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महासागर हमारी जलवायु, भोजन और आजीविका का आधार हैं लेकिन तेज़ी से बिगड़ रहे हैं इसीलिए संयुक्त राष्ट्र ने 2021–2030 को महासागर विज्ञान दशक घोषित किया. अब सवाल है- अब तक क्या हासिल हुआ और आगे क्या करना बाकी है?
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संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 2017 में सतत विकास के लिए महासागर विज्ञान का संयुक्त राष्ट्र दशक (2021-2030) घोषित किया. इसका उद्देश्य महासागर विज्ञान को आगे बढ़ाना और महासागरों को स्वस्थ बनाने के लिए व्यावहारिक समाधान विकसित करना है. यूनेस्को के अंतर-सरकारी महासागरीय आयोग (IOC) के समन्वय में यह दशक “वह विज्ञान जिसकी हमें ज़रूरत है ताकि वह महासागर मिल सके जो हम चाहते हैं” के लक्ष्य पर काम करता है. इसमें दस प्रमुख चुनौती क्षेत्रों पर ध्यान दिया जाता है और वैज्ञानिकों, नीति-निर्माताओं तथा अलग-अलग क्षेत्रों के हितधारकों को साथ लाकर ज्ञान और साझेदारी विकसित की जाती है.
भारत के लिए महासागर दशक बेहद महत्वपूर्ण है. भारत की समुद्री तटरेखा 11,098 किलोमीटर से अधिक है और उसका बड़ा विशेष आर्थिक क्षेत्र है. समुद्र भारत में आजीविका, खाद्य सुरक्षा, व्यापार और राष्ट्रीय सुरक्षा का अहम आधार है. भारत का लगभग 95 प्रतिशत व्यापार समुद्री मार्गों से होता है.
समुद्र स्तर में वृद्धि, जैव-विविधता की हानि, समुद्री प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन ने महासागरों को वैश्विक सततता के केंद्र में ला दिया है. 2021 से महासागर दशक के तहत दुनिया भर में पहलें शुरू हुई हैं जिनमें महासागर अवलोकन, पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा, क्षमता निर्माण और डेटा साझा करना शामिल है. उपग्रह, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और स्वचालित प्रणालियों जैसी नई तकनीकों से पारिस्थितिकी तंत्र, प्रदूषण और मछली भंडार की निगरानी आसान हुई है. क्षेत्रीय कार्यक्रमों ने युवाओं की भागीदारी और पारंपरिक/आदिवासी ज्ञान के उपयोग को बढ़ावा दिया है. स्थानीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नीतिगत सुधार भी हुए हैं. फिर भी, इन प्रयासों का स्थायी असर सुनिश्चित करने के लिए अभी और काम करना होगा.
कई पहलें धन की कमी से जूझ रही हैं जिससे उनका विस्तार और लंबे समय तक चल पाना मुश्किल होता है. अफ्रीका और छोटे द्वीपीय विकासशील देशों (SIDS) में तटीय निगरानी प्रणालियों को स्थिर वित्त और उपकरणों की कमी का सामना करना पड़ता है जिससे जलवायु अनुकूलन के लिए ज़रूरी डेटा जुटाना कठिन हो जाता है. मछलीपालन, शिपिंग, ऊर्जा और संरक्षण जैसे क्षेत्रों के बीच समन्वय भी कमज़ोर है जिसके कारण फैसले बिखरे रहते हैं. ब्लू बेंगुएला करंट एक्शन जैसे क्षेत्रीय सहयोग कार्यक्रम दिखाते हैं कि अंगोला, नामीबिया और दक्षिण अफ्रीका मिलकर बड़े समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र का प्रबंधन कर रहे हैं लेकिन नीतियों का तालमेल और शासन समन्वय अब भी चुनौती बना हुआ है.
यदि शोध और नीति-निर्माण के बीच बेहतर जुड़ाव, क्षेत्रों में क्षमता के लिए अधिक निवेश और उद्योग व समुदायों की सक्रिय भागीदारी नहीं बढ़ी तो महासागर दशक अपने पूरे लक्ष्य हासिल नहीं कर पाएगा.
यदि शोध और नीति-निर्माण के बीच बेहतर जुड़ाव, क्षेत्रों में क्षमता के लिए अधिक निवेश और उद्योग व समुदायों की सक्रिय भागीदारी नहीं बढ़ी तो महासागर दशक अपने पूरे लक्ष्य हासिल नहीं कर पाएगा.
गहरे समुद्र का शोध भी एक बड़ी चुनौती है- समुद्र तल के बड़े हिस्से अब भी अज्ञात हैं. विकासशील देशों में सीमित ढाँचा और उन्नत तकनीक तक कम पहुँच इस समस्या को और बढ़ाती है. वहीं, घाना ओशन क्लाइमेट इनोवेशंस हब जैसी समुदाय-नेतृत्व वाली पहलें- जो पारंपरिक ज्ञान को डिजिटल मैपिंग से जोड़ती हैं, दिखाती हैं कि स्थानीय भागीदारी से लचीलापन बढ़ सकता है. महासागर दशक की क्षमता विकास सुविधा प्रशांत क्षेत्र में सोलोमन द्वीप के बाबानाकिरा समुदाय और नेटिव हवाईयन जैसे समूहों के साथ काम करती है, युवाओं और समुदाय नेताओं को जोड़कर प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियाँ और प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन विकसित करती है. मजबूत समन्वय और निवेश के बिना, महासागर दशक की पूरी क्षमता साकार नहीं होगी.
ओशन डिकेड (महासागर दशक) अपने मध्य चरण में पहुँच चुका है और 2025 महासागर शासन के लिए एक अहम वर्ष साबित हुआ. यह वह समय है जब योजनाओं से आगे बढ़कर ठोस कार्रवाई शुरू हुई. इसी वर्ष संयुक्त राष्ट्र का राष्ट्रीय सीमाओं से परे जैव विविधता संरक्षण समझौता (BBNJ) लागू हुआ जिसके तहत देशों को खुले समुद्र में समुद्री जीवन की रक्षा के लिए मिलकर काम करना होगा.
ओशन डिकेड (महासागर दशक) अपने मध्य चरण में पहुँच चुका है और 2025 महासागर शासन के लिए एक अहम वर्ष साबित हुआ. यह वह समय है जब योजनाओं से आगे बढ़कर ठोस कार्रवाई शुरू हुई.
साथ ही, विश्व व्यापार संगठन (WTO) के मछली पकड़ने पर सब्सिडी से जुड़े नए नियम भी लागू हुए, जिनका उद्देश्य अत्यधिक मछली शिकार को रोकना, निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देना और टिकाऊ समुद्री भोजन को समर्थन देना है. इसके अलावा, मारपोल (MARPOL) समझौते में हुए संशोधनों से जहाजरानी अधिक पारदर्शी बनी है और पर्यावरण को होने वाला नुकसान कम करने की दिशा में कदम बढ़े हैं.
ये सभी पहल, खासकर ग्लोबल साउथ के देशों के लिए, फंडिंग पाने, तकनीक साझा करने और समुद्रों के टिकाऊ प्रबंधन के लिए आवश्यक क्षमता विकसित करने के बड़े अवसर प्रदान करती हैं.
2025 में ब्राज़ील के बेलेम शहर में आयोजित COP30 में पहली बार एक ओशन एनवॉय को शामिल किया गया, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि महासागर और जलवायु परिवर्तन आपस में गहराई से जुड़े हैं. कई देशों ने अपने जलवायु लक्ष्यों में टिकाऊ महासागर योजना को शामिल करने का वादा किया. ब्राज़ील ने 2030 तक अपने पूरे विशेष आर्थिक क्षेत्र (EEZ) को टिकाऊ महासागर योजनाओं के तहत लाने की घोषणा की.
2021 से महासागर दशक के तहत दुनिया भर में पहलें शुरू हुई हैं जिनमें महासागर अवलोकन, पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा, क्षमता निर्माण और डेटा साझा करना शामिल है.
इसी वर्ष आयोजित संयुक्त राष्ट्र महासागर सम्मेलन (UNOC) में सरकारों, निजी कंपनियों, वैज्ञानिकों और नागरिक समाज ने मिलकर महासागर संरक्षण और तटीय क्षेत्रों की सुरक्षा को तेज़ करने का संकल्प लिया. सम्मेलन में निजी क्षेत्र को टिकाऊ समुद्री भोजन और महासागर तकनीकों में निवेश के लिए भी प्रोत्साहित किया गया.
इसके साथ ही कई नई पहल शुरू हुईं, जैसे-
नाइस ओशन एक्शन प्लान, जो समुद्री संरक्षित क्षेत्रों को बढ़ाने और हरित जहाजरानी को बढ़ावा देता है, Space4Ocean, जो महासागर की निगरानी को बेहतर बनाता है, क्वाइट ओशन गठबंधन, जो पानी के भीतर शोर को कम करने पर काम करता है, ओशन टूरिज़्म पैक्ट, जो टिकाऊ समुद्री पर्यटन को बढ़ावा देता है.
2025 में लिए गए फैसले आने वाले वर्षों में यह तय करेंगे कि महासागर शासन कितना प्रभावी, भरोसेमंद और भविष्य की पीढ़ियों के लिए सुरक्षित बन पाएगा.
भारत के लिए महासागर दशक बेहद महत्वपूर्ण है. भारत की समुद्री तटरेखा 11,098 किलोमीटर से अधिक है और उसका बड़ा विशेष आर्थिक क्षेत्र है. समुद्र भारत में आजीविका, खाद्य सुरक्षा, व्यापार और राष्ट्रीय सुरक्षा का अहम आधार है. भारत का लगभग 95 प्रतिशत व्यापार समुद्री मार्गों से होता है.
इसी कारण सागरमाला, मैरीटाइम विज़न 2030 और मैरीटाइम अमृत काल विज़न 2047 जैसी योजनाओं में समुद्र की केंद्रीय भूमिका है. टिकाऊ महासागर प्रबंधन के लिए भारत ने कई पहल शुरू की हैं, जैसे—
वन नेशन–वन पोर्ट, जिससे बंदरगाहों की दक्षता और डेटा साझा करना बेहतर हुआ, हरित सागर जो हरित और पर्यावरण-अनुकूल बंदरगाहों को बढ़ावा देता है, जहाजरानी में कार्बन उत्सर्जन कम करने के प्रयास, सागर सेतु जो डिजिटल कनेक्टिविटी और समुद्री निगरानी को मजबूत करता है.
भारत अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठन (IMO) में भी अहम भूमिका निभा रहा है और दूसरी बार कैटेगरी-B में शीर्ष स्थान हासिल कर चुका है.
भारत महासागर दशक में सक्रिय योगदान दे रहा है. नेशनल डिकेड कोऑर्डिनेशन कमेटी (NDCC) देश की महासागर से जुड़ी गतिविधियों को महासागर दशक के लक्ष्यों से जोड़ती है. डीप ओशन मिशन और समुद्रयान परियोजना के तहत गहरे समुद्र की खोज के लिए मानव चालित पनडुब्बी विकसित की जा रही है.
महासागर दशक भारत के लिए वैश्विक अनुभव से सीखने, अंतरराष्ट्रीय सहयोग पाने और महासागर शासन को मजबूत करने का अवसर है. BIMSTEC, IORA और हरित जहाजरानी गलियारों जैसे क्षेत्रीय मंचों के माध्यम से भारत फंडिंग जुटा सकता है, तकनीक साझा कर सकता है और अपनी समुद्री सुरक्षा व आर्थिक लक्ष्यों को आगे बढ़ा सकता है.
भारत महासागर निगरानी, जैव विविधता शोध और डेटा प्रणालियों को भी मजबूत कर रहा है. भारतीय महासागर क्षेत्र के लिए दशक सहयोग केंद्र (DCC-IOR) क्षेत्रीय सहयोग को बढ़ावा देता है. UNOC जैसे मंचों पर भारत ने SAHAV डिजिटल ओशन डेटा पोर्टल और तटीय सफाई अभियानों को प्रस्तुत कर अपनी वैश्विक भागीदारी दिखाई है. साथ ही, युवा महासागर पेशेवर कार्यक्रम (ECOP) के ज़रिए स्थानीय लोगों और युवाओं को जोड़ा जा रहा है.
हालाँकि भारत ने काफी प्रगति की है फिर भी चुनौतियाँ बनी हुई हैं. कई मछली संसाधन दबाव में हैं, समुद्र से जुड़े नियम कई मंत्रालयों में बँटे हुए हैं, तटीय कानूनों का पालन समान रूप से नहीं हो पा रहा है और समुद्री संरक्षित क्षेत्रों का दायरा अभी सीमित है. तटीय और द्वीपीय इलाकों में रहने वाले लोग चक्रवात, समुद्र स्तर बढ़ने और कटाव के बढ़ते खतरे का सामना कर रहे हैं. छोटे मछुआरे सबसे अधिक प्रभावित होते हैं.
आगे बढ़ते हुए भारत को अलग-अलग नीतियों में बेहतर तालमेल लाना होगा. विज्ञान, तकनीक और ढांचे में निवेश बढ़ाना होगा और स्थानीय समुदायों को निर्णय प्रक्रिया में शामिल करना होगा. मजबूत डेटा सिस्टम, शुरुआती चेतावनी तंत्र और डिजिटल साधन बेहतर योजना और आपदा प्रबंधन में मदद कर सकते हैं.
महासागर दशक भारत के लिए वैश्विक अनुभव से सीखने, अंतरराष्ट्रीय सहयोग पाने और महासागर शासन को मजबूत करने का अवसर है. BIMSTEC, IORA और हरित जहाजरानी गलियारों जैसे क्षेत्रीय मंचों के माध्यम से भारत फंडिंग जुटा सकता है, तकनीक साझा कर सकता है और अपनी समुद्री सुरक्षा व आर्थिक लक्ष्यों को आगे बढ़ा सकता है.
जैसे-जैसे 2025 समाप्ति की ओर बढ़ रहा है, सरकारों के लिए ज़रूरी हो गया है कि वे महासागर दशक के तहत किए गए अपने वादों को ठोस कार्रवाई में बदलें. आगे की प्रगति इस बात पर निर्भर करेगी कि देश अपने फैसलों को कितनी गंभीरता से लागू करते हैं और उन पर लगातार काम करते हैं.
भारत और पूरी अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए अब ध्यान घोषणाओं से हटकर वास्तविक काम पर होना चाहिए. इसके लिए महासागर शासन को मजबूत करना, समुद्री विज्ञान में अधिक निवेश करना और तटीय समुदायों के हितों की रक्षा करने वाली नीतियाँ बनाना बेहद ज़रूरी है. साथ ही, समुद्र की बेहतर निगरानी, समुद्री जैव विविधता की सुरक्षा और समुद्री संसाधनों के ज़िम्मेदाराना उपयोग पर भी खास ध्यान देना होगा.
तटीय क्षेत्रों में रहने वाले लोगों- खासकर मछुआरों और द्वीपीय समुदायों-की आजीविका समुद्र से सीधे जुड़ी है. इसलिए उनके अनुभव और जरूरतों को नीति निर्माण में शामिल करना आवश्यक है. मजबूत डेटा सिस्टम, शुरुआती चेतावनी तंत्र और आधुनिक तकनीकें बेहतर योजना और आपदा प्रबंधन में मदद कर सकती हैं. 2030 के बाद भी स्वस्थ महासागर बनाए रखने के लिए, 2025 में बनी गति को आगे बढ़ाना होगा. इसके लिए लगातार राजनीतिक इच्छाशक्ति, बेहतर तालमेल और ज़मीन पर ठोस नतीजे देने पर स्पष्ट ध्यान देना अनिवार्य है.
अनुषा केसरकर गावनकर ऑब्ज़र्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन में सीनियर फ़ेलो हैं.
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Dr. Anusha Kesarkar-Gavankar is Senior Fellow at the Observer Research Foundation. Her research spans the maritime economy, with a focus on sustainability, infrastructure, port-led development, ...
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