म्यांमार में सेना बंदूक से सत्ता हथियाने के बाद अब चुनावों के ज़रिये उसे वैध ठहराने की कोशिश कर रही है. यह लेख इसी प्रक्रिया पर बात कर रहा है कि कैसे लोकतंत्र के नाम पर कराए जा रहे ये चुनाव, असल में जनता की नहीं बल्कि जुंटा की सत्ता को मजबूत करते हैं.
फरवरी 2021 में सत्ता पर कब्ज़ा करने वाले तख्तापलट के लगभग पाँच साल बाद, म्यांमार की सेना अब अपनी राजनीतिक वैधता का सबसे बड़ा सहारा सामने ला रही है-एक सख़्ती से नियंत्रित राष्ट्रीय चुनाव. जुंटा के अनुसार, ये चुनाव नवंबर 2020 के आम चुनाव के नतीजों को सुधारने के लिए कराए जा रहे हैं जिन्हें वह लगातार धांधली वाला बताता रहा है. हालांकि, इस आरोप को देश और दुनिया के अधिकांश पर्यवेक्षकों ने खारिज किया है फिर भी इसी आधार पर चुनी हुई सरकार को गिराया गया था.
वर्तमान चुनावों को लोकतंत्र की वापसी के रूप में पेश कर, सैन्य शासन अपने लंबे शासन को वैध ठहराने की कोशिश कर रहा है. देश के भीतर राजनीतिक समूहों, नागरिक समाज और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने इन चुनावों को गंभीर रूप से त्रुटिपूर्ण बताया है. वास्तव में, ये चुनाव जनता की इच्छा दिखाने के बजाय सेना को सत्ता में बनाए रखने के लिए तैयार किए गए हैं जबकि जनता ने 2015 और 2020 दोनों चुनावों में आंग सान सू ची को अपना नेता चुना था.
सेना द्वारा बनाए गए 2008 के संविधान के तहत संसद के दोनों सदनों में 25 प्रतिशत सीटें अपने-आप सेना के अधिकारियों के लिए आरक्षित हैं जिन्हें सेनाध्यक्ष नियुक्त करता है. इससे यह सुनिश्चित हो जाता है कि चुनाव के नतीजे चाहे जो हो, सेना की निर्णायक भूमिका बनी रहे और सैन्य प्रभुत्व संविधान के ज़रिये कायम रहे.
इसी रणनीति के तहत जुंटा ने चुनाव तीन चरणों में बांटे हैं-28 दिसंबर को 102 टाउनशिप, 11 जनवरी को 100 टाउनशिप और 25 जनवरी को 63 टाउनशिप में मतदान. यह व्यवस्था भी चुनाव को नियंत्रित रखने और विरोध को कमजोर करने के लिए की गई है. प्रतिनिधित्व की व्यवस्था भी सेना के पक्ष में बनाई गई है. भले ही इस बार सीटें फर्स्ट-पास्ट-द-पोस्ट, आनुपातिक प्रतिनिधित्व और मिश्रित प्रणाली के ज़रिये दी जा रही हों लेकिन नतीजा पहले से तय है. सेना द्वारा बनाए गए 2008 के संविधान के तहत संसद के दोनों सदनों में 25 प्रतिशत सीटें अपने-आप सेना के अधिकारियों के लिए आरक्षित हैं जिन्हें सेनाध्यक्ष नियुक्त करता है. इससे यह सुनिश्चित हो जाता है कि चुनाव के नतीजे चाहे जो हो, सेना की निर्णायक भूमिका बनी रहे और सैन्य प्रभुत्व संविधान के ज़रिये कायम रहे.
इतने बड़े चुनावी अभ्यास के बावजूद, आम लोगों को ज़मीनी स्तर पर चुनाव के बहुत कम संकेत दिखाई देते हैं. यांगून शहर में केवल सेना समर्थित पार्टी यूनियन सॉलिडैरिटी एंड डेवलपमेंट पार्टी (USDP) और कुछ अनुमति प्राप्त दलों-जैसे पीपल्स पार्टी, पीपल्स पायनियर पार्टी, नेशनल यूनिटी पार्टी और म्यांमार फार्मर्स डेवलपमेंट पार्टी-के पोस्टर और होर्डिंग ही नज़र आते हैं. इसके अलावा कहीं यह महसूस नहीं होता कि देश में कोई राष्ट्रीय चुनाव चल रहा है जिससे यह साफ होता है कि पूरी प्रक्रिया सख़्त नियंत्रण में है.
राजनीतिक माहौल भी चुनावों की विश्वसनीयता को कमजोर करता है. आंग सान सू ची अब भी जेल में हैं, उनकी पार्टी नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी-जो देश की सबसे लोकप्रिय पार्टी थी-को भंग कर दिया गया है और स्वतंत्र राजनीतिक गतिविधियों को व्यवस्थित रूप से कुचल दिया गया है. इसलिए लोकतंत्र पर नज़र रखने वाले विशेषज्ञ इन चुनावों को नागरिक शासन की ओर कदम नहीं बल्कि लंबे समय से चले आ रहे सैन्य शासन को चुनावी आवरण में पेश करने की कोशिश मानते हैं.
चुनाव में भाग लेने वाली पार्टियों की संख्या यह दिखाती है कि यहां अनुशासित लोकतंत्र ही हावी है. यूनियन इलेक्शन कमीशन (UEC) के अनुसार, छह राष्ट्रीय और 51 क्षेत्रीय पार्टियां चुनाव लड़ने के लिए पंजीकृत हैं लेकिन असल में राजनीतिक प्रतिस्पर्धा को बहुत सीमित कर दिया गया है. नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी (NLD) को सख़्त राजनीतिक दल पंजीकरण कानून के तहत दोबारा पंजीकरण से इनकार करने पर भंग कर दिया गया. पार्टी का शीर्ष नेतृत्व अब भी हिरासत में है. इसके अलावा कई प्रभावशाली क्षेत्रीय दलों को भी चुनाव से बाहर कर दिया गया है जिनमें रखाइन राज्य की अराकान नेशनल पार्टी और शान नेशनलिटीज़ लीग फॉर डेमोक्रेसी शामिल हैं. नतीजतन, सेना समर्थित पार्टियों-खासकर यूनियन सॉलिडैरिटी एंड डेवलपमेंट पार्टी (USDP) को लगभग बिना किसी ठोस चुनौती के चुनाव लड़ने का मौका मिला है.
कई प्रभावशाली क्षेत्रीय दलों को भी चुनाव से बाहर कर दिया गया है जिनमें रखाइन राज्य की अराकान नेशनल पार्टी और शान नेशनलिटीज़ लीग फॉर डेमोक्रेसी शामिल हैं.
यह कोई हैरानी की बात नहीं है कि USDP की भारी जीत तय मानी जा रही है. पहले चरण के मतदान में पार्टी ने निचले सदन की 102 में से 90 सीटें और ऊपरी सदन की घोषित 31 में से 21 सीटें जीत लीं. बाकी सीटें जातीय और क्षेत्रीय पार्टियों को मिलीं. दूसरे चरण के नतीजे अभी घोषित नहीं किए गए हैं. हालांकि विपक्षी दलों ने पहले चरण में USDP की जीत पर सवाल उठाए हैं. उन्होंने अनियमितताओं और अग्रिम मतपत्रों की प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी का आरोप लगाते हुए जुंटा प्रमुख मिन आंग हलाइंग के पास औपचारिक शिकायतें भी दर्ज कराई हैं लेकिन इन पर कोई कार्रवाई होती नहीं दिख रही. इससे साफ है कि मतदान का इस्तेमाल केवल सेना की कठपुतली सरकार स्थापित करने के लिए किया जा रहा है.
15 सितंबर 2025 को म्यांमार के यूनियन इलेक्शन कमीशन ने घोषणा की कि निचले सदन की 56 और ऊपरी सदन की नौ सीटों पर चुनाव नहीं कराए जाएंगे. इसका एकमात्र कारण यह बताया गया कि ये क्षेत्र स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने के अनुकूल नहीं हैं. इस फैसले के चलते कुल 65 निर्वाचन क्षेत्र मतदान से बाहर हो गए जिनमें से ज़्यादातर इलाके जातीय सशस्त्र संगठनों और लोकतंत्र समर्थक समूहों के नियंत्रण में हैं. नतीजतन, देश के बड़े हिस्से चुनाव प्रक्रिया से बाहर रह गए हैं और संघर्ष प्रभावित क्षेत्रों में सक्रिय प्रतिरोधी ताकतों ने चुनावों का पूरी तरह बहिष्कार कर दिया है.
चुनाव के दूसरे चरण में भी हिंसा देखने को मिली जिससे मौजूदा अस्थिर हालात में चुनाव कराना और भी संदिग्ध हो गया है. तख्तापलट के बाद से अब तक 7,000 से अधिक आम नागरिक मारे जा चुके हैं और 36 लाख से ज़्यादा लोग विस्थापित हो चुके हैं जबकि ये आंकड़े लगातार बढ़ते जा रहे हैं.
अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रियाएं अलग-अलग रही हैं लेकिन अधिकतर आलोचनात्मक हैं. पश्चिमी देशों और मानवाधिकार संगठनों ने इन चुनावों को दिखावटी बताया है और कहा है कि इन्हें केवल जुंटा शासन को वैध ठहराने के लिए कराया जा रहा है. आसियान (दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों का संगठन) के लिए भी ये चुनाव एक मुश्किल मुद्दा बने हुए हैं. पांच सूत्रीय सहमति का ज़मीनी स्तर पर बहुत कम असर हुआ है फिर भी आसियान संवाद और समावेश पर ज़ोर देता रहा है. चुनाव पर्यवेक्षक न भेजने जैसे फैसलों को लेकर संगठन की निष्क्रियता की आलोचना भी हुई है.
म्यांमार के चुनावों को अतीत की राजनीतिक विफलताओं को सुधारने की कोशिश के रूप में नहीं, बल्कि लोकतंत्र के दिखावे के जरिए सैन्य शासन को औपचारिक रूप देने के साधन के रूप में समझा जाना चाहिए.
खबरों के मुताबिक, 2026 में फिलीपींस की अध्यक्षता के दौरान आसियान एक दीर्घकालिक विशेष दूत की नियुक्ति पर विचार कर रहा है. इससे निरंतरता बढ़ सकती है और म्यांमार के अलग-अलग पक्षों से बेहतर संवाद संभव हो सकता है. फिर भी ठोस और निर्णायक कदमों की मांग अब तक अनसुनी ही रही है. वहीं, चीन और रूस जैसे देश-जिनके म्यांमार में रणनीतिक हित हैं- या तो समर्थन दे रहे हैं या तटस्थ बने हुए हैं. उनका कूटनीतिक सहयोग और तकनीकी मदद लोकतांत्रिक सुधार के लिए अंतरराष्ट्रीय दबाव को कमजोर करती है. भारत ने भी स्वतंत्र, निष्पक्ष और समावेशी चुनावों की बात कही है लेकिन सभी पक्षों की ठोस राजनीतिक इच्छाशक्ति के बिना ऐसे बयान खोखले ही लगते हैं.
कुल मिलाकर, म्यांमार के चुनावों को अतीत की राजनीतिक विफलताओं को सुधारने की कोशिश के रूप में नहीं, बल्कि लोकतंत्र के दिखावे के जरिए सैन्य शासन को औपचारिक रूप देने के साधन के रूप में समझा जाना चाहिए. बहिष्कार, दबाव और नियंत्रित भागीदारी ने चुनावी प्रक्रिया को खोखला कर दिया है जिससे नतीजे जनता के बजाय जुंटा के हित में तय हो रहे हैं. वास्तविक सुधार और क्षेत्रीय दबाव के बिना, ये चुनाव राजनीतिक समाधान देने के बजाय अस्थिरता को और गहरा करने वाले हैं.
श्रीपर्णा बनर्जी ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के स्ट्रेटेजिक स्टडीज प्रोग्राम में एसोसिएट फेलो हैं.
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Sreeparna Banerjee is an Associate Fellow in the Strategic Studies Programme. Her work focuses on the geopolitical and strategic affairs concerning two Southeast Asian countries, namely ...
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