलिप्स जैसी अमेरिकी कंपनियां बाहर हो गईं. तेल उद्योग को पुनर्जीवित करने के लिए वेनेज़ुएला को भारी निवेश की जरूरत थी. देश के पास 300 अरब बैरल से अधिक तेल है, लेकिन इसका बड़ा हिस्सा भारी और सल्फर-युक्त है, जिसे निर्यात से पहले विशेष तकनीक से परिष्कृत करना पड़ता है. इसी कारण वेनेज़ुएला ने रूस की ओर रुख किया. रूसी तेल कंपनियों ने आर्थिक कारणों से-न कि केवल भू-राजनीति के लिए-पीडीवीएसए के साथ संयुक्त परियोजनाओं में निवेश किया और ओरिनोको तेल क्षेत्र में काम किया.
रूस की रणनीति में, क्यूबा के अलावा वेनेज़ुएला शक्ति-प्रदर्शन का दूसरा माध्यम बना. इसी नजदीकी के चलते 2009 में वेनेज़ुएला ने 2008 के रूस-जॉर्जिया युद्ध के बाद अबखाज़िया और दक्षिण ओसेतिया को मान्यता दी.
अगले दशक में संबंध और गहरे हुए, खासकर 2014 में क्रीमिया के विलय और पश्चिमी प्रतिबंधों के बाद. रूस के लिए अमेरिका को खुली चुनौती देने वाली गैर-पश्चिमी सरकारों का समर्थन प्राथमिकता बन गया. इस दौर में ऊर्जा और सैन्य सहयोग बढ़ा, नए ऋण दिए गए और 2019 के विरोध प्रदर्शनों के दौरान वैगनर लड़ाकों को भी भेजा गया. रूस ने बीते वर्षों में वेनेज़ुएला को प्रतिबंधों से बचने में भी मदद की.
यूक्रेन पर आक्रमण के बाद रूस की वैश्विक स्तर पर प्रभाव डालने की क्षमता में स्पष्ट गिरावट देखी गई है. एक समय जिस रूस को एक सक्रिय और प्रभावी वैश्विक शक्ति के रूप में देखा जाता था, उसकी भूमिका अब कई क्षेत्रों में सीमित होती जा रही है. इसका एक बड़ा कारण यूक्रेन युद्ध में फँसा रहना है, जिसने रूस के सैन्य, आर्थिक और कूटनीतिक संसाधनों पर भारी दबाव डाला है. इसके साथ ही, भौगोलिक दूरी और वेनेज़ुएला जैसे साझेदार देशों में मौजूद आंतरिक समस्याएं-जैसे भ्रष्टाचार, प्रशासनिक अक्षमता और आर्थिक कुप्रबंधन-ने भी रूस की वहाँ प्रभावी भूमिका निभाने की क्षमता को कमजोर किया है.
आने वाले समय में रूस की अंतरराष्ट्रीय स्थिति काफी हद तक यूक्रेन युद्ध के परिणाम पर निर्भर करेगी, जो उसकी भविष्य की वैश्विक भूमिका और रणनीतिक क्षमता को निर्णायक रूप से आकार देगा.
यूक्रेन संकट को लेकर अमेरिका के साथ चल रही वार्ताओं ने रूस को अपनी प्राथमिकताएं तय करने के लिए मजबूर किया है. यूरोपीय सुरक्षा व्यवस्था और यूक्रेन में अपने रणनीतिक लक्ष्यों को साधने के प्रयास में रूस ने अनिवार्य रूप से अन्य क्षेत्रों, विशेष रूप से लैटिन अमेरिका, को कम महत्व दिया है. इसका परिणाम यह हुआ है कि वेनेज़ुएला जैसे देशों में रूस की मौजूदगी और प्रभाव धीरे-धीरे सीमित होते जा रहे हैं, जबकि अमेरिका ने इस अवसर का लाभ उठाते हुए अपने प्रभाव को फिर से मजबूत किया है.
हालांकि अल्पकाल में रूस को भारी आर्थिक नुकसान नहीं हुआ है. उसकी तेल कंपनी अभी भी ओरिनोको क्षेत्र में अपनी गतिविधियां जारी रखे हुए है, जो यह संकेत देता है कि मॉस्को पूरी तरह पीछे हटने के पक्ष में नहीं है. फिर भी, व्यापक दृष्टि से देखें तो रूस की रणनीतिक पहुँच और वैश्विक प्रभाव में गिरावट साफ नजर आती है. सीरिया में प्रभाव कम होना, ईरान से जुड़े घटनाक्रमों में सीमित भूमिका और वेनेज़ुएला में अमेरिकी कार्रवाइयों को रोकने में असमर्थता-ये सभी संकेत देते हैं कि रूस की वैश्विक शक्ति सिमट रही है. आने वाले समय में रूस की अंतरराष्ट्रीय स्थिति काफी हद तक यूक्रेन युद्ध के परिणाम पर निर्भर करेगी, जो उसकी भविष्य की वैश्विक भूमिका और रणनीतिक क्षमता को निर्णायक रूप से आकार देगा.
राजोली सिद्धार्थ जयप्रकाश ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में जूनियर फेलो हैं.
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Rajoli Siddharth Jayaprakash is a Junior Fellow with the ORF Strategic Studies programme, focusing on Russia’s foreign policy and economy, and India-Russia relations. Siddharth is a ...
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