खाने के तेल का बार-बार इस्तेमाल किया जाना भारत में एक बड़ी समस्या बन गया है. ये समस्या खाद्य सुरक्षा, सार्वजनिक स्वास्थ्य और जैव ईंधन नीति से भी जुड़ी है. इससे निपटने के लिए तकनीकी नवाचारों और सार्वजनिक जागरूकता ज़रूरी है.
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ये लेख ‘खेतों से खाने की प्लेट तक, सुरक्षित भोजन कैसे पायें’ सीरीज़ का हिस्सा है.
एक बार खाना बनाने में इस्तेमाल हो चुके तेल (यूसीओ) का बार-बार उपयोग होना भारतीय खाद्य सुरक्षा और पर्यावरण कानूनों के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है. हालांकि ये वैज्ञानिक रूप से स्थापित हो चुका है कि एक बार इस्तेमाल हो चुके खाने के तेल का बार-बार उपयोग करना ख़तरनाक है. इसके दुरूपयोग से ना सिर्फ सेहत संबंधी ज़ोखिम पैदा होते हैं बल्कि अगर इसका सही तरीके से निपटान ना किया जाए तो ये पर्यावरण को भी नुकसान पहुंचाते हैं. चूंकि इस बार खाद्य सुरक्षा दिवस 2025 की थीम ही “फूड सेफ्टी: साइंस इन एक्शन” है, ऐसे में ये ज़रूरी है कि भारत सरकार इस समस्या पर ध्यान दे. स्पष्ट वैज्ञानिक प्रमाण और नियामक ढांचे की उपलब्धता के बावज़ूद खाने के तेल का बार-बार इस्तेमाल होना सार्वजनिक स्वास्थ्य को कमज़ोर कर रहा है. इस समस्या से होने वाले मानवीय नुकसान को देखते हुए इस निगरानी क्षमता को हर स्तर पर बढ़ाने की तात्कालिक ज़रूरत महसूस की जा रही है, जैसे कि फार्मास्यूटिकल्स के मामले में.
स्पष्ट वैज्ञानिक प्रमाण और नियामक ढांचे की उपलब्धता के बावज़ूद खाने के तेल का बार-बार इस्तेमाल होना सार्वजनिक स्वास्थ्य को कमज़ोर कर रहा है. इस समस्या से होने वाले मानवीय नुकसान को देखते हुए इस निगरानी क्षमता को हर स्तर पर बढ़ाने की तात्कालिक ज़रूरत महसूस की जा रही है
ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन द्वारा 2022 में किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि भारतीय शहरों में उत्पन्न होने वाला 60 प्रतिशत यूसीओ खाद्य श्रृंखला में वापस चला जाता है. ऐसा दो तरीके से होता है. पहला, वाणिज्यिक प्रतिष्ठानों में इसे फिर से इस्तेमाल किया जाता है. दूसरा, अनौपचारिक या अनधिकृत व्यापारी इस इस्तेमाल हो चुके तेल को बेच देते हैं. इस तेल से कैंसर, हृदय रोगों और यहां तक कि न्यूरोडीजेनेरेटिव स्थितियों सहित विभिन्न गैर-संक्रामक बीमारियों के होने के स्पष्ट सबूत मौजूद हैं. इसके बावजूद नियम, उन्हें लागू करने की इच्छाशक्ति और सार्वजनिक जागरूकता में बड़ी खाई बनी हुई है.
भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) ने 2018 में इसके लिए गाइडलाइंस बनाई थी. इन नियमों के मुताबिक उपयोग किए गए जिस खाना पकाने के तेल में टोटल पोलर कंपाउंड (टीपीसी) 25 प्रतिशत से ज़्यादा था, उसके टॉप-अप पर प्रतिबंध लगा दिया. जनवरी 2022 में, एफएसएसएआई ने परीक्षण प्रोटोकॉल और प्रवर्तन से संबंधित समस्याओं का हवाला देते हुए एक नए आदेश के माध्यम से इस प्रावधान को हटा दिया. हालांकि, विभिन्न हितधारकों के भारी विरोध के बाद अगस्त 2024 में ये विवादास्पद आदेश वापस ले लिया गया.
2018 में, एफएसएसएआई ने इस्तेमाल किए गए तेल (यूसीओ) की बढ़ती समस्या के समाधान के लिए विस्तृत दिशानिर्देश जारी किए. इस पहल का नाम था रिपर्पज्ड यूज्ड कुकिंग ऑयल (आरयूसीओ). इस पहल के तहत एक बार इस्तेमाल हो चुके तेल में अगर टीपीसी की मात्रा 25 प्रतिशत से ज़्यादा पाई जाती है तो उसका निपटान किया जाना अनिवार्य है.
भारतीय शहरों में समय-समय पर खाद्य सामान और सामग्री का नियमित रूप से क्वालिटी टेस्ट किया जाता है. इसमें खाना पकाने का तेल भी शामिल है. खाद्य सामग्री के परीक्षण के लिए जो नमूने लिए जाते हैं, उनमें से ज़्यादातर नमूने सुरक्षा और गुणवत्ता परीक्षणों में सफल नहीं होते हैं. हाल ही में एक ऐसा मामला सामने आया, जहां "शुद्ध तेल" के लेबल लगाए एक नमूने में पाम ऑयल का स्तर स्वीकृत सीमा से ज़्यादा पाया गया. ये निष्कर्ष उन पैटर्नों की तरह ही हैं, जो ओआरएफ के लंबे समय तक किए अपने कामों से पहचाने गए हैं. आर्थिक दबाव और कमज़ोर निगरानी की वजह से कई फूड बिजनेस ऑपरेटर (एफबीओ) खराब तेल को ताज़ा स्टॉक में रखते हैं. हालांकि, ये अवैध है, लेकिन इससे उन्हें फायदा होता है. फूड बिजनेस ऑपरेटर ऐसे संगठनों या व्यक्तियों को कहा जाता है, जो खाद्य सामग्री बनाने और उसे ग्राहकों तक पहुंचाते हैं, उसकी बिक्री करते हैं.
2018 में, एफएसएसएआई ने इस्तेमाल किए गए तेल (यूसीओ) की बढ़ती समस्या के समाधान के लिए विस्तृत दिशानिर्देश जारी किए. इस पहल का नाम था रिपर्पज्ड यूज्ड कुकिंग ऑयल (आरयूसीओ). इस पहल के तहत एक बार इस्तेमाल हो चुके तेल में अगर टीपीसी की मात्रा 25 प्रतिशत से ज़्यादा पाई जाती है तो उसका निपटान किया जाना अनिवार्य है. टीपीसी को लेकर ये व्यापक रूप से स्वीकृत वैश्विक सीमा है. हालांकि, एफएसएसएआई के दिशानिर्देश सिर्फ उन खाद्य व्यापारियों (एफबीओ) पर लागू होते हैं जो रोज़ाना 50 लीटर से ज्यादा तेल इस्तेमाल करते हैं. इसकी एक कमी ये है कि भारत में खाद्य श्रृंखला का बड़ा हिस्सा असंगठित क्षेत्र में आता है. ऐसे में ये नियम छोटे होटलों और सड़क पर ठेले लगाकार खाद्य सामग्री बेचने वालों पर लागू नहीं होते, जबकि यही वो वर्ग है जो हर दिन लाखों नागरिकों को सेवा प्रदान करते हैं और इनकी दुकानों पर “आखिरी बूंद” तक तेल को फिर से उपयोग करने की संभावना अधिक होती है. एफएसएसएआई का “ईट राइट इंडिया” आंदोलन आरयूसीओ पहल का ही हिस्सा है और लोगों के बीच जागरूकता बढ़ाने की कोशिश कर रहा है. (चित्र 1) 2018 से 2024 के बीच एफएसएसएआई के यूसीओ दिशानिर्देशों में नियामक परिवर्तनों की समय सीमा को संक्षेप में पेश करता है. ये टीपीसी सीमाओं पर नीति में प्रमुख बदलावों को भी उजागर करता है.
चित्र 1: 2018 से UCO विनियमनों पर FSSAI नीति में परिवर्तन
उत्पादकों ने बार-बार चेतावनी दी है कि इस्तेमाल किए गए खाद्य तेल की कमी की वजह से बायोडीज़ल प्लांट बंद हो रहे हैं. भारत जैसे देश में, जहां इस्तेमाल किए गए तेल की भरमार है, ऐसी स्थिति पैदा होना विडंबना ही कहा जाएगा.
इस्तेमाल किए जा चुके तेल से जुड़े नियमों का पालन नहीं करने पर केरल जैसे राज्यों द्वारा दोषी एफबीओ पर एक लाख रुपये तक का जुर्माना लगाया गया है. इस तरह की सरकारी कार्रवाई से वहां कुछ सुधार देखा गया है. हालांकि, नियमित निगरानी एक चुनौती बनी हुई है. अधिकांश भारतीय शहरों में आरयूसीओ, कार्यान्वयन संबंधी बाधाओं का सामना कर रहा है. इसमें कम मामलों की सूचना, यूसीओ संग्रह के लिए ज़रूरी ढांचे की कमी और उचित निपटान के लिए अपर्याप्त आर्थिक प्रोत्साहन जैसी चुनौतियां शामिल हैं. हालांकि, चेन्नई जैसे शहरों ने नगरपालिका समन्वय और जागरूकता निर्माण के क्षेत्र में बेहतर प्रदर्शन किया है, जिससे इस नियम का प्रभावी कार्यान्वयन संभव हुआ है.
अब तक जैसा चला आ रहा है, उसमें सुधार के लिए विज्ञान के क्षेत्र में हो रही प्रगति महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है. हाल के वर्षों में, शोधकर्ताओं ने तेल में मिलावट का पता लगाने के लिए उन्नत तरीकों का विकास किया. 2024 में नेचर नाम की विज्ञान पत्रिका में प्रकाशित एक समीक्षा ने आशाजनक नवाचारों को उजागर किया, जिसमें पोर्टेबल ‘इलेक्ट्रिक नोज़’ और ‘इलेक्ट्रिक टंग’ भी शामिल हैं. ये उपकरण दोबारा इस्तेमाल किए जा रहे तेल या फिर मिलावटी तेलों की पहचान करने में काफ़ी सक्षम हैं. अगर इन उपकरणों का व्यापक रूप से इस्तेमाल किया जाए तो ये उपभोक्ता सुरक्षा के पक्ष में संतुलन को नाटकीय रूप से बदल सकते हैं. भारत में, केंद्रीय खाद्य प्रौद्योगिकी अनुसंधान संस्थान (सीएफटीआरआई) ने साल 2022 में अपने प्रयोगशाला में उन्नत ई-नोज़ और ई-टंग तकनीकों को शामिल किया. जबकि वर्तमान में ये तकनीकें ऐसे रिसर्च सेटिंग्स में केंद्रित हैं. इन उपकरणों का भारत भर में विस्तार तीन कारकों पर निर्भर है. i) स्थानीय उत्पादन के माध्यम से लागत को कम करना, ii) राज्य खाद्य सुरक्षा प्रयोगशालाओं के साथ एकीकरण, और iii) मोबाइल परीक्षण टीमों के माध्यम से तैनाती. पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) भी यहां एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है. वो स्टार्टअप्स नियामक निकायों के साथ सहयोग कर सकती हैं ताकि इस प्रकार के उपकरणों को विकसित किया जा सके जो इस क्षेत्र के लिए उपयोगी हों. सरकारी समर्थन के माध्यम से, जैसे नवाचार अनुदान या एफएसएसएआई के ईट राइट इंडिया अभियान के जरिए, ये उपकरण प्रयोगशाला से सड़क पर लाए जा सकते हैं, जहां उनकी वास्तव में ज़रूरत है. इससे शहरी और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में प्रवर्तन टीमों को वास्तविक समय में सस्ते परीक्षण की सुविधा मिल सकेगी.
इस समस्या के समाधान के लिए तकनीकी प्रगति का लाभ उठाने के साथ-साथ कुछ और कदम उठाए जाने ज़रूरी हैं. एफएसएसएआई द्वारा प्रोत्साहित की गई यूको प्रबंधन के लिए सर्कुलर इकोनॉमी के दृष्टिकोण को खाद्य और संबंधित क्षेत्रों में लागू करने पर ज़ोर दिया जाना चाहिए. भारत हर साल करीब 3 मिलियन टन इस्तेमाल किया गया तेल उत्पन्न करता है. इससे राष्ट्रीय जैव ईंधन नीति के तहत बायोडीज़ल मिश्रण लक्ष्यों को पूरा करने का एक महत्वपूर्ण अवसर मिलता है. इसके बावजूद ये तेल बायोडीज़ल के ईंधन मिश्रण में एक छोटा सा हिस्सा है. इसकी मुख्य वजह ये है कि आपूर्ति श्रृंखला के विकास में कमी है. इसकी तुलना में अनधिकृत, अनौपचारिक खरीदारों की प्रतिस्पर्धा के कारण ये तेल एफबीओ के पास पहुंच जाता है, जो इसकी सही कीमत देते हैं.
समय आ गया है कि हम इस्तेमाल किए जा चुके तेल का फिर से उपयोग करने के दुष्परिणामों पर चर्चा करें. स्पष्ट शब्दों और उदाहरणों के साथ ये बताएं कि दोबारा इस्तेमाल किए जाने वाला तेल सेहत को कितना नुकसान पहुंचाता है.
इस चुनौती के दुष्परिणाम सार्वजनिक स्वास्थ्य से आगे भी दिखते हैं. इस्तेमाल किए गए तेल का सही तरीके से निपटान नहीं किया जाता. इसे अक्सर नालियों में डाल दिया जाता है. इससे सीवर लाइन में रुकावटें पैदा होती हैं और ये जल निकायों को भी प्रदूषित करता है. इस बीच, बायोडीज़ल उद्योग कच्चे माल की कमी से जूझ रहा है. बायोडीज़ल भारत की जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता को कम करने और ग्रीन इंप्लोयमेंट पैदा करने में मदद कर सकता है. उत्पादकों ने बार-बार चेतावनी दी है कि इस्तेमाल किए गए खाद्य तेल की कमी की वजह से बायोडीज़ल प्लांट बंद हो रहे हैं. भारत जैसे देश में, जहां इस्तेमाल किए गए तेल की भरमार है, ऐसी स्थिति पैदा होना विडंबना ही कहा जाएगा.
इस बहुआयामी चुनौती का समाधान करने के लिए तीन तरह के कदम उठाए जाने ज़रूरी हैं. पहला, इस्तेमाल किए जा चुके तेल को लेकर बनाए गए नियम सभी एफबीओ पर लागू किए जाने चाहिए. इस बात का अध्ययन किया जाना चाहिए कि छोटे रेस्टोरेंट्स के लिए अनुपालन निपटान को प्रोत्साहित करना कितना व्यावहारिक है. इसे लेकर पायलट प्रोग्राम शुरू किए जाने चाहिए, जिसमें प्रमाणित यूसीओ एग्रीगेटर्स के साथ सब्सिडीयुक्त संग्रह या माइक्रो-क्रेडिट लिंकिंग को जांचा जा सके. दूसरा, प्रवर्तन और नियामक प्राधिकरणों को मज़बूत करना चाहिए. इनका विकेंद्रीकरण किया जाना चाहिए और उन्हें अत्याधुनिक तकनीकी उपकरण मुहैया कराने चाहिए. राज्यों और नगरपालिकाओं को मॉडर्न टेस्ट किट और रीयल टाइम में निगरानी करने में सक्षम प्लेटफार्मों से लैस किया जाना चाहिए, जिससे यूको की खरीद-बिक्री पर नज़र रखी जा सके. एफएसएसएआई का पास इसे लागू करने वाला इकोसिस्टम मौजूद है लेकिन उसका कम इस्तेमाल हो रहा है. उसके पास इस्तेमाल किए गए तेल के संग्रहकर्ताओं और बायोडीज़ल उत्पादकों से जुड़ी सारी जानकारी उपलब्ध है.
तीसरा, और सबसे महत्वपूर्ण कदम ये है कि इसे लेकर सार्वजनिक जागरूकता को राष्ट्रीय प्रयास बनाने की कोशिश करनी चाहिए. भारत में खाद्य सुरक्षा अभियानों ने पारंपरिक रूप से कीटनाशक के इस्तेमाल और दूध में मिलावट पर ध्यान केंद्रित किया है. अब समय आ गया है कि हम इस्तेमाल किए जा चुके तेल का फिर से उपयोग करने के दुष्परिणामों पर चर्चा करें. स्पष्ट शब्दों और उदाहरणों के साथ ये बताएं कि दोबारा इस्तेमाल किए जाने वाला तेल सेहत को कितना नुकसान पहुंचाता है. उपभोक्ता और रेस्टोरेंट इसे रोकने के लिए क्या कर सकते हैं. सबूत और कार्रवाई के बीच के अंतर को पाटने के लिए मौजूदा 'ईट राइट इंडिया' अभियान के मंच का इस्तेमाल किया जा सकता है.
खाद्य सुरक्षा दिवस की इस साल की थीम—“साइंस इन एक्शन”—मौजूदा अनुसंधान को मान्यता देती है, लेकिन इसे लेकर अब तक हासिल ज्ञान को योग्य और सब पर समान रूप से लागू करने की भी ज़रूरत है. खाना पकाने के तेल की यात्रा—खेत से कड़ाही और फिर ईंधन टैंक तक—को ज़्यादा सुरक्षित, स्वच्छ और सर्कुलर बनाना चाहिए. इसके लिए, भारत को नियमों, नवाचार और सामूहिक जिम्मेदारी के बीच एक मज़बूत तालमेल बनाना चाहिए.
ओम्मेन सी कुरियन ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन की स्वास्थ्य पहल के मुखिया और सीनियर फेलो हैं.
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Oommen C. Kurian is Senior Fellow and Head of the Health Initiative at the Inclusive Growth and SDGs Programme, Observer Research Foundation. Trained in economics and ...
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