Author : Kumkum Mohata

Expert Speak Raisina Debates
Published on Mar 09, 2026 Updated 0 Hours ago

एआई की दौड़ में सिर्फ बड़े और महंगे मॉडल बनाना ही जरूरी नहीं है- भारत के लिए कम लागत और ज़रूरत के मुताबिक मितव्ययी एआई ज्यादा कारगर हो सकता है. जानें इस आर्टिकल में कि कैसे भारत सीमित संसाधनों के साथ भी एआई में बड़ा और उपयोगी मॉडल विकसित कर सकता है.

कम खर्च में बड़ा एआई: भारत का नया मॉडल

कृत्रिम बुद्धिमत्ता तेज़ी से विस्तार कर रही है, किंतु इसकी आधारभूत अर्थव्यवस्था अब भी अनिश्चित बनी हुई है. वैश्विक एआई बाज़ार के 2027 तक 17 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक होने का अनुमान है, और इसमें निवेश हर वर्ष तीव्र गति से बढ़ रहा है. फिर भी, एआई मॉडल जितने बेहतर हो रहे हैं, उतना आर्थिक फायदा नहीं दिख रहा है. महँगी अवसंरचना, अधिक बिजली खपत और निजी कंप्यूट संसाधनों पर निर्भरता के कारण एआई की क्षमता और उसके वास्तविक उपयोग के बीच अंतर बढ़ रहा है.

हाल ही में आयोजित इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट ने इन चिंताओं को रेखांकित किया और वास्तविक संसाधन सीमाओं के भीतर एआई प्रणालियों के निर्माण और तैनाती की आवश्यकता पर बल दिया. यह दिशा आर्थिक सर्वेक्षण में उल्लिखित उस दृष्टिकोण से मेल खाती है, जो लागत-सचेत और संदर्भ-उपयुक्त नवाचार की आवश्यकता को रेखांकित करता है. इस संदर्भ में, मितव्ययी एआई एक व्यावहारिक मार्ग प्रस्तुत करता है.

भारत में फ्रंटियर स्केल की सीमाएँ

दुनिया की तरह भारत में भी एआई क्षमता और संसाधनों में असमानता है, और लगभग 45% कंपनियां अभी इसके शुरुआती उपयोग चरण में हैं. छोटी कंपनियां और सूक्ष्म उद्यम उच्च अवसंरचना लागत और सीमित डिजिटल साक्षरता से जूझ रहे हैं. उपभोक्ता स्तर पर स्मार्टफोन के माध्यम से डिजिटल पहुँच तो बढ़ी है, किंतु उपयोग क्षमता असमान बनी हुई है. शहरों में जहाँ लोग पढ़ाई और काम के लिए जनरेटिव एआई का अधिक उपयोग कर रहे हैं, वहीं ग्रामीण और छोटे शहरों में कौशल, डिजिटल सुविधाओं और स्थानीय भाषा की कमी के कारण इसका उपयोग अभी सीमित है.

एआई मॉडल जितने बेहतर हो रहे हैं, उतना आर्थिक फायदा नहीं दिख रहा है. महँगी अवसंरचना, अधिक बिजली खपत और निजी कंप्यूट संसाधनों पर निर्भरता के कारण एआई की क्षमता और उसके वास्तविक उपयोग के बीच अंतर बढ़ रहा है.

आपूर्ति-पक्ष पर भारत को उच्च-प्रदर्शन कंप्यूटिंग क्षमताओं और विशेषीकृत हार्डवेयर तक पहुँच में सीमाओं का सामना करना पड़ता है. आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, कंपनियों को कंप्यूटिंग और उससे जुड़ी बुनियादी सुविधाओं पर भारी खर्च करना पड़ सकता है, लेकिन इससे मिलने वाला लाभ अभी अनिश्चित है. एआई प्रणालियाँ अत्यधिक ऊर्जा-गहन होती हैं, और डेटा सेंटर क्षमता के विस्तार के लिए विश्वसनीय बिजली, शीतलन प्रणालियाँ और भूमि की आवश्यकता होती है. साथ ही, डीप-टेक और फ्रंटियर एआई के लिए जोखिम पूँजी तक पहुँच वैश्विक मानकों की तुलना में सीमित है, जिससे घरेलू कंपनियों की बड़े पैमाने पर प्रतिस्पर्धा करने की क्षमता बाधित होती है.

वैश्विक फ्रंटियर पर, ओपनएआई जैसी कंपनियों ने चैटजीपीटी जैसी प्रणालियों के संचालन में अत्यधिक लागत वहन की है, इन निवेशों से कब और कितना फायदा होगा, यह अभी साफ नहीं है. दूसरी ओर, कुछ ऐसी कंपनियां भी हैं जो कम कंप्यूटिंग संसाधनों का इस्तेमाल करके कम लागत में लगभग वही प्रदर्शन हासिल कर रही हैं. उन्नत तकनीक प्रगति लाती है, पर भारत के लिए कम लागत, बहुभाषी और वास्तविक परिस्थितियों में काम करने वाली एआई प्रणालियाँ अधिक जरूरी हैं. 

मितव्ययी एआई का क्रियान्वयन  

भारत की एआई यात्रा को इस तरह समझा जा सकता है कि हमें सीमित संसाधनों-जैसे कंप्यूटिंग, पूँजी और बुनियादी ढांचे-के भीतर रहकर अधिक से अधिक उत्पादकता हासिल करनी है. मितव्ययी एआई इसी विचार पर आधारित है. इसका मतलब है कि किसी काम को करने के लिए जितने न्यूनतम संसाधनों की जरूरत हो, उतने ही संसाधनों का उपयोग किया जाए. साथ ही, 2016 से फ्रंटियर प्रशिक्षण लागत लगभग 2.4 गुना प्रतिवर्ष की दर से बढ़ी है. इससे संकेत मिलता है कि एक सीमा के बाद बहुत अधिक विस्तार करने पर लागत तेजी से बढ़ने लगती है और मिलने वाला अतिरिक्त लाभ कम हो जाता है, जिससे यह आर्थिक रूप से सही नहीं रहता.

मितव्ययी एआई इसी विचार पर आधारित है. इसका मतलब है कि किसी काम को करने के लिए जितने न्यूनतम संसाधनों की जरूरत हो, उतने ही संसाधनों का उपयोग किया जाए. साथ ही, 2016 से फ्रंटियर प्रशिक्षण लागत लगभग 2.4 गुना प्रतिवर्ष की दर से बढ़ी है.

इस संतुलन अवस्था में उत्पादकता लाभ लक्षित तैनाती से प्राप्त होते हैं. कृषि क्षेत्र में, एआई-सक्षम परामर्श और बाज़ार-संयोजन प्रणालियों ने फ्रंटियर-स्तरीय मॉडलों की आवश्यकता के बिना मूल्य खोज और लॉजिस्टिक्स दक्षता में सुधार किया है. स्वास्थ्य क्षेत्र में, प्रारंभिक कैंसर जाँच हेतु कम लागत वाली एआई निदान प्रणालियाँ दर्शाती हैं कि संकीर्ण और संदर्भ-उपयुक्त प्रणालियाँ संसाधन सीमाओं के भीतर मापनीय परिणाम दे सकती हैं. ये उदाहरण स्पष्ट करते हैं कि कम्प्यूटेशनल दक्षता किस प्रकार सेवा वितरण और आय स्थिरता में ठोस सुधार में परिवर्तित होती है.

चित्र 1: एआई के विस्तार में संतुलन – मितव्ययी एआई का सर्वोत्तम मॉडल

From Scale To Efficiency India S Frugal Ai Opportunity

Source: Author’s Illustration

दक्षता लाभ से आगे बढ़कर, मितव्ययी एआई नवाचार में व्यापक भागीदारी को सक्षम बनाता है. भारत की डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना, जो अंतःप्रचालनीय और खुले प्रोटोकॉल पर आधारित है, यह प्रदर्शित करती है कि मॉड्यूलर प्रणालियाँ बिना फ्रंटियर-स्तरीय पूंजी निवेश के समावेशी रूप से विस्तार कर सकती हैं. उभरते घरेलू खिलाड़ी जैसे सर्वम एआई इस परिवर्तन को और स्पष्ट करते हैं. पैमाने पर प्रतिस्पर्धा करने के बजाय, सर्वम ने भारतीय भाषाओं और वास्तविक उपयोग मामलों के अनुरूप मॉडल विकसित किए हैं, जिन्होंने दस्तावेज़ विश्लेषण और भाषण प्रसंस्करण जैसे चुनिंदा मानकों पर वैश्विक प्रणालियों से बेहतर प्रदर्शन किया है. भाषिनी और एआई4भारत जैसे खुले-भाषा पारिस्थितिकी तंत्र डेवलपर्स के लिए प्रवेश बाधाएँ कम करते हैं, साथ ही बड़े पैमाने के मॉडलों से जुड़ी ऊर्जा और कम्प्यूट तीव्रता को भी घटाते हैं.

मितव्ययी एआई के लिए नीतिगत आधार का निर्माण  

मितव्ययी नवाचार पहले से ही भारत की विकास-यात्रा का हिस्सा रहा है, जो संसाधन सीमाओं, बड़े और लागत-कुशल तकनीकी कार्यबल तथा जन-स्तर की डिजिटल प्रणालियाँ निर्मित करने की सिद्ध क्षमता से आकार ग्रहण करता है. अतः भारत का एआई लाभ मॉडल के आकार की प्रतिस्पर्धा में नहीं, बल्कि तैनाती के लोकतंत्रीकरण में निहित है. नीति को इस परिवर्तन को क्रमबद्ध रूप से आगे बढ़ाना चाहिए. इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026 ने इसी दिशा का संकेत दिया है, जिसमें एआई संसाधनों तक लोकतांत्रिक पहुँच और वास्तविक अनुप्रयोगों के विस्तार पर बल दिया गया.

प्रथम, एक महत्वपूर्ण प्रारंभिक कदम उभरता हुआ ‘कम्प्यूट कॉमन्स’ है. साझा GPU (कंप्यूटिंग संसाधन) की सुविधा मिलने से नई कंपनियों और संस्थाओं के लिए एआई में काम करना आसान हो सकता है. अगर इसमें पारदर्शिता नहीं होगी, तो सस्ती या सब्सिडी वाली कंप्यूटिंग सुविधा केवल बड़ी और पैसे वाली निजी कंपनियों तक ही सीमित रह सकती है. दूसरा, भारत को अलग-अलग क्षेत्रों के लिए साझा डेटा सिस्टम को बढ़ाना चाहिए, जैसा कि शिखर सम्मेलन में प्रदर्शित बोध स्वास्थ्य मंच के मॉडल से संकेत मिलता है. ऐसी व्यवस्थाओं को कृषि, परिवहन और शिक्षा जैसे क्षेत्रों तक भी बढ़ाया जाना चाहिए.

भारत सिर्फ तकनीक की नकल करने के बजाय कम लागत में बड़े स्तर पर काम करने वाली एआई प्रणालियाँ बनाकर आगे बढ़ सकता है. भारत कम लागत और बड़े स्तर पर काम करने वाली एआई प्रणालियाँ बनाकर नेतृत्व कर सकता है.

तीसरा, फंडिंग को इस तरह दिया जाना चाहिए कि नई तकनीकों को सिर्फ परीक्षण तक सीमित न रखा जाए, बल्कि उन्हें बड़े स्तर पर लागू करने के लिए प्रोत्साहन मिले.. चतुर्थ, भारत के उद्यमी पारिस्थितिकी तंत्र को मितव्ययी एआई नवाचार का प्रमुख चालक बनाया जाना चाहिए. यहाँ कम लागत में बड़े स्तर पर काम करने वाले डिजिटल समाधान बनाने का अच्छा अनुभव भी है. इसलिए भारतीय कंपनियाँ एआई तकनीक को अलग-अलग परिस्थितियों और जरूरतों के अनुसार उपयोगी अनुप्रयोगों में बदलने की अच्छी क्षमता रखती हैं. अंत में, भारत को ऐसा व्यावहारिक तरीका अपनाने की जरूरत है जिससे एआई की सफलता को मापा जा सके. 

वैश्विक दक्षिण के लिए एआई

इन नीतिगत आधारों पर आगे बढ़ते हुए, भारत मितव्ययी एआई को वैश्विक दक्षिण के लिए एक निर्यात रणनीति के रूप में स्थापित कर सकता है, इसका मतलब है कि भारत सिर्फ तकनीक की नकल करने के बजाय कम लागत में बड़े स्तर पर काम करने वाली एआई प्रणालियाँ बनाकर आगे बढ़ सकता है. भारत कम लागत और बड़े स्तर पर काम करने वाली एआई प्रणालियाँ बनाकर नेतृत्व कर सकता है. मितव्ययी एआई ऐसा मॉडल बन सकता है जिसे वैश्विक दक्षिण के देश अपनाकर सस्ते और प्रभावी एआई समाधान विकसित कर सकें.


कुमकुम मोहता ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के सेंटर फॉर न्यू इकोनॉमिक डिप्लोमेसी में रिसर्च असिस्टेंट हैं.

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