Author : Nilanjan Ghosh

Expert Speak Raisina Debates
Published on Mar 30, 2026 Updated 1 Days ago

ग्रीन स्टील आज महंगी जरूर लगती है लेकिन भविष्य के प्रदूषण, लागत और जोखिम को कम करके असल में यह एक समझदारी भरा निवेश है. अगर भारत को 2047 तक विकसित बनना है, तो सबसे सस्ता नहीं बल्कि सबसे टिकाऊ विकल्प चुनना ही असली अर्थशास्त्र है- जानें कैसे. 

ग्रीन स्टील: आज महंगी, कल सबसे सस्ती

भारत की विकास गाथा इस्पात में लिखी गई है. लेकिन इस भौतिक कहानी के पीछे एक गहरी, अदृश्य कहानी भी छिपी है - समय की कहानी. मनुष्यों के वर्तमान निर्णय हमेशा उनके भविष्य को निर्धारित करते रहे हैं - यही स्थिरता की अवधारणा का मूल है. इसलिए अवसंरचना के क्षेत्र में, जिसे समावेशी धन के ढांचे में भौतिक या निर्मित पूंजी के रूप में भी वर्गीकृत किया जाता है, कारकों का चयन केवल वर्तमान लागतों को ही तय नहीं करता; बल्कि यह भविष्य की दिशा को भी निर्धारित करता है.

विकसित भारत 2047 की भारत की आकांक्षा को इसी समयगत दृष्टिकोण से समझने की आवश्यकता है. विकसित भारत का लक्ष्य केवल प्रति व्यक्ति आय बढ़ाना नहीं है, बल्कि विकास को पर्यावरणीय संतुलन, समानता और स्थिरता के साथ आगे बढ़ाना है. इसी कारण हाल के केंद्रीय बजटों में अवसंरचना और पूंजीगत खर्च बढ़ाने पर जोर दिया गया है , फिर भी विकास का आकलन करने में केवल सकल घरेलू उत्पाद से आगे देखने की आवश्यकता पर वैश्विक स्तर पर बहस होती रही है. इसलिए, विकसित भारत 2047 केवल एक निश्चित सकल घरेलू उत्पाद प्रति व्यक्ति स्तर तक पहुँचने के बारे में नहीं है, बल्कि ‘बियॉन्ड GDP’ यानी सकल घरेलू उत्पाद से आगे की सोच के बारे में भी है - जिसमें प्राकृतिक पूंजी के क्षरण की लागत को ध्यान में रखना, जलवायु परिवर्तन से लड़ना और वितरणात्मक न्याय तथा समानता को बढ़ावा देना शामिल है.

हाल के केंद्रीय बजटों में अवसंरचना और पूंजीगत खर्च बढ़ाने पर जोर दिया गया है , फिर भी विकास का आकलन करने में केवल सकल घरेलू उत्पाद से आगे देखने की आवश्यकता पर वैश्विक स्तर पर बहस होती रही है. इसलिए, विकसित भारत 2047 केवल एक निश्चित सकल घरेलू उत्पाद प्रति व्यक्ति स्तर तक पहुँचने के बारे में नहीं है, बल्कि ‘बियॉन्ड GDP’ यानी सकल घरेलू उत्पाद से आगे की सोच के बारे में भी है.

हालाँकि विकास के लिए अवसंरचना आवश्यक है, लेकिन जलवायु संबंधी चिंताओं का समाधान भी जरूरी है. समावेशी धन ढांचे में निर्मित या उत्पादित पूंजी के एक घटक के रूप में अवसंरचना के लिए इस्पात की आवश्यकता होगी, और इसकी खरीद व उत्पादन प्रक्रियाएँ हरित सिद्धांतों के अनुरूप होनी चाहिए. इसलिए, ग्रीन स्टील अपनाना कोई छोटी या अतिरिक्त चीज़ नहीं है, बल्कि विकसित भारत बनाने के लिए यह बहुत जरूरी कदम है.

ग्रीन स्टील महंगी क्यों लगती है?

पहली नजर में ग्रीन स्टील महंगी लगती है, इसलिए इसका अर्थशास्त्र थोड़ा कठिन दिखाई देता है. इसकी लागत बढ़ने के दो बड़े कारण हैं. पहला, हरित तरीके से इस्पात बनाने में ग्रीन हाइड्रोजन, नवीकरणीय ऊर्जा और स्क्रैप के उपयोग जैसी तकनीकें शामिल होती हैं, जो अभी ज्यादा खर्चीली हैं. दूसरा, सरकारी खरीद प्रणाली आमतौर पर सबसे कम कीमत (L1) को प्राथमिकता देती है, इसलिए नए बदलावों का विरोध होता है. असल में यह विरोध आर्थिक मजबूरी से ज्यादा व्यवस्था की वजह से होता है.

आज जो इस्पात बन रहा है, उससे होने वाला प्रदूषण कई सालों तक बना रहता है. पहले जो पारंपरिक तरीके काम करते थे, वे अब जलवायु बदलाव और सीमित संसाधनों की दुनिया में उतने सही नहीं रह गए हैं और कई बार नुकसान भी पहुंचाते हैं. इसी कारण पुराने तरीके ही चलते रहते हैं और ग्रीन स्टील की ओर बदलाव धीमा पड़ जाता है. मुख्य समस्या सार्वजनिक खरीद प्रणाली में है, जो अभी भी केवल उस समय की कम लागत पर ध्यान देती है. यानी योजना बनाते समय भविष्य के असर को ज्यादा महत्व नहीं दिया जाता.

पहले जो पारंपरिक तरीके काम करते थे, वे अब जलवायु बदलाव और सीमित संसाधनों की दुनिया में उतने सही नहीं रह गए हैं और कई बार नुकसान भी पहुंचाते हैं. इसी कारण पुराने तरीके ही चलते रहते हैं और ग्रीन स्टील की ओर बदलाव धीमा पड़ जाता है.

आज बनने वाली अवसंरचना ही भविष्य की पर्यावरणीय और आर्थिक स्थिति तय करती है, इसलिए यदि खरीद प्रणाली भविष्य के असर को नजरअंदाज करती है तो विकसित भारत का लक्ष्य कमजोर पड़ सकता है.

भविष्य के फायदे कैसे समझें?

इस संक्रमण को समझने के लिए नेट प्रेज़ेंट वैल्यू (NPV) का ढांचा अधिक उपयुक्त दृष्टिकोण प्रदान करता है. पहली नजर में NPV केवल दीर्घकालिक योजना का एक वित्तीय उपकरण लगता है, लेकिन वास्तव में यह उससे कहीं अधिक है. इसे समय का दर्शन भी कहा जा सकता है. भले ही गणितीय दृष्टि से यह केवल एक संख्या हो, लेकिन यही संख्या यह दर्शाती है कि भविष्य के लाभों को वर्तमान लागतों के मुकाबले कितना महत्व दिया जा रहा है. ग्रीन स्टील के मामले में असमानता स्पष्ट है - लागत तुरंत दिखाई देती है और राजनीतिक बहस का विषय बनती है, जबकि लाभ भविष्य में मिलने वाले, व्यापक और अक्सर अदृश्य होते हैं.

प्रारंभिक चरणों में नई तकनीकों और सीमित पैमाने पर अपनाने के कारण लागत अधिक होती है, जिससे इसका प्रसार धीमा रहता है. लेकिन औद्योगिक परिवर्तन अक्सर एक निश्चित पैटर्न का पालन करते हैं. 

NPV ग्रीन स्टील के उन लाभों के भविष्य मूल्य को सामने ला सकता है जो अभी स्पष्ट नहीं दिखते. इनमें कार्बन दायित्वों से बचाव, कार्बन बॉर्डर टैक्स (जैसे CBAM) जैसी वैश्विक व्यापार नीतियों से सुरक्षा, पर्यावरणीय क्षति में कमी, तकनीकी सीख के कारण भविष्य की लागतों में गिरावट, बेहतर पर्यावरण और स्वास्थ्य स्थितियों से श्रम उत्पादकता में वृद्धि, तथा संसाधनों के उपयोग की दक्षता में सुधार शामिल हैं. जब NPV में इन फायदों को शामिल किया जाता है, तो ग्रीन स्टील की अतिरिक्त लागत बोझ नहीं बल्कि भविष्य के जोखिमों से बचाव और अर्थव्यवस्था के लिए निवेश बन जाती है. 

बाजार, तकनीक और समय का खेल

ग्रीन स्टील का अर्थशास्त्र स्वाभाविक रूप से गतिशील है और इसमें समय का बहुत महत्व है. प्रारंभिक चरणों में नई तकनीकों और सीमित पैमाने पर अपनाने के कारण लागत अधिक होती है, जिससे इसका प्रसार धीमा रहता है. लेकिन औद्योगिक परिवर्तन अक्सर एक निश्चित पैटर्न का पालन करते हैं - सीखने की प्रक्रिया, पैमाने की अर्थव्यवस्थाएँ और नेटवर्क प्रभाव समय के साथ लागत को कम कर देते हैं और अपनाने की गति बढ़ जाती है.

भारत का इस्पात क्षेत्र पहले से ही इस दिशा में आगे बढ़ रहा है. अल्पावधि में ग्रीन स्टील की उपलब्धता सीमित और असमान बनी रहेगी. लेकिन इस दशक के मध्य के बाद, जैसे-जैसे बड़े उत्पादक गहन डीकार्बोनाइजेशन के रास्ते अपनाएँगे, आपूर्ति बढ़ेगी और लागत स्थिर होने लगेगी. इसलिए जो आज प्रीमियम दिखाई देता है, वह वास्तव में संक्रमण का संकेत है - एक अधिक प्रतिस्पर्धी और भविष्य के लिए तैयार औद्योगिक आधार की ओर बढ़ने की कीमत.

यदि इसे अपनाया जाता है, तो GPP केवल एक नीति या निर्णय लेने का साधन नहीं रहेगा, बल्कि सार्वजनिक खर्च में ‘मूल्य’ की परिभाषा को ही बदल देगा. इसका मतलब है कि मूल्य तय करने का आधार ‘सबसे कम बोली’ से बदलकर ‘पूरे जीवनचक्र की सबसे कम लागत’ होना चाहिए, जिसमें पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभाव भी शामिल हों.

यदि अपनाया गया, तो ग्रीन पब्लिक प्रोक्योरमेंट (GPP) केवल एक नीति या निर्णय लेने का साधन नहीं रहेगा, बल्कि सार्वजनिक व्यय में मूल्य की परिभाषा को ही बदल देगा. इसका मतलब है कि मूल्य निर्धारण की परिभाषा ‘सबसे कम बोली’ से बदलकर ‘सबसे कम जीवनचक्र लागत’ होनी चाहिए, जिसमें पारिस्थितिक और सामाजिक बाह्यताओं को भी शामिल किया जाए.

2047 तक पहुँचने का पुल

भारत की सार्वजनिक खरीद प्रणाली, जो सकल घरेलू उत्पाद का एक बड़ा हिस्सा प्रभावित करती है और अवसंरचना की मांग को आगे बढ़ाती है, उसे वर्तमान लागत और भविष्य के लाभों के बीच एक समयगत पुल की तरह काम करना चाहिए, जैसा कि विस्तृत NPV (नेट प्रेज़ेंट वैल्यू) ढांचे में बताया गया है. लेकिन वर्तमान व्यवस्था, जो मुख्य रूप से कीमत की खोज और बिखरे हुए मानकों पर आधारित है, जीवनचक्र से जुड़ी बातों को शामिल करने के लिए बनाई ही नहीं गई है. कंपनियों की मौजूदा अल्पदृष्टि को देखते हुए ग्रीन पब्लिक प्रोक्योरमेंट (GPP) की ओर बदलाव आसान नहीं होगा. लेकिन यदि इसे अपनाया जाता है, तो GPP केवल एक नीति या निर्णय लेने का साधन नहीं रहेगा, बल्कि सार्वजनिक खर्च में ‘मूल्य’ की परिभाषा को ही बदल देगा. इसका मतलब है कि मूल्य तय करने का आधार ‘सबसे कम बोली’ से बदलकर ‘पूरे जीवनचक्र की सबसे कम लागत’ होना चाहिए, जिसमें पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभाव भी शामिल हों.

छोटे सुधार बनाम बड़ा परिवर्तन

न्यायपूर्ण परिवर्तन  के दृष्टिकोण से ग्रीन स्टील की ओर चरणबद्ध तरीका-यानी शुरुआत छोटे स्तर से करके समय के साथ इसे बढ़ाना-व्यावहारिक लगता है. यह मौजूदा आपूर्ति की स्थिति के अनुरूप है और अल्पकालिक व्यवधानों को कम करता है. लेकिन यहाँ एक समस्या भी है. यदि महत्वाकांक्षा बहुत सीमित रही, तो यह बदलाव केवल छोटे-छोटे सुधारों तक ही सीमित रह सकता है और वास्तविक संरचनात्मक परिवर्तन नहीं हो पाएगा.

यह भविष्य की पीढ़ियों पर प्रदूषण और अतिरिक्त खर्च का बोझ पड़ने से बचाता है और समानता बढ़ाता है. साथ ही, यह उद्योगों के विकास को पर्यावरण के अनुकूल बनाता है. इसलिए ग्रीन स्टील केवल उद्योग का बदलाव नहीं, बल्कि देश के विकास की नई सोच को दिखाता है.

विकसित भारत 2047 का महत्वाकांक्षी लक्ष्य केवल छोटे सुधारों से नहीं, बल्कि बड़े और संरचनात्मक बदलावों से ही हासिल हो सकता है-जैसे तकनीक, संस्थानों और आर्थिक सोच में बदलाव. ग्रीन स्टील के संदर्भ में, खासकर इसके उन्नत रूपों में, हाइड्रोजन आधारित उत्पादन, स्क्रैप आधारित परिपत्र प्रणाली और कार्बन कैप्चर जैसे उपाय ऐसे ही बदलाव का प्रतिनिधित्व करते हैं. छोटे सुधार पर्याप्त नहीं हैं; विकसित भारत 2047 के लिए तकनीक, संस्थानों और आर्थिक सोच में गहरे और वास्तविक बदलाव जरूरी हैं.

विकसित भारत के लिए ग्रीन स्टील

समग्र विकास की सोच के अनुसार विकसित भारत का मतलब सिर्फ अमीर देशों जितनी आय हासिल करना नहीं है. इसका मतलब है कि देश में सभी को बराबर अवसर मिलें, पर्यावरण सुरक्षित रहे और तकनीक व काम करने की क्षमता बेहतर हो. इन्हीं तीनों को मिलाकर ‘सस्टेनॉमिक्स‘ कहा जाता है.

ग्रीन स्टील इन तीनों के संगम पर स्थित है. यह समय के साथ लागत कम करके और कुल उत्पादकता बढ़ाकर दक्षता को मजबूत करता है. यह भविष्य की पीढ़ियों पर प्रदूषण और अतिरिक्त खर्च का बोझ पड़ने से बचाता है और समानता बढ़ाता है. साथ ही, यह उद्योगों के विकास को पर्यावरण के अनुकूल बनाता है. इसलिए ग्रीन स्टील केवल उद्योग का बदलाव नहीं, बल्कि देश के विकास की नई सोच को दिखाता है.

ग्रीन स्टील की ओर बदलाव दूरदर्शी सोच पर निर्भर करता है. यदि फैसले सिर्फ वर्तमान बजट और टेंडर तक सीमित रहेंगे, तो भविष्य के लाभ नजरअंदाज हो जाएंगे. NPV के अनुसार अल्पकालिक लागत ज्यादा नहीं होती, बल्कि समय के साथ संतुलित हो जाती है, जिससे सतत विकास और विकसित भारत 2047 का लक्ष्य मजबूत होता है.


निलंजन घोष ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में विकास अध्ययन के उपाध्यक्ष हैं.

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