Author : Manoj Joshi

Expert Speak Raisina Debates
Published on May 13, 2023 Updated 28 Days ago

जब पोखरण II परीक्षण हुआ तब भारत प्रमुख घरेलू संकटों का सामना कर रहा था. लेकिन उस वक़्त भारत की परमाणु आकांक्षाओं को सक्षम बनाने को लेकर द्विपक्षीय सहमति थी.

भारत को कैसे 1998 के परमाणु परीक्षण करने के लिए मजबूर किया गया

यह लेख, 25 इयर्स सिंस पोखरण : रिव्यूविंग इंडियाज न्यूक्लियर ओडिसी, श्रृंखला का हिस्सा है.


1974 में अपने एकमात्र परमाणु हथियार परीक्षण के बाद नई दिल्ली ने लंबे समय तक अस्पष्ट परमाणु रणनीति अपनाई थी. उसके पास परीक्षण करने का साधन था, लेकिन उसने परीक्षण नहीं किया था. भारत की इस नीति को "अवरोधक निवारण", "गैर-हथियारयुक्त निवारक" और इसी तरह न जाने कितने ही नाम दिए गए थे. लेकिन 1990 के दशक में भारत पर परीक्षण करने को लेकर तीन विशिष्ट दिशाओं से दबाव आया था.

पहला, दबाव यह था कि ख़ुफ़िया एजेंसियां यह जानकारी दे रही थी कि पाकिस्तान पहले ही चीन के सहयोग से परमाणु हथियार तैयार कर चुका हैं. इसी से जुड़ा एक पहलू यह भी था कि अमेरिका के राष्ट्रपति बुश ने 1990 में यह प्रमाणित करने से इंकार कर दिया था कि इस्लामाबाद, परमाणु हथियार हासिल करने की कोशिश नहीं कर रहा है. दबाव की दूसरी दिशा यह थी कि अमेरिका नॉन प्रोलिफरेशन ट्रीटी अर्थात गैर-प्रसार संधि (NPT) को बिना शर्त और अनिश्चितकाल तक विस्तारित करके और व्यापक परीक्षण प्रतिबंध संधि (CTBT) को सार्वभौमिक बनाकर अतिरिक्त देशों द्वारा परमाणु हथियारों के निर्माण की खिड़की को बंद करने का दबाव बना रहा था. दबाव की तीसरी और अंतिम दिशा यह थी कि भारत और पाकिस्तान की परमाणु हथियारों की क्षमता को "फ्रीज, कैप और रोल बैक" करने के विशिष्ट प्रयास हो रहे थे. 

अमेरिका नॉन प्रोलिफरेशन ट्रीटी अर्थात गैर-प्रसार संधि (NPT) को बिना शर्त और अनिश्चितकाल तक विस्तारित करके और व्यापक परीक्षण प्रतिबंध संधि (CTBT) को सार्वभौमिक बनाकर अतिरिक्त देशों द्वारा परमाणु हथियारों के निर्माण की खिड़की को बंद करने का दबाव बना रहा था. 

इस बीच, नई दिल्ली ने संभावित विरोधियों को रोकने के लिए "टेक्नोलॉजी डेमोंसट्रेशन अर्थात तकनीक प्रदर्शन" की रणनीति के साथ अपना काम करना जारी रखा था. अगस्त 1986 में, ध्रुव अनुसंधान रिएक्टर को हथियार ग्रेड प्लूटोनियम के प्रमुख स्रोत के रूप में कमीशन अर्थात आरंभ किया गया था, और 1989 में, एक लॉन्ग रेंज मिसाइल डिमॉन्स्ट्रेटर अर्थात लंबी दूरी की मिसाइल प्रदर्शक-अग्नि का पहला परीक्षण किया गया. इसकी वज़ह सेअमेरिका को यह संकेत मिलने लगे कि भारत एक थर्मोन्यूक्लियर हथियार का निर्माण कर रहा था.

1990 के दशक में, भारत ने सभी शक्तियों अर्थात देशों के सत्यापन योग्य और व्यवस्थित निरस्त्रीकरण के लिए दो संधियों को जोड़ने के लिए कड़ा संघर्ष किया, लेकिन जल्द ही यह स्पष्ट हो गया कि अमेरिका का लक्ष्य सार्वभौमिक निरस्त्रीकरण के बजाय भारत जैसे देशों और मौजूदा परमाणु हथियार रखने वाले देशों का लक्षित निरस्त्रीकरण ही था. सितंबर 1996 में CTBT पारित किया गया था, लेकिन भारत जैसे देशों के विरोध के कारण इसका अनुसमर्थन संभव नहीं हो सका. अत: भारत ने यह महसूस किया कि 1990 के दशक के मध्य में परमाणु परीक्षण करने की खिड़की बंद हो रही थी. ऐसे में भारत ने अपने हथियारों का परीक्षण करने की गति को तेज कर दिया.

राजनीतिक संदर्भ

1989 के चुनावों में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) की पराजय के साथ ही भारत की परमाणु और मिसाइल कार्यक्रम में कुछ हद तक अनिश्चितता पैदा हो गई. नेशनल फ्रंट (NF) के नेता, प्रधान मंत्री वी.पी. सिंह ने भारतीय जनता पार्टी (BJP) द्वारा बाहर से समर्थित अल्पमत सरकार के साथ सत्ता संभाली. लेकिन उस वर्ष की शुरुआत में ही कश्मीर में पाकिस्तान समर्थित विद्रोह शुरू हो गया. जब हजारों कश्मीरी युवक बंदूकें और प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए नियंत्रण रेखा को पार करते हुए पाकिस्तान पहुंचने लगे तो इस्लामाबाद ने इस संकट का फायदा उठाने की कोशिश करते हुए एक स्पष्ट परमाणु धमकी जारी कर दी. 1990 की शुरुआत में उपमहाद्वीप में CIA के उप निदेशक रॉबर्ट एम. गेट्स के मिशन और उनकी भारत के लिए संभावित परमाणु ख़तरे को लेकर चेतावनी को विवादास्पद ही कहा जाएगा. लेकिन पत्रकार शेखर गुप्ता ने इस मुद्दे को उजागर कर दिया. इसके बाद वीपी सिंह सरकार की प्रतिक्रिया में इस बात को लेकर चौंकाने वाला खुलासा हुआ कि, "यदि भारत के पास एक विश्वसनीय, सुपुर्दगी योग्य निवारक था, तो उसके सशस्त्र बलों को इसकी जानकारी तक नहीं थी.’’ गुप्ता के अनुसार, यही वह वक़्त था जब भारत ने "अंतत: अपनी परमाणु अस्पष्टता को छोड़ कर पूर्ण शस्त्रीकरण को अपनाने का फ़ैसला किया था."

अगले दो वर्ष भारी राजनीतिक अस्थिरता वाले थे. एक ओर जहां प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह ने अन्य पिछड़े वर्ग को आरक्षण देने वाले मंडल आयोग को लागू करने का फ़ैसला किया, वहीं दूसरी ओर उनके सहयोगी भाजपा ने अपने समर्थकों को अयोध्या में बाबरी मस्जिद की जगह पर मंदिर निर्माण के लिए आगे आने की अपील की. इसी बीच देश को जम्मू और कश्मीर में अलगाववादी आंदोलन अथवा विद्रोह ने भी परेशान कर रखा था. दूसरी ओर पंजाब में भी एक अलगाववादी आंदोलन के कारण स्थितियां बद से बदतर होती जा रही थी. ऐसे में वी.पी. सिंह के जन मोर्चा और भाजपा के गठबंधन में फूट पड़ गई, जिसकी वज़ह से NF सरकार नवंबर 1990 में गिर गई. इसके पश्चात INC के समर्थन से जनता दल की अल्पमत वाली सरकार का गठन किया गया. चंद्रशेखर के नेतृत्व वाली यह सरकार छह माह चली और इसके बाद आम चुनावों की घोषणा हो गई.

नवंबर 1990 में राष्ट्रपति एच. डब्ल्यू. बुश ने पहले खाड़ी युद्ध के आरंभ होने के बाद सद्दाम हुसैन को अप्रत्यक्ष रूप से परमाणु चेतावनी दे डाली. इसकी वज़ह से INC ने बुश के फ़ैसले की यह कहते हुए आलोचना कर दी कि अगर ऐसा हुआ तो भारत के लिए अपनी परमाणु संयम संबंधी नीति को जारी रखना मुश्किल हो जाएगा.

अप्रैल 1991 में ऐसे ही किसी समय इस लेखक को एक ऐसी बैठक में शामिल होने का अवसर मिला था, जिसमें पूर्व प्रधान मंत्री (PM) राजीव गांधी ने भारत के परमाणु कार्यक्रम को लेकर ऑफ द रिकॉर्ड टिप्पणी की थी. राजीव गांधी के अनुसार उनकी पार्टी इस मुद्दे पर राष्ट्रपति वेंकटरमन को एक औपचारिक ज्ञापन सौंपने का विचार कर रही थी. इसके बाद इस मुद्दे की संवेदनशीलता को देखते हुए यह तय हुआ कि राजीव गांधी इस मामले में राष्ट्रपति से मौखिक बातचीत करेंगे. पूर्व प्रधान मंत्री ने कहा कि वे चाहते थे कि अपना पदभार छोड़ने से पूर्व उन्हें परमाणु कार्यक्रम को लेकर जो जानकारी थी उसके कारण, वे चाहते थे कि राष्ट्रपति इस बात को सुनिश्चित करें कि परमाणु और मिसाइल क्षेत्र में सब काम पहले की तरह ही आगे बढ़ते रहेंगे. जब श्री गांधी से पूछा गया था कि इस पर राष्ट्रपति का जवाब क्या था, तो उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति ‘‘केवल मुस्कुराये’’ थे. इसका मतलब यह था कि चीजें सही दिशा में आगे बढ़ रही थीं.

पी. वी. नरसिम्हाराव

लेकिन इस मुलाकात के एक माह के भीतर ही राजीव गांधी की हत्या हो गई थी और जून 1991 में पी. वी. नरसिम्हाराव ने प्रधान मंत्री का पद संभाल लिया था. भारत को अब आपदा की तीन प्रमुख घटनाओं का सामना करना पड़ रहा था. पहली आपदा थी राजीव गांधी की हत्या, दूसरा भारत सरकार लगभग दिवालियापन की स्थिति में आ चुकी थी और तीसरी आपदा थी सोवियत संघ का विघटन हो गया था. और यह सब पहले से ही ख़राब घरेलू स्थिति के ऊपर से आई हुई समस्या थी जो भारत में घरेलू मोर्चे पर कश्मीर और पंजाब में और राम मंदिर आंदोलन को लेकर चल रहे राजनीतिक संघर्ष के कारण हो रहा था. राम मंदिर आंदोलन के परिणामस्वरूप 1992 में बाबरी मस्जिद ढहा दी गई थी. इसके कारण पहले सांप्रदायिक दंगे हुए और उसके बाद भारत ने 1993 में मुंबई बम धमाकों का सामना किया था. परमाणु मोर्चे पर, भारतीय कूटनीति को अमेरिका के उस सुझाव का सामना करना पड़ा जिसमें कहा गया था कि भारत और पाकिस्तान संयुक्त राष्ट्र की देखरेख में P-5 देशों की निगरानी में एक द्विपक्षीय संयम व्यवस्था को अपनाएंगे. चीन की ओर से उपजने वाले ख़तरों को ध्यान में रखकर भारत के लिए इस सुझाव को स्वीकार करने का सवाल ही पैदा नहीं होता था. अत: अमेरिका की ओर से आ रहे दबाव को दरकिनार करने के लिए भारत ने वाशिंगटन के साथ ही द्विपक्षीय परमाणु संवाद शुरू करने का फ़ैसला कर लिया. लेकिन भारत ने इसके साथ ही अपने परमाणु और मिसाइल कार्यक्रम को भी गति देने शुरू कर दिया था. 1992 में अपग्रेडेड अग्नि डेमोंस्ट्रेटर का परीक्षण किया गया. इसके ठीक दो वर्षों के बाद 1994 में भारत ने अपना तीसरा सफ़ल परीक्षण कर लिया.

1995 के अंत में नरसिम्हाराव सरकार ने परमाणु परीक्षण करने का फ़ैसला किया. लेकिन भारत की ओर से की जा रही तैयारियों की भनक अमेरिका को लग गई. ऐसे में अमेरिका ने भारत पर दबाव बनाते हुए यह सुनिश्चित किया कि भारत यह परीक्षण न कर पाए.

1996-1998 के बीच अस्थिरता जारी रही

INC को 1996 के चुनाव में भारी पराजय का सामना करना पड़ा. उस चुनाव में BJP को सबसे ज़्यादा लाभ मिला. उसने चुनाव तो नहीं जीता, लेकिन उसे संसद में सबसे ज़्यादा सीटों पर जीत हासिल हो गई. BJP ने अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में सरकार का गठन तो किया, परंतु वाजपेयी सरकार महज 13 दिनों में ही गिर गई.

लेकिन उन 13 दिनों में जो सबसे अहम बात हुई वह यह थी कि डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन (DRDO) तथा डिपार्टमेंट ऑफ एटॉमिक एनर्जी (DAE) को परमाणु परीक्षण करने का अधिकार दे दिया गया था. इन दोनों विभागों ने इसकी तैयारी करते हुए परमाणु उपकरणों को स्थापित कर लिया था, लेकिन 13 दिनों में ही सरकार के गिर जाने की वज़ह से इस परीक्षण को रद्द करना पड़ा था.

उन 13 दिनों में जो सबसे अहम बात हुई वह यह थी कि डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन (DRDO) तथा डिपार्टमेंट ऑफ एटॉमिक एनर्जी (DAE) को परमाणु परीक्षण करने का अधिकार दे दिया गया था. इन दोनों विभागों ने इसकी तैयारी करते हुए परमाणु उपकरणों को स्थापित कर लिया था, लेकिन 13 दिनों में ही सरकार के गिर जाने की वज़ह से इस परीक्षण को रद्द करना पड़ा था.

वाजपेयी सरकार के गिरने के बाद भारत ने जून 1996 से अप्रैल 1997 के बीच एच. डी. देवगौड़ा तथा अप्रैल 1997 से मार्च 1998 के बीच इंदर कुमार गुजराल के रूप में दो प्रधान मंत्री देखें. गुजराल के कार्यकाल में 1997 की शुरुआत में ही भारत ने केमिकल वेपन्स कन्वेंशन (CWC) पर हस्ताक्षर कर दिए. लेकिन गुजराल ने फिस्साइल मटेरियल कट ऑफ ट्रीटी (CTBT) पर हस्ताक्षर करने से यह कहते हुए इंकार कर दिया था कि यह ट्रीटी अर्थात संधि भेदभावपूर्ण थी. वाजपेयी के फ़ैसले का एक महत्वपूर्ण पहलू BJP के 1996 के चुनाव घोषणापत्र में परिलक्षित हुआ था, जिसमें कहा गया था कि BJP देश की ‘‘परमाणु नीति’’ का पुनर्मूल्यांकन करेगी ‘‘और परमाणु हथियारों को शामिल करने के विकल्प का प्रयोग करेगी.’’ इससे पहले BJP के 1991 के चुनाव घोषणापत्र में भी हमारी सेनाओं को ‘‘न्यूक्लियर टिथ’’ (nuclear teeth) देने की बात की गई थी. इसके विपरीत कांग्रेस पार्टी के 1996 के चुनावी घोषणापत्र में इस मुद्दे पर गोलमोल रवैया अपनाया गया था. उसमें कहा गया था कि यदि पाकिस्तान ने परमाणु हथियारों का विकास और उनकी तैनाती को जारी रखा, ‘‘तो भारत को भी इस चुनौती का मुकाबला करने के लिए अपनी नीति पर पुनर्विचार करना पड़ेगा.’’

अटल बिहारी वाजपेयी

अटल बिहारी वाजपेयी मार्च 1998 में सत्ता में लौटे और लौटते ही उन्होंने पुन: परमाणु परीक्षण को मंजूरी दे दी. 1998 में भी BJP के चुनावी घोषणापत्रमें साफ़ तौर पर कहा गया था कि भारत को ‘‘परमाणु परीक्षण करने के अपने अधिकार का उपयोग’’ करना चाहिए और अपने मिसाइल कार्यक्रम को आगे बढ़ाना चाहिए. भारत का दावा था कि उसने परमाणु परीक्षण करने का फ़ैसला छह अप्रैल 1998 को पाकिस्तान द्वारा घौरी मिसाइल का परीक्षण किए जाने की पृष्ठभूमि में लिया था. भारत इसके पहले भी पिछले दो वर्षों में परमाणु परीक्षण करने की कोशिश कर चुका था. 

निष्कर्ष

निरस्त्रीकरण को लेकर भारत के संघर्ष या फिर US की ओर से भारतीय कार्यक्रम को ‘‘कैप, फ्रीज एंड रोल बैक’’ करने की कोशिशों की कहानी तो सर्वविदित है ही, लेकिन एक बात और है जिसे बड़ी मुश्किल से ही समझा जाता है. वह बात यह है कि इन घटनाओं के दौरान भारत किन राजनीतिक परिस्थितियों से गुज़र रहा था. जैसा कि हमने देखा, ये सारे फ़ैसले उस वक़्त लिए गए जब भारत में घरेलू स्तर पर अलगाववाद के साथ ही राजनीतिक तनाव अपने चरम पर था. एक और महत्वपूर्ण बात, जिसे आमतौर पर नहीं समझा जाता है वह यह है कि देश ने अपने परमाणु लक्ष्य संबंधी आकांक्षाओं को हासिल करने के लिए किस हद तक एकजुटता का प्रदर्शन किया था. यदि राजीव गांधी ने विपक्ष में रहते हुए देश के रणनीतिक कार्यक्रम को सही राह पर चलने दिया था तो BJP नेता अटल बिहारी वाजपेयी ने भी बतौर विपक्ष नेता 1990 के दशक के मध्य में कांफ्रेंस ऑफ डिसआर्मामेंट में भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व करते हुए इन समझौतों को भेदभावपूर्ण बताया था. इसी प्रकार जनता पार्टी के प्रधानमंत्री आई. के. गुजराल ने CTBT अथवा 1997 में FMCT को ‘‘भेदभावपूर्ण’’ निरुपित किया था.


मनोज जोशी, ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में एक प्रतिष्ठित फेलो हैं.

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