खाड़ी देशों की पूंजी अब घरेलू जरूरतों की ओर बढ़ रही है जिससे भारत के इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश पर असर पड़ सकता है. ऐसे में भारत को अपने विकास वित्त के नए मजबूत स्रोत तैयार करने होंगे. जानें कैसे ये बदलाव भविष्य की आर्थिक रणनीति को प्रभावित कर सकता है.
पिछले दशक के ज़्यादातर समय में खाड़ी के सॉवरेन वेल्थ फंड (SWF) ने भारत के बुनियादी ढांचे की पूंजी में एक शांत लेकिन महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. अबूधाबी इन्वेस्टमेंट अथॉरिटी (ADIA) 2017 में नेशनल इन्वेस्टमेंट एंड इंफ्रास्ट्रक्चर फंड (NIIF) के मास्टर फंड में पहला अंतरराष्ट्रीय निवेशक बना. उसने भारतीय लॉजिस्टिक, ऊर्जा और परिवहन क्षेत्र के लिए 1 अरब डॉलर की पूंजी लगाने की प्रतिबद्धता जताई. इस संबंध ने इस सोच को मज़बूत किया कि खाड़ी की सॉवरेन पूंजी भारत के इंफ्रास्ट्रक्चर के निर्माण में टिकाऊ भागीदार साबित होगी. उस सोच को अब ताज़ा करने की ज़रूरत है, हालांकि बदलाव एक अधिक जटिल कहानी बताती है.
पहली नज़र में खाड़ी देशों की पूंजी का पुनर्गठन घरेलू ज़रूरतों के प्रति एक तार्किक प्रतिक्रिया है. सऊदी अरब के पब्लिक इन्वेस्टमेंट फंड (PIF) ने 2021 और 2025 के बीच नई घरेलू परियोजनाओं में 199 अरब डॉलर से ज़्यादा का निवेश किया. ये रकम उस अवधि में देश के कुल गैर-तेल GDP का लगभग 10 प्रतिशत है. पिछले दिनों मंज़ूर उसकी 2026-2030 की रणनीति इसी दिशा में है. इसमें प्रतिस्पर्धी घरेलू इकोसिस्टम को विकसित करने और रणनीतिक राष्ट्रीय संपत्ति की क्षमता को उजागर करने पर ज़ोर दिया गया है. खाड़ी के SWF ने सामूहिक रूप से 2025 में 126 अरब डॉलर का निवेश किया जो पूरी दुनिया में सॉवरेन इन्वेस्टमेंट के खर्च का 43 प्रतिशत है. दुनिया में उनकी मौजूदगी का विस्तार जारी है. लेकिन निकट भविष्य में उनके आवंटन का केंद्र बदल सकता है और भारत को उसी हिसाब से योजना बनानी चाहिए.
अबूधाबी इन्वेस्टमेंट अथॉरिटी (ADIA) 2017 में नेशनल इन्वेस्टमेंट एंड इंफ्रास्ट्रक्चर फंड (NIIF) के मास्टर फंड में पहला अंतरराष्ट्रीय निवेशक बना. उसने भारतीय लॉजिस्टिक, ऊर्जा और परिवहन क्षेत्र के लिए 1 अरब डॉलर की पूंजी लगाने की प्रतिबद्धता जताई. इस संबंध ने इस सोच को मज़बूत किया कि खाड़ी की सॉवरेन पूंजी भारत के इंफ्रास्ट्रक्चर के निर्माण में टिकाऊ भागीदार साबित होगी.
तालिका 1: खाड़ी के बड़े SWF का एसेट्स अंडर मैनेजमेंट (AUM) और सालाना इस्तेमाल (2024)
| Fund | Country | AUM 2024 (USD bn) | Primary Mandate |
| Abu Dhabi Investment Authority (ADIA) | UAE | ~993 | Global diversified |
| Public Investment Fund (PIF) | Saudi Arabia | ~941 | Vision 2030 domestic |
| Kuwait Investment Authority (KIA) | Kuwait | ~800 | Intergenerational savings |
| Qatar Investment Authority (QIA) | Qatar | ~475 | Global/real assets |
| Mubadala Investment Company | UAE | ~330 | Strategic/tech |
| Abu Dhabi Developmental Holding Company (ADQ) | Abu Dhabi | ~250 | Domestic/regional |
स्रोत: Deloitte Middle East, Gulf Sovereign Wealth Funds Report, March 2025
इस बदलाव को और भी आवश्यक बना रहा है मौजूदा क्षेत्रीय संकट. 2025 में इज़रायल-ईरान के तनाव में बढ़ोतरी और 2026 में इसके व्यापक क्षेत्रीय युद्ध में बदलने के साथ खाड़ी देशों की अर्थव्यवस्था के सामने एक नई और गंभीर स्थिति खड़ी हो गई है. ब्रेंट क्रूड की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल के पार जाने और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ की नाकेबंदी के साथ खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) की सरकारें एक विरोधाभास का सामना कर रही हैं जहां कागजों पर तो तेल से राजस्व ज्यादा है लेकिन सुरक्षा लागत में बढ़ोतरी, सप्लाई चेन में रुकावट और वित्तीय दबाव SWF को विदेश में पैसा लगाने की तुलना में घरेलू स्थिरीकरण की तरफ धकेल रहे हैं. भारत के हिसाब से देखें तो अपनी आर्थिक स्थिरता को संभाल रहे खाड़ी देश निकट भविष्य में भारतीय बुनियादी ढांचे के लिए दो साल पहले की तुलना में बाहरी पूंजी का एक कम उपलब्ध स्रोत हैं.
भारत की जोखिम की प्रकृति संरचनात्मक है. भारत के नेशनल इंफ्रास्ट्रक्चर पाइपलाइन (NIP) के लिए 2020 और 2025 के बीच ऊर्जा, सड़क, शहरी बुनियादी ढांचे और रेलवे में 1.4 ट्रिलियन डॉलर के निवेश की आवश्यकता थी. ये आंशिक रूप से दीर्घकालिक वैश्विक संस्थागत पूंजी जुटाने पर आधारित था. फंडिंग में कमी GDP के 5 प्रतिशत से ज्यादा होने का अनुमान लगाया गया है और NIP में प्राइवेट सेक्टर की भागीदारी मार्च 2025 में 1 प्रतिशत से कम रही है.
भू-आर्थिक संदर्भ इस स्थिति को और भी जटिल बना देता है. चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) के बारे में व्यापक रूप से माना जा रहा था कि इसमें कमी आ रही है लेकिन वास्तव में इसने अपनी शुरुआत के बाद से अब तक का सबसे अच्छा प्रदर्शन किया है. BRI के तहत निर्माण के ठेके और निवेश 2025 में 213 अरब डॉलर तक पहुंच गए जो 2024 की तुलना में 81 प्रतिशत की बढ़ोतरी है. अफ्रीका, जहां खाड़ी देशों के SWF की भागीदारी अपेक्षाकृत कम है, में BRI के तहत निर्माण के ठेकों में 283 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई और ये 61.2 अरब डॉलर पर पहुंच गया.
रेखाचित्र 1: चीन की बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव- कुल वार्षिक भागीदारी, 2021-2025 (अरब डॉलर में)

स्रोत: Green Finance & Development Center & Griffith Asia Institute, Annual BRI Investment Reports (अलग-अलग साल)
चीन के सरकार द्वारा निर्देशित कर्ज़ के मॉडल को न तो जोखिम समायोजित मुनाफे की आवश्यकता होती है जो पश्चिमी देशों के संस्थागत निवेशकों को मजबूर करते हैं और न ही ये खाड़ी देशों की पूंजी पर पड़ने वाले घरेलू हिदायतों के दबावों के अधीन है. जिस इलाके से सॉवरेन पूंजी पीछे हटती है, वहां चीन के विकास वित्त की व्यवस्था संरचनात्मक रूप से उस जगह को भरने के लिए तैयार होती है. भारत विकास वित्त के मामले में चुपचाप नहीं है बल्कि वो पहले से ही भागीदार है जिसे अक्सर स्वीकार भी किया जाता है. एग्ज़िम बैंक के लाइन ऑफ क्रेडिट (LOC) प्रोग्राम के ज़रिए भारत ने अभी तक 32 अरब डॉलर का रियायती कर्ज़ मुहैया कराया है. अफ्रीका की बात करें तो भारत के LOC ने तंज़ानिया में रेलवे, इथियोपिया में बिजली के बुनियादी ढांचे, रवांडा में अस्पताल और पश्चिम अफ्रीका में जल प्रणाली के लिए फंड मुहैया कराया है.
अहम बात ये है कि खाड़ी संकट विकास वित्त के मामले में में भारत-खाड़ी संबंधों के द्वार बंद नहीं करता है. वास्तव में, ये संबंधों को अधिक स्थायी तरीकों से पुनर्गठित कर सकता है. जैसे-जैसे खाड़ी देश क्षेत्रीय अस्थिरता का सामना कर रहे हैं, वो आर्थिक विविधता, तीसरे देशों में निवेश और कनेक्टिविटी के ढांचे में अपनी दिलचस्पी भी दिखा रहे हैं जो उनकी रणनीतिक निर्भरता कम करती है.
ये सच है कि भारत के पास विकास वित्त के मामले में क्षमता की कमी है लेकिन जो क्षमता है उसे भारत की व्यापक रणनीतिक महत्वाकांक्षाओं के साथ पूरी तरह नहीं जोड़ा गया है. NIIF 4.9 अरब डॉलर की संपत्तियों का प्रबंधन करता है और उसने 4 अरब डॉलर की नई पूंजी जुटाने की योजना बनाई है. ये एक स्वागत योग्य कदम है लेकिन फिर भी मुख्य रूप से घरेलू उपयोग पर केंद्रित है. एग्ज़िम बैंक का LOC मॉडल द्विपक्षीय परियोजनाओं की फंडिंग के लिए प्रभावी है लेकिन ये अभी तक तीसरे देशों के बाज़ार में बड़े पैमाने पर चीन का मुकाबला नहीं कर सकता है.
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Dr. Soumya Bhowmick is a Fellow at the Centre for New Economic Diplomacy (CNED) at the Observer Research Foundation (ORF). He completed industry- endorsed Ph.D. ...
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