एआई की वैश्विक दौड़ में अमेरिका, चीन और यूरोप फिलहाल आगे हैं लेकिन भारत भी अब तेज़ी से रफ्तार पकड़ रहा है. पढ़िए और जानिए, कैसे डेटा, स्टार्टअप्स और सरकारी मिशनों के दम पर भारत एआई के नए केंद्र के रूप में उभर रहा है.
दुनिया भर में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) का बाज़ार तेज़ी से बढ़ने वाला है. साल 2025 से 2030 के बीच लगभग 36.6 प्रतिशत की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर (CAGR) के साथ यह आगे बढ़ सकता है जो साल 2030 तक लगभग 1811.75 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है. स्वास्थ्य सेवा और आर्थिकी से लेकर विनिर्माण और शासन तक, सभी क्षेत्रों व उद्योगों में AI एक बदलावकारी भूमिका में सामने आएगी. इसलिए यह जानना ज़रूरी है कि कौन-कौन से देश वैश्विक AI में नेतृत्व कर रहे हैं और उनके लिए इसका क्या महत्व है?
पहला स्थान अमेरिका का है जो उन्नत शोध, सरकारी व निजी निवेश और नीतिगत समर्थन के कारण सबसे उन्नत AI पारिस्थितिकी तंत्र वाला देश बना हुआ है. इसके बाद चीन का नंबर आता है जहां विभिन्न स्तरीय कानून और उनके पालन को सुनिश्चित करने वाले तंत्र पर आधारित सार्वजनिक निवेश का ढांचा है. भारत तीसरे पायदान पर है, जहां कंप्यूटर, उन्नत शोध, विकास और नवाचार से जुड़ी कुछ ख़ामियां ज़रूर हैं, फिर भी यह AI में तेज़ विकास कर रहा है.
निरंतर और सिलसिलेवार नीतिगत समर्थन के कारण चीन का AI में विकास हुआ है. साल 2017 की ‘न्यू जेनरेशन AI डेवलपमेंट’ योजना में वर्ष 2030 तक वैश्विक AI में नेतृत्व करने का लक्ष्य रखा गया था, जिसके लिए बड़े पैमाने पर सरकारी व निजी निवेश जुटाए गए हैं. 8.2 अरब डॉलर के ‘नेशनल AI इंडस्ट्री इन्वेस्टमेंट फंड’ और स्टार्टअप व रोबोटिक्स जैसे क्षेत्रों के लिए 138 अरब डॉलर के ‘नेशनल वेंचर कैपिटल गाइडेंस फंड’ जैसे सरकारी निवेशों को अलीबाबा और बाइटडांस जैसी बड़ी टेक कंपनियों के निजी निवेशों से मदद मिली है. स्थानीय सरकारें AI पायलट क्षेत्रों में सब्सिडी देती हैं और नियमों को आसान बनाती हैं. राष्ट्रीय एकीकृत कंप्यूटिंग नेटवर्क जैसे कंप्यूटिंग तंत्रों के साथ मिलकर कंप्यूटिंग वाउचर LLM को व्यापक बनाते हैं. इन उपायों के साथ-साथ AI शिक्षा और विश्वविद्यालय-उद्योग सहयोग पर भी ध्यान दिया गया है जिससे AI प्रतिभाओं का समूह तैयार हुआ है. इससे प्रतिस्पर्धी AI पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण हो सका है.
स्वास्थ्य सेवा और आर्थिकी से लेकर विनिर्माण और शासन तक, सभी क्षेत्रों व उद्योगों में AI एक बदलावकारी भूमिका में सामने आएगी. इसलिए यह जानना ज़रूरी है कि कौन-कौन से देश वैश्विक AI में नेतृत्व कर रहे हैं और उनके लिए इसका क्या महत्व है?
चीन की AI शासन प्रणाली मुख्य रूप से ‘सुरक्षा प्रथम व कानून-आधारित’ नीति पर आधारित है. यहां व्यक्तिगत सूचना संरक्षण कानून (PIPL) और डेटा सुरक्षा जैसे कानूनों को एल्गोरिदम, डीप सिंथेसिस व संबंधित प्रौद्योगिकियों से जुड़े अन्य क्षेत्रीय नियमों के साथ जोड़ा गया है. इस ढांचे से जोखिम मूल्यांकन, फाइलिंग और वाटरमार्किंग को लेकर ज़िम्मेदारियां तय होती हैं, साथ ही राज्य का राष्ट्रीय सुरक्षा और सामाजिक व्यवस्था पर नियंत्रण मज़बूत होता है. अपने डिजिटल सिल्क रोड के माध्यम से, चीन क्लाउड, डेटा सेंटर और ‘सेफ सिटी’ स्टैक को आर्थिक व मानकों के साथ जोड़कर AI को बड़े पैमाने पर आगे बढ़ा रहा है. उसकी वैश्विक AI शासन कार्य-योजना में विशेष रूप से ‘ग्लोबल साउथ’ का ज़िक्र किया गया है जिसमें अंतरराष्ट्रीय सहयोग और ख़ास तौर से वैश्विक दक्षिण में AI विकास में संयुक्त नवाचार बढ़ाने की बात कही गई है.
चीन ने विश्व कृत्रिम बुद्धिमत्ता सहयोग संगठन (WAICO) की स्थापना की पहल भी की है जिसका मुख्यालय शंघाई में प्रस्तावित है. इसका उद्देश्य विकासशील देशों में तालमेल बनाने के लिए चीन को एक वैश्विक आयोजक के रूप में आगे बढ़ाना और ‘ग्लोबल साउथ’ को एक पूर्ण विकल्प उपलब्ध कराना है फिर चाहे अमेरिका द्वारा प्रौद्योगिकी नियंत्रण एक समस्या बेशक हो.
नीतिगत कार्रवाई, महत्वपूर्ण निवेश और मज़बूत ढांचे के तालमेल से अमेरिका दुनिया में सबसे बड़ा AI केंद्र बनकर उभरा है. AI में अमेरिकी दबदबा बनाए रखने के लिए 2019 में कार्यकारी आदेश जारी किया गया और 2020 में ‘नेशनल AI इनीशिएटिव ऐक्ट’ लाया गया, जिसने विश्वविद्यालयों में शोध, कंप्यूटिंग और AI प्रतिभा को आगे बढ़ाया. ‘द क्रिएटिंग हेल्पफुल इनीशिएटिव्स टु प्रोड्यूज़ सेमीकंडक्टर्स’ (CHIPS) कानून ने घरेलू सेमीकंडक्टर क्षमता बढ़ाने में मदद की है, जो AI के लिए ख़ासा महत्वपूर्ण है.
इस ढांचे से जोखिम मूल्यांकन, फाइलिंग और वाटरमार्किंग को लेकर ज़िम्मेदारियां तय होती हैं, साथ ही राज्य का राष्ट्रीय सुरक्षा और सामाजिक व्यवस्था पर नियंत्रण मज़बूत होता है. अपने डिजिटल सिल्क रोड के माध्यम से, चीन क्लाउड, डेटा सेंटर और ‘सेफ सिटी’ स्टैक को आर्थिक व मानकों के साथ जोड़कर AI को बड़े पैमाने पर आगे बढ़ा रहा है.
शासन के लिहाज़ से देखें तो राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों से अमेरिका की प्राथमिकताएं बदल रही हैं. अमेरिकी AI नीति में अब नियमन-आधारित सोच से अधिक तीव्रता, व्यापकता और नवाचार-आधारित प्रतिस्पर्धा पर ज़ोर दिया जाता है. इसका पहला एहसास तभी हो गया था, जब मई 2025 में ‘AI डीफ्यूजन रूल’ को रद्द किया गया जो उन्नत AI मॉडल और उच्च-स्तरीय चिप्स के वैश्विक आवागमन को कड़ाई से नियंत्रित करता था. अब यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि अमेरिकी AI प्रौद्योगिकी पिटारे और मानकों को सभी देश अपनाएं. 2025 की AI कार्ययोजना से इसकी पुष्टि भी होती है जो विदेश में अमेरिकी नेतृत्व को मज़बूत करने के लिए नियमों में ढील देने, निजी क्षेत्र में नवाचार को तेज़ करने और घरेलू AI ढांचा को बढ़ाने पर ज़ोर देती है. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमेरिका खुद को हार्डवेयर, सॉफ़्टवेयर, मानकों व सुरक्षा के साथ पूर्ण-स्तरीय AI समाधान उपलब्ध कराने वाला देश बनाने का प्रयास कर रहा है. इसमें AI को औद्योगिक व रक्षा-संपत्ति के रूप में देखा जाता है और सुरक्षा व मानकों से अधिक प्रतिस्पर्धा व श्रेष्ठता को महत्व दिया जाता है.
AI विकास-यात्रा में भारत अब एक महत्वपूर्ण चरण में प्रवेश करने जा रहा है जहां सरकार AI नवाचार, स्टार्टअप और हब को पूरा समर्थन दे रही है. 2024 में स्वीकृत इंडिया AI मिशन का उद्देश्य एक साझा और रियायती AI कंप्यूट इन्फ्रास्ट्रक्चर बनाना है जिसके लिए पांच साल में 10,300 करोड़ रुपये का आवंटन किया गया है. इसके अलावा, भारत उद्यमों को सस्ते दामों में 38,000 GPU और 1,050 TPU उपलब्ध करा रहा है, जिसका उद्देश्य घरेलू चिप व सेमीकंडक्टर निर्माण को आगे बढ़ाना और भारत में AI पारिस्थितिकी तंत्र को मज़बूत बनाना है. इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन जैसे प्रयास लंबे समय तक चिप आत्मनिर्भरता सुनिश्चित कर सकेंगे, जबकि BHASHINI और आगामी IndiaAI डेटासेट जैसे प्लेटफ़ॉर्म भाषा और डेटासेट उपलब्धता पर काम कर रहे हैं. यहां स्वदेशी मॉडल, उत्कृष्टता केंद्र और AI कौशल विकास पर तेज़ी से काम हो रहा है, जिसका मक़सद भारत को भविष्य में वैश्विक AI के मामले में नेतृत्व के रूप में स्थापित करना है. ‘महाकुंभ 2025’ में जिस तरह भीड़ प्रबंधन में AI (Kumbh Sah’AI’yak जैसे चैटबॉट) का इस्तेमाल किया गया, वह इन प्रयासों की सफलता का शुरुआती संकेत है.
हरित कंप्यूटिंग ढांचे में निवेश बढ़ाने, डेटासेट तक ज़िम्मेदारीपूर्वक पहुंच सुनिश्चित करने और निजी डेटा साझाकरण को प्रोत्साहित करने वाली नीतियां बनानी होंगी. शिक्षा जगत और उद्योग के बीच सहयोग भी मज़बूत करना होगा. यहां अनुसंधान आगे बढ़ाने और कुशल AI पेशेवरों को देश में ही रोके रखने के उपाय भी खोजने होंगे.
भारत में AI शासन मॉडल मुख्य रूप से ‘पहले सक्षम करें, फिर नियम बनाएं’ नीति पर आधारित है, जिसका अर्थ है कि AI नवाचार को फलने-फूलने देना चाहिए, लेकिन नैतिकता और सुरक्षा की क़ीमत पर नहीं. इसी के अनुरूप, डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण (DPDP) अधिनियम 2023 बनाए गए और ज़िम्मेदार AI के लिए कानून आसान किए गए. भारत ने AI शासन दिशा-निर्देश भी जारी किए हैं, जिनमें सात मुख्य सिद्धांत हैं- विश्वास, जन-केंद्रित विकास, पाबंदी के बजाय नवाचार, निष्पक्षता और समानता, जवाबदेही, डिजाइन से समझ बढ़ाना, सुरक्षा, लचीलापन व स्थिरता. यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ‘सभी के लिए AI’ सोच के अनुरूप है, जिसके अनुसार, AI को समावेशी विकास और व्यापक सामाजिक लाभों का एक माध्यम बनाने पर ध्यान दिया जा रहा है.
संचालन के मामले में भारत डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI) मॉडल के अनुसार AI नवाचार को आगे बढ़ रहा है. इसके माध्यम से भारत ने बुनियादी प्रौद्योगिकियों का एक साझा सार्वजनिक पिटारा बनाया है, जिसका सरकारी और निजी, दोनों इनोवेटर्स ने लाभ उठाया है. अब सरकार समान-स्तरीय दृष्टिकोण पर विचार कर रही है, जिसके तहत साझा और सब्सिडी प्राप्त कंप्यूट ढांचा, अंतरसंचालनीय प्लेटफ़ॉर्म और मुक्त सार्वजनिक डेटासेट जैसे संसाधन उपलब्ध कराए जाएंगे. इससे सरकारी संस्थानों, स्टार्टअप और निजी कंपनियों को AI आधारित समाधान विकसित करने में मदद मिलेगी.
हालांकि, वैश्विक AI केंद्र के रूप में उभरने की भारत की महत्वाकांक्षा को कुछ ज़मीनी चुनौतियों से भी जूझना पड़ता है. भारत को सबसे पहले कंप्यूट ढांचा पर ध्यान देना होगा, विशेषकर यहां ऊर्जा-कुशल डेटाकेंद्रों की सीमित उपलब्धता है, जिसे दूर करने की ज़रूरत है. यह समस्या एक व्यापक डेटा चुनौती से भी जुड़ी है. यहां AIKosh, ओपन गवर्नमेंट डेटा प्लेटफ़ॉर्म और नेशनल डेटा ऐंड एनालिटिक्स प्लेटफ़ॉर्म (NDAP) जैसे प्रयास किए गए हैं, लेकिन गुणवत्तापूर्ण व अपडेटेड डेटासेट तक सबकी समान पहुंच नहीं है. प्रतिभा की कमी भी एक बड़ी बाधा है, क्योंकि भारत में आईटी स्नातकों की बड़ी संख्या ज़रूर है, लेकिन उन्नत AI शोधकर्ताओं की कमी और प्रतिभाओं का लगातार पलायन कायम है.
साफ़ है, इन चुनौतियों से निपटने के लिए समन्वित समाधान खोजना होगा. हरित कंप्यूटिंग ढांचे में निवेश बढ़ाने, डेटासेट तक ज़िम्मेदारीपूर्वक पहुंच सुनिश्चित करने और निजी डेटा साझाकरण को प्रोत्साहित करने वाली नीतियां बनानी होंगी. शिक्षा जगत और उद्योग के बीच सहयोग भी मज़बूत करना होगा. यहां अनुसंधान आगे बढ़ाने और कुशल AI पेशेवरों को देश में ही रोके रखने के उपाय भी खोजने होंगे.
देबज्योति चक्रवर्ती ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के सेंटर फॉर डिजिटल सोसाइटीज में रिसर्च असिस्टेंट हैं.
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Debajyoti Chakravarty is a Research Assistant at ORF’s Center for New Economic Diplomacy (CNED) and is based at ORF Kolkata. His work focuses on the use ...
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