Author : Prateek Tripathi

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Published on Dec 06, 2025 Updated 6 Days ago

इस लेख में बताया गया है कि ट्रंप की उलझी हुई AI नीति अमेरिका-चीन संघर्ष को और पेचीदा बना रही है. इसके चलते वैश्विक सहयोगियों का भरोसा कमजोर हो रहा है.

अमेरिका या चीन: AI जंग में कौन आगे?

चीन पर परस्पर निर्भरता को कम करना क़रीब एक दशक से अमेरिका की तकनीक और निर्यात नीति का बुनियादी सिद्धांत रहा है. यह रणनीति ख़ास तौर से दोनों देशों के बीच बढ़ते रणनीतिक मुक़ाबले के संदर्भ में काफ़ी देखी जाती रही है. चूंकि अब क़रीब-क़रीब सभी मौजूदा तकनीकों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता, यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का महत्व बढ़ गया है और यह सभी तकनीक में शामिल होने लगी है इसलिए इसको लेकर दोनों देशों में ज्यादा होड़ है. इसी कारण अमेरिका की AI निर्यात नीति विशेष रूप से महत्वपूर्ण बन जाती है. हालांकि, ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि चीन को AI चिप बेचने पर लगी रोक को वापस लेने का फ़ैसला ट्रंप प्रशासन कर सकता है जिस कारण अमेरिकी रवैये पर संदेह बढ़ गया है.

  • AI सभी तकनीकों में शामिल होने लगी है, इसलिए अमेरिका–चीन प्रतिस्पर्धा बढ़ी है।
  • AI चिप प्रतिबंध हटाने के संकेत से अमेरिकी नीति पर संदेह बढ़ गया है।
  • चीन के प्रतिउत्तर और घरेलू चिप निर्माण के बीच अमेरिका ने B30A चिप की बिक्री रोकी।

असल में, चीन द्वारा पलटवार करने और अपने डेटा केंद्रों के लिए घरेलू स्तर पर चिप बनाने के फ़ैसले को देखते हुए ट्रंप प्रशासन ने एनवीडिया द्वारा हाल ही में विकसित B30A चिप चीन को बेचने पर रोक लगाने का फ़ैसला किया है मगर यह पूरा घटनाक्रम बताता है कि ट्रंप की तकनीकी नीति काफ़ी उलझी हुई और भ्रामक है. इसका घरेलू स्तर पर विरोध तो बढ़ ही रहा है, यह अमेरिकी सहयोगी देशों के लिए भी चिंता का विषय बन गया है. वास्तव में, चीन को तकनीक और महत्वपूर्ण खनिज आपूर्ति श्रृंखलाओं से बाहर रखने की अमेरिकी नीति का दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं पर असर पड़ा है. कई मामलों में इसका काफ़ी हानिकारक प्रभाव पड़ा है. इस कारण कई लोग इस नीति की सफलता और भविष्य में इसके क्रियान्वयन के तरीके पर सवाल उठाने लगे हैं.

 

अमेरिकी AI नीति और रणनीतिक पहल

ट्रंप प्रशासन ने हाल के महीनों में कई AI और तकनीकी नीतिगत कदमों की घोषणा की है, जिनमें स्टारगेट परियोजना, अमेरिकी AI कार्ययोजना और CHIPS अधिनियम के तहत टैक्स क्रेडिट बढ़ाना भी शामिल है. इन सभी पहलों का एक ही लक्ष्य है- घरेलू स्तर पर निर्माण को बढ़ावा देना, चीन पर निर्भरता कम करना और निर्यात प्रतिबंधों के माध्यम से महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकियों से चीन को दूर रखना.

अमेरिकी नीति की सफलता और क्रियान्वयन पर अब गंभीर सवाल उठ रहे हैं।

उदाहरण के लिए, एनवीडिया के H20 चिप को ही लें. यह कंपनी की सबसे उन्नत चिप (जैसे ब्लैकवेल) का पुराना व कमज़ोर वर्जन है और विशेष रूप से चीन के बाज़ार की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए ही तैयार किया गया है. इस चिप को तब विकसित किया गया था, जब बाइडेन सरकार ने चीन को उन्नत AI चिप के निर्यात पर रोक लगा दी थी. मगर अप्रैल, 2025 में राष्ट्रपति ट्रंप ने चीन को H20 चिप बेचने पर भी प्रतिबंध लगा दिया, जिसके कारण एनवीडिया को साल की पहली तिमाही में क़रीब 4.5 अरब डॉलर का नुक़सान हुआ. कंपनी के सीईओ जेन्सेन हुआंग के मुताबिक, इस प्रतिबंध से जुलाई तिमाही में कंपनी को क़रीब 8 अरब डॉलर के और भी अधिक नुक़सान होने की आशंका है.

 

AI चिप पर अमेरिका और चीन की रस्साकशी

हालांकि, अगस्त 2025 में ट्रंप ने यह संकेत दिया कि यदि कंपनियां चीन की कमाई का 15 प्रतिशत राजस्व अमेरिकी सरकार के खाते में जमा करती हैं, तो एनवीडिया और AMD की चिपों पर लगे प्रतिबंध हटाए जा सकते हैं. इस कदम को न सिर्फ़ गैर-कानूनी निर्यात टैक्स के रूप में देखा गया, बल्कि चीन पर निर्भरता घटाने की अमेरिकी नीति पर भी सवाल उठाए जाने लगे. बेशक, ट्रंप के हालिया फ़ैसले के पीछे क्या मंशा है, इसको लेकर तरह-तरह के कयास लगाए जा रहे हैं, लेकिन कुछ बातें गौर करने योग्य ज़रूर हैं.

इस फ़ैसले ने अमेरिकी प्रतिबंध नीति पर भी सवाल खड़े किए।

दरअसल, यह घोषणा एनवीडिया द्वारा महीनों की पैरवी के बाद की गई, जिस क्रम में जुलाई में ट्रंप और हुआंग के बीच मीटिंग भी हुई थी. चीन से दूरी बनाने का एक प्रमुख माध्यम है एनवीडिया, बावजूद इसके उसकी मांगों के आगे ट्रंप का यूं झुक जाना बताता है कि ट्रंप प्रशासन रणनीतिक और कॉरपोरेट हितों में किस हद तक घालमेल कर रहा है. राष्ट्रपति ट्रंप ने जो तर्क दिए, वह यह था कि H20 चिप अत्याधुनिक ब्लैकवेल चिप का एक निम्नस्तरीय और घटिया वर्जन है. हालांकि, इससे यह स्पष्ट नहीं होता कि रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण तकनीक को बेचने आखिर ज़रूरत क्यों है, जबकि चीन पश्चिम की तकनीक की नकल करके अपनी तकनीक विकसित करने में माहिर रहा है. इसके अलावा, हार्डवेयर चीन को उपलब्ध कराने के बजाय क्लाउड सेवाओं के माध्यम से किसी दूरस्थ स्थान से इंटरनेट के माध्यम से भी उसे यह सुविधा दी जा सकती थी, जो कहीं अधिक व्यावहारिक विकल्प माना जाता.

हो सकता है कि अमेरिका-चीन व्यापार समझौते की कोशिश इसकी वज़ह हो, जिसका मक़सद पुरानी चिप बेचकर चीन को सुरक्षा का झूठा एहसास दिलाना होता. हालांकि, चीन ने इस रणनीति को तुरंत भांप लिया और उसने सितंबर 2025 में अपनी कंपनियों को H20 चिप खरीदने पर रोक लगा दी. उसने यह फ़ैसला शायद इसलिए लिया, क्योंकि अमेरिकी कांग्रेस (संसद) निर्यात की जाने वाली चिप में ट्रैकिंग और किल-स्विच क्षमताओं (निगरानी करने और ज़रूरत के वक़्त उसे बेअसर कर सकने की क्षमता) को अनिवार्य बनाने को लेकर कानून लाने जा रही थी. और फिर, अमेरिकी वाणिज्य मंत्री हॉवर्ड लुटनिक ने ऐसे बयान दिए थे, जिनमें अन्य बातों के अलावा ‘चीनियों को पुरानी तकनीक की लत लगाने की रणनीति’ जैसी टिप्पणियां भी की गई थीं. 

निर्यात नियंत्रणों से एशियाई सहयोगियों को भारी आर्थिक नुकसान हो रहा है।

चीन ने अपने फ़ैसले को और मजबूत बनाते हुए अपने उन डेटा केंद्रों को, जो 30 प्रतिशत से कम पूरे हुए हैं, अपने यहां से सभी विदेशी चिप हटाने या उनको ख़रीदने की योजना रद्द करने का आदेश दिया. इसके जवाब में, व्हाइट हाउस ने 6 नवंबर, 2025 को चीन को एनवीडिया के छोटे आकार वाली B30A चिप की बिक्री पर रोक लगाने के फ़ैसले का एलान कर दिया.

वाशिंगटन के इस फ़ैसले को जायज ठहराने के लिए जो बड़ी वज़ह बताई जा रही है, वह है चीन के मुखर विरोधी माने जाने वाले विदेश मंत्री मार्को रुबियो जैसे लोगों का विरोध. उन्होने चीन के AI चिप की आपूर्ति से जुड़ी राष्ट्रीय सुरक्षा चिंताओं का हवाला दिया है. ये चिंताएं असल में इस तकनीक के दोतरफा उपयोग और सैन्य प्रभावों से जुड़ी हैं. हालांकि, जैसा कि पहले बताया गया है, ट्रंप कुछ महीने तक इस पर तैयार थे. मगर उनके रुख़ में जो नया बदलाव आया है, उसकी वज़ह शायद दक्षिण कोरिया में आयोजित APEC शिखर सम्मेलन के दौरान अमेरिका-चीन व्यापार समझौते पर बनी सहमति हो सकती है. विदेशी चिप पर अपनी निर्भरता कम करने की चीन की लगातार कोशिशों से भी यह मसला जुड़ा रहा है.

 

ट्रंप की AI और टेक नीति- भू-राजनीतिक परिणाम

यह सभी जानते हैं कि ट्रंप लेन-देन की नीति पर विश्वास करते हैं, लेकिन लंबे समय तक टिकाऊ विदेश नीति बनाने में यह सोच हमेशा व्यावहारिक नहीं मानी जाती. ऐसा इसलिए भी, क्योंकि विदेश नीति हमेशा राष्ट्रीय हितों को पूरा करने के अलावा साझेदारों व सहयोगियों की ज़रूरतों के आधार पर भी तय होती है. इस तरह देखें, तो चीन के प्रति ट्रंप प्रशासन की AI नीति विरोधाभासी और उलझी हुई है. ताइवान, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देश अमेरिकी निर्यात नियंत्रणों के कारण अपने चिप-निर्माण केंद्रों को चीन से बाहर ले जाने को मजबूर हो रहे हैं, जिससे उनको भारी आर्थिक नुक़सान हो रहा है. इस बीच, चीन को AI चिप निर्यात करने को लेकर अमेरिका ने अपना ढुलमुल रवैया दिखाया है, जिससे उसकी प्रतिबंध संबंधी रणनीति पर इन देशों का भरोसा डिगने लगा है और उनकी उलझन बढ़ने लगी है.

सहयोगियों में अमेरिकी नेतृत्व और टेक नीति पर अविश्वास बढ़ रहा है।

अगर ट्रंप इसी तरह एकतरफा फ़ैसले लेते रहेंगे, तो अमेरिका के प्रति इन देशों की नाराज़गी और बढ़ सकती है. यहां तक कि सबसे क़रीबी सहयोगी देश भी अमेरिका से ख़फ़ा हो सकते हैं. इससे वे अमेरिकी तकनीकी आपूर्ति शृंखलाओं पर अपनी निर्भरता धीरे-धीरे कम करने का प्रयास कर सकते हैं और नया गठबंधन बना सकते हैं. इसकी एक झलक तियानजिन में आयोजित 25वें शंघाई सहयोग संगठन (SCO) शिखर सम्मेलन के बाद भारत-रूस-चीन के बीच बढ़ते संबंधों के रूप में दिखने भी लगी है. ट्रंप प्रशासन द्वारा दी गई कई धमकियों के बावजूद रूस के साथ दोस्ताना संबंध बनाए रखने की भारत की नीति से यह तस्वीर और उभरकर सामने आ रही है.

साफ़ है, एक स्पष्ट व स्थिर अमेरिकी तकनीकी नीति के अभाव के कारण पश्चिम की उस रणनीति को लेकर भी उलझन और भ्रम पैदा हो रहा है, जिसमें चीन से दूरी बनाने और उस पर निर्भरता कम करने की बात कही गई थी. यह अनुभवहीन अमेरिकी वर्चस्व संबंधी सोच को भी मज़बूती दे रहा है, क्योंकि अमेरिका के सहयोगी देश अपने ही रिश्तों पर सवाल उठाने लगे हैं. वे वाशिंगटन में मज़बूत और विश्वसनीय नेतृत्व का अभाव महसूस कर रहे हैं, साथ ही तकनीक और AI जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर ट्रंप की नीति को लेकर उनमें उलझन भी बढ़ रही है, इसलिए अन्य देश अमेरिका से अलग एक नई रणनीति और गठबंधन बनाने के लिए प्रेरित हो रहे हैं. यह आने वाले वर्षों में अमेरिका के लिए विनाशकारी साबित हो सकता है.

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