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संयुक्त राष्ट्र ने 25-26 अक्टूबर को साइबर अपराध पर ‘हनोई संधि’ पर 72 देशों के साथ हस्ताक्षर किए जो डिजिटल दुनिया में अपराध रोकने की दिशा में बड़ा कदम है. यह संधि वैश्विक साइबर नियमों की ज़रूरत और देशों के बीच नाजुक राजनीतिक संतुलन को बखूबी दिखाती है.
Image Source: Getty Images
साइबर अपराधों के ख़िलाफ़ लड़ाई और उनकी रोकथाम के लिए 25 और 26 अक्टूबर को संयुक्त राष्ट्र का कन्वेंशन आयोजित किया गया जिसमें 72 देशों ने ‘हनोई संधि’ पर हस्ताक्षर किए. साइबर अपराध को गैर-कानूनी घोषित करने वाली इस संधि में वैश्विक साइबर व्यवस्था की ज़रूरतों और चुनौतियों की चर्चा की गई है. इसे 24 दिसंबर, 2024 को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने पास किया था. बढ़ते ध्रुवीकरण के बीच यह बहुपक्षवाद की जीत मानी गई थी क्योंकि ध्रुवीकरण ने अंतरराष्ट्रीय सहयोग के मौके घटाए हैं. हालांकि, सभी पक्ष इसलिए राज़ी नहीं हुए थे कि उनमें साइबर अपराध की परिभाषा को लेकर जो मतभेद था, वह ख़त्म हो गया था बल्कि यह इसलिए हो सका क्योंकि मौजूदा व्यवस्थाएं कमज़ोर मानी गईं. जहां एक ओर क्षेत्रीय ढांचों ने इस वैश्विक संधि के लिए आधार तैयार किए, वहीं दूसरी ओर, ‘अंतरराष्ट्रीय मानदंडों की वकालत करने वाले’ देशों ने अपने रणनीतिक कौशल का परिचय देकर सहमति बनाने में सफलता पाई.
दरअसल, साइबर अपराध की अंतरराष्ट्रीय प्रकृति पर सभी देशों में एक राय होने के बावजूद, अपराध की संरचना को लेकर उनमें सहमति नहीं बन पा रही थी. इसका पता अलग-अलग क्षेत्रीय ढांचों से भी होता है. अब तक साइबर अपराध से निपटने के लिए कई क्षेत्रीय उपाय किए गए हैं, जैसे कि साइबर अपराध पर बुडापेस्ट कन्वेंशन (2001), अंतर्राष्ट्रीय सूचना सुरक्षा पर सहयोग के लिए शंघाई सहयोग संगठन समझौता (2009), सूचना प्रौद्योगिकी अपराधों का मुकाबला करने को लेकर अरब कन्वेंशन (2010), साइबर सुरक्षा एवं व्यक्तिगत डेटा संरक्षण पर अफ्रीकी संघ कन्वेंशन (2014) इत्यादि. एक तो इनका लक्ष्य एक नहीं रहा है फिर इनमें भौगोलिक सीमा के पार प्रभाव डालने की क्षमता बहुत सीमित है. इतना ही नहीं, नियम संबंधी परस्पर-विरोधी मापदंडों के कारण अक्सर सूचना और प्रौद्योगिकी (ICT) के आपराधिक इस्तेमाल की जांच-पड़ताल में रुकावटें आई है.
“साइबर अपराध की अंतरराष्ट्रीय प्रकृति पर सभी देशों में एक राय होने के बावजूद, अपराध की संरचना को लेकर उनमें सहमति नहीं बन पा रही थी.”
चूंकि सूचना व प्रौद्योगिकी किसी एक भौगोलिक सीमा में सिमटकर नहीं रहतीं और सीमा-पार आतंकवाद के हथियार के रूप में उनका व्यापक इस्तेमाल होने लगा है इसलिए क्षेत्रीय ढांचों में इस तरह का सामंजस्य बनाना ज़रूरी हो गया था कि विश्व स्तर पर प्रभावी कार्रवाई के लिए सभी देशों में आपसी तालमेल बन सके. बेशक, बुडापेस्ट कन्वेंशन को साइबर अपराध के ख़िलाफ़ महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय साधन माना गया है लेकिन ज़्यादातर गैर-पश्चिमी देश इस पर सहमत नहीं रहे हैं. संयुक्त राष्ट्र में साइबर अपराध पर चर्चा मुख्य रूप से एक खुली सदस्यता वाले अंतर-सरकारी विशेषज्ञ समूह के माध्यम से शुरू हुई जिसे 'साइबर अपराध पर एक व्यापक अध्ययन’ करने का काम सौंपा गया था. इसके बाद, रूस और इसकी वकालत करने वाले 17 अन्य पक्ष साइबर अपराध संधि का प्रस्ताव देकर 'मानदंडों के निर्माता' बन गए. अमेरिका और यूरोपीय संघ के साथ-साथ कई मानवाधिकार संगठनों ने इसका विरोध किया, फिर भी संयुक्त राष्ट्र महासभा में यह प्रस्ताव पास हो गया. 2019 में, संयुक्त राष्ट्र महासभा ने खुली सदस्यता वाली तदर्थ अंतर-सरकारी समिति (AHC) बनाई ताकि आपराधिक उद्देश्यों के लिए सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी के उपयोग के ख़िलाफ़ अंतरराष्ट्रीय संधि बन सके और उसका मसौदा तैयार किया जा सके. 2021 से 2024 के बीच इस पर व्यापक विचार-विमर्श हुआ, तब जाकर साइबर अपराध पर संयुक्त राष्ट्र संधि को बिना किसी मतदान के सर्वसम्मति से पारित किया गया.
भले ही बुडापेस्ट संधि के प्रावधान कहीं अधिक व्यापक हैं लेकिन सभी देशों की उस पर सहमति नहीं बन सकी. इसे इसलिए नकार दिया गया क्योंकि इसमें ‘ग्लोबल साउथ’ (वैश्विक दक्षिण) को वार्ता-प्रक्रिया से बाहर रखा गया और सीमा-पार कार्रवाइयों को लेकर भी इसमें छूट दी गई है जिससे क्षेत्रीय संप्रभुता को लेकर चिंताएं पैदा हुई हैं. हालांकि, संयुक्त राष्ट्र के नेतृत्व में जो प्रक्रिया चलाई गई, वह पक्षपात-रहित और सबके प्रतिनिधित्व की बात कहती थी, पर साइबर अपराधों और इससे जुड़े प्रावधानों को तय करने को लेकर कई देशों में वैचारिक संघर्ष दिखा, यहां तक कि तदर्थ अंतर-सरकारी समिति की चर्चाओं में भी यह देखा गया. फिर भी, साइबर अपराधों को दो रूपों में बांटने पर कुछ हद तक सहमति बन गई, जिनमें पहला है- साइबर-आश्रित, यानी ऐसा अपराध, जो सिर्फ़ सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी उपकरणों का उपयोग कर किया जा सकता है, और दूसरा- साइबर-सक्षम, यानी पारंपरिक अपराध, जो सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी के उपयोग द्वारा आसानी से किए जा सकते हैं.
“साइबर अपराधों को दो रूपों में बांटने पर कुछ हद तक सहमति बन गई— साइबर-आश्रित और साइबर-सक्षम.”
यूरोपीय संघ ने साइबर अपराध की परिभाषा सीमित रखने की लगातार मांग की, ताकि यह संधि साइबर-आधारित अपराधों तक ही सिमटकर रहे. उसका तर्क था कि साइबर अपराध की व्यापक परिभाषा से मानवाधिकारों और मौलिक स्वतंत्रता में बेवज़ह के दख़ल का ख़तरा बढ़ सकता है. उसने राष्ट्रीय सुरक्षा के मामलों को ‘साइबर अपराध’ में शामिल करने को लेकर चिंता जाहिर की थी और कहा था कि इससे खुले, स्वतंत्र और सुरक्षित साइबरस्पेस को ख़तरा हो सकता है. हालांकि, उसी की तरह अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया जैसे देश भी शुरुआत में इस कन्वेंशन के विरोध में थे, पर अंत में साइबर-आधारित और साइबर-सक्षम, दोनों तरह के अपराधों को इसमें शामिल करने पर वे सहमत हो गए, लेकिन विवेकपूर्ण ढंग से.
दूसरी ओर, रूस और चीन ने साइबर अपराध की एक व्यापक परिभाषा तैयार करने की पैरवी की, जिसमें भ्रामक सूचना फैलाने, सीमा पार साइबर जासूसी करने और महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे को निशाना बनाने वाले साइबर कार्रवाइयों के लिए सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी के इस्तेमाल को भी अपराध घोषित करने की बात थी. इसलिए, जब इस संधि का शीर्षक (मसौदा के समय) ‘आपराधिक उद्देश्यों के लिए सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी के इस्तेमाल का मुकाबला करने को लेकर एक व्यापक अंतरराष्ट्रीय संधि’ से हटाकर ‘साइबर अपराध के ख़िलाफ़ संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन’ किया गया, तो रूस ने अपनी नाराज़गी ज़ाहिर की. पाकिस्तान और ईरान जैसे अन्य देश भी कन्वेंशन से मानवाधिकार सुरक्षा उपायों को हटाने जैसे मुद्दे पर मुखर थे.
“20 वर्षों बाद स्वीकार की गई पहली वैश्विक आपराधिक न्याय साइबर संधि.”
कुल मिलाकर, साइबर अपराध को तय करने के लिए तदर्थ अंतर-सरकारी समिति में पेश प्रस्तावों से पता चला कि साइबर व्यवस्था में वैश्विक मानदंडों का चरित्र कितना कमज़ोर है. ज़्यादातर पश्चिमी देशों ने ‘चरमपंथी अपराध’ और ‘आतंकवाद संबंधी अपराध’ जैसे विषयों से जुड़े साइबर अपराधों को इसमें शामिल करने के प्रस्तावों का विरोध किया. अमेरिका और उसके सहयोगी देशों ने मुख्य रूप से चीन और रूस को संधि का मसौदा तय करने से रोकने के लिए तदर्थ अंतर-सरकारी समिति में भाग लिया था. हालांकि अंत में इस समिति ने ऐसा मसौदा तैयार किया कि सदस्य देशों ने संधि पारित होने में कोई रुकावट नहीं डाली और इंडोनेशिया, मेक्सिको, सिंगापुर और दक्षिण अफ्रीका जैसे ‘स्विंग वोटरों’ (जिनका रुख़ साफ़ नहीं था) ने भी अंत में कन्वेंशन का समर्थन किया.
हनोई कन्वेंशन पहली अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्याय संधि है, जिस पर बीते 20 वर्षों में न सिर्फ़ व्यापक चर्चा हुई, बल्कि अब उसे स्वीकार भी कर लिया गया है. यह साइबर अपराध से निपटने के लिए सदस्य देशों की इच्छाशक्ति को दर्शाता है, भले इसमें टालमटोल किया गया हो. बेशक, इस संधि को अपनाना बहुपक्षीय सहयोग और साइबर अपराध से निपटने के लिए मानक ढांचे को मज़बूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, फिर भी इसमें कुछ ख़ामियां हैं. पहली, यह संधि सभी की सहमति से अपनाया गया है और 72 देशों ने हनोई में कन्वेंशन पर हस्ताक्षर किए हैं, मगर क्या सभी देश इसे शिद्दत से अपनाएंगे? इतिहास पर यदि नज़र डालें, तो हस्ताक्षर करने के बाद बहुपक्षीय संधि को लागू करने में सदस्य देशों को काफ़ी समय लगता है, क्योंकि इसके लिए उनको अपने यहां के कानून में संधि के अनुसार बदलाव करने पड़ते हैं.
दूसरी ख़ामी, साइबर अपराध के मानदंडों को तय करने में संशोधनवादी देशों का जो प्रभाव रहा, वह बताता है कि विश्व में एक नई व्यवस्था आकार ले रही है. वैश्विक साइबर शासन व्यवस्था एक उभरता हुए क्षेत्र है, इसलिए इसके मानदंडों को कौन तय करेगा, यह सभी देशों के बीच कड़ी प्रतिस्पर्धा का विषय बन गया है. अमेरिका और उसके सहयोगी देशों ने साइबर अपराध पर रूस के नेतृत्व वाली संधि का पहले विरोध किया, फिर इसकी परिभाषा पर उन्होंने आपत्ति जताई और अंत में शर्त के साथ इस संधि को मानने के लिए तैयार हुए. हालांकि, इन सबसे अलग इस संधि की सबसे बड़ी चुनौती मानदंडों पर सहमति बनाने और एक जवाबदेह, मज़बूत वैश्विक शासन व्यवस्था बनाने के बीच जो खाई बन गई है, उसे पाटने की होगी.
(हीना मखीजा ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में एसोसिएट फेलो हैं)
(अर्शिया रॉय ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में रिसर्च इंटर्न हैं)
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Dr. Makhija is an Associate Fellow at ORF and specializes in the study of Multilateralism, International Organizations, Global Norms, India at UN, Multilateral Negotiations, and ...
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