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Published on Mar 31, 2026 Updated 0 Hours ago

जाम्बिया को कभी संयुक्त राज्य अमेरिका से दवा और मदद मिलती थी- अब वही मदद खनिजों के सौदे में बदलती दिख रही है, जानें यह बदलाव क्या संकेत देता है. डोनाल्ड ट्रंप के दौर की यह नीति फायदे तो दिला सकती है लेकिन लंबे समय में भरोसे और रिश्तों को कमजोर कर सकती है.

अफ्रीका में अमेरिका का नया खेल- दोस्ती या फायदा?

डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल में अमेरिका की अफ्रीका नीति की दिशा धीरे-धीरे एक ऐसे बदलाव को दिखाती है जिसमें व्यावहारिक सहयोग से हटकर अधिक संकीर्ण और संसाधन-केंद्रित लेन-देन वाली नीति की ओर झुकाव दिखाई देता है. पहले अफ्रीका में अमेरिकी भागीदारी आमतौर पर रणनीतिक हितों के साथ-साथ विकास और मानवीय प्रतिबद्धताओं के संतुलन पर आधारित रही है, लेकिन हाल की नीतियाँ संकेत देती हैं कि संसाधनों तक पहुँच पाने के लिए सहायता और कूटनीति को साधन के रूप में इस्तेमाल करने की इच्छा बढ़ रही है. 

इस बदलाव का एक स्पष्ट उदाहरण जाम्बिया के प्रति अमेरिका का बदलता रुख है. विदेश विभाग के एक मसौदा ज्ञापन से पता चलता है कि वाशिंगटन ने जीवन-रक्षक स्वास्थ्य सहायता का उपयोग एक सौदेबाजी के साधन के रूप में करने पर विचार किया है ताकि ज़ाम्बिया के महत्वपूर्ण खनिज संसाधनों तक विशेष पहुँच मिल सके. यह उस लंबे समय से चले आ रहे सिद्धांत से एक बड़ा विचलन है जिस पर एड्स राहत के लिए राष्ट्रपति की आपातकालीन योजना (PEPFAR)जैसे कार्यक्रम आधारित रहे हैं जिसने ऐतिहासिक रूप से अमेरिका के मानवीय नेतृत्व का प्रतीक बनने के साथ उसकी सॉफ्ट पावर को भी बढ़ाया है.

अफ्रीका में अमेरिका नीति 

दो दशकों से अधिक समय से PEPFAR ने ज़ाम्बिया के सार्वजनिक स्वास्थ्य क्षेत्र में परिवर्तनकारी भूमिका निभाई है. लाखों लोग रोज़ाना एचआईवी उपचार पर निर्भर हैं, साथ ही क्षय रोग और मलेरिया से निपटने के लिए भी अमेरिकी फंडिंग से कार्यक्रम चलते रहे हैं. अपने चरम पर, इस कार्यक्रम ने उस भयानक महामारी को पलटने में मदद की थी, जो कभी हर साल हजारों लोगों की जान लेती थी. लेकिन वर्तमान नीति पुनर्संतुलन के तहत यह मानवीय विरासत अब रणनीतिक सौदेबाज़ी के कारण पीछे छूटने का खतरा झेल रही है. सहायता में बड़ी कटौती का प्रस्ताव यह संकेत देता है कि स्वास्थ्य सुरक्षा को भी सौदेबाज़ी के हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है.

पहले अफ्रीका में अमेरिकी भागीदारी आमतौर पर रणनीतिक हितों के साथ-साथ विकास और मानवीय प्रतिबद्धताओं के संतुलन पर आधारित रही है, लेकिन हाल की नीतियाँ संकेत देती हैं कि संसाधनों तक पहुँच पाने के लिए सहायता और कूटनीति को साधन के रूप में इस्तेमाल करने की इच्छा बढ़ रही है. 

ज़ाम्बिया के साथ प्रस्तावित समझौते की शर्तें इस लेन-देन आधारित बदलाव की गहराई दिखाती हैं. पहली शर्त यह है कि पाँच वर्षों में 1 अरब अमेरिकी डॉलर की सहायता पाने के लिए-जो पहले की सहायता से काफी कम है-ज़ाम्बिया को अपने घरेलू स्वास्थ्य खर्च में उल्लेखनीय वृद्धि करनी होगी और लगभग 340 मिलियन डॉलर खर्च करने होंगे. दूसरी और अधिक महत्वपूर्ण शर्त यह है कि इस समझौते के तहत अमेरिकी कंपनियों को ज़ाम्बिया के विशाल खनिज संसाधनों-जैसे तांबा, कोबाल्ट, लिथियम और दुर्लभ पृथ्वी तत्व-तक अधिक पहुँच दी जाएगी. अफ्रीका का दूसरा सबसे बड़ा तांबा उत्पादक होने के कारण ज़ाम्बिया ऊर्जा संक्रमण से जुड़ी वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में अहम स्थान रखता है.

इस समझौते का संसाधन-केंद्रित पहलू कोई अपवाद नहीं है. यह वाशिंगटन की उस व्यापक रणनीति के अनुरूप भी है, जिसका उद्देश्य अफ्रीका के खनन क्षेत्रों में चीन की मजबूत मौजूदगी का मुकाबला करना है. वर्षों से अमेरिकी नीति-निर्माता चीन को महाद्वीप भर में खनिज संपत्तियों तक विशेष और अक्सर अपारदर्शी पहुँच पाने के लिए आलोचना करते रहे हैं. स्वास्थ्य सहायता को खनन रियायतों से जोड़कर ट्रंप प्रशासन अपनी कूटनीतिक रणनीति को नए सिरे से परिभाषित करता दिख रहा है.

प्रस्तावित व्यवस्था का तीसरा पहलू मिलेनियम चैलेंज कॉर्पोरेशन के एक पुराने अनुदान के पुनर्गठन से जुड़ा है. यह अनुदान मूल रूप से ज़ाम्बिया के कृषि क्षेत्र के समर्थन के लिए था, लेकिन अब इसे खनन और संबंधित उद्योगों में नियामकीय सुधारों को आगे बढ़ाने के लिए उपयोग किया जा रहा है. स्वास्थ्य वित्तपोषण, संसाधन पहुँच और प्रशासनिक सुधार-इन सब शर्तों का एक साथ जुड़ना यह दिखाता है कि अमेरिकी भागीदारी अब अधिक शर्तों और पैकेजों में बंधती जा रही है.

अब तक इस लेनदेन आधारित दृष्टिकोण से अमेरिका को कुछ सफल परिणाम भी मिले हैं. उदाहरण के लिए, नियोजित ऋण राहत पैकेज वापस लेने की अमेरिकी धमकी ने ज़ाम्बिया की बातचीत की स्थिति को सीधे प्रभावित किया. कुछ ही दिनों में ज़ाम्बिया के अधिकारियों ने अमेरिकी संस्थाओं को विशेष पहुंच देने की संभावना जताई और राष्ट्रीय खनन आंकड़ों तक अभूतपूर्व पहुँच भी प्रदान की. इससे संकेत मिलता है कि कम से कम अल्पकाल में वित्तीय दबाव का उपयोग रणनीतिक रियायतें हासिल करने के लिए प्रभावी ढंग से किया जा रहा है.

वर्षों से अमेरिकी नीति-निर्माता चीन को महाद्वीप भर में खनिज संपत्तियों तक विशेष और अक्सर अपारदर्शी पहुँच पाने के लिए आलोचना करते रहे हैं. स्वास्थ्य सहायता को खनन रियायतों से जोड़कर ट्रंप प्रशासन अपनी कूटनीतिक रणनीति को नए सिरे से परिभाषित करता दिख रहा है.

वास्तव में यह दृष्टिकोण केवल ज़ाम्बिया तक सीमित नहीं है. विश्व स्वास्थ्य संगठन से अमेरिका के हटने और यूएसएआईडी की गतिविधियों में बड़ी कटौती के बाद वाशिंगटन ने कई अफ्रीकी देशों के साथ इसी तरह के समझौते करने की कोशिश की है, जिनमें सहायता जारी रखने के बदले घरेलू स्वास्थ्य खर्च बढ़ाने की शर्त रखी गई है. अब तक 20 अफ्रीकी देशों ने अमेरिका की पहली वैश्विक स्वास्थ्य रणनीति पर हस्ताक्षर किए हैं, लेकिन कुछ जगहों पर इसका विरोध भी देखने को मिला है. जिम्बाब्वे ने इस समझौते को असमान सौदा बताते हुए अस्वीकार कर दिया है और संप्रभुता से जुड़ी चिंताएं जताई हैं, खासकर जैविक (बायोलॉजिकल) डेटा साझा करने के मुद्दे पर. केन्या, जिसने इस समझौते पर हस्ताक्षर करने वाला पहला अफ्रीकी देश बनने के बावजूद, इसके कार्यान्वयन में कठिनाइयों का सामना किया है, क्योंकि नागरिक समाज संगठनों ने डेटा गोपनीयता को लेकर आपत्ति जताई है.

जाम्बिया का मामला इसलिए अलग है क्योंकि यहाँ स्वास्थ्य सहायता को खनिज संसाधनों तक पहुँच से जोड़ा गया है. लंबी अवधि तक स्वास्थ्य डेटा व जैविक नमूने साझा करने की शर्तों ने नैतिक और संप्रभुता से जुड़ी गंभीर चिंताएँ पैदा की हैं.

अफ्रीका की बढ़ती अहमियत  

यह लेन-देन आधारित नीति अफ्रीका में अमेरिकी रिश्तों को बदल रही है. दक्षिण अफ़्रीका में वैचारिक तनाव के बावजूद आर्थिक निर्भरता बनी है और वह चीन सहित अन्य वैश्विक शक्तियों से संबंध मजबूत कर रहा है. राष्ट्रपति सिरिल रामफोसा ने चीनी निवेश को सक्रिय रूप से आकर्षित किया है और साथ-साथ विविध साझेदारियाँ भी बनाए रखी हैं. जनवरी में दक्षिण अफ्रीका ने रूस, चीन और ईरान के साथ अपने जलक्षेत्र में ‘Will for Peace’ नामक संयुक्त नौसैनिक अभ्यास भी आयोजित किया. हाल ही में दक्षिण अफ्रीका ने ईरान से दूरी बनाने के अमेरिकी दबाव को भी अस्वीकार कर दिया. इसी तरह नाइजीरिया भी प्रौद्योगिकी और नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्रों में चीन के साथ सहयोग बढ़ा रहा है, जबकि अमेरिका के साथ उसके व्यापार और व्यावसायिक संबंध अभी भी महत्वपूर्ण बने हुए हैं.

अमेरिका  ने परंपरागत रूप से शासन, पारदर्शिता और मानवीय मूल्यों से अलग पहचान बनाई, लेकिन ‘स्वास्थ्य के बदले संसाधन’ समझौते इस छवि को कमजोर कर सकते हैं. ऐसे कदम अल्पकालिक लाभ दें, पर अफ्रीका में अमेरिकी सॉफ्ट पावर और सद्भावना को दीर्घकाल में नुकसान पहुंचा सकते हैं.

अफ्रीकी देश समझ रहे हैं कि महत्वपूर्ण खनिजों के कारण बहुध्रुवीय दुनिया में उनकी रणनीतिक अहमियत बढ़ी है. यही संसाधन उनकी सौदेबाज़ी शक्ति बढ़ाते हैं, लेकिन भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा भी तेज करते हैं.  इस संदर्भ में अन्य बाहरी शक्तियों से तुलना करना उपयोगी है. रूस की अक्सर इस बात के लिए आलोचना की जाती रही है कि वह ‘संसाधनों के लिए सुरक्षा‘ यानी सुरक्षा के बदले संसाधन वाले समझौते करता है, जिनमें अक्सर खनन अधिकारों के बदले सैन्य सहायता शामिल होती है. अमेरिका  ने परंपरागत रूप से शासन, पारदर्शिता और मानवीय मूल्यों से अलग पहचान बनाई, लेकिन ‘स्वास्थ्य के बदले संसाधन’ समझौते इस छवि को कमजोर कर सकते हैं. ऐसे कदम अल्पकालिक लाभ दें, पर अफ्रीका में अमेरिकी सॉफ्ट पावर और सद्भावना को दीर्घकाल में नुकसान पहुंचा सकते हैं.

अंत में डोनाल्ड ट्रम्प के दौर में वॉशिंगटन की अफ्रीका नीति रणनीतिक प्रतिस्पर्धा और नैतिक नेतृत्व के बीच तनाव दिखाती है. अत्यधिक लेन-देन आधारित रुख भरोसा, वैधता और संतुलन को कमजोर कर सकता है, जिससे प्रतिद्वंद्वियों से आगे निकलने की कोशिश में अमेरिका की पारंपरिक सॉफ्ट पावर और विश्वसनीयता घट सकती है.


समीर भट्टाचार्य ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में एसोसिएट फेलो हैं.

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