महासागर जलवायु परिवर्तन से लड़ने में कार्बन और गर्मी सोखते हैं इसलिए mCDR जैसी तकनीकें बढ़ रही हैं. आइए जानें कैसे ये तकनीकें काम करती हैं और इनके साथ कौन-सी चुनौतियाँ जुड़ी हैं.
महासागर वायुमंडल से गर्मी और कार्बन डाइऑक्साइड को सोखकर वैश्विक जलवायु को नियंत्रित करने में एक मौलिक भूमिका निभाता है. फिर भी, जलवायु परिवर्तन एक ही समय में महासागरीय तापन, अम्लीकरण, ऑक्सीजन की कमी और समुद्र के जलस्तर में वृद्धि के माध्यम से समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र को बदल रहा है. जब से 1970 के दशक में रिकॉर्ड रखना शुरू हुआ है, महासागर ने जलवायु परिवर्तन द्वारा उत्पन्न अतिरिक्त गर्मी का 90 प्रतिशत से अधिक हिस्सा सोख लिया है, जबकि 1990 के दशक की शुरुआत से महासागरीय तापन की दर दोगुनी से अधिक हो गई है. इसके साथ ही, अनुमान बताते हैं कि निरंतर चल रहे महासागरीय अम्लीकरण के कारण 2100 तक खुले महासागर की सतह का पीएच (pH) 0.3 पीएच यूनिट तक गिर सकता है, जिससे समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र और स्थिर महासागरीय रसायन विज्ञान पर निर्भर रहने वाली प्रजातियों (जैसे कि मूंगा चट्टानें/coral reefs) को गंभीर खतरा पैदा हो सकता है. जैसे-जैसे ये दबाव तीव्र हो रहे हैं, वैश्विक जलवायु लक्ष्यों को नियंत्रण में रखने के समर्थन में वैज्ञानिक संस्थानों, सरकार और निजी हितधारकों के बीच समुद्री कार्बन डाइऑक्साइड निष्कासन (marine carbon dioxide removal - mCDR) के माध्यम से वायुमंडलीय कार्बन डाइऑक्साइड को हटाने और संग्रहीत करने की महासागर की क्षमता को बढ़ाने में रुचि बढ़ रही है.
mCDR का मतलब है समुद्र की कार्बन सोखने की क्षमता बढ़ाना. आजकल नेट-नेगेटिव लक्ष्यों और कार्बन जमा करने वाले तटीय जंगलों (मैंग्रोव और समुद्री घास) को बढ़ावा देने के अलावा, प्रस्तावित दृष्टिकोणों में महासागरीय क्षारीयता वृद्धि , कार्बन-समृद्ध बायोमास को बड़े पैमाने पर डुबाना और कार्बन सोखने की प्रक्रियाओं को संशोधित करने के लिए कृत्रिम अपवेलिंग शामिल हैं. ये सभी तरीके आकार और तकनीक में अलग हैं, लेकिन इनका एक ही मकसद है-समुद्र में लंबे समय के लिए कार्बन जमा करना.
mCDR-महासागर शासन के लिए चुनौती
mCDR का मुख्य मकसद जलवायु सुधारना है, लेकिन समुद्र में इंसानी दखल देना बहुत जटिल काम है. पहले से संकट झेल रहे समुद्र में ऐसी नई तकनीकें इस्तेमाल करने से कई बड़ी चुनौतियां पैदा हो सकती हैं, भले ही इसके कुछ स्थानीय फायदे भी हों, जैसे कि महासागरीय अम्लीकरण का आंशिक रूप से मुकाबला करना, वे इसके साथ ही अतिरिक्त पारिस्थितिकी और सामाजिक जोखिम भी पैदा कर सकते हैं. उदाहरण के लिए, पोषक तत्वों को मिलाने या बायोमास को डुबाने से जुड़े दृष्टिकोण समुद्री खाद्य जाल, ऑक्सीजन की गतिशीलता और पारिस्थितिकी तंत्र के कामकाज को बदल सकते हैं, जिसके मत्स्य पालन और तटीय आजीविका पर संभावित परिणाम हो सकते हैं.
जैसे-जैसे ये दबाव तीव्र हो रहे हैं, वैश्विक जलवायु लक्ष्यों को नियंत्रण में रखने के समर्थन में वैज्ञानिक संस्थानों, सरकार और निजी हितधारकों के बीच समुद्री कार्बन डाइऑक्साइड निष्कासन के माध्यम से वायुमंडलीय कार्बन डाइऑक्साइड को हटाने और संग्रहीत करने की महासागर की क्षमता को बढ़ाने में रुचि बढ़ रही है.
इसके साथ ही, महासागर शासन विभिन्न संस्थानों, क्षेत्रों और क्षेत्राधिकारों में बहुत खंडित बना हुआ है, जिससे mCDR की बदलती हुई प्रकृति को संभालना कठिन हो जाता है. समुद्र आपस में जुड़े हैं और उनकी कोई सरहद नहीं होती, इसलिए एक जगह किए गए काम का असर दूसरी जगह भी पड़ सकता है. जबकि समुद्री पर्यावरण में इसकी निगरानी और उसका श्रेय तय करना अपने आप में चुनौतीपूर्ण बना हुआ है.
इसके अलावा, बड़े पैमाने पर mCDR की तैनाती की वैज्ञानिक समझ अभी भी सीमित है. कई लंबे समय के पारिस्थितिकी और सामाजिक परिणाम केवल तैनाती के माध्यम से ही दिखाई देंगे, जिसका अर्थ है कि निर्णय-कि mCDR को कहाँ, किस हद तक और क्या आगे बढ़ाया जाना चाहिए-गहरे उथल पुथल के हालात में लिए जा रहे हैं. इसलिए, mCDR को संभालने के लिए हमें एक मुश्किल संतुलन बनाना होगा. हमें एक तरफ जलवायु परिवर्तन के नुकसानों से बचने के नए रास्ते ढूंढने होंगे, और दूसरी तरफ यह भी ध्यान रखना होगा कि इन नए तरीकों से हमारे समुद्र और इंसानों का रिश्ता अनिश्चित और असमान न हो जाए
mCDR सिर्फ एक तकनीकी फैसला नहीं है, बल्कि यह न्याय का मामला है कि नियम कौन बनाएगा और इसके नफा-नुकसान को सबमें कैसे बराबर बांटा जाएगा. mCDR पर शोध और विकास करने के लिए आवश्यक वित्तीय, वैज्ञानिक और तकनीकी क्षमताएं वर्तमान में मुख्य रूप से उत्तरी अमेरिका और यूरोप में केंद्रित है, जहां कई प्रमुख अनुसंधान पहल, स्टार्ट-अप और निजी निवेश स्थित हैं. परिणामस्वरूप, कुछ देश और हितधारक उभरती प्रौद्योगिकियों और शासन के एजेंडे को आकार देने के लिए दूसरों की तुलना में काफी बेहतर स्थिति में हैं.
औपचारिक अंतर्राष्ट्रीय शासन प्रक्रियाएं सैद्धांतिक रूप से खुली हो सकती हैं, पैसा और तकनीक न होने के कारण, समुद्र और जलवायु संकट से सबसे ज़्यादा प्रभावित गरीब देशों और समुदायों की फैसलों में कोई सुनवाई नहीं हो पाती. इसके साथ ही, mCDR की बड़े पैमाने पर भविष्य में होने वाली तैनाती आने वाली पीढ़ियों को जलवायु संकट से बचाने के लिए है, लेकिन उन्हें इसके बुरे नतीजे और तकनीकी निर्भरता भी विरासत में मिल सकती है.
इससे हमें यह तय करने का मौका मिलेगा कि समुद्र में होने वाले इन नए कामों को कैसे कंट्रोल किया जाए. इसके लिए मौजूदा शासन ढांचों को छोड़ने की आवश्यकता नहीं है, जो एहतियात, निगरानी और अंतर्राष्ट्रीय समन्वय के लिए आवश्यक आधार प्रदान करना जारी रखते हैं.
mCDR का यह कठिन रूप अंतर्राष्ट्रीय महासागर शासन के लिए एक चुनौती पेश करता है. मौजूदा शासन ढांचे, विशेष रूप से लंदन कन्वेंशन और प्रोटोकॉल (LC/LP), मौजूदा नियम mCDR को सिर्फ प्रदूषण रोकने और खतरे जांचने के नजरिए से देखते हैं. पुराने कानून नुकसान रोकने के लिए बने थे, न कि पूरी धरती की प्रणालियों को बदलने वाले इतने बड़े कामों को संभालने के लिए; इसलिए यह नजरिया अधूरा है. यानी, mCDR का मामला सिर्फ साइंस और पर्यावरण का नहीं है, बल्कि समाज और राजनीति का भी है. इसके रिसर्च से लेकर इसे लागू करने तक, हर स्टेज पर यह देखना होगा कि सबके साथ न्याय और बराबरी का बर्ताव हो.
जलवायु समाधान बनाम वैश्विक असमानता
mCDR के नियमों पर बात करना हमारे लिए एक बेहतरीन मौका है. यह मुद्दा सीधे तौर पर मौसम के बदलाव, महासागर की देखरेख और दुनिया की अमीर-गरीब असमानता से जुड़ा है. इससे हमें यह तय करने का मौका मिलेगा कि समुद्र में होने वाले इन नए कामों को कैसे कंट्रोल किया जाए. इसके लिए मौजूदा शासन ढांचों को छोड़ने की आवश्यकता नहीं है, जो एहतियात, निगरानी और अंतर्राष्ट्रीय समन्वय के लिए आवश्यक आधार प्रदान करना जारी रखते हैं. हालांकि, इसके लिए शासन के दृष्टिकोण को केवल पर्यावरणीय जोखिम से आगे बढ़ाने और मौजूदा शासन ढांचों के बीच संबंधों को मजबूत करने की आवश्यकता है. लंदन कन्वेंशन और प्रोटोकॉल (समुद्री प्रदूषण रोकने के नियम) को समुद्र और पर्यावरण की सुरक्षा करने वाले अन्य बड़े वैश्विक समझौतों से जोड़ा जाना चाहिए. उदाहरण के लिए, इसे जैव विविधता समझौते और नए BBNJ समझौते के साथ मिलाना होगा. ऐसा करने से नियमों की कमियां दूर होंगी और पर्यावरण के मामले में सबको सही न्याय मिल पाएगा.
mCDR का न्यायपूर्ण शासन यह स्वीकार करने की मांग करता है कि समुद्र में जानबूझकर किए गए हस्तक्षेप अनिवार्य रूप से व्यापक सामाजिक संबंधों और सामाजिक लक्ष्यों को प्रभावित करते हैं. महासागर प्रबंधन (शासन) को केवल तकनीक और पर्यावरण सुरक्षा तक सीमित नहीं रहना चाहिए. उसे यह भी देखना होगा कि खतरे की परिभाषा कौन तय कर रहा है, किसके ज्ञान को महत्व मिल रहा है, इस काम से फायदा किसका हो रहा है और इसका नुकसान कौन भुगत रहा है. चूँकि भविष्य के सामाजिक और प्राकृतिक नतीजे अभी पूरी तरह तय नहीं हैं, इसलिए सामाजिक बराबरी को पर्यावरण जांच से कम महत्व देना गलत होगा. नियम बनाते समय पर्यावरण, तकनीक और समाज-इन तीनों को एक साथ रखकर देखना ज़रूरी है.
असल में, mCDR को लेकर चल रही बहस इस बात पर है कि समुद्र का भविष्य कैसा होगा और उसे कौन नियंत्रित करेगा. जैसे-जैसे ये वैज्ञानिक प्रयोग अब राजनीतिक और आर्थिक सच्चाई बन रहे हैं, इसका सही प्रबंधन तभी संभव है जब पर्यावरण के खतरों को रोकने के साथ-साथ यह भी तय किया जाए कि इसमें सबकी बराबर हिस्सेदारी, फायदे-नुकसान का सही बंटवारा और ज़िम्मेदारी शुरू से ही तय हो. बढ़ते जलवायु दबावों और शक्ति एवं क्षमता के असमान वितरण से पहले से ही प्रभावित महासागर में, जलवायु समाधानों की खोज मौजूदा असमानताओं को और मजबूत करने की कीमत पर नहीं होनी चाहिए.The views expressed above belong to the author(s). ORF research and analyses now available on Telegram! Click here to access our curated content — blogs, longforms and interviews.
Lina Röschel is a research associate with the Ocean Governance Research Group at the Research Institute for Sustainability (RIFS) at GFZ in Potsdam, Germany. Her ...
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