ईरान, नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका जैसे देशों में युवा असंतोष बढ़ रहा है. इन आंदोलनों और उनके कारणों को समझने के लिए लेख ज़रूर पढ़ें.
ईरान, बांग्लादेश, नेपाल और श्रीलंका में फैले विरोध प्रदर्शनों की जड़ें समान सामाजिक-आर्थिक कारणों में हैं, हालांकि बाद में ये आंदोलन अधिक राजनीतिक हो गए. अलग-अलग राजनीतिक प्रणालियों और संस्थागत ढाँचों के बावजूद, इन आंदोलनों के नतीजे काफी हद तक एक जैसे रहे. इन सभी आंदोलनों में युवाओं की भूमिका सबसे अहम रही.
इन आंदोलनों के पीछे इंटरनेट और सोशल मीडिया की बड़ी भूमिका रही है जिसने न केवल वैश्विक स्तर पर जानकारी का प्रसार किया बल्कि लोगों को अपने ही देशों में मौजूद असमानताओं के प्रति अधिक जागरूक किया. खासकर युवा वर्ग में एक ऐसा आकांक्षी समूह उभरा है जो सीमित आर्थिक और सामाजिक अवसरों से निराश है. इन आंदोलनों के कारण भौगोलिक सीमाओं से परे समान रहे हैं-रोजगार की कमी, भेदभावपूर्ण नीतियाँ, बढ़ती असमानता और कमजोर आर्थिक न्याय.
इन देशों की समस्या आर्थिक ठहराव नहीं है. 2024 में नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका और ईरान की जीडीपी वृद्धि दर 3.7 से 5 प्रतिशत के बीच रही, जो वैश्विक औसत 2.9 प्रतिशत से अधिक है. असली समस्या विकास की कमी नहीं, बल्कि उसका असमान वितरण है.
ईरान में विरोध प्रदर्शन बिगड़ती आर्थिक स्थिति का परिणाम हैं, जिसे अमेरिका द्वारा लगाए गए लगातार प्रतिबंधों ने और गंभीर बना दिया. वित्त वर्ष 2025 में ईरान की आर्थिक वृद्धि 4.6 प्रतिशत से घटकर 3.7 प्रतिशत रह गई, जो पिछले पाँच वर्षों में सबसे कम है. इससे रोजगार के अवसर कम हुए. ईरान में कामकाजी उम्र के केवल 10 में से 3.8 लोग ही रोजगार में हैं, जबकि महिलाओं में यह आंकड़ा और भी कम, केवल 1.2 है.
खासकर युवा वर्ग में एक ऐसा आकांक्षी समूह उभरा है जो सीमित आर्थिक और सामाजिक अवसरों से निराश है. इन आंदोलनों के कारण भौगोलिक सीमाओं से परे समान रहे हैं-रोजगार की कमी, भेदभावपूर्ण नीतियाँ, बढ़ती असमानता और कमजोर आर्थिक न्याय.
दिसंबर में ईरानी रियाल की कीमत गिरकर 1.42 मिलियन प्रति अमेरिकी डॉलर तक पहुँच गई, जो अब तक का सबसे निचला स्तर है. इसके साथ ही महँगाई तेजी से बढ़ी. 2025 में महँगाई दर 42.2 प्रतिशत तक पहुँच गई और खाद्य पदार्थों की कीमतें एक साल में 72 प्रतिशत बढ़ गईं.
बांग्लादेश में विरोध प्रदर्शन सार्वजनिक क्षेत्र की नौकरियों में आरक्षण (कोटा) समाप्त करने की मांग से शुरू हुए. इसके पीछे भाई-भतीजावाद, असमानता और खराब शासन जैसी गहरी समस्याएँ थीं. छात्र आंदोलन ने देश की संरचनात्मक सामाजिक-आर्थिक कमजोरियों को उजागर किया. आर्थिक वृद्धि के बावजूद रोजगार नहीं बढ़े, जिससे श्रम बाजार पर भारी दबाव पड़ा.
हालाँकि विनिर्माण क्षेत्र में अपेक्षाकृत बेहतर वेतन वाली नौकरियाँ हैं, फिर भी 2016 से 2022 के बीच कुल रोजगार में 10 प्रतिशत की गिरावट आई. इसका सबसे ज्यादा असर युवाओं और महिलाओं पर पड़ा. 2023 में युवाओं की बेरोजगारी दर 8 प्रतिशत और विश्वविद्यालय स्नातकों में 14 प्रतिशत रही. इससे सरकारी नौकरियों पर निर्भरता बढ़ी और असंतोष फैला.
असमानता और रोजगार-विहीन विकास की समस्या का एक प्रमुख कारण अर्थव्यवस्था में अपेक्षित संरचनात्मक बदलाव का न होना है. सामान्यतः जब कोई अर्थव्यवस्था आगे बढ़ती है, तो श्रमिक कृषि जैसे कम उत्पादक क्षेत्रों से विनिर्माण और आधुनिक सेवाओं जैसे अधिक उत्पादक क्षेत्रों की ओर स्थानांतरित होते हैं. यही प्रक्रिया आय में वृद्धि, रोजगार सृजन और समावेशी विकास का आधार बनती है. लेकिन इन देशों में यह परिवर्तन या तो बहुत धीमा रहा है या अधूरा ही रह गया है. परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में श्रमिक कम आय और असुरक्षित रोजगार वाले क्षेत्रों में फंसे हुए हैं. इसके चलते आर्थिक वृद्धि के लाभ सीमित वर्ग तक सिमट गए और श्रम बाजार में असमानता बढ़ती चली गई.
सामान्यतः जब कोई अर्थव्यवस्था आगे बढ़ती है, तो श्रमिक कृषि जैसे कम उत्पादक क्षेत्रों से विनिर्माण और आधुनिक सेवाओं जैसे अधिक उत्पादक क्षेत्रों की ओर स्थानांतरित होते हैं. यही प्रक्रिया आय में वृद्धि, रोजगार सृजन और समावेशी विकास का आधार बनती है.
2025 में नेपाल में जेन-ज़ी युवाओं के नेतृत्व में बड़े विरोध प्रदर्शन हुए, जिनका मकसद भ्रष्टाचार, असमानता और बढ़ते आर्थिक संकट का विरोध करना था. नेपाल की 3 करोड़ आबादी में से लगभग 20 प्रतिशत लोग गरीबी में रहते हैं और 15-24 वर्ष आयु वर्ग में बेरोजगारी 22 प्रतिशत है. आय असमानता भी काफी अधिक है-शीर्ष 10 प्रतिशत लोगों की आय निचले 40 प्रतिशत से तीन गुना से अधिक है.
रोजगार की कमी के कारण 10 लाख से ज्यादा युवा विदेशों में काम की तलाश में जा चुके हैं. देश में उपलब्ध अधिकतर नौकरियाँ अनौपचारिक, कम वेतन वाली और असुरक्षित हैं. इन सभी कारणों ने युवाओं में गहरी निराशा पैदा की और बड़े आंदोलनों को जन्म दिया. इसी तरह श्रीलंका में 2022 में ‘अरागलया’ आंदोलन हुआ, जो कर्ज संकट, अत्यधिक महँगाई और मुद्रा के पतन के कारण भड़का. इस आंदोलन को बनाए रखने में युवाओं की निर्णायक भूमिका रही, जिससे यह साफ हुआ कि शिक्षा के बावजूद सामाजिक उन्नति न हो पाने से युवाओं में भारी असंतोष है.
क्या समावेशी विकास विफल हो गया है?
इन देशों में आर्थिक विकास तो हो रहा है, लेकिन वह समान रूप से लाभ नहीं पहुँचा पा रहा. श्रीलंका में माध्यमिक शिक्षा का स्तर 81-83 प्रतिशत होने के बावजूद 18 प्रतिशत युवा न तो नौकरी में हैं, न शिक्षा में और न प्रशिक्षण में. ईरान में भी उच्च शिक्षा के बावजूद बेरोजगारी बनी हुई है.
जब तक युवाओं की आकांक्षाओं को गंभीरता से नहीं लिया जाता और ठोस संरचनात्मक सुधार नहीं किए जाते, तब तक ऐसे विरोध प्रदर्शन भविष्य में भी जारी रहने की संभावना है.
नेपाल में शिक्षा की कमी और उच्च युवा बेरोजगारी-दोनों समस्याएँ मौजूद हैं. बांग्लादेश में असमानता बनी हुई है, जहाँ गिनी सूचकांक 30.9 है. अर्थशास्त्री डैरोन एसेमोग्लू और जेम्स रॉबिन्सन के अनुसार, संस्थाएँ यह तय करती हैं कि संसाधनों का बँटवारा कैसे होगा. कमजोर या शोषणकारी संस्थाएँ समावेशी विकास और सामाजिक उन्नति को रोकती हैं.
इन देशों में अधूरा संरचनात्मक बदलाव, निजी निवेश की कमी, राजनीतिक अस्थिरता और कमजोर संस्थाएँ विकास को रोजगार-सृजन से जोड़ने में विफल रही हैं. ईरान की अर्थव्यवस्था तेल पर निर्भर है, श्रीलंका का विकास मुख्यतः बुनियादी ढाँचे पर आधारित रहा है, जबकि बांग्लादेश और नेपाल में बड़ी आबादी अब भी कृषि और अनौपचारिक सेवाओं में लगी हुई है.
इन आंदोलनों से भाई-भतीजावाद, कमजोर श्रम बाजार, बहिष्करणकारी नीतियाँ और कम जवाबदेही जैसी समस्याएँ उजागर होती हैं. राजनीतिक अस्थिरता और आर्थिक कमजोरी एक-दूसरे को बढ़ावा देती हैं. जब तक युवाओं की आकांक्षाओं को गंभीरता से नहीं लिया जाता और ठोस संरचनात्मक सुधार नहीं किए जाते, तब तक ऐसे विरोध प्रदर्शन भविष्य में भी जारी रहने की संभावना है.
श्रुति जैन ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के सेंटर फॉर डेवलपमेंट स्टडीज में एसोसिएट फेलो हैं.
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Shruti is an Associate Fellow at the Centre for Development Studies, Observer Research Foundation (ORF), where her research examines the intersections between policy, economic diplomacy ...
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