Expert Speak India Matters
Published on Mar 17, 2023 Updated 0 Hours ago

पूर्व आर्थिक सलाहकार  रघुराम राजन और अन्य अर्थशात्रियों ने एक बार फिर अतीत के नैरेटिव को दोहराते हुए कहा है कि सनातन धर्म की तरह ही हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ लगातार आगे बढ़ी है. 

भारतीय अर्थव्यवस्था:एक बार फिर ‘हिंदूफोबिया’ से संक्रमित!

जब एक अर्थशास्त्री राजनीतिक लाभ हासिल करने के लिए धर्म पर हमला बोलता है और धर्म को नीचा दिखाने का काम करता है, तो यह समझ लीजिए कि उसने अर्थशास्त्र को एक किनारे रख दिया है और वह राजनीति में शामिल हो सकता है, साथ ही वह भविष्य में भी इसी तरह धर्म को अपमानित करने का काम करता रहेगा. अक्सर देखा जाता है कि जब हिंदू धर्म की बात सामने आती है तो उसका मज़ाक उड़ाना और निंदा करना सबसे आसान होता है. इतना ही नहीं हिंदू धर्म के बारे में अनर्गल बातें करने में कोई ज़ोख़िम नहीं होता है और कहीं न कहीं ऐसा करना फायदेमंद भी होता है. इसकी प्रमुख वजह यह है कि हिंदू धर्म को मानने वाले सहिष्णु हैं और सब कुछ सहजता से स्वीकार करने वाले हैं. ऐसे में कोई जब चाहे हिंदू धर्म को निशाना बना सकता है, क्यों ये हिंदू ही हैं, जो उसे यह सब करने के लिए काफ़ी हद तक एक सुरक्षित वातावरण मुहैया कराते हैं.

रघुराम राजन भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर, पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के पूर्व इकोनॉमिक काउंसलर एवं अनुसंधान निदेशक, बैंक फॉर इंटरनेशनल सेटलमेंट में बोर्ड के पूर्व वाइस चेयरमैन और शिकागो बूथ में कैथरीन डस्क मिलर डिस्टिंग्विश्ड सर्विस प्रोफेसर ऑफ फाइनेंस के रूप में अपनी सेवाएं दे चुके हैं. इसके साथ ही उनकी शिक्षा भी बेहद उच्च कोटि की रही है.उन्होंने आईआईटी दिल्ली से बीटेक, आईआईएम अहमदाबाद से एमबीए और एमआईटी से पीएचडी की डिग्री हासिल की है. लेकिन इतनी उच्च शिक्षा और देश-दुनिया में महत्त्वपूर्ण ज़िम्मेदारियों को संभालने के बावज़ूद, उन्होंने पॉलिसी के मुद्दे पर बात करते हुए, जिस प्रकार से धीमी विकास दर को हिंदू धर्म से जोड़ने का काम किया है, उसने उनकी विकृत मानसिकता उजागर हो गई है. हिंदू धर्म की निंदा करते हुए रघुराम राजन ऐसे सवाल उठाते हैं, जो अर्थव्यवस्था, राजनीति और धर्म में घालमेल करते हुए नज़र आते हैं. इतना ही नहीं, उन्होंने जिस प्रकार से धर्म को निशाना बनाते हुए उसे आर्थिक हालात से जोड़ने की कोशिश की है, वह किसी भी लिहाज़ से बदली हुई आर्थिक परिस्थियों से मेल नहीं खाता है.

हिंदू धर्म की निंदा करते हुए रघुराम राजन ऐसे सवाल उठाते हैं, जो अर्थव्यवस्था, राजनीति और धर्म में घालमेल करते हुए नज़र आते हैं. इतना ही नहीं, उन्होंने जिस प्रकार से धर्म को निशाना बनाते हुए उसे आर्थिक हालात से जोड़ने की कोशिश की है, वह किसी भी लिहाज़ से बदली हुई आर्थिक परिस्थियों से मेल नहीं खाता है.

यह लेख उन सभी बेमतलब की बातों की विस्तार से पड़ताल करता है, जिन्हें रघुराम राजन ने हाल ही बड़े ज़ोरशोर से उठाया है: “भारतीय अर्थव्यव्सथा ख़तरनाक रूप से हमारी पुरानी हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ के बेहद निकट पहुंच गई है! हमें इससे बेहतर करके दिखाना चाहिए.” अपने इस बयान में राजन हिंदुओं की जनसंख्या में बढ़ोतरी का जिक्र नहीं कर रहे हैं, बल्कि वह भारत के दिसंबर 2022 तिमाही के जीडीपी आंकड़ों में वृद्धि की बात कर रहे हैं. ज़ाहिर है कि उनके इस विचार को लेकर कई तरह की समस्याएं हैं, और जब ऐसा विचार किसी प्रतिष्ठित अर्थशास्त्री द्वारा प्रकट किया जाता है, तो यह समस्याएं और जटिल हो जाती हैं.

हिंदू धर्म बुरा है, हमें दूसरे धर्म की विकास दर चाहिए

सबसे पहले यह जानना ज़रूरी है कि कब पहली बार कम विकास दर को हिंदू धर्म से जोड़ा गया था. दरअसल, इस शब्द को पहली बार बीपीआर विट्ठल द्वारा छद्म नाम 'नाजिन यानुपी' के साथ फरवरी 1973में गढ़ा गया था, जब भारत की प्रति व्यक्ति विकास दर के बारे में चर्चा करते हुए लिखा गया था: "5 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर प्रति व्यक्ति के लिहाज़ से 3 प्रतिशत से अधिक वृद्धि दर होगी. इन लक्ष्यों के बावज़ूद वास्तविक उपलब्धि पिछले दो दशकों में 3.7 से 3.8 प्रतिशत रही है, जो इस अवधि के दौरान प्रति व्यक्ति आय में लगभग 1 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि करेगी. इस प्रकार, हमारे समक्ष एक ऐसी स्थिति है, जहां प्रति व्यक्ति आय की वृद्धि दर वास्तविक 1 प्रतिशत और लक्षित लगभग 3 प्रतिशत के बीच झूलती है. यह सीमा अप्रत्याशित नहीं है. यह वह रेंज है, जिसके भीतर जीवन को लेकर सिर्फ़ हिंदू दृष्टिकोण कायम रहेगा." ज़ाहिर है कि इसमें जो आंकड़े हैं, वो तो सही हैं, लेकिन इनको लेकर हिंदुओं और हिंदू धर्म को जिस प्रकार से लपेटा गया है, वो सही नहीं है, बल्कि कहा जाए तो घृणास्पद है.

बाद में इस सोच को पांच वर्ष पश्चात 1978 में राज कृष्ण द्वारा आर्थिक मान्यता प्रदान की गई, जिन्होंने विकास के प्लेटफॉर्म को प्रति व्यक्ति से वास्तविक में बदल दिया था. जहां तक देश के अर्थशास्त्रियों की बात है, तो भले ही वे इन परिस्थितियों के लिए समाजवादी नीतियों को समान रूप से दोषी ठहराते हों, लेकिन यह बेहद अफ़सोसजनक है कि भारत के चोटी के इकोनॉमिक्स शिक्षण संस्थान यानी दिल्ली स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स में एक शिक्षक के रूप में, राज कृष्ण द्वारा इसे दी गई मान्यता अन्य इकोनॉमिस्ट और भारतीय अर्थशास्त्र के लिए आज भी एकमात्र स्थायी और अटूट विरासत बनी हुई है. एक ऐसा अर्थशास्त्री, जो पहले भी कई बार अपनी विचारधारा की वजह से ग़लत साबित हो चुका है, उसकी हिंदूफोबिया से ग्रसित विरासत आज भी हिंदू-विरोधी नैरेटिव्स पर आधारित है और उसे आगे भी बढ़ा रही है. इस सबके पीछे मकसद यह है कि कुछ चुनिंदा आंकड़ों या फिर छोटे-मोटे वाकयों की आड़ ली जाए और फिर उसे हिंदुओं पर हमला करने का माध्यम बना दिया जाए. यह हाल तब है, जबकि इससे भी बेकार आंकड़े (यूरोपीय संघ में मुद्रास्फ़ीति और जीडीपी दर देखें) मौज़ूद हैं और हिंदू-विरोधी घटनाएं भी (पाकिस्तान और बांग्लादेश में और कनाडा एवं यूके में भी हिंदुओं की दुर्दशा देखें) हर जगह होती हैं.

हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ पर उनका बयान सिर्फ़ और सिर्फ़ एक तिमाही की 4.4 प्रतिशत जीडीपी विकास दर पर आधारित है. उस हिसाब से देखा जाए, तो टेबल-1 में उन देशों की विकास दर प्रदर्शित की गई है, जहां धर्मिक बहुसंख्यक हैं. यह वर्गीकरण एक बड़े आकार की धार्मिक आबादी की सबसे बड़ी संख्या वाले देश में प्रमुख धर्म पर आधारित है.

बहुत छोटे अंतराल के आंकड़ों से बहुत बड़ा निष्कर्ष

दूसरी बात यह है किरघुराम राजन ने जो बड़ी-बड़ी बातें की हैं, उनसे ना सिर्फ़ हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं का अपमान होता, बल्कि उन्हें एक विचारहीन बौद्धिक पीड़ित के रूप में भी सामने लाती हैं, या यह दर्शाती हैं कि वे इस तरह के भ्रामक नैरेटिव को जानबूझ कर आगे बढ़ रहे हैं. हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ पर उनका बयान सिर्फ़ और सिर्फ़ एक तिमाही की 4.4 प्रतिशत जीडीपी विकास दर पर आधारित है. उस हिसाब से देखा जाए, तो टेबल-1 में उन देशों की विकास दर प्रदर्शित की गई है, जहां धर्मिक बहुसंख्यक हैं. यह वर्गीकरण एक बड़े आकार की धार्मिक आबादी की सबसे बड़ी संख्या वाले देश में प्रमुख धर्म पर आधारित है. राजन के लिए यह बड़े अफ़सोस की बात है कि उनके नैरेटिव और उनकी राजनीति में हिंदू रेट ऑफ ग्रेथ सबसे ऊपर आती है. ऐसे में उन्हें हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ पर रोने-धोने के बजाए, अन्य धर्मों के लोगों को हिंदू धर्म में परिवर्तित होने की सलाह देनी चाहिए.

TABLE 1: Dominant Religion and GDP Growth
Religion Country Growth rate (%) *
Hindu rate of growth India 4.4
Islamic rate of growth Turkey 3.5
Chinese Folk rate of growth China 2.9
Christian rate of growth US 2.7
Jewish rate of growth Israel 2.7
Buddhist rate of growth Thailand 1.4
Shinto rate of growth Japan 0.2
* October to December 2022

ज़ाहिर तौर पर हम सभी जानते हैं कि एक तिमाही के आंकड़ों के आधार पर किसी देश की जीडीपी वृद्धि पर कोई भी अपनी राय नहीं बनाता है. अगर कोई कुछ कहने को मज़बूर ही हो, जैसे कि चीन में पैदा हुई कोविड-19 महामारी जैसी अप्रत्याशित परिस्थिति में, तो वैश्विक संदर्भ में एक तुलनात्मक ढंग से ऐसा करता है. यह रघुराम राजन को अर्थशास्त्र का कोई उपदेश देने के लिए नहीं है, वे अपनी इकोनॉमिक्स को भली भांति जानते और समझते हैं, बल्कि इसका उल्लेख उनके भ्रामक नैरेटिव्स गढ़ने को लेकर किया गया है.

धार्मिक संदर्भों में विकास की दर

तीसरी बात यह है कि आधी सदी से हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ की थ्योरी हिंदुओं को बदनाम करके भारत को बदनाम करने के नैरेटिव पर हावी रही है. हिंदू विकास दर नाम का बेहद अपमानजनक और धृणास्पद शब्द वर्ष 1973 में सामने आया था और तब से ना केवल रघुराम राजन, बल्कि कई अन्य अर्थशास्त्रियों द्वारा इस शब्द को खाद-पानी दिया जाता रहा है. ऐसा करने वाले ज़्यादातर अर्थशास्त्री या तो भारतीय रहे हैं, या फिर भारतीय मूल के हैं. वास्तविकता यह है कि 1970 और 1980 के दशक की धीमी विकास दर पूर्व प्रधानमंत्रियों जवाहरलाल नेहरू और उनकी बेटी इंदिरा गांधी की नीतियों की वजह से है. इन दोनों ने ही उद्यमियों पर नीतियों के ज़रिए निशाना साधा और यह सुनिश्चित किया कि भारत बाक़ी दुनिया से पीछे रहे (रिफॉर्म नेशनदेखें). उनके आर्थिक अत्याचारों और ज़्यादितियों के अवशेष आज उन अनुपालनों में दिखाई देते हैं, जो कि भारत के इंस्पेक्टर राज को बल देते हैं.

भारत की जीडीपी वृद्धि की औसत वास्तविक वार्षिक दर वर्ष 1961 और 1991 के बीच 4.1 प्रतिशत थी (विश्व बैंक के आंकड़े 1961 से शुरू होते हैं, न कि 1947 से). ये तीन प्रधानमंत्रियों के शासन के अंतर्गत आर्थिक नियंत्रण के वर्ष थे, जिन्होंने धन सृजित करने वालों को व्यवस्था की जंजीरों में बांध दिया था, जिसे नैरेटिव गढ़ने वाले लेखक हिंदू रेट ऑफ़ ग्रोथ कहकर ढकने की कोशिश कर रहे हैं. जबकि इसे नेहरू-गांधी रेट ऑफ ग्रोथ कहा जाना चाहिए. अगर एक परिवार की वफादारी के चलते वे ऐसा नहीं कह सकते हैं, तो इसे विकास की समाजवादी दर, या विकास की मार्क्सवादी दर, या फिर कमांडिंग हाइट्स रेट ऑफ ग्रोथ कहना भी ग़लत नहीं होगा. प्रधानमंत्री राजीव गांधी के अलावा, जिनके शासन के दौरान5.2 प्रतिशत की उच्च विकास दर देखी गई थी, वर्ष 1984 और 1991 के बीच की अवधि ऐसी थी, जब समाजवादी नीतियां धराशायी हो गईं थी और प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह एवं चंद्रशेखर ने अर्थव्यवस्था को आर्थिक रसातल की कगार पर पहुंचा दिया था.

वर्ष 2060 तक भारत के दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने की उम्मीद है. OECD के एक पूर्वानुमानके मुताबिक़ अमेरिका की 36 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर की जीडीपी और यूरोपियन यूनियन की 23 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर की जीडीपी के साथ-साथ भारत की जीडीपी वर्ष 2060 में 42 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक होने की संभावना है.

देश में तीस वर्षों के आर्थिक सुधारों को, जिन्हें पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव ने वर्ष 1991 में शुरू किया था. उनके बाद के पांच प्रधानमंत्रियों (अटल बिहारी वाजपेयी, एचडी देवेगौड़ा, इंद्र कुमार गुजराल, मनमोहन सिंह और नरेन्द्र मोदी) के नेतृत्व में सभी आठ सरकारों के दौरान उन आर्थिक सुधारों को जारी रखा और भारत की 6.1 प्रतिशत की औसतन वार्षिक आर्थिक विकास दर के साथ उन सुधारों को आगे बढ़ाया. इसलिए, सवाल यह उठता है कि 3.8 प्रतिशत, 5.2 प्रतिशत और 6.1 प्रतिशत के बीच, विकास की वास्तविक हिंदू दर क्या है?

जैसा कि हिंदूफोबिया से पीड़ित इकोनॉमिस्ट इसका जवाब तलाश रहे हैं, यहां कुछ संबंधित आंकड़े दिए गए हैं. जब नेहरू-गांधी युग में भारत को आर्थिक तौर पर दबाया जा रहा था (1961 और 1991 के बीच, जिसके लिए विश्व बैंक के आंकड़े उपलब्ध हैं), तब देश की औसत वार्षिक विकास दर 4.2 प्रतिशत थी. उस काल खंड में अमेरिका में औसत वार्षिक विकास दर 3.6 प्रतिशत (क्रिश्चियन रेट ऑफ ग्रोथ) थी, तुर्किये में 4.8 प्रतिशत (मुस्लिम रेट ऑफ ग्रोथ), थाईलैंड में 7.7 प्रतिशत (बुद्धिस्ट रेट ऑफ ग्रोथ), चीन में 6.9 प्रतिशत (चाइनीज फोक रिलीजियन्स रेट ऑफ ग्रोथ), जापान में 6.1 प्रतिशत (शिंतो रेट ऑफ ग्रोथ) थी, जबकि इजराइल की विकास दर से जुड़े आंकड़ें उपलब्ध नहीं हैं.

अब, जरा अगले तीस वर्षों यानी 1991 से 2021 के बीच के आंकड़ों पर नज़र डालते हैं. इस दौरान औसत वार्षिक जीडीपी वृद्धि की हिंदू दर अचानक 6.1 प्रतिशत हो जाती है. भारत में जिसे हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ के रूप में देखा जा रहा था और जिसका रघुराम राजन व उनके साथी मज़ाक उड़ा रहे थे, वो अब उस अमेरिका (इस अवधि में यह 2.3 प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से बढ़ी) में स्थानांतरित हो गई थी, जहां वे पढ़ाते थे. इसी काल खंड में थाईलैंड में प्रति वर्ष 3.6 प्रतिशत, तुर्किये में 4.8 प्रतिशत और जापान में 0.7 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज़ की गई. अगर हम राजन द्वारा कही गई बातों को ही आगे बढ़ाएं, तो ऐसा प्रतीत होगा कि क्रिश्चियन, बुद्धिस्ट, मुस्लिम और शिंतो धर्म मानने वाले हिंदू धर्म में परिवर्तित हो गए हैं. हमें इस पर एक नए पेपर का इंतज़ार है. इन सभी वर्षों में चीन का आर्थिक चमत्कार साफ तौर पर दिखाई देता है. वर्ष 1961 और 1991 के बीच चीन की औसतन वार्षिक वृद्धि दर 6.9 प्रतिशत थी, और वहां चीनी फोक रिलीजन को मानने वालों की औसत वार्षिक वृद्धि दर अगले 30 वर्षों में छलांग लगाते हुए 9.2 प्रतिशत हो गई. जो कि अर्थशास्त्र के इर्दगिर्द एक नास्तिक-संशयवादी कथन को प्रदर्शित करता है. टेबल-2 इन बदलावों को दिखाती है.

Table 2: 30 Years of GDP Growth
Religion Country Growth rate (1961-1991) Growth rate (1991-2021) Change
Hindu rate of growth India 4.1 6.1 2.0
Islamic rate of growth Turkey 4.8 4.7 -0.1
Chinese Folk rate of growth China 6.9 9.2 2.3
Christian rate of growth US 3.6 2.3 -1.3
Jewish rate of growth Israel NA NA NA
Buddhist rate of growth Thailand 7.7 3.6 -4.1
Shinto rate of growth Japan 6.1 0.7 -5.4
           

औसत जीडीपी वृद्धि प्रतिशत में, प्रतिशत अंकों में बदलाव

भविष्य में भी रहेगा हिंदूफोबिक माहौल

चौथी बात यह है कि ये पूरी तरह से स्पष्ट हो चुका है कि रघुराम राजन और उनका भारत विरोधी, हिंदू विरोधी समूह निकट दृष्टि दोष से ग्रसित है. ऐसा इसलिए, क्योंकि वे उन्हीं आंकड़ों का उपयोग करते हैं और उसकी खींचतान करते हैं, जो उनके राजनीतिक (वर्तमान चुनी हुई सरकार के विरुद्ध), वैचारिक (भारत में गरीबी के एजेंडे को आगे बढ़ाते हुए बाहर फलफूल रहे हैं) और भौतिक सुरक्षा के विज़न (वे जानते हैं कि हिंदू उनका सिर नहीं काटेंगे) के मुताबिक़ है. उन पर बीते हुए युग में जीने और हमेशा पिछली बातों को ही दोहराने के आरोप लगाना, यह स्वीकार करने के बराबर होगा कि वे कुछ हद तक बौद्धिक रूप से ईमानदार हैं.जबकि सच्चाई यह है कि ऊपर चर्चा किए गए तथ्य और लेख में आगे दिए गए पूर्वानुमान उन्हें हर तरीक़े से ग़लत साबित करते हैं.

अगर आने वाले वर्षों की तरफ़ देखें, तो वर्ष 2060 तक भारत के दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने की उम्मीद है. OECD के एक पूर्वानुमानके मुताबिक़ अमेरिका की 36 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर की जीडीपी और यूरोपियन यूनियन की 23 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर की जीडीपी के साथ-साथ भारत की जीडीपी वर्ष 2060 में 42 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक होने की संभावना है, जो चीन की62 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर की जीडीपी के बाद दूसरे स्थान पर है. इस आंकड़े को इस संदर्भ में भी समझा जा सकता है कि भारत की जीडीपी में जी20 देशों का पांचवा हिस्सा और वैश्विक जीडीपी का 17.6 प्रतिशत शामिल होगा, ज़ाहिर है कि यह उपलब्धि विकास की उच्च दर के बगैर हासिल नहीं की जा सकती है. अब उस ग्रोथ रेट का धर्म हिंदू होगा या कोई अन्य, यह तो हमें रघुराम राजन ही बता पाएंगे.

देखा जाए तो रघुराम राजन इतने ग़लत भी नहीं हैं, वे तीन मामलों में एक दम सही और एक मामले में ग़लत हैं. पहले जिस मामले में वह दुरुस्त है, वो यह है कि वह हैंडसम और वाकपटु हैं. दूसरा, वह अमेरिका में एक शीर्ष इकोनॉमिक्स यूनिवर्सिटी में पढ़ाते हैं और तीसरा, वह एक ऐसे प्रभावशाली और प्रेरित करने वाले अतीत में जी रहे हैं, जिसका उनके विचारों पर गहरा असर है और वह उन्हीं पुरानी बातों काढोल पीटते रहते हैं. लेकिन जिसको लेकर वह ग़लत हैं, वो है भारत, जहां अब नया राजनीतिक नारा यह होगा कि “गर्व से कहो हमारी हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ है.”

The views expressed above belong to the author(s). ORF research and analyses now available on Telegram! Click here to access our curated content — blogs, longforms and interviews.