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अब जलवायु परिवर्तन सिर्फ़ धरती का नहीं, इंसान के जीवन और सेहत का भी सवाल बन गया है. बढ़ती गर्मी, बाढ़, सूखा और प्रदूषण हमारे शरीर और सांस तक पहुंच चुके हैं. ऐसे वक्त में COP30 सिर्फ़ जलवायु की नहीं बल्कि ज़िंदगी की रक्षा का सम्मेलन बन गया है — जहां तय होगा कि आने वाला भविष्य कितना सुरक्षित और सेहतमंद होगा.
Image Source: Getty Images
यह लेख ‘कॉप-30 से उम्मीदें’ निबंध श्रृंखला का हिस्सा है.
जलवायु परिवर्तन 21वीं सदी में मानव जीवन, स्वास्थ्य, आजीविका और समृद्धि के लिए सबसे बड़ा ख़तरा बनकर उभरा है. दुनिया भर में, असामान्य मौसम और बदलते जलवायु पैटर्न से जलवायु-जनित बीमारियां बढ़ रही हैं. अत्यधिक गर्मी से जहां मौत के मामले बढ़ रहे हैं, वहीं सूखे से खाद्य और जल सुरक्षा कमज़ोर हो रही है. बाढ़ से संक्रामक रोग फैल रहे हैं और भयानक तूफ़ान हमारी स्वास्थ्य सेवाओं की परीक्षा ले रहे हैं. इनका मतलब साफ़ है कि जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निपटने के लिए विश्व भर में जो प्रयास किए जा रहे हैं, उनमें ईमानदारी नहीं बल्कि कहीं-न-कहीं कमी है. इसी वज़ह से जलवायु परिवर्तन से बढ़ रहे स्वास्थ्य ख़तरों के साथ हम तालमेल नहीं बिठा पाए हैं.
2015 के पेरिस समझौते के तहत बने ग्लोबल स्टॉकटेक (जलवायु परिवर्तन से लड़ने के लिए दुनिया क्या कर रही है, उसका मूल्यांकन करने वाला तंत्र) की पहली रिपोर्ट में ही यह समझा जा सकता है. इसमें कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन का असर हर क्षेत्र में महसूस किया जा रहा है फिर भी उसके अनुसार किए जाने वाले प्रयासों में बिखराव है. उनमें समानता भी नहीं है. ख़ास तौर से, स्वास्थ्य के क्षेत्र में अनुकूलन के प्रयास काफ़ी कमज़ोर हैं. नतीजतन, अब करीब 3.6 अरब लोग जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील हैं और कई देशों की स्वास्थ्य सेवाएं इससे निपटने के लिए तैयार नहीं हैं. विकासशील देशों को अपनी तैयारी के लिए 2030 तक सालाना 215-387 अरब डॉलर की ज़रूरत है जबकि उनको इससे काफ़ी कम मदद मिल रही है.
“COP28 एक ‘टर्निंग प्वाइंट’ था — यह पहला मौका था, जब संयुक्त राष्ट्र की जलवायु वार्ताओं में स्वास्थ्य का मुद्दा केंद्र में रहा.”
जलवायु-स्वास्थ्य संबंधों के लिहाज से दुबई में आयोजित COP28 (जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन के पक्षकारों का 28वां सम्मेलन) एक ‘टर्निंग प्वाइंट’ था. यह पहला मौका था, जब संयुक्त राष्ट्र की जलवायु वार्ताओं में स्वास्थ्य का मुद्दा केंद्र में रहा. सम्मेलन में पहली बार स्वास्थ्य दिवस मनाया गया और एक उच्च-स्तरीय जलवायु-स्वास्थ्य मंत्रिस्तरीय बैठक का आयोजन भी किया गया. इतना ही नहीं, पहली बार 143 देशों ने जलवायु और स्वास्थ्य पर एक घोषणा-पत्र पर हस्ताक्षर किए. इसके अलावा, उस सम्मेलन में एक नया ‘संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ग्लोबल फ्रेमवर्क फॉर क्लाइमेट रेजिलिएशन’ स्वीकार किया गया, जिसमें जलवायु-जोखिम के मूल्यांकन, योजना और क्रियान्वयन के लिए 2030 तक के लक्ष्य तय किए गए. जलवायु परिवर्तन के खिलाफ स्वास्थ्य ढांचों को मज़बूत करना भी इसमें शामिल है.
साफ़ है, ब्राज़ील के बेलेम में हो रहा COP30 सम्मेलन जलवायु-स्वास्थ्य एजेंडे के लिहाज से एक महत्वपूर्ण मोड़ है. ग्लोबल स्टॉकटेक से यही पता चलता है कि जलवायु परिवर्तन से निपटने की प्रतिबद्धताओं में स्वास्थ्य का मुद्दा बहुत पीछे है. बेलेम सम्मेलन में यह तस्वीर बदलनी चाहिए और हमें ठोस नतीजे हासिल करने की ओर बढ़ना चाहिए. इसके लिए पेरिस समझौते के अनुच्छेद 7 के तहत तय किए गए ‘अनुकूलन पर वैश्विक लक्ष्य’ (GGA) में स्वास्थ्य-स्थिति में होने वाले बदलावों को शामिल करना चाहिए. इतना ही नहीं, अनुच्छेद 13 के तहत सच्चाई से स्वास्थ्य आंकड़े को बताना चाहिए और जन-स्वास्थ्य तंत्र की वास्तविकताओं के अनुसार ‘हानि और क्षति फ्रेमवर्क’ बनाना चाहिए. यह पारंपरिक स्वास्थ्य ख़तरों से भी कहीं आगे तक फैली चुनौतियां हैं, जैसे- जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता, रोगाणुरोधी प्रतिरोध (AMR), सूक्ष्म प्लास्टिक का ख़तरा और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) डेटा केंद्रों के लिए पानी की अत्यधिक ज़रूरत (इस वज़ह से पहले से ही सूखे का सामना करने वाले जलाशयों पर दबाव बढ़ गया है) आदि.
जलवायु परिवर्तन से पैदा होने वाली स्वास्थ्य चुनौतियां और उनसे निपटने के लिए ज़रूरी संसाधनों का अभाव एक बड़ा मुद्दा है, जिसका समाधान COP30 में होना चाहिए. इसके लिए मील का एक पत्थर ‘वृहद GGA ढांचा’ को अपनाना हो सकता है, जिसमें ख़ास लक्ष्य और संकेतक शामिल किए जाएं. कई वर्षों की मेहनत के बाद सभी पक्ष सात विषयों (जल, भोजन, पारिस्थिति तंत्र और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों के) पर सहमत हुए हैं और उनमें प्रगति को मापने के लिए लगभग 100 संकेतक तैयार किए हैं. COP30 में इस ढांचे को अंतिम रूप देने से अनुकूलन योजना के सभी स्तरों में स्वास्थ्य को शामिल करने का एक ख़ाका तैयार हो सकता है. जैसे- एक प्रस्तावित संकेतक गर्मी से होने वाले नुक़सान और मौतों की वार्षिक दर में बदलाव हो सकता है, जो एक ठोस मापदंड होगा और सभी देशों को अत्यधिक गर्मी से होने वाले नुक़सान की निगरानी करने व उसे कम करने के लिए प्रोत्साहित करेगा.
“जलवायु वित्त का सिर्फ़ 33 फीसदी हिस्सा अनुकूलन के लिए रखा जाता है, और 2023 में तो केवल तीन प्रतिशत संसाधन ही अनुकूलन परियोजनाओं में खर्च हो सके.”
इन योजनाओं को पूरा करने के लिए अधिक संसाधनों की ज़रूरत होगी. COP30 ऐसे समय में हो रहा है, जब जलवायु वित्त में अनुकूलन संबंधी उपायों पर लंबे समय से कम ध्यान दिया जाता रहा है. अभी जलवायु वित्त का सिर्फ़ 33 फीसदी हिस्सा इसके लिए रखा जाता है. साल 2023 में तो केवल तीन प्रतिशत संसाधन ही अनुकूलन से जुड़ी परियोजनाओं में खर्च हो सके. इतना ही नहीं, अनुकूलन के कामों में खर्च को 2025 तक दोगुना करने का संकल्प भी अब तक अधूरा है, जो शायद ही पूरा हो सकेगा, क्योंकि विकासशील देशों के लिए लगभग 40 अरब डॉलर के तय लक्ष्य में से 2023 तक केवल 26 अरब डॉलर ही दिया जा सका है.
वास्तव में, होता यह है कि आज अधिकतर बहसें कार्बन उत्सर्जन की कमी को लेकर की जाती हैं, जबकि अनुकूलन और सामर्थ्य पैदा करने वाले मापदंड कमज़ोर हैं. यही वह पड़ाव है, जहां स्वास्थ्य को इसमें शामिल करने से फर्क पड़ सकता है. अनुकूलन की सफलता का एक सहज मानदंड स्वास्थ्य है. यदि सभी पक्ष COP30 में GGA के तहत स्वास्थ्य मापदंड पर सहमत हो जाते हैं, तो वे इसे अपने देश के आंकड़ों और स्टॉकटेक में शामिल कर सकते हैं. उदाहरण के लिए, तेज़ गर्मी से होने वाली मौत की जानकारी देश देंगे या जलवायु संबंधी मानकों के अनुसार तैयार अस्पतालों की संख्या बताएंगे या फिर जलवायु-संवेदनशील बीमारियों के रुझानों के बारे में जानकारियां साझा करेंगे. इस तरह के आंकड़े जलवायु प्रगति के कामों को अधिक मानवीय बनाएंगे और सरकारों पर दबाव पड़ेगा कि वे गर्मी से होने वाली मौतों में वृद्धि या नए इलाकों में मलेरिया के उभरने की स्थिति कार्रवाई करें.
नतीजों की परवाह किए बिना, सभी पक्षों को जलवायु परिवर्तन के अनुसार स्वास्थ्य ढांचे को तैयार करने के लिए मानक बनाने चाहिए. उदाहरण के लिए, जलवायु-प्रतिरोधी बुनियादी ढांचे (बाढ़ से सुरक्षा, गर्मी के लिए बिजली का बैकअप, कूलिंग की टिकाऊ व्यवस्था आदि) वाली स्वास्थ्य सुविधाओं का प्रतिशत एक संकेतक हो सकता है.
महत्वपूर्ण बात यह है कि अपनाए गए किसी भी मानक की जानकारी साफ़-साफ़ दी जानी चाहिए. 2024 से, उन्नत पारदर्शिता ढांचा सभी देशों को दो वर्षों पर पारदर्शिता रिपोर्ट (BTA) प्रस्तुत करने के लिए प्रेरित करता है. इसमें अनुकूलन संबंधी जानकारी भी शामिल होती है. यदि COP30 में यह तय होता है कि सभी पक्ष ‘सबसे महत्वपूर्ण चीज़, यानी लोगों की सेहत को मापेंगे’ और अपनी रिपोर्टिंग में स्वास्थ्य संकेतकों को शामिल करेंगे, तो इससे जलवायु प्रगति के बारे में हमारी समझ काफ़ी बेहतर बनेगी. इससे 2028 ग्लोबल स्टॉकटेक (दूसरा विश्लेषण) में सिर्फ़ यही पता नहीं चलेगा कि कितने गीगाटन उत्सर्जन में कमी आई है, बल्कि यह भी जानकारी मिलेगी कि जलवायु कार्रवाई (या निष्क्रियता) के कारण कितने जीवन बचाए गए (या खोए गए).
COP30 से पूर्व हुए सम्मेलनों पर नज़र डालने पर पता चलता है कि जलवायु और स्वास्थ्य के बीच संबंधों को व्यावहारिक रूप से समझने के लिए कई अलग-अलग क्षेत्रों में लगातार प्रयास किए जाने की ज़रूरत है. ये दोनों संकट (जलवायु संकट और वैश्विक स्वास्थ्य संकट) आपस में गुंथे हुए हैं. बढ़ते संकटों का अर्थ है कि हमारी रणनीतियां व्यापक होनी चाहिए. जैसे- बढ़ते तापमान और बारिश के पैटर्न में हो रहे बदलाव सिर्फ़ बीमारियों को तेज़ी से फैलाने में मदद नहीं करते, बल्कि AMR (रोगाणुरोगी प्रतिरोध) को भी बदतर बनाते हैं. ऐसा माना जाता है कि बाढ़ से ऐसे बैक्टीरिया का संक्रमण फैल सकता है, जिन पर एंटीबायोटिक दवाएं काम न करें. ऐसा तब होता है, जब बाढ़ का पानी और सीवेज या अन्य गंदगियों वाला पानी स्वच्छ जल में मिल जाता है. लोगों में बार-बार होने वाले संक्रमणों के कारण जब उन पर एंटीबायोटिक का बार-बार इस्तेमाल किया जाता है, तो रोगाणुओं की प्रतिरोधी क्षमता बढ़ जाती है.
“यदि COP30 यह तय करता है कि सभी पक्ष स्वास्थ्य संकेतकों को अपनी रिपोर्टिंग में शामिल करेंगे, तो इससे जलवायु प्रगति का आकलन अधिक मानवीय और प्रभावी होगा।”
आने वाले दिनों में जीवाश्म ईंधनों का चरणबद्ध उन्मूलन भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा है, क्योंकि यह जलवायु परिवर्तन और गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं, दोनों की जड़ है. COP28 में जारी आधिकारिक दस्तावेज़ में पहली बार जीवाश्म ईंधनों से बचने की ज़रूरत पर बल दिया गया था, जो बताता है कि कोयला, तेल और गैस के बेहिसाब उपयोग वाला युग अब ख़त्म हो रहा है. हालांकि, यह बयान सावधानीपूर्वक दिया गया था, फिर भी इसमें कुछ खामियां थीं, इसलिए COP30 को इस विवादास्पद मुद्दे पर फिर से विचार करना चाहिए. स्वास्थ्य संबंधी फ़ायदों के अलावा, इससे प्लास्टिक के उत्पादन और तेल उद्योग से वातावरण में उत्सर्जित हो रहे अन्य विषैले पदार्थों में भी कमी आएगी. अभी 99 प्रतिशत से अधिक प्लास्टिक जीवाश्म ईंधन के कच्चे माल से बनता है, और प्लास्टिक का पूरा चक्र (बनने से लेकर अपशिष्ट के रूप में जलने तक) ग्रीनहाउस उत्सर्जन का एक प्रमुख स्रोत है. सूक्ष्म प्लास्टिक प्रदूषण ग्रीनहाउस गैसों में एक है, जो जल, मिट्टी, यहां तक कि हवा को भी दूषित करता है. यह अपने संपर्क में आने वाले व्यक्ति में फेफड़ों में सूजन से लेकर हार्मोन में समस्याएं तक पैदा कर सकता है.
साफ़ है, उभरती चुनौतियों के प्रति हमें सावधान होना चाहिए. जैसे-जैसे हमारा समाज जलवायु परिवर्तन के अनुसार खुद को तैयार करता है और तकनीकी समाधानों की ओर आगे बढ़ाता है, नई समस्याएं भी पैदा हो सकती हैं. उदाहरण के लिए, डिजिटलीकरण और AI को आगे बढ़ाने से कई मायनों में हमें निस्संदेह लाभ मिलता है, लेकिन इससे ऊर्जा का अधिक उपयोग करने वाले एआई-केंद्र भी तेज़ी से बढ़ रहे हैं. ये बड़े-बड़े सर्वर गर्मी पैदा करते हैं और जल-आधारित कूलिंग सिस्टम से ही आमतौर पर इनको ठंडा किया जाता है. कई केंद्र तो उन इलाकों में बनाए जा रहे हैं, जहां पानी का संकट है, जबकि बड़े एआई-केंद्रित डेटा केंद्र प्रतिदिन लाखों गैलन पानी की ख़पत कर सकते हैं, जिससे हजारों लोगों की ज़रूरतें पूरी हो सकती हैं.
महत्वपूर्ण मुद्दा यह भी है कि जलवायु समाधान या नए उद्योग खुद सार्वजनिक स्वास्थ्य या समृद्धि को कमज़ोर कर सकते हैं. जैसे-जैसे उच्च-तकनीक वाले भविष्य की ओर हम बढ़ रहे हैं, टिकाऊ विकास का आकलन करने के लिए जलवायु परिवर्तन का स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों को ध्यान में रखना बेहद ज़रूरी होगा. दुनिया ऐसी जलवायु नीति बर्दाश्त नहीं कर सकती, जिसमें मानवीय नुक़सान को अनदेखा किया गया हो, और न ही ऐसी स्वास्थ्य नीति को झेल सकती है, जो जलवायु परिवर्तन से जुड़ी चुनौतियों को नज़रंदाज़ करे. इसके लिए ज़रूरी है कि अनुकूलन व पारदर्शिता के प्रयासों का स्वास्थ्य प्राथमिकताओं के साथ तालमेल बनाया जाए, और जलवायु परिवर्तन से सेहत को होने वाले नुक़सान के लिए आर्थिक राहत दी जाए. कोई भी देश अपनी जलवायु कार्रवाई को उत्सर्जन और तापमान की कहानी नहीं, बल्कि मानव अस्तित्व और सम्मान की कहानी ही बनाना चाहेगा. कहा भी गया है कि ‘जो मापा जाता है, प्रबंधन उसी का होता है’. तो, सही चीज़ों को मापकर और सकारात्मक स्वास्थ्य नतीजों की ओर बढ़कर, COP30 यह तय करने में मदद कर सकता है कि जलवायु परिवर्तन के युग में मानवता केवल जीवित ही न रहे, बल्कि फले और फूले भी.
(के एस उपलब्द्ध गोपाल ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में हेल्थ इनीशिएटिव के एसोसिएट फेलो हैं)
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Dr. K. S. Uplabdh Gopal is an Associate Fellow within the Health Initiative at ORF. His focus lies in researching and advocating for policies that ...
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