शासन अब पुराने ढांचों पर निर्भर नहीं रह सकता. अफ्रीका को अपनी दिशा खुद तय करनी होगी और वह ऐसा करेगा.
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ये लेख निबंध श्रृंखला सागरमंथन संवाद 2025 का भाग है.
अफ़्रीका के महासागर केवल व्यापारिक गलियारे नहीं हैं. उनमें स्मृति, विरासत और दायित्व का भंडार छिपा हुआ है. इसलिए, अफ़्रीकी तटीय देशों का प्रतिनिधित्व काफी अहम है, क्योंकि उन्हें आमतौर पर उन नीतिगत निर्णयों से बाहर रखा जाता है, जो उनके भविष्य को गढ़ने में सक्षम हैं. इसके अलावा, समुद्री तट हमें मानचित्रों से भी पुरानी कहानियां बताते हैं और मछुआरा समुदाय एक ऐसी ज्ञान प्रणाली का प्रतीक है, जिसकी न तो सैटेलाइट और न ही स्प्रेडशीट नकल कर सकते हैं. फिर भी, वैश्विक समुद्री शासन व्यवस्था में इस ज्ञान और समुद्रों के साथ इस गहरे जुड़ाव, दोनों को नज़रंदाज़ किया जाता है और समग्र आंकड़ों में गलती की जाती है.
पारिस्थितिक तंत्र का बुद्धिमानी से इस्तेमाल करने की इसी सोच से पैदा हुआ है ‘केक चेन मैपिंग’. यह संरक्षण का एक ऐसा प्रयास है, जिसे सांस्कृतिक प्रवाह, पारिस्थितिक चक्रों और संस्थागत निरंतरता के नज़रिये से ‘ट्रेड लॉजिस्टिक’ (व्यापार की योजना, निष्पादन और प्रबंधन से जुड़ी आपूर्ति श्रृंखला) की फिर से कल्पना करने के लिए विकसित किया गया है. उत्पादों को अलग-अलग बांटकर उन पर निगरानी रखने के बजाय, यह बंदरगाहों, सहकारी समितियों, नियामकों व पारिस्थितिकी तंत्रों में ज़िम्मेदारियों का तंत्र बनाता है, और यह तय करता है कि आपूर्ति श्रृंखला का प्रत्येक स्तर नैतिक हो और उसका स्पष्ट मूल्यांकन किया गया हो.
यह संरक्षण का एक ऐसा प्रयास है, जिसे सांस्कृतिक प्रवाह, पारिस्थितिक चक्रों और संस्थागत निरंतरता के नज़रिये से ‘ट्रेड लॉजिस्टिक’ की फिर से कल्पना करने के लिए विकसित किया गया है.
केक चेन मैपिंग की संकल्पना व्यापार में गरिमा और स्थिरता को संस्थागत बनाने के एक औजार के रूप में की गई है. इसे ग्लोबोट और फ्लेव कांगो क्लीनअप जैसे अभियानों की बुनियाद पर तैयार किया गया है, जिनमें तंत्रों की अस्पष्टता के कारण स्पष्ट शासन व्यवस्था की ज़रूरत बताई गई है. चित्रों, वीडियो और ग्राफिक्स आदि द्वारा संदेश भेजने की सुविधा होने के साथ-साथ केक चेन मैपिंग में अफ़्रीकी शासन सिद्धांत, ब्लॉकचेन संचालन सिद्धांत और हितधारकों की जानकारियां भी शामिल हैं, इसलिए उम्मीद है कि यह विभिन्न पीढ़ियों और क्षेत्रों में सुगमता को बढ़ावा देगा.
उदाहरण के लिए, कांगो नदी बेसिन के नील पर्च मछली को ही लें. मुख्यधारा के निर्यात मॉडल में इसे खाद्य-पदार्थ के रूप में ही बेचा जाता है. मगर, एक संरक्षणवादी अर्थव्यवस्था में, इसे कई क्षेत्रों में सावधानीपूर्वक बांटा जाता है. इसके मांस समाजों को पोषण देते हैं; इसके तेल झुर्रियां कम करने वाली क्रीमों में इस्तेमाल किए जाते हैं; जिलेटिन से पानी-रोधी गोंद बनाया जाता है; इसका शल्क उन सामग्रियों के बीच इंटरलॉकिंग में काम आता है, जो मज़बूत जोड़ बनाते हैं; और पारंपरिक चिकित्सा शास्त्र इसके ऊतकों को कामोत्तेजक गुणों व स्वास्थ्य लाभ के टॉनिक के रूप में जानते हैं. यानी, इसका प्रत्येक उपयोग किसी उद्योग से नहीं, बल्कि सांस्कृतिक, आर्थिक और पारिस्थितिक से जुड़ा है.
केक चेन मैपिंग पारिस्थितिक, औषधीय और औद्योगिक क्षेत्रों में इन्हीं बदलावों पर यह सुनिश्चित करते हुए नज़र रखता है कि सिर्फ़ इनका दोहन नहीं होगा, बल्कि पुनर्चक्रण भी होगा और पर्यावरण में इनकी वापसी भी होगी. स्तर-दर-स्तर तैयार मानचित्र छिपे हुए दबाव-बिंदुओं को सामने लाने में मदद करता है, जैसे कि नियमों की कमी को, जिस कारण बेहिसाब मछलियां पकड़ी जाती हैं या औद्योगिक प्रोटोकॉल के अभाव को, जो सुधार के काम को व्यापक नहीं बना सकते और निर्यात पर निर्भरता काफी घटा सकते हैं.
यह नौजवानों के नेतृत्व वाले समुद्री उद्यमों के लिए भी नए रास्ते खोलता है, जो नवाचार पर आधारित तो हैं, लेकिन नियमों से बंधे हुए भी हैं. इस तरह, चैंबर्स, सहकारी समितियों और संरक्षक संस्थाओं के हाथो में नील पर्च सिर्फ़ एक उत्पाद नहीं, बल्कि संप्रभु क्षमता-निर्माण का एक साधन बन जाता है.
जैव-सांस्कृतिक प्रबंधन और समुद्री अर्थशास्त्र के नज़रिये से ब्लू हेरिटेज चैंबर जैसी पहल समावेशन की बात नहीं कर रही, बल्कि मूल उत्पाद पर ज़ोर दे रही है. यह भूमिका पूरक नहीं, बल्कि बुनियादी है.
वैश्विक समुद्री शासन व्यवस्था की रूपरेखा अक्सर समुद्री तटों से सबसे दूर स्थित देशों द्वारा बनाई जाती है. विशाल समुद्री क्षेत्रों, महत्वपूर्ण जलमार्गों और स्वदेशी समुद्री ज्ञान के बावजूद, अफ़्रीकी देशों को अक्सर इस पायदान में सबसे अंत में रखा जाता है. उन्हें नियमों का निर्माता नहीं समझा जाता. हालांकि, अब स्थिति बदल रही है. बुनियादी ढांचों में सुधार और संप्रभु मूल्यांकन चार्टर जैसी व्यवस्थाओं से, एजेंसी न केवल संसाधनों पर अपना दावा फिर से करने लगी है, बल्कि उन संस्थानों पर भी हक जताने लगी है, जो उनको नियंत्रित करती हैं. पुराने ढर्रे पर शासन व्यवस्था नहीं बनी रहनी चाहिए. अफ़्रीका को अपनी मौलिक स्थिति से आगे बढ़ना होगा, और वह बढ़ेगा भी.
यदि 20वीं सदी समुद्र के निष्कर्षण के लिए याद की जाती है, तो 21वीं सदी को इस पर उचित काम करने के रूप में परिभाषित किया जाना चाहिए. अफ़्रीका की मांग किसी पूर्व-लिखित महासागरीय अर्थव्यवस्था में शामिल होने की नहीं है, बल्कि यह मिलजुल कर एक नया व्याकरण रचना चाहता है, जहां शोषण के बजाय संरक्षण पर, निष्कर्षण के बजाय मूल्यांकन पर और साम्राज्य के बजाय शासन व्यवस्था पारिस्थितिक तंत्र पर आधारित हो.
आइए, हम अब ऐसा समुद्री अर्थशास्त्र का युग बनाएं- जहां व्यापार, कराधान और बुनियादी ढांचा महासागर को ख़त्म करने के लिए नहीं, बल्कि उसे नया जीवन देने के लिए तैयार किया गया हो.
इसके अलावा, दुनिया भर में, तटीय इलाकों में रहने वाले समुदायों ने महासागर के साथ गहरे रिश्ते बनाए हैं और संसाधनों के टिकाऊ उपयोग, आपदा तैयारी और पारिस्थितिकी तंत्र के प्रबंधन के माध्यम से खुद को उनके अनुरूप ढाला है. ये पारंपरिक ज्ञान प्रणालियां अनुकूलन और परिस्थितियों से लड़ने के प्रयासों में बहुमूल्य दृष्टि प्रदान कर सकती हैं. अफ़्रीका ज़मीनी स्तर की, स्थानीय तौर पर संचालित जलवायु संबंधी रणनीतियों को बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है, जो महासागर की प्राकृतिक प्रणालियों में फिर से जान डालने के लिए बुद्धिमानी से उसके उपयोग पर ज़ोर देती हैं. आइए, हम अब ऐसा समुद्री अर्थशास्त्र का युग बनाएं- जहां व्यापार, कराधान और बुनियादी ढांचा महासागर को ख़त्म करने के लिए नहीं, बल्कि उसे नया जीवन देने के लिए तैयार किया गया हो.
(सिमोन स्मिथ-गॉडफ्रे ब्लू हेरिटेज चैंबर ऑफ कॉमर्स की संस्थापक हैं)
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She is the Founder and Chief Architect of the Blue Heritage Chamber of Commerce, leading sovereign innovation across Africa’s maritime, ceremonial, and defence ecosystems. Her ...
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