Author : Oommen C. Kurian

Expert Speak Health Express
Published on Dec 05, 2025 Updated 0 Hours ago

जब वैश्विक सहायता सिकुड़ रही हो और बीमारियाँ फैल रही हों, तब सबसे बड़ा सवाल यही है- क्या गरीब देश अपनी स्वास्थ्य प्रणाली को गिरने से बचा पाएंगे.

ग्लोबल हेल्थ अलर्ट: दुनिया की फंडिंग डाउन… सबसे गरीब कैसे बचेंगे?

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विश्व बैंक की हालिया रिपोर्ट, एट अ क्रॉसरोड्स: सहायता में गिरावट के बीच सरकारी स्वास्थ्य वित्तपोषण की संभावनाएं, ऐसे समय में सामने आई है, जब वैश्विक स्वास्थ्य खर्च स्पष्ट दबाव में है. इस लेख में आगे से इसे क्रॉसरोड्स रिपोर्ट कहा जाएगा. ये रिपोर्ट एक ऐसे विचलन को उजागर करती है जो स्वास्थ्य के मामले में दुनिया की सबसे गरीब आबादी के पीछे छूट जाने की ख़तरा पैदा करती है. क्रॉसरोड्स रिपोर्ट एक तीखा सवाल पूछती है जो निम्न आय वाले देशों (एलआईसी) और निम्न मध्यम आय वाले देशों (एलएमआईसी) के लिए बहुत मायने रखती है. सवाल ये है कि स्वास्थ्य प्रणालियों को बाहरी आर्थिक समर्थन के रूप में चालू रखने या ख़त्म होने के लिए कौन भुगतान करेगा?

  • वैश्विक सहायता घट रही है; सवाल है—क्या गरीब देश अपनी स्वास्थ्य प्रणाली बचा पाएंगे?
  • नई विश्व बैंक रिपोर्ट तब आई है जब वैश्विक स्वास्थ्य खर्च दबाव में है।जो दान दाता देश थे, खुद
  • रिपोर्ट बताती है—सबसे गरीब आबादी स्वास्थ्य के क्षेत्र में पीछे छूटने के ख़तरे में है।

उनके यहां ऋण संकट, भू-राजनीतिक उथल-पुथल और घरेलू नीतियों के मेल ने एक तूफान पैदा कर दिया है. ऐसे में कुछ कम आय और निम्न मध्यम आय वाले देश स्वास्थ्य के लिए बाहरी सहायता में गिरावट के हिस्से की भरपाई कर सकता है. इसके लिए सिद्धांत रूप से वो अनुमानित आर्थिक विकास और घरेलू तौर पर राजस्व जुटाने का काम कर सकते हैं. फिर भी अगर स्वास्थ्य के लिए विकास सहायता (डीएएच) पर हालिया सबूतों के साथ इसकी वजह से पड़ने वाले असर की संख्याएं देखी जाएं तो संतुलन कहीं अधिक नाजुक दिखता है.

एलआईसी और एलएमआईसी के बारे में क्या कहती है रिपोर्ट?
क्रॉसरोड्स रिपोर्ट विश्व बैंक की स्वास्थ्य श्रृंखला के लिए वार्षिक सरकारी संसाधनों और अनुमानों में पहली है. ये रिपोर्ट 2030 तक संभावित रास्तों का पता लगाने के लिए आधारभूत सरकारी स्वास्थ्य व्यय के साथ मैक्रो-राजकोषीय अनुमानों को जोड़ती है. इसका शुरुआती बिंदु यह है कि कम आय और निम्न मध्यम आय वाले देशों में घरेलू सार्वजनिक व्यय पहले से ही स्वास्थ्य वित्तपोषण का अधिकांश भार वहन करता है. इनमें से ज़्यादातर देशों में अनुदान और रियायती ऋण सरकारी स्वास्थ्य बजट का सिर्फ एक छोटा सा हिस्सा हैं. हालांकि, कुछ कम आय वाले और बहुत ही गरीब देश इस मामले में अपवाद हैं. उन्हें स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए दान दाता देशों से काफ़ी मदद मिलती है.

“डब्ल्यूएचओ ने वर्तमान अवधि को वैश्विक स्वास्थ्य वित्तपोषण के इतिहास का ‘सबसे बड़ा व्यवधान’ बताया है क्योंकि प्रमुख दाता देशों ने अपने योगदान में कटौती की है.”

ये तस्वीर, उस बात की तस्दीक करती है जो हाल ही में विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट में कही गई है. डब्ल्यूएचओ के वैश्विक स्वास्थ्य व्यय अपडेट से ये उजागर होता है कि घरेलू सरकारी खर्च कई एलएमआईसी में भी कुल स्वास्थ्य खर्च पर हावी है जबकि स्वास्थ्य के लिए विकास सहायता यानी डीएचए का बढ़ना बंद हो गया. इसके विपरीत ये सहायता सापेक्षिक रूप से घट रही है. अगर इन सभी रिपोर्ट्स को एक साथ पढ़ें तो ये स्रोत स्वास्थ्य वित्तपोषण संबंधी बहसों को सिर्फ ज्यादा मदद-कम मदद के रूप में पेश कर किसी निष्कर्ष पर पहुंचने को कठिन बनाते हैं.

इसके साथ ही, ये रिपोर्ट मौजूदा सहायता माहौल से जुड़े ज़ोखिमों के बारे में भी खरी-खरी बात कहती है. डब्ल्यूएचओ ने वर्तमान अवधि को वैश्विक स्वास्थ्य वित्तपोषण के इतिहास का "सबसे बड़ा व्यवधान" बताया है क्योंकि प्रमुख दाता देशों ने अपने योगदान में कटौती की है. स्थिति इतनी खराब हो गई है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन को खुद अपने मुख्य बजट को पांचवें हिस्से से अधिक कम करने के प्रस्तावों का सामना करना पड़ रहा है. इसका एक प्रमुख उदाहरण ब्रिटेन है. ब्रिटेन ने एड्स, तपेदिक और मलेरिया से लड़ने के लिए वैश्विक फंड में अपने योगदान में 2027-29 चक्र के लिए 15 प्रतिशत की कटौती की है. ब्रिटेन ने पहले एक अरब पाउंड की सहायता देने का वादा किया था जिसे घटाकर 850 मिलियन पाउंड कर दिया गया है. ये बहुपक्षीय स्वास्थ्य वित्तपोषण के लिए समर्थन में कमी का एक बड़ा उदाहरण है.

एट अ क्रॉसरोड्स रिपोर्ट पूछती है कि क्या इन परिस्थितियों में कम आय वाले देशों और निम्न मध्यम आय वाले देशों में घरेलू स्वास्थ्य बजट इतनी तेज़ी से बढ़ सकता है और क्या उसका पर्याप्त रूप से उपयोग किया जा सकता है ताकि जनता के बुनियादी अधिकारों को भी बरकरार रखा जा सके. इसका जवाब सावधानी से देने की ज़रूरत है. जानबूझकर राजकोषीय और राजनीतिक विकल्पों के बिना, कई एलआईसी देश खर्च करने के रास्ते पर बने हुए हैं. इसका नतीजा ये होगा कि 2030 तक प्रति व्यक्ति सरकारी स्वास्थ्य व्यय बहुत कम स्तर पर रह जाएगा जो सेवाओं के एक आवश्यक पैकेज को वित्तपोषित करने के लिए ज़रूरी है. 

"विदेशी सहायता बनाम घरेलू खर्च" की बहस से परे
क्रॉसरोड्स रिपोर्ट के अनुमान स्वास्थ्य के लिए विकास सहायता और घरेलू खर्च पर बढ़ते काम के साथ मेल खाते हैं. लैसेंट मैगज़ीन में अपेगयेई और सहकर्मियों का एक हालिया लेख 1990 से 2030 तक के डीएएच पर नज़र रखता है. इस लेख के विश्लेषण से ये सामने आता है कि ऐतिहासिक रूप से बड़े दान दाता देश अगर सहायता में कटौती करते हैं तो इससे स्वास्थ्य संबंधी असमानताएं बढ़ने का ख़तरा है. जब तक, घरेलू संसाधन जुटाने में तेज़ी नहीं आती और मौजूदा खर्च का अधिक कुशलता से इस्तेमाल नहीं किया जाता, तब तक विदेशी सहायता में कटौती से कम आय वाले देशों मुश्किल पैदा हो सकती है. बीएमजे ग्लोबल हेल्थ में युबियाओ झी और सह-लेखकों की एक पूरक समीक्षा परिवर्तन के दौर से गुजर रही डीएएच की जांच करती है और इस चीज का दस्तावेज़ीकरण करती है कि जब कोई देश आय सीमा को पार करते हैं तो क्या होता है. ऐसा होने पर बाहरी समर्थन अक्सर तेज़ी से गिरता है और घरेलू बजट में समायोजन आम तौर पर अनिश्चितता से भरा होता है. 

“एट अ क्रॉसरोड्स रिपोर्ट पूछती है कि क्या इन परिस्थितियों में कम आय वाले देशों और निम्न मध्यम आय वाले देशों में घरेलू स्वास्थ्य बजट इतनी तेज़ी से बढ़ सकता है… ताकि जनता के बुनियादी अधिकार बरकरार रहें.”

घरेलू खर्चे के मोर्चे पर, लास्टुका और उनके सहयोगियों द्वारा लैंसेट ग्लोबल हेल्थ मेटा-विश्लेषण में 1995 और 2022 के बीच 201 देशों को शामिल किया गया है. इस विश्लेषण में, वास्तविक स्वास्थ्य-समायोजित जीवन प्रत्याशा (लाइफ एक्सपेक्टेंसी) और हर देश के खर्च के स्तर पर क्या हासिल किया जा सकता है,  इसके बीच अंतर के रूप में स्वास्थ्य देखभाल अक्षमता का अनुमान लगाया गया है. अध्ययन से पता चलता है कि 2019 तक अक्षमता में लगातार गिरावट आई. कोविड महामारी के दौरान स्थिति और खराब हो गई और तब से इसमें आंशिक रूप से ही सुधार हुआ है. टुकड़ों-टुकड़ों में मिलने वाली सहायता या जेब से किए जाने वाले खर्च के विपरीत, बेहतर प्रशासन और एकत्रित सरकारी वित्तपोषण का उच्च हिस्सा, अधिक कुशल संसाधन उपयोग से जुड़ा हुआ है. यहां पर जेब से किए जाने वाले खर्च का अर्थ ये है कि जब आप अपने मेडिकल बिल को बीमा या रिइंबर्समेंट की बजाए अपनी जेब से भरते हैं.

इस पृष्ठभूमि में देखें तो एट अ क्रॉसरोड्स रिपोर्ट कई बिंदुओं पर प्रकाश डालती है जो कम आय और निम्न मध्यम आय वाले देशों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं. एक बिंदु तो ये है कि किसी चीज का एक सीमा से ज्यादा इस्तेमाल करने में आने वाली बाधा तकनीकी के बजाए राजकोषीय ज़्यादा है. निम्न आय वाले देशों का एक बड़ा समूह अभी भी सकल घरेलू उत्पाद के 15 प्रतिशत से कम राशि का टैक्स इकट्ठा करते हैं. इस समस्या को मुख्य सामाजिक खर्च को बनाए रखने के लिए न्यूनतम सीमा के रूप में व्यापक रूप से उल्लेखित किया गया है. बड़े पैमाने पर प्रगतिशील राजस्व सुधारों के बिना,  स्वास्थ्य, शिक्षा या सामाजिक सुरक्षा के लिए पर्याप्त सार्वजनिक धन उपलब्ध करा पाना बहुत मुश्किल है फिर भले ही स्वास्थ्य मंत्रालय अपनी योजनाओं को कितनी अच्छी तरह डिज़ाइन करते हों.


“जब विदेशी सहायता और घरेलू राजकोषीय स्थिति दोनों दबाव में होती हैं तो इन गलत आवंटनों का समानता और परिणामों पर तीव्र प्रभाव पड़ता है.”

दूसरी बात यह है कि सार्वजनिक बजट की संरचना भी मायने रखती है. रिपोर्ट से पता चलता है कि कुछ कम आय वाले देशों में कुल सार्वजनिक व्यय में स्वास्थ्य की हिस्सेदारी में मामूली लेकिन निरंतर वृद्धि, एक दशक से भी ज़्यादा समय में,  दीर्घकालिक तस्वीर बदल सकती है. ऐसे में ये कहा जा सकता है कि सिर्फ संसाधनों की मात्रा ही मायने नहीं रखती है, बल्कि सीमित बजट के भीतर स्वास्थ्य से जुड़ी प्राथमिकता भी महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं.

इसके अलावा ये रिपोर्ट दक्षता को पूरी तरह से तकनीकी मुद्दा मानने का विरोध करती है, जिसे वित्तपोषण संबंधी सवालों के निपटारे के बाद सुलझाया जा सकता है. वैश्विक स्तर पर मिले सबूत इस बात को स्पष्ट करते हैं कि कम उपयोग की गई सुविधाओं, खराब लक्षित सब्सिडी और प्राथमिक देखभाल, सार्वजनिक स्वास्थ्य और अग्रिम पंक्ति के कार्यकर्ताओं की उपेक्षा करने से नाकामी की संभावना बढ़ जाती है. जब विदेशी सहायता और घरेलू राजकोषीय स्थिति दोनों दबाव में होती हैं तो इन गलत आवंटनों का समानता और परिणामों पर तीव्र प्रभाव पड़ता है.

ग्लोबल साउथ देशों के सामने बड़ी चुनौती
क्रॉसरोड्स रिपोर्ट में कम और निम्न मध्यम आय वाले देशों में नीति समुदायों के लिए दो मुश्किल लेकिन ज़रूरी कदमों की तरफ इशारा किया गया है. एक चिंता उन शर्तों को लेकर है जिनके सहारे बाहरी साझेदार घरेलू स्वास्थ्य रणनीतियों का समर्थन कर उनमें दखलअंदाज़ी की कोशिश करते हैं. स्वास्थ्य पर विदेशी सहायता को लेकर हाल में किए गए शोध से पता चलता है कि खराब तरीके से प्रबंधित सहायता से ज़रूरी स्वास्थ्य कार्यक्रमों में अस्थिरता पैदा हो सकती है, खासकर उन देशों में, जहां सिस्टम नाजुक हैं और राजकोषीय स्थिति कठिन है. जैसे-जैसे दानकर्ता देश पीछे हटते हैं, वैसे-वैसे ज़्यादा पारदर्शी और पूर्वानुमानित होने की ज़िम्मेदारी सरकारों की होती है. सरकारों और समुदायों पर ज़ोखिम डालने के बजाए शेष धनराशि को राष्ट्रीय योजनाओं के अनुरूप बनाना बड़ी जिम्मेदारी होती है और इसमें पैंतरेबाज़ी करने की गुंजाइश भी बहुत कम होती है.

दूसरा मुद्दा घरेलू है. कई देशों में, स्वास्थ्य को अभी भी एक ऐसे कम महत्वपूर्ण क्षेत्र के रूप में देखा जाता है जो ऋण सेवा, सब्सिडी और सुरक्षा खर्च से भरा हुआ है. ह्यूमन राइट्स वॉच और अन्य संगठनों ने स्वास्थ्य में कम निवेश के वितरणात्मक परिणामों को उजागर करना शुरू कर दिया है. दस्तावेज़ी सबूतों के साथ  वे बता रहे हैं कि स्वास्थ्य पर सार्वजनिक व्यय का निम्न स्तर, कैसे पहुंच और समानता के लिए हानिकारक प्रभावों में बदल जाता है.

एट अ क्रॉसरोड्स रिपोर्ट में कुल सार्वजनिक खर्च के हिस्से के रूप में सरकारी स्वास्थ्य व्यय पर ज़ोर दिया गया है. खास बात ये है कि उस धन को देखभाल के स्तरों पर कैसे आवंटित किया जाता है,  ये भी उतना ही मायने रखता है जितना कि आगे के अनुमान. जब स्वास्थ्य को विवेकाधीन लाइन आइटम यानी गैरज़रूरी खर्च की बजाए मुख्य सामाजिक अनुबंध के हिस्से के रूप में मान्यता दी जाती है, तो कराधान, निर्धारण और पुनर्प्राथमिकता की राजनीति अलग दिखने लगती है.

“भारत का स्वास्थ्य भविष्य मुख्य रूप से इसके टैक्स सिस्टम, अंतर-सरकारी राजकोषीय हस्तांतरण और बजटीय विकल्पों से आकार लेगा, ना कि विदेशी सहायता लिफाफे के आकार से.”

इसके अलावा, राजकोषीय बातचीत का विस्तार स्वास्थ्य मंत्रालय से आगे बढ़ना चाहिए. बाकी मंत्रालयों की भी इसमें शामिल किया जाना चाहिए. "स्वास्थ्य कर" या तम्बाकू, शराब और चीनी पर भारी टैक्स का मामला पहले से कहीं ज़्यादा मज़बूत है. इन्हें सिर्फ राजस्व सृजक के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए. इसे सार्वजनिक स्वास्थ्य के ऐसे हस्तक्षेप के रूप में देखा जाना चाहिए, जो गैर-संचारी रोगों के दीर्घकालिक बोझ को कम करता है. फिर भी, ऐसे टैक्सों को लागू करने की राजनीतिक अर्थव्यवस्था ज़ोखिमों से भरी हुई है, उद्योग जगत भी इसका विरोध करता है. उद्योग के विरोध को दूर करने के लिए स्वास्थ्य विभाग से जुड़े नेताओं को वित्त मंत्रालयों और नागरिक समाज के साथ गठबंधन बनाने की कोशिश करनी चाहिए.

ये रिपोर्ट भारत के लिए प्रासंगिक क्यों है?
भारत इस रिपोर्ट में लगभग एक बाहरी देश के रूप में शामिल हुआ है. भारत जैसी बड़ी उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए, विदेशी अनुदान और रियायती ऋण सरकारी स्वास्थ्य व्यय का एक नगण्य हिस्सा बनाते हैं. विश्व बैंक का विश्लेषण, स्पष्ट शब्दों में, संकेत देता है कि विदेशी सहायता में कटौती का भारत के कुल स्वास्थ्य व्यय पर बहुत कम सीधा प्रभाव पड़ेगा.

अन्य आकलन भी इसी दिशा में इशारा करते हैं. 2024 में ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन (ओआरएफ) द्वारा तैयार भारत के लिए पीएचएसएसआर (स्वास्थ्य प्रणाली स्थिरता और लचीलेपन के लिए साझेदारी) देश की रिपोर्ट में एक महत्वपूर्ण बात सामने आई. रिपोर्ट से ये सामने आया कि, कुल स्वास्थ्य खर्च का एक तिहाई से ज़्यादा अभी भी अपनी जेब से आता है. ऐसे में, परिवर्तन के मुख्य कारक, घरेलू सार्वजनिक वित्तपोषण, बुनियादी ढांचे में निवेश और शासन सुधार में निहित हैं, ना कि सहायता प्रवाह में. इस संदर्भ में देखें तो, क्रॉसरोड्स रिपोर्ट हमें याद दिलाती है कि, भारत का स्वास्थ्य भविष्य मुख्य रूप से इसके टैक्स सिस्टम, अंतर-सरकारी राजकोषीय हस्तांतरण और बजटीय विकल्पों से आकार लेगा, ना कि विदेशी सहायता लिफाफे के आकार से, जो सिकुड़ता रहता है.

यह रिपोर्ट, कुछ दूसरे कारणों से भी भारत के लिए प्रासंगिक बनी हुई है. ग्लोबल साउथ में अन्य देशों के साथ भारत का विकास सहयोग बढ़ रहा है. निम्न आय वाले देशों के सामने आने वाली राजकोषीय और सहायता बाधाओं की स्पष्ट समझ भारत के बहुत काम आ सकती है. क्रॉसरोड्स रिपोर्ट, डीएएच कटौती के संपर्क में आने वाले पड़ोसी और अफ्रीकी देशों में स्थिर, अधिक साझेदारी-उन्मुख स्वास्थ्य सहयोग को डिज़ाइन करने में मदद कर सकती है. रिपोर्ट में दर्ज की गई उथल-पुथल डब्ल्यूएचओ से लेकर ग्लोबल फंड तक, भारत की अपनी स्वास्थ्य सुरक्षा से जुड़ी बहुपक्षीय संस्थाओं को भी प्रभावित करेगी.ये रिपोर्ट राजकोषीय यथार्थवाद और दीर्घकालिक स्वास्थ्य-प्रणाली दृष्टि के संयोजन पर ज़ोर देती है. ये दृष्टिकोण, स्वास्थ्य प्रणाली स्थिरता और लचीलेपन के लिए साझेदारी के निष्कर्षों में कही गई बातों से काफ़ी हद तक खाता है.

कम और निम्न आय वाले देशों के लिए विश्व बैंक की ये हालिया रिपोर्ट एक प्रारंभिक चेतावनी के रूप में सबसे अच्छी तरह पढ़ी जाती है. अब वो समय ख़त्म हो रहा है, जिस अवधि में बढ़ती सहायता और मामूली घरेलू सह-वित्तपोषण वृद्धिशील लाभ प्रदान कर सकता था. अब आगे क्या होगा, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि, देश टैक्स लगाने, खर्च करने और शासन करने का कैसा तरीका चुनते हैं. ये देखना भी महत्वपूर्ण होगा कि, क्या समय आने पर वैश्विक स्वास्थ्य एकजुटता का एक अलग, और स्थिर रूप बनाया जा सकता है.


ओम्मन सी कुरियन ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन में सीनियर फेलो और स्वास्थ्य पहल के प्रमुख हैं.

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