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खेती से लेकर संसाधन प्रबंधन और परिवार की देखभाल तक महिलाएं हर जगह बदलाव की पहली पंक्ति में हैं. ऐसे में जलवायु पर आए संकट के समाधान के लिए हो रहा COP30 अब सिर्फ़ चर्चा का मंच नहीं बल्कि महिलाओं की ज़रूरतों और उनकी नेतृत्व भूमिका को नीति और फंडिंग में सच में बदलने का अवसर है. यह सम्मेलन तय करेगा कि लैंगिक समानता केवल शब्दों में नहीं,बल्कि हर जलवायु फैसले में महसूस हो.
यह लेख ‘COP30 से अपेक्षाएं’ निबंध श्रृंखला का हिस्सा है.
लगभग दस साल पहले, दुनिया ने मिलकर जलवायु परिवर्तन से निपटने का बड़ा कदम उठाया-पेरिस समझौता लेकिन आज, इतने साल बाद भी वैश्विक प्रयास पूरी तरह भरोसेमंद नहीं लगते। असलियत ये है कि जलवायु परिवर्तन के प्रभाव तेज़ हो रहे हैं और इसका असर खासकर ग्लोबल साउथ के देशों में ज़्यादा महसूस किया जा रहा है. इसमें एक बड़ा पहलू है-लैंगिक असमानता। अक्सर इसे अनदेखा किया जाता है लेकिन सच ये है कि महिलाओं की भूमिका सबसे अहम होती है. खेती के काम से लेकर संसाधनों का प्रबंधन और परिवार की देखभाल तक महिलाएं हर जगह सक्रिय हैं इसलिए, जब जलवायु बदलाव आता है तो इसका असर सबसे पहले और सबसे ज्यादा महिलाओं पर पड़ता है.
पेरिस समझौते के तहत जलवायु कार्रवाई को प्रभावशाली बनाने में लैंगिक समानता को एक बुनियादी ज़रूरत बताया गया है. इसमें जलवायु अनुकूलन को लेकर जो अनुच्छेद 7 है, इसमें विशेष रूप से जलवायु कार्रवाई में लैंगिक-संवेदनशील नज़रिए को प्रमुखता दी गई है. इतना ही नहीं, इस समझौते की प्रस्तावना हो या फिर क्षमता निर्माण और शिक्षा के संबंधित अनुच्छेद 11 और अनुच्छेद 12 हों, सभी में लैंगिक समानता को सबसे ऊपर रखा गया है और हर हाल में इसे हासिल करने की आवश्यकता जताई गई है. इसके अलावा, जलवायु कार्रवाई में लैंगिक समानता के इस नज़रिए को लीमा वर्क प्रोग्राम ऑन जेंडर (LWPG) और जेंडर एक्शन प्लान (GAP) के ज़रिए भी आगे बढ़ाने का काम किया गया है. देखा जाए तो, जेंडर एक्शन प्लान ने जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन (UNFCCC) की रणनीति के तहत लैंगिक एकीकरण को संस्थागत स्वरूप प्रदान किया है. यानी इसने जलवायु कार्रवाई के सभी तरीक़ों, जैसे कि जलवायु शमन, अनुकूलन, वित्तपोषण और क्षमता निर्माण में महिलाओं को बराबरी देने का काम किया है.
“COP29 के दौरान लैंगिक विविधिता, जाति, धर्म और वर्ग के आधार पर भेदभाव एवं महिलाओं में वित्तीय समानता जैसे मुद्दों पर मतभेदों की वजह से जलवायु कार्रवाई के लिए तमाम पहलुओं में महिलाओं की समान भागीदारी पर बातचीत ठप हो गई थी.”
COP29 के दौरान लैंगिक विविधिता, जाति, धर्म और वर्ग के आधार पर भेदभाव एवं महिलाओं में वित्तीय समानता जैसे मुद्दों पर मतभेदों की वजह से जलवायु कार्रवाई के लिए तमाम पहलुओं में महिलाओं की समान भागीदारी पर बातचीत ठप हो गई थी. इस वजह से लैंगिक-संवेदनशील जलवायु नीति का भविष्य भी अधर में लटक गया था. हालांकि, ब्राज़ील के बेलेम में आयोजित हो रहे COP30 में ये मुद्दे एक बार फिर बातचीत के केंद्र में आ चुके हैं. इससे कहीं न कहीं फिर से इस दिशा में होने वाली प्रगति का आकलन करने और जलवायु शासन में लैंगिक एकीकरण के अगले चरण की रूपरेखा को निर्धारित करने का एक महत्वपूर्ण अवसर सामने आया है.
वर्ष 2014 में लीमा में आयोजित COP20 में जलवायु कार्रवाई में लैंगिक समानता के मुद्दे को अपनाया गया था और उसके बाद से LWPG द्वारा UNFCCC के फ्रेमवर्क में लैंगिक समानता को शामिल किया गया. इसके अलावा, यह भी स्वीकार किया गया है कि जलवायु परिवर्तन के प्रभाव लिंग के आधार पर अलग-अलग होते हैं, यानी पुरुषों और महिलाओं पर इनका असर भिन्न होता है, साथ ही इनसे निपटने के लिए जो उपाय किए जाते हैं, उन्हें पुरुषों और महिलाओं के लिहाज़ से तैयार और लागू किये जाने की ज़रूरत है. साल 2017 में आयोजित COP23 के दौरान पहली बार जलवायु कार्रवाई के लिए जेंडर एक्शन प्लान अपनाया गया था, जिसमें पांच प्राथमिकताएं निर्धारित की गई थीं. ये प्राथमिकताएं थीं, क्षमता निर्माण, महिला नेतृत्व और महिलाओं की भागीदारी, संस्थागत स्तर पर महिलाओं को ध्यान में रखकर नियमों, मानकों और नीतियों को बनाना एवं कार्यान्वयन के तौर-तरीक़ों में बदलाव लाना और इन पहलों की निगरानी एवं रिपोर्टिंग के समुचित इंतज़ाम करना. COP25 के दौरान इस दिशा में और आगे बढ़ते हुए जलवायु कार्रवाई में लैंगिक असमानता को दूर करने के लिए न केवल एक उन्नत LWPG को अपनाया गया, बल्कि अपडेटेड GAP को भी अपनाया गया. इसका मकसद यह था कि लैंगिक समानता को सख़्ती से लागू किया जा सके और जवाबदेही सुनिश्चित की जा सके. अगर COP29 की बात करें, तो उसमें लैंगिक समानता से संबंधित इस फ्रेमवर्क को अगले दशक के लिए बढ़ा दिया गया था, साथ ही इसे कैसे लागू किया जाएगा, इसके बारे में भी स्पष्ट तौर पर कुछ नहीं कहा गया था. अब वर्तमान में बेलेम में आयोजित हो रहे COP30 में इसके कार्यान्वयन को लेकर महत्वपूर्ण फैसला किया जाना है.
“वैश्विक स्तर पर देखा जाए, तो कृषि क्षेत्र में काम करने वाले कुल कामगारों में महिलाओं की हिस्सेदारी क़रीब 40 प्रतिशत है.”
वैश्विक स्तर पर लंबे समय से जलवायु प्रशासन में महिलाओं के प्रतिनिधित्व को बढ़ाने की कोशिश की जा रही है. लैंगिक संतुलन यानी महिला प्रतिनिधियों की भागीदारी के लिहाज़ से देखें, तो पिछला जलवायु परिवर्तन सम्मेलन (COP29) अब तक का सबसे सफल सम्मेलन था. COP29 में शामिल होने वाले वैश्विक प्रतिनिधियों में महिलाओं की हिस्सेदारी 40 प्रतिशत थीं. इसमें कोई संदेह नहीं है कि जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में महिलाओं की भागीदारी में ख़ासा सुधार हुआ है, लेकिन इसमें क्षेत्रीय असमानताएं बनी हुई हैं. जलवायु सम्मेलन में जहां अफ्रीका की हिस्सेदारी 31 प्रतिशत है, वहीं एशिया-प्रशांत के देशों की हिस्सेदारी महज 28 प्रतिशत है. वहीं अगर COP20 की बात करें, तो इसके उद्घाटन सत्र में बोलने वाले 78 वैश्विक लीडर्स में सिर्फ़ 8 महिलाएं शामिल थीं. इसके अलावा, इन सम्मेलनों में महिला प्रतिनिधि शिक्षा और सशक्तिकरण जैसे विषयों पर होने वाली चर्चाओं में हिस्सा लेती हैं, लेकिन फाइनेंस और टेक्नोलॉजी जैसे विषयों पर होने वाली चर्चा-परिचर्चाओं में उनके भाग लेने की उम्मीद कम होती है यानी इनमें उनका प्रतिनिधित्व कम होता है. इससे ज़ाहिर होता है कि जलवायु कार्रवाई में लैंगिक समानता के जो प्रयास किए जा रहे हैं, ज़मीनी स्तर पर वे ज़्यादा प्रभावी नहीं हो पाए हैं और उनमें कुछ कमी रह गई है.
चित्र 1. पिछले दशक में आयोजित COP में देशों के प्रतिनिधिमंडल में महिलाओं का प्रतिनिधित्व (COP14–COP29)

स्रोत: Carbon Brief, 2024 के आंकड़ों का उपयोग करके लेखक द्वारा संकलित
हालांकि, वैश्विक स्तर पर जलवायु कार्रवाई में लैंगिक समानता पर कुछ प्रगति हुई है. जैसे कि 2024 में UNFCCC में शामिल 85 प्रतिशत देशों ने अपनी सूचनाओं और रिपोर्टों में लिंग का उल्लेख किया है, वहीं 100 प्रतिशत सदस्य देशों ने जलवायु परिवर्तन से जुड़ी अपनी राष्ट्रीय अनुकूलन योजनाओं (NAP) में जेंडर का जिक्र किया है. UNFCCC की 2025 की सिंथेसिस रिपोर्ट की बात करें, यानी वो रिपोर्ट जिसमें देशों की राष्ट्रीय जलवायु महत्वाकांक्षाओं (NDC) का विश्लेषण करके उनकी जलवायु प्रतिबद्धताओं का एक संक्षिप्त विवरण दिया जाता है, के मुताबिक़ 89 प्रतिशत पार्टियों यानी देशों ने लिंग का उल्लेख किया है और 80 प्रतिशत ने इसे ज़मीनी स्तर पर लागू करने को लेकर अपना संकल्प जताया है. हालांकि, वास्तविकता में इन देशों की कथनी और करनी में बहुत अंतर दिखाई देता है. जैसे कि 61 प्रतिशत देश लिंग-आधारित जलवायु कार्रवाई का उल्लेख करते हैं, लेकिन उनमें से केवल 30 प्रतिशत ने ही इसे कृषि, ऊर्जा और स्वास्थ्य जैसे प्रमुख सेक्टरों में शामिल किया है.
चित्र 2. NDCs में जेंडर का उल्लेख

स्रोत: UNFCCC सिंथेसिस रिपोर्ट 2025
पिछले दशक में लिंग-लक्षित जलवायु वित्त यानी महिलाओं और बालिकाओं की विशेष ज़रूरतों और उन पर पड़ने वाले प्रभावों को खत्म करने के लिए बनाई गई योजनाओं पर ख़र्च किए जाने वाले फंड पर नज़र डालें तो वर्ष 2010-11 में इसमें जहां 4.8 बिलियन अमेरिकी डॉलर ख़र्च किए गए थे, वहीं 2022-23 में यह ख़र्च बढ़कर 37.2 बिलियन अमेरिकी डॉलर हो गया. हालांकि, इस फंडिंग के ज़्यादातर हिस्से को महत्वपूर्ण श्रेणी में रखा गया. इसका मतलब यह है कि इस फंडिंग का मकसद लैंगिक आधार पर बनाई गई योजनाओं का वित्तपोषण करना तो था, लेकिन इसे प्राथमिकता में नहीं रखा गया था. इतना ही नहीं, ऐसी परियोजनाएं जो मुख्य रूप से महिलाओं पर केंद्रित हैं, वे बहुत छोटी हैं और उनकी हिस्सेदारी भी बेहद कम है. बीते दस वर्षों के दौरान ऐसी महिला केंद्रित परियोजनाओं में फंडिंग 0.49 बिलियन अमेरिकी डॉलर से बढ़कर 2.06 बिलियन अमेरिकी डॉलर ही हो पाई है. इससे यह पता चलता है कि जलवायु कार्रवाई के दौरान लैंगिक समानता पर फोकस तो बहुत अधिक किया जा रहा है, लेकिन ऐसी बहुत कम परियोजनाएं हैं, जो हक़ीक़त में महिलाओं को केंद्र में रखती हैं. यह नज़रिया कृषि, ऊर्जा और स्वास्थ्य जैसे प्रमुख सेक्टरों में समस्या पैदा कर सकता है, जहां लैंगिक समावेशी जलवायु निवेश और योजनाओं की बहुत ज़्यादा ज़रूरत है. यानी ऐसा करके ही सही मायने में परिवर्तन लाया जा सकता है और अपेक्षित नतीज़े हासिल किए जा सकते हैं.
चित्र 3. रियो मार्कर द्वारा लैंगिक समानता उद्देश्यों के साथ दी गई आधिकारिक विकास सहायता (ODA) की मात्रा और हिस्सेदारी (बिलियन डॉलर में)

स्रोत: OECD, 2025 के आंकड़ों का उपयोग करते हुए लेखक द्वारा संकलित
मौज़ूदा जेंडर एक्शन प्लान में अनिवार्य और मापने योग्य लक्ष्यों के कमी है. इसकी वजह यह है कि UNFCCC के दिशानिर्देशों में सिर्फ़ लिंग-आधारित डेटा जुटाने को ही तवज्जो दी गई है और देश भी आंकड़े एकत्र करने में इसी पर फोकस करते हैं. हालांकि, जिस प्रकार से देशों द्वारा NDCs यानी राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान की प्रतिबद्धताओं में लैंगिक स्पष्टता दिखाई जाने लगी है, वो इस दिशा में प्रगति को दिखाती ज़रूर है, लेकिन इससे यह साफ तौर पर पता नहीं चल पाता है कि वास्तविकता में इन्हें लागू किया जाता है कि नहीं और यह नतीज़ों में बदलते भी हैं या नहीं. ज़ाहिर है कि अगर इस तरह की पहलों की सख़्ती से निगरानी नहीं की जाती है और इनकी फंडिंग पर ध्यान नहीं दिया जाता है, तो इनसे सांकेतिक बदलाव तो हो सकता है, लेकिन ज़मीनी स्तर पर व्यापक बदलाव लाना बेहद मुश्किल है.
अनुमान है कि वर्ष 2050 तक दुनिया भर में 15.8 करोड़ और अधिक महिलाएं व लड़कियां ग़रीबी के दलदल में फंस सकती हैं. इतना ही नहीं, 23.6 करोड़ महिलाओं और लड़कियों को खाद्य असुरक्षा से जूझ़ना पड़ सकता है. जलवायु परिवर्तन की वजह से पैदा होने वाले हालात इन परिस्थितियों को और भयावह बना सकते हैं. ज़ाहिर है कि जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभाव पुरुषों और महिलाओं पर अलग-अलग होते हैं, जो कि उनकी सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों से तय होते हैं. उदाहरण के तौर पर, कृषि और मछली पालन ऐसे क्षेत्र हैं, जो जलवायु परिवर्तन के लिहाज़ से बेहद संवेदनशील हैं. इन सेक्टरों में काम करने वाली ज़्यादातर महिलाएं ही हैं. वैश्विक स्तर पर देखा जाए, तो कृषि क्षेत्र में काम करने वाले कुल कामगारों में महिलाओं की हिस्सेदारी क़रीब 40 प्रतिशत है. एक और अहम बात यह है कि इन महिलाओं में से सिर्फ़ 15 प्रतिशत के पास ही अपनी ज़मीन है. इस कारण कृषि सेक्टर में कार्यरत महिलाओं को न तो कर्ज़ मिल पाता है और न ही बीमा सुविधाओं तक इनकी पहुंच हो पाती है, जिससे जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों का सामना करने में उन्हें भारी मुश्किलों से जूझना पड़ता है. वर्ष 2024 में किए गए एक अध्ययन के मुताबिक़ गर्मी की वजह से उन परिवारों की वार्षिक आय 8 प्रतिशत कम हो जाती है, जिनकी मुखिया महिलाएं होती हैं. इतना ही नहीं, बाढ़ की वजह से भी इन परिवारों की सालाना इनकम 3 प्रतिशत और कम हो जाती है. अनुमान है कि इससे महिलाओं को हर साल लगभग 53 बिलियन अमेरिकी डॉलर का नुक़सान उठाना पड़ता है.
“वर्ष 2010-11 में इसमें 4.8 बिलियन अमेरिकी डॉलर ख़र्च किए गए थे, वहीं 2022-23 में यह ख़र्च बढ़कर 37.2 बिलियन अमेरिकी डॉलर हो गया.”
ज़ाहिर है कि महिलाएं जहां एक तरफ नौकरी आदि करके पैसा कमाती हैं, वहीं उन्हें सामाजिक और लैंगिक पूर्वाग्रहों की वजह से पुरुषों की तुलना में रोज़ाना कई अवैतनिक कार्य भी करने पड़ते हैं. इनमें परिवार की देखभाल करना, पानी लाना और ईंधन के लिए लकड़ियां इकट्ठा करना जैसे कार्य शामिल हैं. जलवायु परिवर्तन की वजह से इन प्राकृतिक संसाधनों पर ख़तरा पैदा होता है और कहीं न कहीं इससे महिलाओं की मुश्किलें और बढ़ जाती हैं, साथ ही रोज़मर्रा के इन कामों में ज़्यादा समय देना पड़ता है. उदाहरण के तौर पर, फिलहाल महिलाओं को परिवार के लिए पानी लाने में रोज़ाना 20 मिनट से ज़्यादा का वक़्त लगता है, वहीं बढ़ते जलवायु परिवर्तन के कारण पैदा होने वाले हालातों की वजह से साल 2050 तक इसमें लगभग 30 प्रतिशत ज़्यादा समय लगने की उम्मीद है.
इसके अतिरिक्त, जलवायु परिवर्तन का जीवन के साथ-साथ प्रजनन पर भी गंभीर असर पड़ता है, लेकिन अक्सर देखने में आता है कि नीतियां बनाते वक़्त इस महत्वपूर्ण पहलू को अनदेखा कर दिया जाता है. उदाहरण के तौर पर भारत में भयंकर गर्मी में रहने वाली गर्भवती महिलाओं को तमाम स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों का सामना करना पड़ता है. ऐसे में उनमें गर्भावस्था के विपरीत नतीज़ों यानी प्रसव या उसके बाद मां और बच्चे को स्वास्थ्य समस्याएं होने की संभावना अधिक होती है. इसके बावज़ूद, देशों के हीट एक्शन प्लान यानी अत्यधिक गर्मी के होने वाले हानिकारक स्वास्थ्य ख़तरों को कम करने से जुड़ी योजनाओं में प्रजनन स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं को कोई जगह नहीं दी जाती है.
“यदि COP30 लैंगिक समानता के मुद्दे पर केवल चर्चा नहीं बल्कि इसे कार्यान्वयन में बदले तो यह खुद को एक कार्यान्वयन COP के रूप में स्थापित कर सकता है.”
इस सारी मुश्किलों और कमज़ोरियों के बावज़ूद ये महिलाएं ही हैं, जो बदलाव में अग्रणी भूमिका निभाती हैं. ज़ाहिर है कि रोज़मर्रा के जीवन में महिलाएं न केवल प्राकृतिक संसाधनों के सीधे संपर्क में आती हैं, बल्कि घरेलू ज़रूरतों को पूरा करने के अलावा सामुदायिक गतिविधियों से भी जुड़ी रहती हैं. इससे जहां महिलाओं को अक्सर सबसे पहले जलवायु परिवर्तनों का पता लगता है, वहीं इसके प्रभावों से निपटने के लिए ज़रूरी तौर-तरीक़े अपनाने में भी यह मददगार होता है. कहने का मतलब है कि महिलाएं आजीविका और पारिस्थितिकी तंत्र के साथ तालमेल स्थापित करने में सबसे आगे होती हैं. इससे साबित होता है कि न्यायसंगत जलवायु प्रशासन कितना ज़रूरी है, यानी एक ऐसी जलवायु व्यवस्था, जो न केवल पर्यावरण की रक्षा करे, बल्कि सामाजिक और आर्थिक न्याय को प्राथमिकता दे, बेहद ज़रूरी है. कुल मिलाकर ऐसी जलवायु व्यवस्था होनी चाहिए, जिसमें नीतियां और फंडिंग न केवल लैंगिक अंतर को दूर करें, बल्कि लचीलापन स्थापित करने में महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका को पहचानें और उन्हें आगे बढ़ने में मदद करें.
उम्मीद है कि COP30 के दौरान सिर्फ़ एक समर्पित जेंडर डे आयोजित करके ज़िम्मेदारियों से पल्ला नहीं झाड़ा जाएगा, बल्कि जलवायु कार्रवाई में लैंगिक समानता का महत्व समझा जाएगा और इसे चर्चाओं के केंद्र में रखा जाएगा. मौज़ूदा समय में जलवायु कार्रवाई में लैंगिक समानता के कार्यान्वयन में जो कमियां हैं, उनके मद्देनज़र निम्नलिखित सिफ़ारिशें जलवायु नीति और जलवायु कार्रवाई में लैंगिक एकीकरण को सशक्त कर सकती हैं.
ज़ाहिर है कि जलवायु प्रशासन में कई संरचनात्मक, वित्तीय और नीतिगत ख़ामियां हैं. ऐसे में जलवायु कार्रवाई के इरादों को सही मयानों में नतीज़ों में बदलने के लिए इन कमियों को दूर किए जाने की ज़रूरत है. हालांकि, NDCs और कई ग्लोबल फ्रेमवर्क्स में लैंगिक समानता बढ़ रही है, बावज़ूद इसके इसकी प्रगति में काफ़ी असमानता है. कहने का मतलब है कि लैंगिक समानता के मामले में कई देशों में अभी भी ज़रूरी प्रणालियों, संसाधनों और जवाबदेही की कमी है. ऐसे में COP30 लैंगिक समानता के मुद्दे पर केवल चर्चा-परिचर्चा का मंच बनने के बजाय, खुद को एक कार्यान्वयन COP के रूप में स्थापित कर सकता है. इस लिहाज़ से COP30 एक बेहतीन मौक़ा है, जो सभी संस्थाओं में लैंगिक समानता को शामिल करने, इसे देशों की राष्ट्रीय जलवायु प्रतिबद्धताओं के साथ जोड़ने और जलवायु नीतियों को महिलाओं के मुताबिक़ न्यायसंगत व प्रभावशाली बनाने का महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करता है.
शेरोन साराह थवाने ओआरएफ कोलकाता एवं सीएनईडी के निदेशक नीलांजन घोष की एक्ज़ीक्यूटिव असिस्टेंट हैं.
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Sharon Sarah Thawaney is the Executive Assistant to the Director - ORF Kolkata and CNED, Dr. Nilanjan Ghosh. She holds a Master of Social Work ...
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