ग्लोबल कॉम्बैट एयर प्रोग्राम (GCAP) के जरिए जापान अब सिर्फ हथियार खरीदने वाला देश नहीं बल्कि अगली पीढ़ी की सैन्य तकनीक का सह-निर्माता बनने की ओर बढ़ रहा है. यूके और इटली के साथ मिलकर विकसित हो रहा यह छठी पीढ़ी का लड़ाकू विमान कार्यक्रम जापान की रक्षा आत्मनिर्भरता, वैश्विक रक्षा बाजार में बढ़ती भूमिका और बदलती सुरक्षा रणनीति का प्रतीक बन गया है. पढ़िए, कैसे GCAP जापान की रक्षा महत्वाकांक्षाओं को नई उड़ान दे रहा है.
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ग्लोबल कॉम्बैट एयर प्रोग्राम द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद से जापान द्वारा शुरू की गई सबसे महत्वपूर्ण रक्षा-औद्योगिक और रणनीतिक साझेदारियों में से एक है. 2035 तक संयुक्त रूप से छठी पीढ़ी के लड़ाकू विमान को विकसित करने के लिए जापान, यूनाइटेड किंगडम (यूके) और इटली को एक साथ लाने वाला ग्लोबल कॉम्बैट एयर प्रोग्राम केवल एक लड़ाकू जेट कार्यक्रम से कहीं अधिक है. यह जापान के विकसित होते रणनीतिक दृष्टिकोण, संयुक्त राज्य अमेरिका के गठबंधन ढांचे से परे जाकर उच्च-स्तरीय रक्षा औद्योगिक सहयोग में शामिल होने की उसकी बढ़ती इच्छा, और हिंद-प्रशांत तथा यूरो-अटलांटिक क्षेत्रों के बीच व्यापक अंतर-क्षेत्रीय सुरक्षा संबंधों के उभरने को दर्शाता है.
ग्लोबल कॉम्बैट एयर प्रोग्राम टोक्यो के लिए रणनीतिक आवश्यकता और राजनीतिक परिवर्तन दोनों का प्रतिनिधित्व करता है, जिसके तहत 2022 में उसने अपने स्वदेशी F-X लड़ाकू कार्यक्रम को यूनाइटेड किंगडम की 'टेम्पेस्ट' पहल के साथ विलय करने का निर्णय लिया था. F-35 कार्यक्रम के विपरीत-जहाँ संयुक्त राज्य अमेरिका अपग्रेड, सॉफ्टवेयर एक्सेस और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण पर महत्वपूर्ण नियंत्रण रखता है-ग्लोबल कॉम्बैट एयर प्रोग्राम को स्पष्ट रूप से संप्रभु क्षमता के इर्द-गिर्द तैयार किया गया है. जापान, इटली और यूनाइटेड किंगडम ने निर्णय लेने, औद्योगिक भागीदारी और तकनीकी पहुंच में समानता पर जोर दिया है. यह जापान के लिए विशेष रूप से एक बड़ा बदलाव है, जिसका युद्ध के बाद का रक्षा खरीद मॉडल ऐतिहासिक रूप से संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ लाइसेंस प्राप्त उत्पादन व्यवस्था पर निर्भरता और उन बाधाओं से प्रभावित था जिन्होंने स्वदेशी नवाचार के विकास को सीमित कर दिया था.
यह जापान के विकसित होते रणनीतिक दृष्टिकोण, संयुक्त राज्य अमेरिका के गठबंधन ढांचे से परे जाकर उच्च-स्तरीय रक्षा औद्योगिक सहयोग में शामिल होने की उसकी बढ़ती इच्छा, और हिंद-प्रशांत तथा यूरो-अटलांटिक क्षेत्रों के बीच व्यापक अंतर-क्षेत्रीय सुरक्षा संबंधों के उभरने को दर्शाता है.
चीन की बढ़ती सैन्य ताकत, सेनकाकू द्वीप में घुसपैठ और अमेरिका पर पूरी तरह निर्भर न रहने की सोच ने जापान को ग्लोबल कॉम्बैट एयर प्रोग्राम प्रोग्राम के लिए प्रेरित किया है. इसके अलावा, उत्तर कोरिया की मिसाइलों और रूसी गतिविधियों के खतरों को देखते हुए, जापान अब अकेले लड़ाकू विमानों के बजाय अगली पीढ़ी की एकीकृत युद्ध प्रणालियों को मजबूत करने पर पूरा ध्यान दे रहा है.
विशेष रूप से, ग्लोबल कॉम्बैट एयर प्रोग्राम केवल एक विमान बनाने के बारे में नहीं है. इसकी कल्पना 'सिस्टम ऑफ सिस्टम्स' के रूप में की गई है जो मानवयुक्त और मानवरहित प्लेटफॉर्मों, उन्नत सेंसर, डेटा फ्यूजन, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध क्षमताओं, एआई-सक्षम युद्ध प्रबंधन और कई क्षेत्रों में नेटवर्क-केंद्रित संचालन को जोड़ती है. आधुनिक युद्ध में सूचना की बड़ी भूमिका है, और ग्लोबल कॉम्बैट एयर प्रोग्राम के जरिए जापान को स्टील्थ और उन्नत सेंसर जैसी अत्याधुनिक तकनीकें मिलेंगी. इसके अलावा, पिछले दस वर्षों में रक्षा अभ्यासों और समझौतों से जापान और यूके के सुरक्षा संबंध काफी मजबूत हुए हैं. चीन-रूस के बढ़ते सहयोग को देखते हुए, जापानी अधिकारी अब हिंद-प्रशांत और यूरोपीय सुरक्षा को एक-दूसरे से जुड़ा हुआ मानते हैं. 2025 में, टोक्यो ने उल्लेख किया था कि यूके-जापान रक्षा संबंध एक ‘अभूतपूर्व‘ स्तर पर पहुंच गए हैं, जिसमें ग्लोबल कॉम्बैट एयर प्रोग्राम इस रिश्ते के एक केंद्रीय स्तंभ के रूप में कार्य कर रहा है.
ग्लोबल कॉम्बैट एयर प्रोग्राम के भीतर इटली की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है, हालांकि हिंद-प्रशांत की चर्चाओं में अक्सर इसे कम करके आंका जाता है. रोम 'लियोनार्डो' के माध्यम से पर्याप्त एयरोस्पेस विशेषज्ञता और बहुराष्ट्रीय लड़ाकू विमान परियोजनाओं में अपना लंबा अनुभव लाता है. इटली, हिंद-प्रशांत की प्राथमिकताओं और यूरोपीय रक्षा प्रणालियों के बीच एक पुल का काम करता है, जिससे जापान की यूरोपीय रक्षा साझेदारी मजबूत होती है.
चीन-रूस के बढ़ते सहयोग को देखते हुए, जापानी अधिकारी अब हिंद-प्रशांत और यूरोपीय सुरक्षा को एक-दूसरे से जुड़ा हुआ मानते हैं. 2025 में, टोक्यो ने उल्लेख किया था कि यूके-जापान रक्षा संबंध एक ‘अभूतपूर्व‘ स्तर पर पहुंच गए हैं, जिसमें ग्लोबल कॉम्बैट एयर प्रोग्राम इस रिश्ते के एक केंद्रीय स्तंभ के रूप में कार्य कर रहा है.
संस्थागत रूप से, ग्लोबल कॉम्बैट एयर प्रोग्राम पिछले दो वर्षों में तेजी से विकसित हुआ है. 2025 में, तीनों देशों ने 'ग्लोबल कॉम्बैट एयर प्रोग्राम इंटरनेशनल गवर्नमेंट ऑर्गनाइजेशन' (GIGO) को क्रियान्वित किया और 'एड्जविंग' को लॉन्च किया, जो बीएई सिस्टम्स, लियोनार्डो और जापान एयरक्राफ्ट इंडस्ट्रियल एन्हांसमेंट कंपनी को एक साथ लाने वाला एक संयुक्त औद्योगिक उद्यम है. अप्रैल 2026 में, एड्जविंग को £686 मिलियन का डिज़ाइन और इंजीनियरिंग के पहले संयुक्त अंतर्राष्ट्रीय अनुबंध के साथ यह कार्यक्रम अलग-अलग राष्ट्रीय समझौतों से हटकर एक एकीकृत बहुराष्ट्रीय ढांचे में बदल गया है.
रणनीतिक वादे के बावजूद ग्लोबल कॉम्बैट एयर प्रोग्राम के सामने बड़ी चुनौतियां हैं. तीन अलग संस्कृतियों वाले देशों के लिए 2035 तक इस जटिल प्रोजेक्ट को बजट, तकनीक और आपसी तालमेल के साथ पूरा करना काफी मुश्किल है. इसके अलावा बढ़ती लागत भी एक बड़ी चिंता है. इटली ने हाल ही में 2037 तक इस कार्यक्रम के लिए लगभग 8.8 बिलियन यूरो के वित्तपोषण (फंडिंग) को मंजूरी दी है, जबकि संशोधित अनुमान प्रारंभिक अनुमान की तुलना में काफी अधिक दीर्घकालिक खर्चों का संकेत देते हैं.
अपने रणनीतिक फायदों के बावजूद, ग्लोबल कॉम्बैट एयर प्रोग्राम के सामने कई बड़ी चुनौतियां खड़ी हैं. इस कार्यक्रम के लिए तय की गई समय सीमा बेहद महत्वाकांक्षी है. साल 2035 तक छठी पीढ़ी का लड़ाकू विमान तैयार करने के लिए तीन अलग-अलग देशों को एक साथ मिलकर काम करना होगा. ऐसे में, तकनीक के विकास, औद्योगिक तालमेल, राजनीतिक सहमति और बजट से जुड़े वादों को एक समान गति में लाना बेहद कठिन काम है.
अब जापान ग्लोबल कॉम्बैट एयर प्रोग्राम प्रोग्राम को सिर्फ हथियार खरीदने का जरिया नहीं मानता, बल्कि इसके जरिए वह वैश्विक रक्षा बाजार में अपनी पैठ मजबूत करना चाहता है. यह पूरा कार्यक्रम न केवल आधुनिक लड़ाकू विमानों का भविष्य तय करेगा, बल्कि विभिन्न क्षेत्रों के बीच होने वाले रक्षा समझौतों पर भरोसा भी बढ़ाएगा.
विशेष रूप से टोक्यो के लिए, एक उभरती हुई चिंता यह है कि क्या घरेलू राजनीतिक और औद्योगिक उम्मीदें इस कार्यक्रम की गति के साथ तालमेल बिठाकर चल सकती हैं. जापानी हितधारक 2035 को देश के पुराने होते F-2 लड़ाकू विमानों के बेड़े को बदलने की एक अंतिम समय सीमा के रूप में देखते हैं. यूके और इटली के पास लड़ाकू विमानों का बैकअप होने से थोड़ा लचीलापन है. वहीं ब्रिटिश बजट की अनिश्चितता और देरी से निराश जापान के काम को बिना बाधा जारी रखने के लिए हाल ही में एक अस्थायी अंतरिम समझौता किया गया है. खबरों के मुताबिक लंदन महीनों की जापानी चिंताओं के बाद कार्यक्रम को स्थिरता देने के उद्देश्य से ग्लोबल कॉम्बैट एयर प्रोग्राम के लिए एक दीर्घकालिक फंडिंग पैकेज को मंजूरी देने की तैयारी कर रहा है. बहुराष्ट्रीय रक्षा प्रोजेक्ट्स में देशों की अपनी संप्रभुता और काम की रफ्तार में तालमेल बिठाना मुश्किल होता है. देशों के अलग बजट और निर्यात नियम आगे चलकर तनाव बढ़ा सकते हैं. इसके अलावा, नए सदस्यों को शामिल करने की बातचीत में जर्मनी और सऊदी अरब का नाम भी सामने आया है.
इटली, विशेष रूप से, कार्यक्रम की बढ़ती लागतों की भरपाई करने और निर्यात बाजारों का विस्तार करने के लिए भागीदारी को व्यापक बनाने (अन्य देशों को शामिल करने) के प्रति खुला रुख रखता है. हालांकि, जापान सतर्क बना हुआ है. टोक्यो की हिचकिचाहट प्रौद्योगिकी सुरक्षा, निर्यात संवेदनशीलता और इस संभावना को दर्शाती है कि अतिरिक्त भागीदार समय सीमा में देरी कर सकते हैं या कार्यक्रम के भीतर जापानी प्रभाव को कम कर सकते हैं.
वास्तव में, ग्लोबल कॉम्बैट एयर प्रोग्राम के सबसे रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण आयामों में से एक जापान द्वारा अपनी रक्षा निर्यात और औद्योगिक नीतियों की धीरे-धीरे की जा रही नई व्याख्या है. द्वितीय विश्व युद्ध के बाद, जापान पर हथियारों के निर्यात को लेकर कई कड़े प्रतिबंध थे, जिस वजह से वह वैश्विक रक्षा नेटवर्क में शामिल नहीं हो पाता था. लेकिन हाल ही में उसने अपनी नीतियों में ढील दी है. अब जापान ग्लोबल कॉम्बैट एयर प्रोग्राम प्रोग्राम को सिर्फ हथियार खरीदने का जरिया नहीं मानता, बल्कि इसके जरिए वह वैश्विक रक्षा बाजार में अपनी पैठ मजबूत करना चाहता है. यह पूरा कार्यक्रम न केवल आधुनिक लड़ाकू विमानों का भविष्य तय करेगा, बल्कि विभिन्न क्षेत्रों के बीच होने वाले रक्षा समझौतों पर भरोसा भी बढ़ाएगा. जापान के लिए यह खुद को साबित करने का एक बड़ा मौका है, ताकि वह दूसरों से हथियार खरीदने के बजाय खुद अगली पीढ़ी की सैन्य तकनीक बनाने वाला एक बड़ा देश बन सके.
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Pratnashree Basu is an Associate Fellow with the Strategic Studies Programme. She covers the Indo-Pacific region, with a focus on Japan’s role in the region. ...
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