Expert Speak Raisina Debates
Published on Dec 15, 2025 Updated 2 Days ago

दिसंबर 2024 में असद शासन के पतन के साथ ही सीरिया की सत्ता ही नहीं बदली बल्कि पश्चिम एशिया की पूरी भू-राजनीति हिल गई. गोलान हाइट्स से लेकर इज़राइल-सीरिया रिश्तों तक, हर मोर्चे पर अब पुराने दुश्मन, नई रणनीतियों के साथ आमने-सामने हैं.

क्या सीरिया बदल रहा है? जानें गोलान हाइट्स और नए समीकरण

दिसंबर 2024 में बशर अल-असद की सरकार गिरने के साथ ही सीरिया में बाथ पार्टी का शासन खत्म हो गया और इसका सीधा असर पश्चिम एशिया में गोलान हाइट्स की स्थिति पर पड़ा. इज़राइल ने तुरंत गोलान के उन हिस्सों पर भी सैन्य नियंत्रण कर लिया जो अब तक सीरिया के पास थे जिससे उसकी रणनीति पूरी तरह साफ हो गई. प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू का कहना है कि वहां इज़राइली सेना की मौजूदगी ज़रूरी है ताकि भविष्य में सीरिया की तरफ से किसी भी हमले को रोका जा सके. यह सोच इज़राइल के भीतर लंबे समय से मौजूद उस डर को भी दिखाती है जिसमें सीरिया को फिर से खतरे के रूप में देखा जाता है लेकिन दूसरी ओर, अहमद अल-शरा की अगुवाई में बनी नई HTS सरकार ने पुराने इज़राइल-विरोधी रुख से साफ तौर पर दूरी बना ली है. 

  • दिसंबर 2024 में असद शासन के पतन से पश्चिम एशिया की भू-राजनीति में बड़ा बदलाव आया.

  • गोलान हाइट्स और इज़राइल-सीरिया संबंध नए रणनीतिक दौर में प्रवेश कर चुके हैं.

  • इज़राइल ने गोलान के नए इलाकों पर सैन्य नियंत्रण स्थापित किया.

सीरिया ने हमास से बातचीत से इनकार किया, फिलिस्तीनी गुटों को देश से बाहर निकाला, इस्लामिक जिहाद के दो बड़े नेताओं को गिरफ्तार किया और ईरान व हिज़्बुल्लाह के बीच हथियारों की तस्करी रोकने की कोशिश की. इसके बावजूद नेतन्याहू दक्षिणी सीरिया के कुछ इलाकों को पूरी तरह हथियार-मुक्त करने की मांग कर रहे हैं. सवाल यह है कि क्या शरा इन इलाकों से नियंत्रण छोड़ सकते हैं? जवाब है- नहीं, क्योंकि ऐसा करने से देश के भीतर जबरदस्त विरोध खड़ा हो सकता है जो उनकी नई सरकार और उनकी छवि दोनों को नुकसान पहुंचा सकता है. ऐसे में शरा की यह ‘नरमी की कोशिश’ यह सवाल खड़ा करती है कि क्या नई सीरियाई सरकार सिर्फ अमेरिका जैसे ताकतवर देशों से मान्यता और सहयोग चाहती है या फिर उसके और इज़राइल के बीच पहले से कोई छुपा हुआ रिश्ता भी रहा है.

काफी समय से यह अटकलें लगती रही हैं कि यह ‘गुडविल प्रोजेक्ट’ दरअसल इज़राइल का एक गुप्त रास्ता था, जिसके ज़रिए उसने चुपचाप सीरिया के 12 विद्रोही गुटों को पैसा पहुंचाया. 2017 की कुछ चर्चित मीडिया रिपोर्टों में खास तौर पर जिस गुट का नाम सामने आया, वह था फ़ुर्सान अल-जौलान, जिसे “नाइट्स ऑफ़ द गोलान” कहा जाता है.

सीरियाई गृहयुद्ध में इज़राइल की भूमिका

2019 में इज़राइल के एक सेवानिवृत्त हो रहे सैन्य अधिकारी ने एक इंटरव्यू में यह स्वीकार किया था कि उनकी सरकार सीरिया में असद विरोधी कुछ विद्रोही गुटों को हथियार दे रही थी. सालों के दौरान ऐसी कई खबरें भी सामने आईं जिनमें कहा गया कि घायल सीरियाई विद्रोहियों का इलाज इज़राइल के अस्पतालों में किया गया. 

‘ऑपरेशन गुड नेबर’ के तहत इज़राइल ने मानवीय मदद, शिक्षा और आर्थिक सहायता जैसे कदमों का इस्तेमाल किया ताकि गोलान क्षेत्र में असद सरकार से नाराज़ लोगों को अपने पक्ष में किया जा सके. 2011–12 में माजदल शम्स चौक पर हुई घटनाएं जिनसे आगे चलकर सीरियाई गृहयुद्ध भड़का, इसी रणनीति की एक मिसाल मानी जाती हैं.

कई जानकारों का मानना है कि यह ‘गुडविल प्रोजेक्ट’ दरअसल एक गुप्त रास्ता था, जिसके ज़रिए इज़राइल ने चुपचाप सीरिया के 12 विद्रोही गुटों को फंडिंग की. 2017 की चर्चित मीडिया रिपोर्टों में खास तौर पर जिस गुट का नाम सामने आया, वह था फ़ुर्सान अल-जौलान यानी “नाइट्स ऑफ़ द गोलान”. यह गुट जुबाथा अल-ख़शब नाम के कस्बे में सक्रिय था जो इज़राइल के कब्ज़े वाले गोलान हाइट्स में बसे द्रूज़ कस्बे बुक़ाथा के ठीक सामने है. बाकी विद्रोही गुटों के नाम सार्वजनिक नहीं किए गए लेकिन कई ऑनलाइन रिपोर्टों में इस फंडिंग को अलग नज़रिये से देखा गया है. माना जाता है कि इज़राइल ने यह कदम इसलिए उठाया ताकि सीमा के पास पैदा हुए सत्ता के खालीपन पर ईरान समर्थित हिज़्बुल्लाह या उससे जुड़े दूसरे संगठन क़ब्ज़ा न कर सकें.

HTS की फंडिंग और तुर्की का कनेक्शन

दमिश्क में बदले हुए हालात और 1973 के योम किप्पुर युद्ध के बाद पहली बार इज़राइल–सीरिया रिश्तों में दिख रही हल्की-फुल्की ‘तरक्की’ ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं. सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या किसी भी रूप में इज़राइल HTS को फंडिंग देता है?

फ़ुर्सान अल-जौलान, फ्री सीरियन आर्मी का एक गुट था, जिसकी सोच और विचारधारा HTS से अलग थी. HTS अल-क़ायदा से निकला संगठन है और आज भी अमेरिका और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद उसे आतंकवादी संगठन मानते हैं. ऐसे में इज़राइल ने सीधे तौर पर HTS को कभी फंड नहीं किया. हां, इज़राइल ने जिन धर्मनिरपेक्ष और असद-विरोधी गुटों की मदद की, वे व्यवहार में HTS के लिए जगह बनाने का ही काम कर रहे थे. वैसे भी HTS लंबे समय तक खुद ही अपने संसाधनों से चलने वाला संगठन रहा है क्योंकि वह बाहरी ताकतों को या तो ग़द्दार मानता था या काफ़िर लेकिन मौजूदा राजनीतिक माहौल में HTS अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सरकार को मान्यता दिलाने के लिए दूसरे देशों से रिश्ते दोबारा बनाने की कोशिश कर रहा है.

इसी दौरान अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति-चुनाव विजेता डोनाल्ड ट्रंप ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा था कि असद की सत्ता गिरने के पीछे तुर्की का हाथ था, और उन्होंने इसे ‘शत्रुतापूर्ण अधिग्रहण’ बताया।

माना जाता है कि गोलान से जुड़े रहे अहमद अल-शरा ने अमेरिका के साथ गुप्त खुफिया चैनल बनाए थे. कुछ लोगों का यह भी दावा है कि उन्होंने एनजीओ जैसे माध्यमों के ज़रिए तुर्की को खुफिया जानकारियां बेचीं. शरा की नीति का एक अहम आधार पश्चिमी प्रतिबंधों को हटवाना और सीरिया को, खासकर अमेरिका के साथ, दोबारा वैश्विक मंच से जोड़ना है. अगर सीरिया अमेरिका से रिश्ते सुधारना चाहता है तो उसे हिज़्बुल्लाह, ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड (IRGC) और आईएसआईएस जैसे इस्लामी और जिहादी संगठनों के खिलाफ सख्त रुख अपनाना होगा और क्षेत्र में शांति की अपनी ज़िम्मेदारी निभानी होगी. वहीं हमास और हूती जैसे गैर-राज्य गुटों की राजनीति अरब एकता को तोड़ती है और सामूहिक समाधान की कोशिशों को कमजोर करती है जिससे पूरा इलाका और अस्थिर होता जा रहा है।

इसका मतलब यह भी है कि HTS और नई सीरियाई सत्ता इज़राइल और तुर्की- दोनों के साथ संतुलित और सौहार्दपूर्ण रिश्ते बनाए रखना चाहती है. कई सीरियाई विद्रोहियों को तुर्की में पनाह मिली है. तुर्की सीमा पर बाब-अल-हावा क्रॉसिंग से HTS हर महीने टोल के रूप में करीब 1.5 करोड़ अमेरिकी डॉलर तक वसूलता था. दूसरी ओर, ट्रंप प्रशासन इज़राइल को बिना किसी शर्त के खुला समर्थन देता रहा, जिससे सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और तुर्की जैसे क्षेत्रीय खिलाड़ियों की भूमिका और असर कमजोर पड़ता चला गया.

निष्कर्ष

शरा की हालिया कूटनीतिक कोशिशों के बावजूद, बेंजामिन नेतन्याहू दो अहम मुद्दों पर बिल्कुल अड़े हुए हैं. पहला, इज़राइल 2024 से पहले वाली सीमा रेखा पर लौटने को तैयार नहीं है और दूसरा, वह दक्षिणी सीरिया को संयुक्त राष्ट्र की निगरानी में पूरी तरह हथियार-मुक्त करने की ज़िद पर कायम है. 2025 की शुरुआत से ही यही टकराव इज़राइल-सीरिया रिश्तों की पहचान बन गया है, जहां दोनों पक्ष अपनी बुनियादी मांगों में कोई बदलाव करने को तैयार नहीं हैं.

इज़राइल और सीरिया के बीच रिश्तों को सामान्य करने की राह में कई गहरी और संरचनात्मक बाधाएं हैं जिनकी वजह से पूरे 2025 में कूटनीतिक गतिरोध बना रहा. सीरिया ने साफ कह दिया है कि जब तक इज़राइली सेना गोलान हाइट्स से पीछे नहीं हटती, तब तक वह अब्राहम समझौतों का हिस्सा नहीं बनेगा.

सीरियाई राष्ट्रपति अहमद अल-शरा ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि किसी भी अंतिम शांति समझौते की शर्त यही होगी कि इज़राइल 8 दिसंबर 2024 से पहले वाली सीमाओं पर वापस जाए.

असल में, गोलान हाइट्स का मुद्दा ही दोनों देशों के बीच किसी भी प्रगति में सबसे बड़ी रुकावट है. सीरियाई जनता में इस इलाके पर कब्ज़े को लेकर गहरी नाराज़गी है, जिसकी वजह से शरा सरकार के लिए ज़मीन से जुड़े किसी भी समझौते पर लचीलापन दिखाना बेहद मुश्किल हो जाता है. यह रुख एक तरफ घरेलू राजनीति की मजबूरी को दिखाता है तो दूसरी तरफ सीरिया की कमजोर आर्थिक हालत को भी, जहां वह किसी नए युद्ध का बोझ नहीं उठा सकता. ऐसे विरोधाभासी दबावों के बीच सीरिया की राजनीतिक दिशा अब भी अनिश्चित बनी हुई है. असद सरकार जहां इज़राइल के खिलाफ सख्त विरोध की नीति पर कायम रही, वहीं मौजूदा सरकार इज़राइल और वॉशिंगटन से रिश्ते सुधारना भी चाहती है लेकिन बिना ज़मीन के विवाद सुलझाए ऐसा करना सरकार की स्थिरता को खतरे में डाल सकता है।

इज़राइल और सीरिया के बीच टिकाऊ रिश्तों की बहाली तब ही मुमकिन है, जब इज़राइल एकतरफा मांगों के बजाय भरोसा बढ़ाने वाले ठोस कदम उठाए. आगे बढ़ने का रास्ता तभी खुलेगा, जब गोलान हाइट्स की संप्रभुता को लेकर दोनों पक्षों की सुरक्षा चिंताओं को ध्यान में रखते हुए निष्पक्ष और संतुलित समाधान तलाशे जाएं. जब तक क्षेत्रीय स्थिति पर गंभीर बातचीत और चरणबद्ध वापसी जैसे विकल्पों पर इज़राइल की तरफ से ठोस पहल नहीं होती, तब तक कूटनीतिक रास्ते बंद ही रहेंगे.

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