जापान ने रिकॉर्ड रक्षा बजट को मंजूरी देकर साफ़ कर दिया है कि हिंद-प्रशांत की बदलती सुरक्षा तस्वीर को वह अब पहले की तरह नहीं देख रहा. जानें, कैसे चीन, उत्तर कोरिया और अमेरिका की रणनीतियों के बीच टोक्यो अब क्षेत्रीय सुरक्षा में कहीं अधिक सक्रिय भूमिका की ओर बढ़ रहा है.
जापान ने वित्त वर्ष 2026 के लिए क़रीब 8.9 ट्रिलियन जापानी येन (लगभग 58 अरब डॉलर) के रिकॉर्ड रक्षा बजट को मंजूरी दी है. उसने लगातार 12वां साल अपना रक्षा ख़र्च बढ़ाया है. यह हिंद-प्रशांत क्षेत्र को लेकर उसकी रणनीतिक चिंताओं को उजागर करता है. हालांकि, पहले 8.8 ट्रिलियन येन ही मंजूर किया गया था लेकिन बाद में उसमें संशोधन किया गया और 26 दिसंबर को मंत्रिमंडल ने नए बजट को मंजूरी दे दी. इसमें पिछले वर्ष की तुलना में 3.8 प्रतिशत ज़्यादा ख़र्च का प्रावधान है और यह टोक्यो की पांच वर्षीय 43 ट्रिलियन येन (क़रीब 275 अरब डॉलर) की रक्षा-निर्माण योजना को गति दे रहा है जिसमें सैन्य ख़र्च को पूर्वनिर्धारित 2027 से पहले GDP का 2 प्रतिशत तक करने का लक्ष्य रखा गया है.
नए बजट की प्रमुख विशेषता है, प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने और आधुनिकीकरण पर ज़ोर. इसमें बहुस्तरीय तटीय रक्षा नेटवर्क (shield प्रणाली) जैसी नई क्षमताओं को तैनात करने के लिए बड़ी धनराशि आवंटित की जा रही है, साथ ही अमेरिका निर्मित MQ-9B सी गार्जियन जैसे लंबी दूर तक मार कर सकने वाले निगरानी ड्रोनों के परीक्षण पर भी ख़र्च किए जा रहे हैं. लंबी मारक क्षमता वाली विकसित टाइप-12 सतह से जहाज़ पर मार करने वाली मिसाइलों की ख़रीद संकेत है कि जापान अब मिसाइल क्षमताओं में निवेश कर रहा है. इन सबसे पता चलता है कि टोक्यो अपनी पुरानी रक्षात्मक नीति से अलग हटकर एक नई रणनीति अपना रहा है.
जापान की राष्ट्रीय सुरक्षा नीति, जिसे दिसंबर 2022 में मंत्रिमंडल ने स्वीकार किया था, क्षेत्रीय सुरक्षा के लिहाज़ से स्थिति को पहले से ही दूसरे विश्व युद्ध के बाद से सबसे गंभीर बता रही है और चीन व उत्तर कोरिया को जापान के लिए एक बड़ा ख़तरा मानती है. इस नीति ने जापान को प्रोत्साहित किया है कि वह अपनी प्रतिरोधक ताक़त को मज़बूत बनाने, व्यापक रक्षा क्षमता हासिल करने और गठबंधन के तहत अमेरिका के साथ मज़बूत जुड़ाव के लिए अत्याधुनिक क्षमताओं का अपनाए.
नए बजट की प्रमुख विशेषता है, प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने और आधुनिकीकरण पर ज़ोर. उसने लगातार 12वां साल अपना रक्षा ख़र्च बढ़ाया है. यह हिंद-प्रशांत क्षेत्र को लेकर उसकी रणनीतिक चिंताओं को उजागर करता है.
प्रधानमंत्री सनाए ताकाइची इन योजनाओं को तेज़ी से आगे बढ़ाना चाहती हैं जिन्होंने अक्टूबर 2025 में अपना पदभार संभाला है. उन्होंने सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के 2 प्रतिशत तक रक्षा ख़र्च करने का लक्ष्य घटाकर मार्च 2026 कर दिया और उभरते ख़तरों से निपटने के लिए जापान की राष्ट्रीय सुरक्षा नीति व इससे जुड़े अन्य सामरिक दस्तावेज़ों की समीक्षा शुरू कर दी है. समीक्षा का यह काम जो 2026 के अंत तक पूरा हो सकता है, बताता है कि चीन की बढ़ती सैन्य गतिविधियों, उत्तर कोरिया से मिल रही मिसाइल धमकियों और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में व्यापक रणनीतिक बदलावों के साथ-साथ क्षेत्रीय भू-राजनीतिक वास्तविकताओं के अनुसार टोक्यो अपनी रक्षा नीति बनाना चाहता है.
रक्षा ख़र्च में बढ़ोतरी भू-राजनीतिक दबावों, विशेष रूप से वाशिंगटन के दबावों के अनुरूप है जो सहयोगी देशों को अपने ख़र्च बढ़ाने पर ज़ोर दे रहा है. हाल ही में जारी अमेरिकी राष्ट्रीय रणनीति, 2025 में ट्रंप प्रशासन की प्राथमिकताओं के अनुसार, अधिक लेन-देन वाली नीति और अपने मानदंडों के आधार पर सावधानीपूर्वक उसे अपनाने (चयनात्मक) पर ज़ोर दिया गया है. इस लिहाज़ से देखें, तो रक्षा बजट में वृद्धि न सिर्फ टोक्यो की अपनी प्रतिरोधक क्षमता मज़बूत बनाने की प्रतिबद्धता का संकेत है बल्कि क्षेत्रीय सुरक्षा में अधिक सक्रियता से अमेरिकी साझेदार बनने की उसकी मंशा भी उजागर करती है. जापान को इस बात का भी डर है कि ट्रंप चीन के साथ कोई ऐसा समझौता कर सकते हैं जिससे क्षेत्र में विभाजन पैदा हो जाए. ताइवान संकट में जापानी सैन्य हस्तक्षेप की संभावना पर प्रधानमंत्री ताकाइची द्वारा संसद में कही गई बातों से बीजिंग-टोक्यो रिश्तों में पैदा हुए तनाव ने इस चिंता को और बढ़ा दिया है.
उधर, पड़ोसी देश चीन और दक्षिण कोरिया भी लगातार अपने रक्षा ख़र्च बढ़ा रहे हैं. चीन का रक्षा बजट दुनिया में दूसरा सबसे बड़ा है. साल 2025 में उसका अनुमानित सैन्य ख़र्च 1.78 ट्रिलियन युआन (क़रीब 246 अरब डॉलर) तक पहुंच गया, जो बीते वर्ष की तुलना में 7.2 प्रतिशत अधिक है. बीजिंग का रक्षा ख़र्च भले ही इकाई अंकों में बढ़ रहा है लेकिन पड़ोसी देशों की तुलना में वह भी काफ़ी ज़्यादा है. वह अपनी नौसैन्य ताक़त, मिसाइल क्षमताओं और हवाई क्षमताओं जैसे क्षेत्रों में अपनी सेना PLA को आधुनिक बनाने में यह ख़र्च कर रहा है. दक्षिण कोरिया ने भी 2026 में बड़ा रक्षा बजट बनाया है. वहां की सरकार ने लगभग 66.3 ट्रिलियन कोरियाई वॉन (क़रीब 47 अरब डॉलर) मंजूर किए हैं जो पिछले वर्ष की तुलना में 8.2 प्रतिशत अधिक है. वह पारंपरिक रक्षा प्रणालियों को मज़बूत बनाने के साथ-साथ एआई और उन्नत टोही विमानों सहित भविष्य की क्षमताओं पर ख़र्च कर रहा है.
विश्व में सबसे अधिक सरकारी कर्ज जापान पर है और वहां की आबादी भी तेज़ी से बूढ़ी होती जा रही है इसलिए उसकी रणनीतिक प्राथमिकताओं और आर्थिक स्थिरता पर बहस स्वाभाविक है. रक्षा ख़र्च के लिए जरूरी पैसे जुटाने के लिए आयकर बढ़ाने की योजना से यह मुद्दा और चर्चा में आ गया है.
बेशक, तीनों देशों ने अपने-अपने रक्षा ख़र्च बढ़ाए हैं लेकिन बीजिंग का बजट टोक्यो और सियोल की तुलना में बहुत अधिक है. जापान जहां जवाबी प्रतिक्रिया वाली क्षमता मज़बूत बनाने पर ज़ोर दे रहा है, वहीं चीन का ख़र्च उसकी क्षेत्रीय रणनीतिक महत्वाकांक्षाओं के अनुरूप है और दक्षिण कोरिया तो उत्तर कोरिया से मिलने वाले ख़तरों व आत्मनिर्भर बनने के हिसाब से ख़र्च बढ़ा रहा है.
जापान में बजट बढ़ाने के ख़िलाफ़ घरेलू स्तर पर नाराज़गी भी है. विश्व में सबसे अधिक सरकारी कर्ज जापान पर है और वहां की आबादी भी तेज़ी से बूढ़ी होती जा रही है इसलिए उसकी रणनीतिक प्राथमिकताओं और आर्थिक स्थिरता पर बहस स्वाभाविक है. रक्षा ख़र्च के लिए जरूरी पैसे जुटाने के लिए आयकर बढ़ाने की योजना से यह मुद्दा और चर्चा में आ गया है. सत्तारूढ़ लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी और जापान इनोवेशन पार्टी के बीच भी आयकर बढ़ाने के समय को लेकर विवाद बना हुआ है. हालांकि, चर्चा इस पर भी हो रही है कि जापान की सुरक्षा नीति भविष्य में क्या आकार लेगी जिसमें संवैधानिक सीमाओं और तीन परमाणु-विरोधी जैसे पारंपरिक सिद्धांतों में संभावित संशोधन के सवाल भी शामिल हैं.
साफ़ है, हिंद-प्रशांत सुरक्षा ढांचे में जापान की अधिक सक्रिय व स्वायत्त भूमिका को देखते हुए टोक्यो ने प्रतिरोधक क्षमताओं को मज़बूत करने वाला रक्षा बजट बनाया है. यह बजट न केवल अंकों के मामले में काफ़ी बड़ा है बल्कि रणनीतिक पुनर्संतुलन का भी संकेत दे रहा है.
प्रत्नाश्री बसु ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में एसोसिएट फेलो हैं.
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Pratnashree Basu is an Associate Fellow with the Strategic Studies Programme. She covers the Indo-Pacific region, with a focus on Japan’s role in the region. ...
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