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दुनिया में लगभग 75% मौतें गैर-संचारी रोगों से जुड़ी हैं और शोध बताते हैं कि अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड इसकी बड़ी वजह हैं. भारत से अमेरिका और यूरोप तक फैलते इस चलन ने मोटापा, मधुमेह और हृदय रोग को कैसे वैश्विक संकट बनाया- इस लेख में वही पड़ताल है.
Image Source: Pexels
अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड (Ultra-Processed Foods -UPFs) आज भारत सहित दुनिया भर में पोषण और स्वास्थ्य के लिए एक गंभीर चुनौती बन चुके हैं. ये खाद्य पदार्थ भारत के पोषण संक्रमण को तेज़ कर रहे हैं जिससे मोटापा, मधुमेह, हृदय रोग जैसे गैर-संचारी रोग (NCDs) तेज़ी से बढ़ रहे हैं. साथ ही, ये कुपोषण के दोहरे बोझ को भी गहरा कर रहे हैं, जहाँ एक ही समय में अल्पपोषण और मोटापा दोनों मौजूद हैं.
गैर-संचारी रोगों में हृदय रोग, मधुमेह, कैंसर और लंबे समय की श्वसन बीमारियाँ शामिल हैं जो दुनिया में होने वाली लगभग तीन-चौथाई मौतों के लिए ज़िम्मेदार हैं. ये रोग स्वास्थ्य व्यवस्था और अर्थव्यवस्था दोनों पर बोझ डालते हैं. इनके कारणों में अस्वास्थ्यकर खान-पान एक प्रमुख और बदला जा सकने वाला कारण है और बढ़ते प्रमाण बताते हैं कि अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड इस संकट का अहम कारण हैं.
अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड (Ultra-Processed Foods -UPFs) आज भारत सहित दुनिया भर में पोषण और स्वास्थ्य के लिए एक गंभीर चुनौती बन चुके हैं.
अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड ऐसे औद्योगिक उत्पाद होते हैं जिन्हें परिष्कृत खाद्य पदार्थों, रसायनों, रंगों, स्वाद बढ़ाने वाले तत्वों और प्रिज़र्वेटिव्स से तैयार किया जाता है. आमतौर पर इनमें संतृप्त वसा, चीनी और नमक की मात्रा अधिक होती है जबकि फाइबर, प्रोटीन और ज़रूरी सूक्ष्म पोषक तत्व कम होते हैं. चिप्स, पैकेट वाले स्नैक्स, शक्करयुक्त पेय, इंस्टेंट नूडल्स, बिस्कुट, पैकेज्ड मिठाइयाँ और कई रेडी-टू-ईट उत्पाद इसी श्रेणी में आते हैं.
दुनिया भर में UPFs की बढ़ती खपत को “पोषण संक्रमण” से जोड़ा जाता है. इसका अर्थ है पारंपरिक, कम प्रोसेस्ड और घर में बने भोजन से हटकर ऐसे भोजन की ओर बढ़ना, जो ज़्यादा कैलोरी वाला, सुविधाजनक और जल्दी तैयार होने वाला हो. यह बदलाव शहरीकरण, आय में वृद्धि, खाद्य प्रणालियों के वैश्वीकरण, आक्रामक विज्ञापन और बदलती जीवनशैली के कारण हुआ है. भारत जैसे निम्न और मध्यम आय वाले देशों में यह बदलाव बहुत तेज़ी से हुआ है लेकिन इसके साथ आवश्यक नियम और सुरक्षा उपाय विकसित नहीं हो पाए. नतीजतन, यहाँ कुपोषण और मोटापा दोनों साथ-साथ बढ़ रहे हैं.
भारत जैसे निम्न और मध्यम आय वाले देशों में यह बदलाव बहुत तेज़ी से हुआ है लेकिन इसके साथ आवश्यक नियम और सुरक्षा उपाय विकसित नहीं हो पाए.
भारत इस बदलाव के स्वास्थ्य प्रभावों का एक स्पष्ट उदाहरण है. ग्लोबल बर्डन ऑफ डिज़ीज़ (GBD) के अनुसार, भारत में गैर-संचारी रोगों से होने वाली मौतों में आहार से जुड़े जोखिम प्रमुख कारण हैं, खासकर हृदय रोग और मधुमेह. वर्ष 2016 में भारत में कुल मौतों का एक-चौथाई से अधिक हिस्सा हृदय रोगों के कारण था. वहीं 1990 से 2019 के बीच गैर-संचारी रोगों से होने वाली समय से पहले मौतों की संख्या लगभग दोगुनी हो गई.
राष्ट्रीय सर्वेक्षण भी इस ओर इशारा करते हैं कि शहरी और ग्रामीण- दोनों क्षेत्रों में मोटापा और अधिक वजन तेज़ी से बढ़ रहा है. 2005-06 से 2019-20 के बीच वयस्कों में मोटापा और अधिक वजन 10 प्रतिशत से अधिक बढ़ा है. बच्चों और किशोरों में भी यह प्रवृत्ति चिंता का विषय है. कम उम्र में मोटापा आगे चलकर मधुमेह और हृदय रोग का खतरा कई गुना बढ़ा देता है. भारत में किए गए आहार संबंधी अध्ययनों से पता चलता है कि मिठाइयों, नमकीन स्नैक्स और परिष्कृत कार्बोहाइड्रेट से भरपूर आहार टाइप-2 मधुमेह और हृदय संबंधी बीमारियों के जोखिम को बढ़ाता है. बाज़ार अध्ययनों से पता चलता है कि भारत और दुनिया भर में अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड की बिक्री तेज़ी से बढ़ रही है क्योंकि ये सुविधाजनक होते हैं और लंबे समय तक चलते हैं. बड़ी खाद्य कंपनियाँ ऐसे बाज़ारों पर ध्यान दे रही हैं जहाँ नियम कम सख्त हैं और माँग बढ़ रही है. शोध बताते हैं कि सोशल मीडिया पर इन खाद्यों के विज्ञापन बच्चों और किशोरों को ज़्यादा प्रभावित करते हैं जिससे कम उम्र में मोटापा और दूसरी स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है.
अंततः, अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड का बढ़ता प्रभाव केवल एक स्वास्थ्य समस्या नहीं बल्कि विकास और भविष्य की पीढ़ियों से जुड़ा सवाल है.
वैज्ञानिक अध्ययनों से यह संबंध और स्पष्ट होता है. यूरोप और अमेरिका में किए गए शोध बताते हैं कि अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड का अधिक सेवन हृदय रोग, स्ट्रोक और समय से पहले मृत्यु के जोखिम को बढ़ाता है. एक नियंत्रित प्रयोग में यह भी पाया गया कि जब लोगों को अल्ट्रा-प्रोसेस्ड भोजन दिया गया तो उन्होंने बिना भूख बढ़े ही ज़्यादा कैलोरी ली और उनका वजन तेज़ी से बढ़ा. इससे संकेत मिलता है कि केवल चीनी, नमक या वसा ही समस्या नहीं हैं बल्कि भोजन की बनावट, तीखा स्वाद और जल्दी खा पाने की सुविधा भी अधिक खाने की आदत को बढ़ावा देती है जो लंबे समय में स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह हो सकती है.
इसके बावजूद, UPFs को नियंत्रित करने के लिए नीतिगत कदम कई देशों में अपर्याप्त हैं. नियम अक्सर बिखरे हुए हैं, कई उपाय स्वैच्छिक हैं और आर्थिक दंड कम है. शोध बताते हैं कि पैकेट के सामने स्पष्ट चेतावनी लेबल, बच्चों के लिए विज्ञापन पर रोक और शक्करयुक्त पेयों पर कर जैसे कदम प्रभावी साबित हो सकते हैं. चिली जैसे देशों ने सख़्त लेबलिंग और विज्ञापन प्रतिबंध लागू कर उपभोक्ता व्यवहार में बदलाव दिखाया है. कनाडा और ब्रिटेन ने भी अपने खाद्य और संचार कानूनों में बदलाव कर ऐसे नियम लागू किए हैं.
UPFs और गैर-संचारी रोगों के बीच संबंध से निपटने के लिए पूरे खाद्य तंत्र में सुधार की ज़रूरत है. इसमें सख़्त नियम, कर नीति, उपभोक्ता शिक्षा, विज्ञापन नियंत्रण और खाद्य उद्योग की जवाबदेही शामिल होनी चाहिए. सरकार को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि स्कूलों, अस्पतालों, सरकारी दफ्तरों और विश्वविद्यालयों में स्वस्थ और कम प्रोसेस्ड भोजन की खरीद और उपलब्धता को प्राथमिकता दी जाए.
अंततः, अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड का बढ़ता प्रभाव केवल एक स्वास्थ्य समस्या नहीं बल्कि विकास और भविष्य की पीढ़ियों से जुड़ा सवाल है. स्वस्थ, कम प्रोसेस्ड और पोषक आहार को बढ़ावा देना न केवल गैर-संचारी रोगों को कम करने के लिए ज़रूरी है बल्कि सतत विकास और दीर्घकालिक जन-स्वास्थ्य के लिए भी अनिवार्य है.
शोबा सूरी ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन की हेल्थ इनिशिएटिव में सीनियर फेलो हैं।
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Dr. Shoba Suri is a Senior Fellow with ORFs Health Initiative. Shoba is a nutritionist with experience in community and clinical research. She has worked on nutrition, ...
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