दक्षिण अफ्रीका की जी20 अध्यक्षता ने विकास और ग्लोबल साउथ को केंद्र में लाकर इस मंच की दिशा बदल दी लेकिन अब अमेरिका को हुआ नेतृत्व हस्तांतरण यह सवाल खड़ा करता है कि क्या जी20 बिना औपचारिक नियमों के अपनी निरंतरता और सहयोग बनाए रख पाएगा.
दक्षिण अफ्रीका की 2025 की जी20 अध्यक्षता इस मंच के लिए एक अहम क्षण थी. पहली बार किसी अफ्रीकी देश ने जी20 की मेज़बानी की और प्रिटोरिया ने विकास वित्त, ऋण स्थिरता, असमानता और जलवायु परिवर्तन को अपने एजेंडे के केंद्र में रखा. गहरे भू-राजनीतिक मतभेदों के बावजूद नेताओं की घोषणा (लीडर्स डिक्लेरेशन) को अपनाया जाना भी एक बड़ी उपलब्धि रही. जोहान्सबर्ग शिखर सम्मेलन ने ग्लोबल साउथ की लगातार अध्यक्षताओं-इंडोनेशिया, भारत, ब्राज़ील और दक्षिण अफ्रीका-की श्रृंखला को पूरा किया. इन अध्यक्षताओं ने मिलकर जी20 का ध्यान विकास के मुद्दों पर मज़बूती से केंद्रित किया और अफ्रीकी संघ को जी20 में स्थायी सदस्य के रूप में शामिल करवाया.
अमेरिकी शेरपा ने संकेत दिया है कि वह पारंपरिक ट्रोइका को नज़रअंदाज़ करते हुए केवल 2027 और 2028 के अध्यक्षों-ब्रिटेन और दक्षिण कोरिया-से सलाह करेंगे.
दक्षिण अफ्रीका की अध्यक्षता का महत्व सिर्फ उसके एजेंडे तक सीमित नहीं है बल्कि उसके बाद जो हुआ, वह भी उतना ही अहम है. जोहान्सबर्ग से 2026 में अमेरिका की जी20 अध्यक्षता में हुआ बदलाव अब एक संस्थागत परीक्षा बन गया है. इससे यह साफ़ होता है कि जी20 में निरंतरता कितनी हद तक आने वाले अध्यक्ष की पसंद पर निर्भर करती है. औपचारिक हस्तांतरण नियमों के अभाव में यह सवाल और भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या जी20 तब भी सहयोग बनाए रख सकता है, जब उसके समन्वय तंत्रों का पालन करना केवल इच्छा पर निर्भर हो.
जी20 की अनौपचारिक संरचना उसकी प्रभावशीलता की एक बड़ी वजह रही है. किसी संधि, स्थायी सचिवालय या बाध्यकारी नियमों के बिना भी, वैश्विक वित्तीय संकट के समय जी20 ने तेज़ी से कदम उठाए और आर्थिक प्रोत्साहन तथा वित्तीय सुधारों में समन्वय किया लेकिन यही ढांचा नेतृत्व की निरंतरता को बहुत अहम बना देता है. तय प्रक्रियाओं की कमी के कारण एजेंडा तय करने और उस पर अमल कराने की ज़िम्मेदारी मुख्य रूप से मेज़बान देश पर होती है.
ट्रोइका-जिसमें पिछला, वर्तमान और अगला अध्यक्ष शामिल होता है-एक व्यवहार आधारित व्यवस्था है जिसका उद्देश्य अध्यक्षता के हस्तांतरण और बहुवर्षीय पहलों में निरंतरता बनाए रखना है लेकिन व्यवहार में ट्रोइका में भागीदारी स्वैच्छिक है. किसी भी देश पर यह बाध्यता नहीं है कि वह अपने पूर्ववर्तियों से सलाह करे, उनके एजेंडे को आगे बढ़ाए या स्थापित परंपराओं का पालन करे. दक्षिण अफ्रीका से अमेरिका को अध्यक्षता सौंपे जाने के दौरान यह बात साफ़ दिखाई दे रही है. अमेरिकी शेरपा ने संकेत दिया है कि वह पारंपरिक ट्रोइका को नज़रअंदाज़ करते हुए केवल 2027 और 2028 के अध्यक्षों-ब्रिटेन और दक्षिण कोरिया-से सलाह करेंगे. वहीं, 2026 के मियामी शिखर सम्मेलन से दक्षिण अफ्रीका को बाहर रखने और उसकी जगह पोलैंड को बुलाने के प्रस्ताव दिखाते हैं कि निरंतरता की व्यवस्थाओं को कितनी आसानी से बदला या किनारे किया जा सकता है. फिलहाल, प्रिटोरिया ने संयम बरतने का फैसला किया है और संकेत दिया है कि वह 2027 में ब्रिटेन की अध्यक्षता आने तक किसी टकराव से बचेगा. यह संयम कब तक बना रहेगा और अन्य देश इस बदलाव पर कैसी प्रतिक्रिया देंगे, यह अभी साफ़ नहीं है.
2026 के मियामी शिखर सम्मेलन से दक्षिण अफ्रीका को बाहर रखने और उसकी जगह पोलैंड को बुलाने के प्रस्ताव दिखाते हैं कि निरंतरता की व्यवस्थाओं को कितनी आसानी से बदला या किनारे किया जा सकता है.
ये घटनाक्रम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वे दिखाते हैं कि जी20 किस हद तक अध्यक्ष देशों के सहयोग पर निर्भर है. जब नया मेज़बान देश स्थापित समन्वय प्रक्रियाओं को अपनाने से बचता है, तो निरंतरता एक सामान्य प्रक्रिया नहीं रह जाती, बल्कि उसकी इच्छा पर निर्भर हो जाती है. इससे भविष्य के लिए एक चिंताजनक मिसाल कायम होने का जोखिम पैदा होता है.
वर्तमान नेतृत्व परिवर्तन ने हाल के वर्षों में बने एजेंडा की गति पर दबाव डाल दिया है. 2022 से 2025 के बीच लगातार रही अध्यक्षताओं ने विकास से जुड़े मुद्दों-जैसे संप्रभु ऋण राहत, असमानता और विकासशील देशों के लिए पूंजी की ऊँची लागत-को प्राथमिकता दी. इस अवधि का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव जोहान्सबर्ग शिखर सम्मेलन रहा, जहाँ 122 बिंदुओं वाली घोषणा अपनाई गई. इसमें अफ्रीका के औद्योगीकरण पर ज़ोर दिया गया और एक वैश्विक असमानता पैनल की शुरुआत की गई, वह भी अमेरिका की भागीदारी के बिना. इसके अलावा, अफ्रीकी संघ को स्थायी सदस्य बनाए जाने से जी20 की प्रतिनिधित्व क्षमता बढ़कर दुनिया की लगभग 80 प्रतिशत आबादी तक पहुंच गई.
जब अमेरिका ने जी20 की वेबसाइट का नियंत्रण संभाला, तो पहले की सारी सामग्री हटा दी गई और उसकी जगह केवल जी20 मियामी 2026 का लोगो और नारा-“द बेस्ट इज़ येट टू कम”-दिखाने वाला एक पेज रखा गया.
लेकिन आने वाली अमेरिकी अध्यक्षता से मिल रहे शुरुआती संकेत बताते हैं कि एजेंडा अब एक सीमित बुनियादी मुद्दों की ओर मुड़ सकता है, जिसमें नियमों में ढील, ऊर्जा सुरक्षा और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा पर अधिक ध्यान होगा. समस्या केवल विषयों के बदलने की नहीं है-क्योंकि यह जी20 की स्वाभाविक प्रक्रिया है-बल्कि इस बात की है कि जब सक्रिय राजनीतिक समर्थन कम हो जाता है, तो पहले से शुरू की गई पहलें कितनी आसानी से अपनी गति खो देती हैं. दक्षिण अफ्रीका द्वारा विकासशील देशों के लिए पूंजी की लागत घटाने के प्रयास इस कमजोरी को साफ़ दिखाते हैं. जी20 अफ्रीका एक्सपर्ट पैनल जैसी पहलें तभी प्रभावी रह सकती हैं, जब लगातार आने वाली अध्यक्षताएँ अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों पर दबाव बनाए रखें. जैसे ही यह ध्यान हटता है, प्रगति रुक जाती है, भले ही काग़ज़ों पर प्रतिबद्धताएं बनी रहें.
2025–26 का संक्रमण जी20 की एक बुनियादी विशेषता को उजागर करता है-इसकी मजबूती, कार्यकुशलता और समावेशिता काफी हद तक अलग-अलग अध्यक्षताओं के व्यवहार पर निर्भर करती है. घूर्णन प्रणाली के तहत मेज़बान देशों को एजेंडा तय करने, परामर्श की प्रक्रिया और भागीदारी को लेकर काफ़ी स्वतंत्रता मिलती है. कुछ प्रतीकात्मक कदम भी इस प्रवृत्ति को मज़बूत करते हैं. जब अमेरिका ने जी20 की वेबसाइट का नियंत्रण संभाला, तो पहले की सारी सामग्री हटा दी गई और उसकी जगह केवल जी20 मियामी 2026 का लोगो और नारा-“द बेस्ट इज़ येट टू कम”-दिखाने वाला एक पेज रखा गया. यह तरीका पिछली अध्यक्षताओं से काफ़ी अलग है, जहाँ आम तौर पर पुराने कंटेंट को सहेजकर या अलग से संग्रहित किया जाता था, ताकि संस्थागत स्मृति बनी रहे.
अंततः, जी20 की अनौपचारिकता उसकी ताक़त भी है और कमजोरी भी. लचीलापन उसे बदलती परिस्थितियों के अनुसार ढलने में मदद करता है, लेकिन औपचारिक हस्तांतरण नियमों की कमी का मतलब है कि निरंतरता अपने आप नहीं बनी रहती. दक्षिण अफ्रीका से अमेरिका की ओर हुआ यह बदलाव दिखाता है कि जी20 की दिशा कितनी हद तक नेतृत्व के चुनाव पर निर्भर करती है और समन्वय तंत्रों को वैकल्पिक मानने पर निरंतरता कितनी आसानी से खतरे में पड़ सकती है.
सैंड्रा थाचिरिकल प्रथाप ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के स्ट्रेटेजिक स्टडीज प्रोग्राम में रिसर्च असिस्टेंट हैं.
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Sandra Thachirickal Prathap is a Research Assistant with the Observer Research Foundation’s (ORF) Strategic Studies Programme (SSP). Her research examines the geopolitical dynamics of the Global ...
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