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Published on Apr 09, 2026 Updated 0 Hours ago

एचएएल के स्वदेशी ट्रेनर विमान लंबे समय तक देरी और तकनीकी दिक्कतों में फंसे रहे, जिससे वे समय पर वायुसेना की जरूरत पूरी नहीं कर पाए. इसी वजह से वायुसेना आज भी पुराने किरण जैसे विमानों और कुछ विदेशी प्लेटफॉर्म पर निर्भर है. आर्टिकल से जानें, क्यों स्वदेशी ट्रेनर विमान अभी तक पूरी तरह सफल नहीं हो पाए.

क्यों अब भी पुराने और विदेशी विमानों पर निर्भर है वायुसेना?

स्थिर और मज़बूत आधारभूत संरचनाएं मिलने से दुनियाभर में सेनाओं को काफ़ी फायदा होता है. लेकिन भारतीय वायु सेना (आईएएफ) के नज़रिए से देखें तो, कम गुणवत्ता वाले उपकरण वायुसैनिकों के प्रशिक्षण में कई ज़ोखिमों को जन्म देते हैं. पिछले पांच दशकों में वायुसेना में कई हाई-प्रोफाइल विमान शामिल हुए. जगुआर, मिराज-2000, सुखोई-30MKI, लाइट कॉम्बेट एयरक्राफ्ट (तेजस), राफेल, सी-130J सुपर हरक्यूलिस, सी-17, चिनूक और अपाचे जैसे विदेशी विमान वायुसेना के बेड़े में आए. 

इसके अलावा, एचटी-2, एचपीटी-32 और एचजेटी-16 किरण के अलावा स्वदेशी रूप से डिजाइन, विकसित और निर्मित प्रशिक्षक विमानों पर भी काम हुआ, लेकिन इन्हें वायुसेना में शामिल करने में हुई प्रगति की कमी ने हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) के प्रदर्शन पर सवाल खड़े कर दिए हैं. वायु सेना में पहले ये ज़रूरी माना जाता था कि हर ट्रेनी पायलट एक स्थिर, मानकीकृत प्रशिक्षण से गुजरे, जिसमें टर्बोप्रॉप और जेट उड़ान दोनों का अनुभव शामिल हो. इसके बाद ही उसे वायु सेना की तीन धाराओं, फाइटर, परिवहन, या हेलीकॉप्टर में शामिल करने लायक समझा जाता था. 

1960 के दशक की शुरुआत से 2009 तक वायु सेना की प्रशिक्षण यात्रा में दो स्वदेशी पिस्टन-इंजन प्रशिक्षक विमानों, एचटी-2 और एचपीटी-32 पर आधारित एक बुनियादी चरण शामिल था. 1950 के दशक में निर्मित और एचएएल द्वारा संचालित हिंदुस्तान ट्रेनर-2 ने 1980 के दशक की शुरुआत तक एक बुनियादी प्रशिक्षक विमान के रूप में सेवाएं प्रदान कीं. इसके बाद इसे एक अन्य पिस्टन-इंजन वाले विमान, एचपीटी-32 से बदल दिया गया, जो पहले से ही पुराना हो चुका था. टर्बोप्रॉप प्रशिक्षक विमान के लिए वायु सेना की आवश्यकता को पूरा करने में असमर्थ एचपीटी-32 दो दशकों से ज़्यादा समय तक सेवा में रहा, लेकिन ये रखरखाव संबंधी गंभीर समस्याओं से ग्रस्त रहा.

वायु सेना में पहले ये ज़रूरी माना जाता था कि हर ट्रेनी पायलट एक स्थिर, मानकीकृत प्रशिक्षण से गुजरे, जिसमें टर्बोप्रॉप और जेट उड़ान दोनों का अनुभव शामिल हो. इसके बाद ही उसे वायु सेना की तीन धाराओं, फाइटर, परिवहन, या हेलीकॉप्टर में शामिल करने लायक समझा जाता था. 

2000 से ही, वायु सेना ने पिस्टन-इंजन वाले प्रशिक्षु विमानों को आधुनिक टर्बोप्रॉप प्रशिक्षु विमानों से बदलने की मांग बार-बार दोहराई. उसकी मांग तब मानी गई, जब इंजन की खराबी के कारण एचपीटी-32 विमान कई हादसों का शिकार हुआ. जान-माल के नुकसान के बाद 2009 में इसे सेवामुक्त कर दिया गया. किसी भी व्यावहारिक स्वदेशी विकल्प की कमी की वजह से वायु सेना को पुराने एचजेटी-16 किरण जेट ट्रेनर पर बुनियादी उड़ान प्रशिक्षण आयोजित करने के लिए मजबूर होना पड़ा. 

एचपीटी-32 के बाद बुनियादी प्रशिक्षण 

2009 में वायु सेना ने 75 बुनियादी प्रशिक्षण विमानों के लिए एक अंतर्राष्ट्रीय निविदा जारी की. 2011 में, एक कड़ी चयन प्रक्रिया के बाद स्विस पिलाटस पीसी-7 टर्बोप्रॉप प्रशिक्षण विमान का चयन किया. दो दर्जन से ज़्यादा देशों द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे ये प्रशिक्षण विमान समकालीन और आधुनिक हैं. इस समझौते में लगभग 30 करोड़ रुपये प्रति विमान की कीमत पर 38 अतिरिक्त विमान खरीदने का विकल्प भी शामिल था.

हालांकि, एचएएल ने कार्रवाई करते हुए रक्षा मंत्रालय को पिलाटस सौदे के साथ आगे न बढ़ने की सलाह दी और खुद की फाइनेंसिंग से एचटीटी-40 को डिज़ाइन और विकसित करने का प्रस्ताव दिया. कंपनी ने तीन से चार साल के भीतर विमानों का पहला बैच देने का वादा किया. लेकिन वायु सेना का भरोसा नहीं था, क्योंकि 1999 से ही उसने अपने बजट का एक महत्वपूर्ण हिस्सा एचएएल को एचजेटी-36, या सितारा इंटरमीडिएट जेट ट्रेनर के डिज़ाइन और विकास के लिए आवंटित कर दिया था, लेकिन एचएएल सितारा विमान की आपूर्ति नहीं कर सकी. ऐसे में वायु सेना फिर से इसी तरह के परिणाम झेलने का ज़ोखिम नहीं उठाना चाहती थी. इसलिए उसने 75 पिलाटस विमानों की खरीद को आगे बढ़ाया.

एचएएल के शुरुआती वादे के लगभग 10 साल बाद भी ये प्लेटफॉर्म अभी तक सेवा में नहीं आया है. अब इसे इस साल के आखिर तक फ्लाइंग इंस्ट्रक्टर्स स्कूल में शामिल किए जाने की योजना है. फ्लाइट कैडेट्स शायद अगले साल ही इसे उड़ाना शुरू कर पाएंगे.

दुर्भाग्यवश, वायु सेना 38 अतिरिक्त पिलाटस विमानों के विकल्प का इस्तेमाल नहीं कर सकी. इसका नतीजा ये हुआ कि एचएएल द्वारा डिज़ाइन किए गए एचटीटी-40 का महत्व फिर से बढ़ गया, क्योंकि इसे वायु सेना के बुनियादी प्रशिक्षक के रूप में पिलाटस के पूरक के रूप में तेजी से उपयोग करने के लिए बनाया गया था. हालांकि, एचएएल के शुरुआती वादे के लगभग 10 साल बाद भी ये प्लेटफॉर्म अभी तक सेवा में नहीं आया है. अब इसे इस साल के आखिर तक फ्लाइंग इंस्ट्रक्टर्स स्कूल में शामिल किए जाने की योजना है. फ्लाइट कैडेट्स शायद अगले साल ही इसे उड़ाना शुरू कर पाएंगे.

मौजूदा प्रशिक्षण विमानों से क्या दिक्कतें आ रही हैं?

हिंदुस्तान जेट ट्रेनर-16 (एचजेटी-16) 1950 के दशक के जेट प्रोवोस्ट विमान का लाइसेंस प्राप्त संस्करण है, जिसे 1993 में रॉयल एयर फोर्स से हटा दिया गया था. एचएएल द्वारा निर्मित एक अधिक उन्नत, लाइसेंस प्राप्त संस्करण के रूप में इसे 1968 में भारतीय वायु सेना में शामिल किया गया. एचजेटी-16 को किरण के नाम से भी जाना जाता है. इसने लगभग 40 साल तक एक बुनियादी और उन्नत जेट प्रशिक्षक के रूप में सेवा की. 2006 से इसकी जगह ज्यादा उन्नत माने जाने वाले हॉक ने ले ली. हालांकि, इसके उन्नत MK-AI और MK-II वेरिएंट अभी भी फ्लाइंग अकादमियों और फ्लाइंग इंस्ट्रक्टर्स स्कूल में एक बुनियादी जेट ट्रेनर के रूप में इस्तेमाल किए जाते हैं.

एचएएल द्वारा निर्मित एक अधिक उन्नत, लाइसेंस प्राप्त संस्करण के रूप में इसे 1968 में भारतीय वायु सेना में शामिल किया गया. एचजेटी-16 को किरण के नाम से भी जाना जाता है.

1980 के दशक में एडवांस्ड जेट ट्रेनर (एजेटी) की उपलब्ध नहीं थे. इसकी वजह से नए लड़ाकू पायलटों को पुराने जेट ट्रेनर (एचजेटी-16) से सीधे जगुआर और मिग-23/27/29 जैसे विमानों में प्रशिक्षित करना बड़ी चुनौती थी. वायु सेना दो दशकों से अधिक समय तक इस व्यवस्था से बंधी रही. 2006 में ब्रिटिश एयरोस्पेस हॉक को बेड़े में शामिल किया गया, जिससे वायु सेना को धीरे-धीरे अपने लिफ्ट प्लेटफॉर्म के रूप में मिग-21 से छुटकारा पाने में मदद मिली. फाइटर पायलट्स को ट्रेनिंग देने के लिए बेहतर विमान मिले. 

सितारा का अनिश्चित भविष्य  

वायु सेना के सामने अभी भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है. ये चुनौती है छह दशक पुराने एचजेटी-16 बेसिक जेट ट्रेनर को एचएएल द्वारा निर्मित सितारा इंटरमीडिएट जेट ट्रेनर (एचजेटी-36) से बदलने का प्रस्ताव. एचजेटी-36 के डिज़ाइन और विकास पर 4,000 करोड़ रुपये से ज़्यादा खर्च करने के बावजूद, इस विमान की प्रासंगिकता धीरे-धीरे कम हो गई है. इस वजह से भारतीय वायु सेना को पुराने हो चुके किरण विमान को बार-बार सेवा विस्तार देना पड़ रहा है, जबकि तकनीकी तौर पर ये भी पुराना हो चुका है.

ये स्थिति काफ़ी चिंतित करने वाली है, क्योंकि सैन्य विमानन मूल्य श्रृंखला के सबसे निचले स्तर पर एक आधुनिक प्रशिक्षण विमान बहुत ज़रूरी है. ऐसे विमानों को उपलब्ध कराने में नाकामी वायुसेना के व्यापक इकोसिस्टम पर बुरा प्रभाव डालती है.

किरण विमानों के मौजूदा बेड़े में कमी आने के कारण वायु सेना लड़ाकू विमानों की श्रेणी में चयनित पायलटों की प्रशिक्षण जरूरतों को बड़ी मुश्किल से पूरा कर पा रही है. हेलीकॉप्टर और परिवहन पायलटों को अब पिलाटस बेसिक ट्रेनर से सीधे चेतक हेलीकॉप्टरों और दो इंजन वाले डोर्नियर हल्के परिवहन विमानों पर प्रशिक्षण शुरू करने के लिए भेजा जा रहा है. अच्छी बात ये है कि पिलाटस विमान तकनीकी रूप से उन्नत हैं, इसलिए ट्रेनिंग देना आसान हो रहा है.

उन्नत ग्लास कॉकपिट, इंजन में सुधार, बेहतर प्रदर्शन और सितारा से यशस नाम दिए जाने के बावजूद, एचएएल और वायुसेना के बीच एचजेटी-36, यानी इंटरमीडिएट जेट ट्रेनर की व्यवहार्यता को लेकर मतभेद बना हुआ है. 

हालांकि, भारतीय वायु सेना 2006 में सीमित उत्पादन वाले 12 एचजेटी-36 विमानों का ऑर्डर देने के लिए तैयार थी, जिसके बाद 2010 में 73 और विमानों का ऑर्डर देने का प्रस्ताव था, लेकिन अब वो बड़े पैमाने पर खरीद के लिए धन देने में अनिच्छुक है. इसके बजाय, वायु सेना इस परियोजना में अतिरिक्त पैसे लगाने से पहले उन्नत यशस विमानों को हॉक एडवांस्ड जेट ट्रेनर में लगाना चाहती है. 

एचएएल ने एचटीटी-40 और सितारा आईजेटी दोनों के विकास चरणों के दौरान बदलती आवश्यकताओं और लक्ष्यों के कारण देरी का अक्सर हवाला दिया है. ये स्थिति काफ़ी चिंतित करने वाली है, क्योंकि सैन्य विमानन मूल्य श्रृंखला के सबसे निचले स्तर पर एक आधुनिक प्रशिक्षण विमान बहुत ज़रूरी है. ऐसे विमानों को उपलब्ध कराने में नाकामी वायुसेना के व्यापक इकोसिस्टम पर बुरा प्रभाव डालती है.


अर्जुन सुब्रमण्यम भारतीय वायु सेना के सेवानिवृत्त एयर वाइस मार्शल और एक रणनीतिक टिप्पणीकार हैं.

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