Author : Mahdi Ghuloom

Expert Speak Raisina Debates
Published on Dec 24, 2025 Updated 12 Days ago

2013 में जीसीसी (GCC) देशों ने रक्षा सहयोग को मजबूत करने की दिशा में अब तक का सबसे बड़ा कदम उठाया.

GCC + अमेरिका = खाड़ी की सुरक्षा का नया दौर

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“GCC देशों की सुरक्षा एक-दूसरे से जुड़ी हुई है.” सामूहिक सुरक्षा की इस सोच को हाल के महीनों में GCC के नेताओं और खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) के महासचिव महामहिम जासेम मोहम्मद अलबुदैवी ने बार-बार दोहराया है. यह बात 3 दिसंबर 2025 को बहरीन में हुई GCC सुप्रीम काउंसिल की 46वीं बैठक, 25 नवंबर 2025 को कुवैत में आयोजित संयुक्त रक्षा परिषद की 22वीं बैठक और खास तौर पर 24 सितंबर 2025 को न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) के 80वें सत्र के दौरान GCC–अमेरिका रणनीतिक साझेदारी की संयुक्त बैठक में भी दोहराई गई.

  • GCC की सुरक्षा साझा है  
  • साझा रक्षा की ओर GCC  
  • अमेरिका की भूमिका निर्णायक

यह बात न्यूयॉर्क में इसलिए खास मानी जा रही है क्योंकि जीसीसी (GCC) अपने सदस्य देशों के लिए अमेरिका के साथ मिलकर एक साझा रक्षा ढांचा बनाने की दिशा में काम कर रहा है. दिसंबर में जीसीसी के महासचिव जासेम मोहम्मद अलबुदैवी ने कहा था कि ‘जॉइंट गल्फ मिसाइल डिफेंस शील्ड’ नाम की इस पहल में अभी कई तकनीकी मुद्दों को सुलझाना बाकी है. उन्होंने यह भी बताया कि इस रक्षा व्यवस्था की संरचना और कामकाज को अंतिम रूप देने के लिए अमेरिका के साथ नियमित बैठकें हो रही हैं. ऐसे में यह संभव है कि 2027 की शुरुआत में खाड़ी क्षेत्र में होने वाले बड़े संयुक्त सैन्य अभ्यास में अमेरिका भी शामिल हो. अमेरिका के साथ लगातार हो रहा समन्वय यह दिखाता है कि विदेशी साझेदारों के साथ समझौते जीसीसी के रक्षा एकीकरण को मजबूत कर सकते हैं. शुरुआत भले ही अमेरिका से हो लेकिन आगे चलकर अमेरिका से जुड़े अन्य देश भी जीसीसी के साथ सामूहिक रक्षा सहयोग में शामिल हो सकते हैं. इससे जीसीसी में अलग-अलग देशों की बजाय साझा और संयुक्त रक्षा प्रयासों को बढ़ावा मिल रहा है.

दिसंबर में जीसीसी के महासचिव जासेम मोहम्मद अलबुदैवी ने कहा था कि ‘जॉइंट गल्फ मिसाइल डिफेंस शील्ड’ नाम की इस पहल में अभी कई तकनीकी मुद्दों को सुलझाना बाकी है.

GCC सुरक्षा सहयोग और चुनौतियाँ

2013 में जीसीसी (GCC) देशों ने रक्षा सहयोग को मजबूत करने की दिशा में अब तक का सबसे बड़ा कदम उठाया. उस वर्ष कुवैत में हुई शिखर बैठक में संयुक्त सैन्य कमान बनाने और रणनीतिक व सुरक्षा अध्ययन के लिए एक गल्फ अकादमी स्थापित करने पर सहमति बनी. यह कदम 1982 में बने पेनिनसुला शील्ड फोर्स और सदी की शुरुआत में हुए संयुक्त रक्षा समझौते के बाद सबसे अहम प्रगति माना जाता है.

2025 में क़तर पर इज़राइल और ईरान के हमलों के बाद जीसीसी देशों ने रक्षा सहयोग को तेज़ करने की ज़रूरत महसूस की. इसके तहत जीसीसी संयुक्त रक्षा परिषद की एक विशेष बैठक दोहा में हुई, जिसमें साझा सैन्य कमान को संयुक्त रक्षा व्यवस्था और क्षेत्रीय सुरक्षा क्षमता को सक्रिय करने के निर्देश दिए गए. इसमें खुफिया जानकारी साझा करने, सभी देशों के ऑपरेशन सेंटरों के बीच हवाई स्थिति की जानकारी जोड़ने, बैलिस्टिक मिसाइलों के लिए प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली को तेज़ करने, संयुक्त रक्षा योजनाओं को अपडेट करने और साझा सैन्य अभ्यास करने का फैसला लिया गया. हालांकि, जीसीसी देशों की सेनाओं के बीच तालमेल की कमी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है क्योंकि उनके हथियारों और तकनीकी प्रणालियों में हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर स्तर पर अहम अंतर मौजूद हैं.

यहीं पर जीसीसी की रक्षा एकीकरण कोशिशों में अमेरिका के साथ तालमेल बेहद जरूरी हो जाता है. यह जीसीसी के अपने लक्ष्य-अंदरूनी क्षमताओं को मजबूत करने, क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों को गहरा करने और सहयोग के तंत्र को बढ़ाने-के अनुरूप भी है. साथ ही, यह जरूरत इसलिए भी बनी है क्योंकि जीसीसी देश अपने हथियारों और रक्षा प्रणालियों के रखरखाव और आपसी तालमेल के लिए काफी हद तक अमेरिका पर निर्भर हैं, जिनमें से अधिकतर प्रणालियाँ अमेरिका से ही खरीदी गई हैं. इसी कारण विशेषज्ञों का कहना है कि क्षेत्रीय रक्षा एकीकरण को आगे बढ़ाने के लिए जीसीसी को अमेरिका की जरूरत है, क्योंकि अमेरिका संगठनात्मक ढांचा, तकनीक और प्रशिक्षण उपलब्ध कराता है.

अमेरिका–GCC रक्षा सहयोग में बदलाव

2015 में कैंप डेविड में हुई बैठक के बाद अमेरिका की भूमिका में एक अहम बदलाव देखने को मिला. पहले अमेरिका खाड़ी देशों की सुरक्षा की गारंटी देने वाला माना जाता था, लेकिन अब वह उन्हें अपनी सुरक्षा क्षमता खुद विकसित करने में मदद करने की दिशा में बढ़ रहा है. इस बैठक में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा और GCC देशों के नेताओं ने पूरे क्षेत्र के लिए बैलिस्टिक मिसाइल रक्षा प्रणाली विकसित करने पर सहमति जताई, जिसे अमेरिका का समर्थन मिला.इसी साल अमेरिका के Centre for Naval Analyses ने एक रिपोर्ट भी जारी की, जो एक विशेष संवाद मंच (ट्रैक 1.5) के बाद तैयार की गई थी. इस मंच में खाड़ी देशों के अधिकारी, विशेषज्ञ और विद्वान शामिल थे। रिपोर्ट के अनुसार, सभी पक्ष चाहते थे कि अमेरिका और GCC देशों के रिश्ते इस दिशा में आगे बढ़ें कि खाड़ी देश अपनी रक्षा क्षमताएं खुद मजबूत कर सकें.

हालांकि, जीसीसी देशों की सेनाओं के बीच तालमेल की कमी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है क्योंकि उनके हथियारों और तकनीकी प्रणालियों में हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर स्तर पर अहम अंतर मौजूद हैं.

अमेरिका और जीसीसी (GCC) के बीच रक्षा सहयोग का मुख्य उद्देश्य ज्ञान साझा करना और क्षमताओं का विकास करना है, ताकि जीसीसी देश अपनी रक्षा शक्ति खुद मजबूत कर सकें. इसी लक्ष्य को लेकर 2022 में बाइडेन प्रशासन के दौरान अमेरिका-जीसीसी रक्षा कार्य समूहों की शुरुआत हुई, जो 2024 तक जारी रहे. ये पहल 2015 के कैंप डेविड वार्तालापों की सोच पर आधारित थीं. हालांकि, राष्ट्रपति ट्रंप के दूसरे कार्यकाल की शुरुआत के बाद अब तक ऐसी कोई बैठक नहीं हुई है. भले ही ट्रंप के पहले कार्यकाल में उम्मीद थी कि वे जीसीसी के लिए साझा मिसाइल रक्षा व्यवस्था को आगे बढ़ाएंगे, लेकिन उन्होंने इस मुद्दे पर डेमोक्रेट नेताओं की तुलना में कम सक्रियता दिखाई.

साझा रक्षा ढांचे के लिए जीसीसी को अमेरिका की सक्रिय भूमिका चाहिए, जिसमें राष्ट्रपति ट्रंप का अमेरिका को केवल सुरक्षा देने वाले देश से आगे बढ़कर ‘सुरक्षा समन्वयक’ की भूमिका स्वीकार करना अहम होगा.

इसके बजाय, राष्ट्रपति ट्रंप के कार्यकाल में अमेरिका और खाड़ी देशों के बीच बहुपक्षीय सुरक्षा सहयोग के बजाय द्विपक्षीय समझौतों पर ज्यादा जोर रहा. सितंबर 2025 में ट्रंप ने “क़तर की सुरक्षा सुनिश्चित करना” नामक एक आदेश पर हस्ताक्षर किए, जिसमें कहा गया कि क़तर पर हमला अमेरिका की सुरक्षा के लिए भी खतरा माना जाएगा. इसमें दोनों देशों के बीच आपात स्थिति में साझा योजना का ढांचा भी बनाया गया. इसके अलावा, 2019 में अमेरिका और यूएई के बीच रक्षा सहयोग समझौता लागू हुआ, और ओमान के साथ भी अमेरिकी नौसेना को बंदरगाहों तक नियमित पहुंच देने का रणनीतिक समझौता किया गया. सऊदी अरब के साथ भी ऐसे ही द्विपक्षीय समझौते पर बातचीत चल रही है. इससे संकेत मिलता है कि ट्रंप प्रशासन में इस दिशा में प्रगति धीमी रह सकती है, जो GCC महासचिव की उम्मीदों के अनुरूप नहीं है.

अमेरिका की निर्णायक भूमिका

न्यू अरब क्षेत्रीय संगठनों की तुलना में जीसीसी (GCC) को अब भी क्षेत्रीय एकीकरण का सबसे सफल उदाहरण माना जाता है,  भले ही यह अभी अधूरा हो. क़तर पर हुए हमलों ने जीसीसी देशों की सेनाओं के बीच तालमेल की कमी और अमेरिका की पिछली नीतियों की सीमाएँ उजागर कीं. साझा रक्षा ढांचे के लिए जीसीसी को अमेरिका की सक्रिय भूमिका चाहिए, जिसमें राष्ट्रपति ट्रंप का अमेरिका को केवल सुरक्षा देने वाले देश से आगे बढ़कर ‘सुरक्षा समन्वयक’ की भूमिका स्वीकार करना अहम होगा. यदि जीसीसी अमेरिका के साथ मिलकर सैन्य तालमेल की समस्याओं को दूर कर पाता है और बहुपक्षीय सहयोग के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाता है, तो वह एक मजबूत और स्थायी सामूहिक रक्षा व्यवस्था की ओर बढ़ सकता है.

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