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रूस-चीन और भारत-अमेरिका के बीच मेल-जोल को लेकर बढ़ती चिंताओं के बीच भारत और रूस को अपना द्विपक्षीय संबंध अधिक व्यावहारिक बनाने के लिए एक रोडमैप अपनाने की ज़रूरत है.
जून के आख़िर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मॉस्को यात्रा को लेकर प्रकाशित अटकलों को दुनिया की मीडिया ने तुरंत तवज्जो दी. हर किसी ने ये समझा कि रूस के नेतृत्व के साथ बातचीत राजनीतिक और सांकेतिक रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि इस साल भारत के आम चुनाव के बाद पीएम मोदी की ये पहली द्विपक्षीय विदेश यात्रा है. इस तरह मोदी ने सबसे पहले दक्षिण एशिया के पड़ोसी देश का दौरा करने की अनौपचारिक परंपरा को तोड़ने का फैसला किया. 2015 के बाद रूस की राजधानी का मोदी का ये पहला दौरा है और ये दौरा रूस-भारत संवाद के प्रारूप (फॉर्मेट) के प्रति भारत की प्रतिबद्धता दिखाती है. 2022 में उज़्बेकिस्तान में शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के शिखर सम्मेलन के दौरान हुई बैठक को छोड़ दिया जाए तो दोनों देशों के बीच बातचीत पिछले तीन वर्षों से स्थगित थी. एक तरफ भारत-रूस की बातचीत स्थगित थी तो दूसरी तरफ रूस-चीन संवाद लगातार होता रहा और एक-के-बाद-एक तीन आमने-सामने की बैठकें हुईं.
महामारी के बाद राष्ट्रपति पुतिन ने 2021 में भारत का दौरा किया. इसकी वजह से अब बारी मोदी के रूस दौरे की थी. पिछले साल के अंत में विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने अपने रूस दौरे में कहा था कि प्रधानमंत्री 2024 में रूस का दौरा करेंगे.
अक्टूबर 2000 में भारत और रूस ने जिस रणनीतिक साझेदारी के घोषणापत्र पर हस्ताक्षर किए थे, उसमें एक मुख्य प्रावधान था सालाना शिखर सम्मेलन स्तर की बैठकों का आयोजन. इसलिए दोनों देशों के राष्ट्र प्रमुखों के बीच द्विपक्षीय बातचीत कोविड-19 महामारी तक बार-बार होती रही. महामारी के बाद राष्ट्रपति पुतिन ने 2021 में भारत का दौरा किया. इसकी वजह से अब बारी मोदी के रूस दौरे की थी. पिछले साल के अंत में विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने अपने रूस दौरे में कहा था कि प्रधानमंत्री 2024 में रूस का दौरा करेंगे.
2022 के बाद के युग में भारत और रूस के बीच संबंधों में हैरानी का तत्व एक प्रमुख विशेषता बन गया है. आधिकारिक खुलासे में आकस्मिकता दौरे के साथ मिलने वाली जानकारी की भरमार को ख़त्म करने की इच्छा से प्रेरित थी. लोगों की सोच में यात्रा का उतना ही सांकेतिक महत्व है जितनी कि राजनीतिक अहमियत. ये महत्व लंबे समय के बाद बातचीत के इस प्रारूप की शुरुआत से पैदा होता है. अगर दोनों देशों के नेता इस साल नहीं मिलते तो इससे बड़ी शक्तियों की तरफ संतुलित दृष्टिकोण के मामले में भारत की विदेश नीति की रणनीति की निरंतरता के बारे में गंभीर चर्चाओं में तेज़ी आती. रूस में भारत के पूर्व राजदूत वेंकटेश वर्मा ने कहा, “ये यात्रा समय पर तो है ही लेकिन इसके साथ-साथ रणनीतिक साझेदारी के स्रोत को फिर से सक्रिय करने के लिए भी इसकी ज़रूरत थी.”
भारत में फैसला लेने वाले विदेश नीति के जिस समीकरण का हल करने की कोशिश कर रहे हैं, उसकी संरचना जटिल प्रतीत होती है. भारत परस्पर विरोधी गुटों के नेतृत्व के साथ जुड़ते हुए एक निष्पक्ष दृष्टिकोण अपनाने का प्रयास कर रहा है. यही कारण है कि रूस दौरे के पहले मोदी G7 के शिखर सम्मेलन में शामिल हुए जो उनके शपथ लेने के कुछ दिनों के बाद आयोजित हुआ था. विशेषाधिकार प्राप्त देशों के इस सम्मेलन में मोदी ने न सिर्फ़ ग्लोबल साउथ (विकासशील देशों) की आवाज़ को बुलंद किया बल्कि यूक्रेन के राष्ट्रपति से भी मुलाकात की. ये ऐसी मुलाकात थी जो फॉर्मेट के भीतर पहले ही सामान्य हो चुकी है. इस मामले में किनारे में बैठक की प्राथमिकता रूस के दौरे की स्थिति के ख़िलाफ़ तय की गई थी. एक और उदाहरण स्विट्ज़रलैंड शिखर सम्मेलन में भारत की भागीदारी का स्तर और अंतिम बयान पर हस्ताक्षर करने से इनकार करना है. राजनीतिक अभिजात वर्ग नई परिस्थितियों के तहत व्यक्तिगत संपर्क के महत्व को समझता है क्योंकि इस तरह के आयोजन को दोनों पक्षों के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत के रूप में समझा जा सकता है.
मुश्किल इस तथ्य को लेकर भी है कि इस दौरे के राजनीतिक मतलब को समझने के बारे में रूस और भारत के दृष्टिकोण अलग-अलग हैं. अगर रूस के लिए कम-से-कम सार्वजनिक क्षेत्र में यूक्रेन संकट के बीच पश्चिमी देशों के साथ भारत की भागीदारी के संदर्भ में महत्व है तो भारत के लिए इस समीकरण को विदेश नीति की यूरेशियाई और यूरो-अटलांटिक दिशा के बीच विरोधाभास के साथ-साथ इस महाद्वीप में प्रतिस्पर्धियों के साथ संबंध से मदद मिलती है. दूसरे शब्दों में कहें तो समस्या विदेश नीति के तिकड़म के अलग-अलग आकलन से पैदा होती है.
अगर रूस के लिए कम-से-कम सार्वजनिक क्षेत्र में यूक्रेन संकट के बीच पश्चिमी देशों के साथ भारत की भागीदारी के संदर्भ में महत्व है तो भारत के लिए इस समीकरण को विदेश नीति की यूरेशियाई और यूरो-अटलांटिक दिशा के बीच विरोधाभास के साथ-साथ इस महाद्वीप में प्रतिस्पर्धियों के साथ संबंध से मदद मिलती है.
कज़ाखस्तान में SCO शिखर सम्मेलन में मोदी की यात्रा का अचानक रद्द होना एक और उदाहरण है. एक तरफ तो इस फैसले के पीछे का कारण आंतरिक राजनीति है- नई लोकसभा का पहला सत्र एक दिन पहले ख़त्म हुआ था. लेकिन इसके साथ-साथ ये फैसला भारत की विदेश नीति के नज़रिए के संदर्भ में लिया गया. भारत का नेतृत्व चीन और पाकिस्तान के साथ बातचीत को सार्वजनिक रूप से दिखाने में झिझकता है. माना जाता है कि इस वजह से यूरेशिया में रूस के साथ द्विपक्षीय बातचीत और मध्य एशिया + भारत शिखर सम्मेलन, जो कि इस साल होने वाला है, आयोजित करने पर भारत की विदेश नीति के एजेंडे में वैचारिक स्तर पर “बंटवारा” हुआ है. हालांकि, मौजूदगी की राजनीतिक स्थिति में कमी का मतलब भागीदारी से इनकार करना नहीं है क्योंकि चीन और पाकिस्तान के साथ-साथ अफ़ग़ानिस्तान के मुद्दों पर बातचीत के लिए SCO एक महत्वपूर्ण मंच बना हुआ है.
रूस ने तुरंत संकेत दिया कि वो मोदी के दौरे को बहुत ज़्यादा महत्व देता है क्योंकि ये भारत के द्वारा एक संतुलित और स्वतंत्र विदेश नीति को आगे बढ़ाने की रणनीतिक क्षमता की पुष्टि के तौर पर देखा जाता है जो कि एक बहुध्रुवीय विश्व प्रणाली की स्थापना के लिए एक शर्त है. भारत-अमेरिका संबंधों की गतिशीलता को नज़रअंदाज़ नहीं किया गया लेकिन इस प्रक्रिया को बढ़ाने वाले मूलभूत कारणों को रूस समझता है. यही वजह है कि मुख्य इच्छा है कि ये “भटकाव” रूस के साथ संबंधों की कीमत पर नहीं हो.
रूस ने तुरंत संकेत दिया कि वो मोदी के दौरे को बहुत ज़्यादा महत्व देता है क्योंकि ये भारत के द्वारा एक संतुलित और स्वतंत्र विदेश नीति को आगे बढ़ाने की रणनीतिक क्षमता की पुष्टि के तौर पर देखा जाता है जो कि एक बहुध्रुवीय विश्व प्रणाली की स्थापना के लिए एक शर्त है.
आम तौर पर द्विपक्षीय संबंधों का दायरा और रफ्त़ार आर्थिक और राजनीतिक क्षेत्रों- दोनों में सकारात्मक मानी जाती है. इस तरह वित्तीय वर्ष 2023-24 में द्विपक्षीय व्यापार का स्तर 65.5 अरब अमेरिकी डॉलर के पार चला गया जो वित्तीय वर्ष 2022-23 की तुलना में 25 प्रतिशत की बढ़ोतरी दिखाता है. भारत के सभी व्यापारिक साझेदारों में रूस चौथे नंबर पर है. इसके अलावा भारत के निर्यात में 35 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई जो स्मार्टफोन, धातु उद्योग और इंजीनियरिंग उत्पादों की सप्लाई में तेज़ी से प्रेरित व्यापार असंतुलन में बढ़ोतरी में कमी की शुरुआत का संकेत है. इस अवधि के दौरान 15 वर्षों में पहली बार रूस को एल्युमिनियम की सप्लाई भी देखी गई.
स्पष्ट रूप से दोनों पक्षों की ओर से यात्रा के बारे में सूचना की लगभग पूरी तरह से कमी के कारण कोई भी महत्वपूर्ण समझौता होने की उम्मीद नहीं है. वैसे तो रूस की अर्थव्यवस्था पर प्रतिबंध का दबाव कम नहीं हुआ है लेकिन इन प्रतिबंधों से पार पाने की रूस की क्षमता अधिक बनी हुई है और समय के साथ नई पाबंदियों का मनोवैज्ञानिक असर भी कम हो रहा है. इस तथ्य को देखते हुए कि भारत और रूस के बीच व्यापारिक संबंध अभी भी शुरुआती दौर में हैं, ये यात्रा लंबे समय के सहयोग के लिए इरादे का प्रदर्शन कर सकती है. बातचीत के एजेंडे में कथित विषयों की जानकारी नीचे है:
द्विपक्षीय व्यापार में उच्च गतिशीलता के लिए एक उचित रणनीतिक आधार की आवश्यकता है जो भारत-रूस संबंध को अधिक व्यावहारिक बनाएगा. भुगतान से जुड़े मुद्दों, लॉजिस्टिक, तकनीक और निवेश के क्षेत्रों के लिए अधिक पूर्वानुमान की लंबे समय से आवश्यकता महसूस की जा रही थी. राजनीतिक क्षेत्र में रूस-चीन और भारत-अमेरिका मेल-जोल को लेकर बढ़ती आशंकाओं के बीच दोनों देशों को आपसी भरोसे की पुष्टि करने की ज़रूरत है. इन परिस्थितियों में दोनों देशों को द्विपक्षीय संबंधों में अधिक व्यावहारिकता लाने के लिए एक रोडमैप स्थापित करने की आवश्यकता है. ऐसा करने में नेता बातचीत के उद्देश्य से अधिक टिकाऊ रूप-रेखा तैयार करने के लिए "बाहरी चुनौतियों को लेकर अस्थायी प्रतिक्रिया” के उदाहरण से परिवर्तन करने का इरादा जताएंगे.
इवान शेदरोव ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन में विज़िटिंग फेलो हैं.
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Ivan Shchedrov is presently a Visiting Fellow at Observer Research Foundation, New Delhi. He is also a research fellow at the Center of Indo-Pacific Region ...
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