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मिज़ोरम अपनी जगह और संसाधनों की वजह से भारत का नया व्यापार रास्ता बन सकता है. अभी तक कनेक्टिविटी की कमी से इसकी क्षमता बाहर नहीं आ पाई थी लेकिन सड़क, रेल और बॉर्डर सुविधाएँ बेहतर होने से मिज़ोरम अब दक्षिण-पूर्व एशिया को जोड़ने वाला अहम राज्य बन रहा है.
अपने समृद्ध प्राकृतिक संसाधनों और रणनीतिक स्थिति के बावजूद अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में पूर्वोत्तर भारत का योगदान बहुत कम बना हुआ है. 2024-25 के दौरान पूर्वोत्तर से निर्यात का कुल मूल्य 6.20 अरब अमेरिकी डॉलर होने का अनुमान था जो भारत के कुल निर्यात का 0.13 प्रतिशत था. पूर्वोत्तर राज्यों में असम का हिस्सा इस क्षेत्र के कुल निर्यात में 89 प्रतिशत था जिसके बाद मेघालय (5.3 प्रतिशत), सिक्किम (3.7 प्रतिशत) और त्रिपुरा (2 प्रतिशत) का स्थान रहा लेकिन मिज़ोरम का निर्यात महज़ 0.23 मिलियन अमेरिकी डॉलर (0.04 प्रतिशत) था जो बहुत छोटे व्यापार के आधार का संकेत देता है.
इस क्षेत्र में व्यापार एवं विकास की राह में एक बड़ी बाधा अपर्याप्त परिवहन और कनेक्टिविटी का बुनियादी ढांचा है. सिलीगुड़ी कॉरिडोर (एक संकरा 22 किलोमीटर का हिस्सा) पूर्वोत्तर और बाकी भारत के बीच अकेले ज़मीनी संपर्क के रूप में काम करता है. पूर्वोत्तर के सामान इस लंबे और घुमावदार रूट से कोलकाता और हल्दिया बंदरगाह तक पहुंचते हैं जिसका नतीजा परिवहन लागत में बढ़ोतरी और लंबे समय के रूप में निकलता है जो व्यापार में प्रतिस्पर्धा और औद्योगिक निवेश की अपील को कमज़ोर करता है. इसलिए केंद्र और राज्य- दोनों सरकारों के द्वारा हाल के दिनों में विकास से जुड़ी पहल को देखते हुए मिज़ोरम में व्यापार और कनेक्टिविटी को मज़बूत करने की संभावनाओं का विश्लेषण करना महत्वपूर्ण है.
“पूर्वोत्तर आर्थिक कॉरिडोर (NEEC) इस क्षेत्र को विकास के एक प्रमुख केंद्र के रूप में बदलने की दिशा में एक बड़ा कदम है.”
रणनीतिक रूप से स्थित मिज़ोरम पश्चिम में बांग्लादेश (318 किमी) और पूर्व एवं दक्षिण में म्यांमार (404 किमी) के साथ अंतर्राष्ट्रीय सीमा साझा करता है. 21,087 वर्ग किमी में फैला ये राज्य काफी हद तक पहाड़ी है लेकिन फिर भी पेड़-पौधों और प्राकृतिक संसाधनों के मामले में समृद्ध है. मिज़ोरम को हाल ही में पूरी तरह से साक्षर राज्य घोषित किया गया है जो शिक्षा और मानवीय पूंजी के विकास के प्रति इसकी मज़बूत प्रतिबद्धता के बारे में बताता है. 2023-24 में स्थिर कीमत पर मिज़ोरम का सकल राज्य मूल्य वर्धन (GSVA) 20,271.55 करोड़ रुपये था और प्रति व्यक्ति सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP) 1,74,148 रुपये था. प्राइमरी सेक्टर ने GSVA में 17 प्रतिशत का योगदान दिया जबकि सेकेंडरी और टर्टियरी सेक्टर का योगदान क्रमश: 28 प्रतिशत और 55 प्रतिशत था.
क्षेत्रीय विकास और एकीकरण को तेज़ करने के लिए पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास मंत्रालय (MDoNER) ने कई प्रमुख पहल की हैं. पूर्वोत्तर विशेष बुनियादी ढांचा विकास योजना (NESIDS), जिसे अब पूर्वोत्तर परिषद (NEC) के तहत NESIDS (सड़क) और MDoNER के तहत NESIDS (सड़कों के अलावा) में बांट दिया गया है, सड़क, बिजली और पानी की आपूर्ति जैसे महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचों में सुधार पर ध्यान देती है. पूर्वोत्तर क्षेत्र के लिए प्रधानमंत्री विकास पहल (PM-DevINE), पहाड़ी क्षेत्र विकास कार्यक्रम (HADP) और गैर-समाप्ति योग्य केंद्रीय संसाधन पूल (NLCPR) जैसे सहायक कार्यक्रम विकास से जुड़ी खामियों को पाटने और पूरे क्षेत्र में कनेक्टिविटी बढ़ाने में मददगार साबित हुए हैं.
2023 में शुरू पूर्वोत्तर आर्थिक कॉरिडोर (NEEC) इस क्षेत्र को विकास के एक प्रमुख केंद्र के रूप में बदलने की दिशा में एक बड़ा कदम है. इस कॉरिडोर का उद्देश्य परिवहन, बिजली और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर को अपग्रेड करके कनेक्टिविटी, व्यापार और निवेश में बढ़ोतरी है. साथ ही बांस, अगरवुड, रेशम उत्पादन और अधिक मूल्य की बागवानी की फसलों जैसे प्राथमिकता के क्षेत्रों को बढ़ावा देना है. इस पहल के तहत भारत की एक्ट ईस्ट नीति के अनुरूप पूर्वोत्तर को दक्षिण-पूर्व एशिया के लिए भारत के प्रवेश द्वार के रूप में स्थापित करने की परिकल्पना भी की गई है.
“मिज़ोरम की जलवायु अदरक, हल्दी, मिर्च, पैशन फ्रूट और एंथूरियम जैसी ज़्यादा दाम वाली फसलों के अनुकूल है.”
2015 में योजना आयोग की जगह नीति आयोग बनने के बाद विकास की बदलती रूप-रेखा के जवाब में मिज़ोरम ने कई राज्य विशिष्ट रणनीतियां तैयार की. इनमें 2016 की नई आर्थिक विकास नीति (NEDP), 2019 का सामाजिक-आर्थिक विकास कार्यक्रम (SEDP) और 2024 की मिज़ोरम बाना कैह (सहायता) योजना शामिल हैं जिनका सामूहिक उद्देश्य आजीविका, उद्यमिता और समावेशी विकास को मज़बूत करना है.
राज्य सरकार ने टिकाऊ और व्यापक विकास को बढ़ावा देने के लिए क्षेत्र और विषय के हिसाब से भी कई नीतियों को अपनाया है. इनमें प्रमुख हैं मिज़ोरम औद्योगिक एवं निवेश नीति 2025, मध्यम, लघु और सूक्ष्म उद्यमों के लिए मिज़ोरम ख़रीद वरीयता नीति 2025, ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस पॉलिसी 2023, राज्य लॉजिस्टिक नीति 2022, कौशल एवं उद्यमिता विकास नीति 2018 और पर्यटन नीति 2023. साथ मिलकर ये रूप-रेखा संसाधनों के उचित उपयोग, निजी क्षेत्र की भागीदारी और टिकाऊ आर्थिक कायाकल्प के लिए एक व्यापक रोडमैप प्रदान करती है.
मिज़ोरम की जलवायु अदरक, हल्दी, मिर्च (बर्ड्स आई वैरायटी), पैशन फ्रूट और एंथूरियम जैसी ज़्यादा दाम वाली फसलों के अनुकूल है. इनके निर्यात को बढ़ावा देने के लिए राज्य को किसान-उत्पादक कंपनियों (FPC) के माध्यम से उत्पादन क्लस्टर विकसित करना चाहिए और कटाई के बाद के बुनियादी ढांचे (जैसे कि कोल्ड चेन और ड्रायर) में निवेश करना चाहिए. ऑर्गेनिक सर्टिफिकेशन, मिज़ो मिर्च जैसी फसल के लिए ज्योग्राफिकल इंडिकेशन (GI) हासिल करने और अच्छी कृषि पद्धति (GAP) की ट्रेनिंग देने से प्रतिस्पर्धा में बढ़ोतरी होगी. लेंगपुई हवाई अड्डा-कोलकाता बंदरगाह और दक्षिण-पूर्व एशियाई व्यापार मार्ग के माध्यम से अच्छी कनेक्टिविटी के साथ कृषि एवं प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (APEDA), मसाला बोर्ड, राष्ट्रीय बागवानी बोर्ड (NHB) और MSME योजनाओं का समर्थन निर्यात संभावना को मज़बूत कर सकती है.
“4,500 मेगावॉट की संभावना के साथ जल विद्युत राज्य के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दे सकती है.”
इसके अलावा मिज़ोरम के लगभग 30 प्रतिशत (6,446 वर्ग किमी) क्षेत्र में बांस की खेती होती है जिसमें मेलोकन्ना बैसीफेरा प्रजाति का दबदबा है. ये पर्यावरण अनुकूल उद्योगों, रोज़गार और निर्यात के लिए अवसर प्रदान करता है. बैम्बू पार्क बनाने और राष्ट्रीय बांस मिशन (NBM) के साथ साझेदारी करने से ज़्यादा कीमत वाले उत्पादों को बढ़ावा मिल सकता है जिनमें फर्नीचर, हैंडीक्राफ्ट और बायोमास ऊर्जा शामिल हैं. कौशल विकास, ब्रांडिंग और म्यांमार, बांग्लादेश एवं दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के संघ (ASEAN) के बाज़ार के साथ जुड़ने से इस क्षेत्र के विकास को बढ़ावा मिलेगा.
4,500 मेगावॉट (MW) की संभावना के साथ जल विद्युत राज्य के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दे सकती है. सरप्लस ऊर्जा का निर्यात बांग्लादेश, म्यांमार और पड़ोसी राज्यों को किया जा सकता है जबकि विश्वसनीय बिजली आपूर्ति उद्योगों को आकर्षित करेगी.
समृद्ध परिदृश्य, सांस्कृतिक उत्सव और जैव विविधता पर्यटन को एक प्रमुख अवसर बनाते हैं. स्वदेश दर्शन एवं तीर्थयात्रा कायाकल्प तथा आध्यात्मिक संवर्धन अभियान (PRASAD) योजना के समर्थन से रीएक, म्यूफांग और फावंगपुई जैसी जगहों को विकसित किया जा रहा है. एक्ट ईस्ट नीति के तहत सीमा पार पर्यटन से रोज़गार और आमदनी में बढ़ोतरी हो सकती है. राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) और आयुष्मान भारत के साथ-साथ सार्वजनिक-निजी साझेदारी के ज़रिए अस्पतालों एवं टेलीमेडिसिन तक पहुंच में सुधार से स्वास्थ्य देखभाल का विस्तार हो रहा है. ज़ोरम मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल और पारंपरिक चिकित्सा, स्वास्थ्य (वेलनेस) निर्यात की संभावना का अवसर प्रदान करती है. लेकिन सीमित मात्रा में विशेष स्वास्थ्य देखभाल और मानव संसाधन महत्वपूर्ण चुनौतियां हैं.
मिज़ोरम में तीन मान्यता प्राप्त सीमा व्यापार बिंदु हैं: ज़ोखावथर (म्यांमार), ज़ोरिनपुई (म्यांमार, प्रस्तावित इंटिग्रेटेड चेक पोस्ट) और कौरपुईछुआह (बांग्लादेश, प्रस्तावित इंटिग्रेटेड चेक पोस्ट). 2015 में शुरू ज़ोखावथर लैंड कस्टम स्टेशन (LCS) आधिकारिक रूप से कार्यरत है लेकिन कर्मचारियों और बुनियादी सुविधाओं (जैसे कि क्वॉरंटीन, खाद्य परीक्षण और धर्मकांटा) की कमी के कारण निष्क्रिय बना हुआ है. व्यापारियों को लेटर ऑफ क्रेडिट और कंट्री ऑफ ऑरिजिन के लेबलिंग से जुड़ी समस्याओं का सामना करना पड़ता है. बॉर्डर प्वाइंट को अधिक रेगुलेटरी (कस्टम, इमिग्रेशन, क्वॉरंटीन) और दूसरी सहायताओं (पार्किंग, गोदाम, बैंक, यूटिलिटी) की आवश्यकता है. जो LCS काम नहीं करते हैं, उन्हें अपग्रेड करना चाहिए और बेहतर परिवहन के माध्यम से जोड़ना चाहिए. भारतीय भूमि पत्तन प्राधिकरण (LPAI) के तहत इंटिग्रेटेड चेक पोस्ट (ICP) का विकास धीमा है और अभी तक देश में नौ ICP ही काम कर रहे हैं.
“बेहतर तालमेल और लगातार निवेश के साथ मिज़ोरम भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया को जोड़ने वाले एक रणनीतिक व्यापार कॉरिडोर के रूप में उभर सकता है.”
केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर और सीमा शुल्क बोर्ड (CBIC) को अधिक इनलैंड कंटेनर डिपो (ICD) को बढ़ावा देना चाहिए और परिवहन संपर्क एवं सीमा के दोनों तरफ सुविधाओं के साथ LCS का विकास करना चाहिए. लागत और देरी कम करने के लिए मैनुअल सिस्टम की जगह ऑटोमेशन एवं तकनीक आधारित कस्टम प्रक्रिया को अपनाया जाना चाहिए. पूर्वोत्तर भारत में पर्याप्त संख्या में लैबोरेटरी और क्वॉरंटीन के बुनियादी ढांचे की कमी है. भारत की कुल 182 FSSAI लैब में से केवल 18 और 53 प्लांट क्वॉरंटीन ऑफिस में से केवल 3 ही पूर्वोत्तर क्षेत्र में हैं. यहां निर्यात निरीक्षण परिषद (EIC) की कोई लैब नहीं है जिसकी वजह से निर्यात का प्रमाणन मुश्किल हो जाता है.
मिज़ोरम में 7,700 किमी से ज़्यादा सड़कें हैं जिनमें 1,423 किमी राष्ट्रीय राजमार्ग (18.5 प्रतिशत) शामिल हैं. लेकिन कठिन भू-भाग और रख-रखाव की अधिक आवश्यकताओं के कारण कई सड़कें ख़राब स्थिति में हैं. बैराबी-सैरंग रेलवे लाइन (51 किमी) अब आइज़ल को राष्ट्रीय नेटवर्क से जोड़ती है जबकि लेंगपुई हवाई अड्डा (जो कि सरकार द्वारा निर्मित भारत के कुछ हवाई अड्डों में से एक है) को परिचालन एवं मौसम से जुड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है. एक्ट ईस्ट नीति के तहत बाहरी कनेक्टिविटी बड़े अवसर प्रदान करती है. म्यांमार और बांग्लादेश के साथ 722 किमी की मिज़ोरम की सीमा के साथ कलादान मल्टी-मॉडल ट्रांज़िट परिवहन परियोजना और ज़ोखावथर-कालेम्यो सड़क जैसी परियोजनाओं का उद्देश्य सीमा पार व्यापार को बढ़ाना है. एशियन हाईवे और ट्रांस-एशियन रेलवे के साथ मिज़ोरम को जोड़ने से दक्षिण-पूर्व एशिया का रास्ता और खुलेगा. हालांकि ज़्यादा लागत, नाज़ुक भू-भाग, भूस्खलन और खुली सीमा पर सुरक्षा से जुड़े मुद्दे प्रमुख चुनौतियां बनी हुई हैं. बेहतर तालमेल और लगातार निवेश के साथ मिज़ोरम भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया को जोड़ने वाले एक रणनीतिक व्यापार कॉरिडोर के रूप में उभर सकता है.
दशकों तक मिज़ोरम भौगोलिक रूप से भारत की मुख्यधारा की अर्थव्यवस्था से अलग रहा. लेकिन मौजूदा समय में केंद्र और राज्य की पहल के साथ वो व्यापार और विकास का केंद्र बनने की दहलीज पर खड़ा है. अपनी प्राकृतिक संपदाओं- बागवानी, बांस, जल विद्युत और पर्यटन- का लाभ उठाकर और मल्टीमॉडल कनेक्टिविटी को मज़बूत करके मिज़ोरम दक्षिण-पूर्व एशिया के लिए भारत के प्रवेश द्वार के रूप में अपनी संभावनाओं को साकार कर सकता है.
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Prof. Vanlalchhawna is a Professor of Economics at Mizoram University, a central university established in 2001. He is presently the Finance Officer at Mizoram University. Expert Member, Mizoram ...
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