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Published on Jan 23, 2026 Updated 0 Hours ago
समुद्री व्यापार ज़रूरी है लेकिन इसका पर्यावरण पर असर भी बड़ा है. समझिए हरित सागर पहल के ज़रिये भारत बंदरगाहों का विकास जलवायु संरक्षण के साथ कैसे कर रहा है.
जहाजरानी का ग्रीन टर्न: भारत तैयार?

मौजूदा दौर में 90 प्रतिशत से ज़्यादा वैश्विक व्यापार समुद्र के रास्ते होता है. यही वजह है कि वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का लगभग 3 प्रतिशत हिस्सा अकेले शिपिंग उद्योग का है. अंतर्राष्ट्रीय समुद्री संगठन (आईएमओ) ने जहाजरानी क्षेत्र के लिए नेट ज़ीरो उत्सर्जन का लक्ष्य रखा है. इसी के बाद समुद्री व्यापार में अग्रणी राष्ट्र इस बात पर विचार कर रहे हैं कि आर्थिक विकास और जलवायु संरक्षण को एक साथ कैसे हासिल किया जाए.

भारतीय बंदरगाह मात्रा के हिसाब से लगभग 95 प्रतिशत और मूल्य के हिसाब से 70 प्रतिशत व्यापार संभालते हैं. भारत ने अपनी ब्लू इकोनॉमी को टिकाऊ बनाने के लिए 2023 में हरित सागर दिशानिर्देश जारी किए. इसमें बंदरगाहों के विकास को पंचामृत लक्ष्यों के अनुरूप बनाया गया है जो जलवायु परिवर्तन से संबंधित पांच प्रतिबद्धताओं पर ज़ोर देते हैं. समुद्री अमृत काल विजन 2047 और समुद्री भारत विजन 2030 के अंतर्गत इस पर काम किया जा रहा है. हरित सागर भारत के प्रमुख बंदरगाहों के लिए ऊर्जा दक्षता और जलवायु अनुकूलन क्षमता को अंतर्राष्ट्रीय मानकों के हिसाब से ढालने का रास्ता बनाता है.

ग्लोबल नेट-ज़ीरो शिपिंग की सीमाएं

अंतर्राष्ट्रीय समुद्री संगठन की संशोधित ग्रीनहाउस गैस रणनीति (2023) में अंतर्राष्ट्रीय परिवहन से होने वाले उत्सर्जन को 2050 तक या उसके आसपास कम करने के लक्ष्य निर्धारित किए गए हैं. इसमें 2008 के स्तर की तुलना में 2030 तक कम से कम 20 प्रतिशत की कमी (लक्ष्य 30 प्रतिशत) और 2040 तक कम से कम 70 प्रतिशत की कमी (लक्ष्य 80 प्रतिशत) का आह्वान किया गया है. इसके जवाब में, सिंगापुर के समुद्री और बंदरगाह प्राधिकरण ने 2030 तक अपने कुल बंदरगाह उत्सर्जन में 60 प्रतिशत की कमी लाने का लक्ष्य रखा है. इतना ही नहीं, वैकल्पिक ईंधन के उपयोग को बढ़ाने के लिए सिंगापुर ने अमोनिया बंकरिंग की शुरुआत की है. इसके अलावा, रॉटरडैम-सिंगापुर ग्रीन एंड डिजिटल शिपिंग कॉरिडोर यह सुनिश्चित करता है कि अंतर्राष्ट्रीय साझेदारियां 2030 तक इस प्रमुख व्यापार मार्ग पर उत्सर्जन में 20-30 प्रतिशत की कमी लाएं.

भारत ने अपनी ब्लू इकोनॉमी को टिकाऊ बनाने के लिए 2023 में हरित सागर दिशानिर्देश जारी किए. इसमें बंदरगाहों के विकास को पंचामृत लक्ष्यों के अनुरूप बनाया गया है जो जलवायु परिवर्तन से संबंधित पांच प्रतिबद्धताओं पर ज़ोर देते हैं.

सिंगापुर के विपरीत, उभरती अर्थव्यवस्थाओं और लघु द्वीप विकासशील देशों (एसआईडीएस) के सामने चुनौतियां बड़ी हैं. उन्हें वित्त तक सीमित पहुंच, संरचनात्मक मुद्दे, तकनीकी चुनौतियां, क्षमता की कमी और बुनियादी ढांचे की तैयारी जैसी महत्वपूर्ण बाधाओं का सामना करना पड़ता है. ऐसे देशों में, बड़े समुद्री लक्ष्यों को पूरा करने के चक्कर में अक्सर छोटे बंदरगाहों की अनदेखी कर दी जाती है. विकसित अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में वैकल्पिक ईंधनों को तेजी से अपनाने की क्षमता के बावजूद, सुरक्षा और ईंधन भरने संबंधी नियमों में हो रहे बदलाव उनकी प्रगति में बाधा डाल सकते हैं. इसके अलावा, एक मुश्किल ये है कि ज्यादातार हरित हाइड्रोजन और मेथनॉल परियोजनाएं अभी शुरुआती और प्रायोगिक चरण में हैं. इन्हें बड़े पैमाने पर लागू होने में काफ़ी समय लग सकता है.

भारत के सामने दोहरी चुनौती है. अपनी राष्ट्रीय महत्वाकांक्षाओं को पूरा करना है, साथ ही अंतर्राष्ट्रीय समुद्री संगठन में अपनी भूमिका भी निभानी है. ऐसे में भारत हरित बंदरगाह ढांचे के माध्यम से स्थानीय परिस्थितियों पर आधारित समाधान खोजने की कोशिश कर रहा है. हालांकि, इसे हासिल करने के लिए भारत के हरित सागर प्रयासों को केवल दिशा-निर्देशों तक सीमित ना रहकर ठोस काम करना होगा. इसके लिए स्थानीय व्यापार, जनसंख्या और पर्यावरणीय आवश्यकताओं जैसे घटकों पर भी ध्यान देना होगा.

चुनौती का कैसे मुकाबला कर रहे हैं भारतीय बंदरगाह?

हरित सागर परियोजना के समग्र दृष्टिकोण में बंदरगाह के कार्बन फुटप्रिंट में योगदान देने वाली सभी गतिविधियों को ध्यान में रखा जाता है, जिसमें माल की हैंडलिंग और भंडारण, जहाज संचालन, लॉजिस्टिक्स सेवाएं और भीतरी इलाकों की कनेक्टिविटी शामिल हैं. यह ढांचा 'उन्मूलन, न्यूनीकरण और नियंत्रण' मॉडल का पालन करता है. ये मॉडल बंदरगाहों के आसपास के समुद्री पारिस्थितिक तंत्रों और तटीय समुदायों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना कार्बन उत्सर्जन कम करने की दिशा में काम करता है.

  • स्वच्छ ऊर्जा की तरफ बदलाव और सर्कुलर इकोनॉमी

हरित सागर परियोजना बंदरगाहों को सौर और पवन ऊर्जा, उपकरणों और वाहनों के नवीनीकरण पर ज़ोर दिया गया है. लंगर डालकर खड़े जहाजों को तटवर्ती विद्युत आपूर्ति के माध्यम से स्वच्छ ऊर्जा संचालन अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है. बंदरगाहों को वर्ष 2030 तक प्रति टन माल पर कार्बन उत्सर्जन में 30 प्रतिशत और 2047 तक 70 प्रतिशत की कमी करनी होगी. इसके साथ ही, नवीकरणीय ऊर्जा का उपयोग बढ़ाना होगा. नया मंगलौर बंदरगाह पूरी तरह से सौर ऊर्जा से संचालित होता है. यह ढांचा बंदरगाहों को संचालन को सुव्यवस्थित करने, निष्क्रिय समय और कार्बन उत्सर्जन को कम करने के लिए कहता है.

  • भारतीय बंदरगाहों में नवीकरणीय ऊर्जा का विस्तार करना

हरित सागर परियोजना बंदरगाहों को भविष्य के ईंधनों के लिए तैयार कर रही है. इसके तहत भारत के राष्ट्रीय मिशन के अनुरूप हरित हाइड्रोजन, हरित अमोनिया और हरित मेथनॉल पर काम हो रहा है. बंदरगाहों से अपेक्षा की जाती है कि वो 2030 तक नवीकरणीय ऊर्जा का इस्तेमाल 60 प्रतिशत से ज़्यादा और 2047 तक 90 प्रतिशत तक बढ़ाएं. उदाहरण के लिए, दीनदयाल बंदरगाह 20 मेगावाट सौर और पवन ऊर्जा क्षमता स्थापित करने की योजना बना रहा है. विशाखापत्तनम में 10 मेगावाट सौर ऊर्जा है. वीओ चिदंबरनार बंदरगाह (वीओसी) और न्यू मंगलौर बंदरगाह अपने नवीकरणीय ऊर्जा संयंत्रों का विस्तार कर रहे हैं. वीओसी ने स्ट्रीटलाइट और इलेक्ट्रिक वाहन चार्जिंग के लिए भारत की पहली ग्रीन हाइड्रोजन पायलट परियोजना शुरू की है और एक ग्रीन मेथनॉल बंकरिंग सुविधा स्थापित करने की योजना बना रहा . बंदरगाह में एलईडी लाइटिंग, ग्रीन बिल्डिंग, विद्युतीकृत रेल लिंक और संसाधन दक्षता में सुधार के लिए तटवर्ती बिजली योजनाओं को लागू किया जा रहा है.

हरित सागर परियोजना के समग्र दृष्टिकोण में बंदरगाह के कार्बन फुटप्रिंट में योगदान देने वाली सभी गतिविधियों को ध्यान में रखा जाता है, जिसमें माल की हैंडलिंग और भंडारण, जहाज संचालन, लॉजिस्टिक्स सेवाएं और भीतरी इलाकों की कनेक्टिविटी शामिल हैं.

  • बंदरगाहों पर जल, प्रदूषण और जैव विविधता का प्रबंधन

हरित सागर योजना में बंदरगाहों को तटरेखा और आसपास के समुदायों का अभिन्न अंग माना जाता है. इसलिए इसमें मैंग्रोव के संरक्षण, वायु और ध्वनि प्रदूषण को कम करने, अपशिष्ट, जलभराव और गिट्टी जल का जिम्मेदारीपूर्वक प्रबंधन करने पर ध्यान दिया जाता है. संसाधनों की बर्बादी रोकने के लिए स्पष्ट लक्ष्य निर्धारित किए गए हैं,  इसमें वर्ष 2030 तक प्रति टन माल ढुलाई में ताजे पानी के उपयोग को 20 प्रतिशत कम करना, सभी अपशिष्ट जल की रिसाइक्लिंग और जैव विविधता को मज़बूत करने के लिए हरित आवरण को 20 प्रतिशत से ज़्यादा बढ़ाना शामिल है.

  • जलवायु संबंधी चुनौतियों से निपटने में सक्षम बंदरगाह का निर्माण

हरित सागर में जलवायु संबंधी ज़ोखिमों से निपटने के लिए बंदरगाहों की तैयारी पर ज़ोर दिया गया है. इसके लिए स्थानीय कमज़ोरियों का नियमित आकलन करना, बुनियादी ढांचे को मज़बूत करना और समुद्र स्तर में वृद्धि, चक्रवात, बाढ़ और तटीय कटाव जैसी चुनौतियों के लिए योजना बनाना आवश्यक है. गोवा स्थित मोरमुगाओ बंदरगाह को हरित श्रेय योजना के तहत भारत का पहला हरित बंदरगाह घोषित किया गया है. यह बंदरगाह स्वच्छ परिवहन और अधिक टिकाऊ प्रथाओं को बढ़ावा देने के लिए एक आदर्श के रूप में वैश्विक पर्यावरण जहाज सूचकांक में सूचीबद्ध है.

  • हरित बंदरगाह प्रणालियों में शासन और पारदर्शिता

पर्यावरण संरक्षण के नाम पर धोखाधड़ी को रोकने और दिशानिर्देशों का पालन सुनिश्चित करने के लिए बंदरगाह संचालन की नियमित निगरानी और रिपोर्टिंग पर ज़ोर दिया गया है. हरित सागर कार्बन क्रेडिट अर्जित करने को प्रोत्साहित करता है. इतना ही नहीं, स्वच्छ ईंधन या तटवर्ती बिजली का उपयोग करने वाले जहाजों के लिए प्राथमिकता के आधार पर लंगर डालने या बंदरगाह शुल्क में छूट जैसे प्रोत्साहन प्रस्तावित करता है. इसके तहत स्वच्छ ईंधन या इलेक्ट्रिक वाहनों का उपयोग करने वाले निजी संचालकों, सार्वजनिक-निजी भागीदारी और ट्रक बेड़ों को भी मान्यता दी जाती है.

हरित सागर के विज़न को साकार करने के लिए सभी हितधारकों को चरणबद्ध दृष्टिकोण अपनाना होगा. निगरानी अधिक पारदर्शी और सुसंगत होनी चाहिए, हरित वित्त को बढ़ावा देना होगा.

  • भारत की ब्लू इकोनॉमी को ग्रीन पोर्ट से जोड़ना

इसमें कोई शक नहीं कि ब्लू इकोनॉमी में रोजगार और आय उत्पन्न करने की क्षमता होती है, लेकिन स्थानीय परिस्थितियों को ध्यान में रखे बिना जहाजरानी, बंदरगाहों, मत्स्य पालन और तटीय पर्यटन के अनियंत्रित विकास से सामुद्रिक पारिस्थितिक तंत्र को नुकसान हो सकता है. स्थानीय और आदिवासी समुदायों पर नकारात्मक असर पड़ सकता है. ऐसे में हरित सागर को पर्यावरण संरक्षण और जलवायु परिवर्तन के प्रति लचीलेपन को स्थानीय आकांक्षाओं और ज़मीनी हकीक़तों से जोड़ना होगा. वीओसी बंदरगाह ने स्थानीय समुदाय के साथ मिलकर मैंग्रोव संरक्षण का काम शुरू कर दिया है.

  • भारत के हरित बंदरगाह परिवर्तन को लागू करना

भारत एक प्रमुख समुद्री राष्ट्र है. भारत पूरी दुनिया के सामने ये उदाहरण पेश कर सकता है कि विकास को बढ़ावा देते हुए बंदरगाहों और जहाजरानी को कैसे पर्यावरण के अनुकूल बनाया जा सकता है. हरित सागर दिशानिर्देशों को धीरे-धीरे देशभर के सभी बंदरगाहों पर लागू किया जा सकता है. भारत अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं और छोटे विकासशील देशों के साथ अपने अनुभव साझा कर सकता है, जिससे उन्हें भी विभिन्न परिस्थितियों में हरित बंदरगाह परिवर्तन को अपनाने और लागू करने में मदद मिलेगी.

हरित सागर के विज़न को साकार करने के लिए सभी हितधारकों को चरणबद्ध दृष्टिकोण अपनाना होगा. निगरानी अधिक पारदर्शी और सुसंगत होनी चाहिए, हरित वित्त को बढ़ावा देना होगा. इन पहलों के लिए हर स्तर पर स्थानीय समुदायों की भागीदारी ज़रूरी है. आईएमओ, जी20 और ब्रिक्स जैसे मंच निष्पक्ष समुद्री जलवायु नीतियों को और ज़्यादा समर्थन दे सकते हैं. अगर हरित सागर दिशानिर्देशों को प्रभावी ढंग से लागू किया जाए, तो भारत की हरित बंदरगाह यात्रा वैश्विक स्तर पर यह प्रदर्शित कर सकती है कि आर्थिक विकास और स्थिरता साथ-साथ चल सकते हैं.


अनुषा केसरकर गवांकर ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन में सीनियर फेलो हैं.

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