खाड़ी देश अब सिर्फ तेल निर्यातक नहीं रहना चाहते बल्कि एलएनजी, हाइड्रोजन, अमोनिया और स्वच्छ बिजली के साथ बहु-ऊर्जा शक्ति बनने की दिशा में बढ़ रहे हैं. आर्टिकल से जानें क्यों यह रणनीति भविष्य की वैश्विक ऊर्जा राजनीति को नया रूप दे सकती है.
लगभग पिछले पचास वर्षों तक खाड़ी क्षेत्र का भू-राजनीतिक प्रभाव मुख्य रूप से कच्चे तेल के निर्यात पर आधारित रहा. तेल से भरे विशाल टैंकर खाड़ी देशों से निकलकर दुनिया के विभिन्न हिस्सों तक ऊर्जा पहुँचाते थे, और इसी के माध्यम से इस क्षेत्र की वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था में मजबूत भूमिका बनी रही. कच्चे तेल का व्यापार न केवल आर्थिक शक्ति का स्रोत था, बल्कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों और रणनीतिक महत्व का भी आधार बन गया था.
हालाँकि अब वैश्विक ऊर्जा प्रणाली धीरे-धीरे बदल रही है. स्वच्छ और कम-कार्बन ऊर्जा की बढ़ती मांग के साथ खाड़ी क्षेत्र भी अपनी ऊर्जा रणनीति को नए रूप में ढाल रहा है. आज इसका प्रभाव केवल तेल तक सीमित नहीं रह गया है. द्रवीकृत प्राकृतिक गैस के कार्गो, हाइड्रोजन के अणु, स्वच्छ ऊर्जा वाहक और कार्बन प्रबंधन समाधान ऊर्जा व्यापार के नए साधन बन रहे हैं.
इसके अलावा सीमाओं के पार बिजली का निर्यात भी ऊर्जा सहयोग का एक उभरता हुआ माध्यम बन रहा है. इस परिवर्तन के साथ खाड़ी क्षेत्र वैश्विक ऊर्जा प्रणाली में अपनी भूमिका को नए और अधिक विविध रूप में स्थापित करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है. हाइड्रोकार्बन को पूरी तरह छोड़ने के बजाय खाड़ी देश स्वयं को बहु-ऊर्जा निर्यातक के रूप में पुनर्स्थापित कर रहे हैं. वे अपने प्राकृतिक संसाधनों, संप्रभु पूँजी और रणनीतिक भौगोलिक स्थिति को भविष्य के वैश्विक ऊर्जा व्यापार में दीर्घकालिक प्रभाव में बदलने की कोशिश कर रहे हैं. यह उभरता हुआ निर्यात मॉडल तीन स्थायी लाभों पर आधारित है.
अब वैश्विक ऊर्जा प्रणाली धीरे-धीरे बदल रही है. स्वच्छ और कम-कार्बन ऊर्जा की बढ़ती मांग के साथ खाड़ी क्षेत्र भी अपनी ऊर्जा रणनीति को नए रूप में ढाल रहा है. आज इसका प्रभाव केवल तेल तक सीमित नहीं रह गया है.
पहला, खाड़ी क्षेत्र के पास विशाल हाइड्रोकार्बन भंडार के साथ-साथ दुनिया के सबसे प्रतिस्पर्धी सौर और पवन ऊर्जा संसाधन भी हैं, जिससे पारंपरिक और कम-कार्बन ऊर्जा प्रणालियों में एक साथ निवेश संभव हो जाता है. दूसरा, सॉवरेन वेल्थ फंड और राज्य-स्वामित्व वाली ऊर्जा कंपनियाँ धैर्यपूर्ण पूँजी प्रदान करती हैं, जिससे बड़े पैमाने की अवसंरचना—जैसे एलएनजी संयंत्र, परमाणु ऊर्जा संयंत्र, हाइड्रोजन केंद्र और कार्बन कैप्चर नेटवर्क—को वित्तपोषित किया जा सकता है. तीसरा, यूरोप, एशिया और अफ्रीका के बीच स्थित इस क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति इसे ऊर्जा व्यापार के लिए एक प्राकृतिक गलियारा बनाती है. इन सभी कारणों से खाड़ी क्षेत्र केवल ऊर्जा परिवर्तन के अनुरूप ढल ही नहीं रहा, बल्कि इसके उभरते व्यावसायिक ढाँचे को आकार भी दे रहा है.
एलएनजी (द्रवीकृत प्राकृतिक गैस) खाड़ी के विकसित हो रहे निर्यात मॉडल का सबसे परिपक्व और व्यावसायिक रूप से सुरक्षित स्तंभ बना हुआ है. यह हाइड्रोकार्बन युग के साथ निरंतरता बनाए रखने के साथ-साथ कम-कार्बन ऊर्जा प्रणालियों की ओर विविधीकरण के लिए वित्तीय आधार भी प्रदान करता है. हालाँकि, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया से बढ़ती प्रतिस्पर्धा, बदलती जलवायु नीतियाँ और 2030 के दशक के बाद मांग के स्थिर होने की संभावना यह संकेत देती है कि एलएनजी को अंतिम लक्ष्य नहीं, बल्कि एक स्थिर पुल के रूप में समझना चाहिए, जो बहु-ऊर्जा पोर्टफोलियो की ओर संक्रमण को संभव बनाता है.
कतर के नॉर्थ फील्ड विस्तार से 2030 तक एलएनजी उत्पादन क्षमता 77 मिलियन टन प्रतिवर्ष से बढ़कर लगभग 142 मिलियन टन होने की उम्मीद है, जिससे वह दुनिया के प्रमुख गैस निर्यातकों में अपनी स्थिति और मजबूत करेगा.
हाइड्रोकार्बन युग के साथ निरंतरता बनाए रखने के साथ-साथ कम-कार्बन ऊर्जा प्रणालियों की ओर विविधीकरण के लिए वित्तीय आधार भी प्रदान करता है. हालाँकि, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया से बढ़ती प्रतिस्पर्धा, बदलती जलवायु नीतियाँ और 2030 के दशक के बाद मांग के स्थिर होने की संभावना यह संकेत देती है कि एलएनजी को अंतिम लक्ष्य नहीं, बल्कि एक स्थिर पुल के रूप में समझना चाहिए.
इसी प्रकार संयुक्त अरब अमीरात में एडीएनओसी का रुवैस एलएनजी परियोजना लगभग 9.6 मिलियन टन प्रतिवर्ष की अतिरिक्त क्षमता जोड़ेगी, जिसकी 80 प्रतिशत से अधिक क्षमता पहले ही दीर्घकालिक समझौतों के माध्यम से सुरक्षित की जा चुकी है. यह संयंत्र स्वच्छ बिजली और उन्नत डिजिटल तकनीक से संचालित होगा, जिससे यह क्षेत्र की सबसे कम-कार्बन एलएनजी सुविधाओं में से एक बनेगा.
हाइड्रोजन को वैश्विक ऊर्जा प्रणाली के डीकार्बोनाइजेशन में खाड़ी क्षेत्र के प्रभाव को बनाए रखने के एक महत्वपूर्ण साधन के रूप में देखा जा रहा है. जैसे-जैसे दुनिया स्वच्छ और कम-कार्बन ऊर्जा की ओर बढ़ रही है, खाड़ी देश अपनी ऊर्जा भूमिका को नए रूप में ढालने की कोशिश कर रहे हैं. हाइड्रोजन इस परिवर्तन का एक केंद्रीय तत्व बनकर उभर रहा है, क्योंकि इसे भविष्य की स्वच्छ ऊर्जा के प्रमुख विकल्पों में गिना जाता है.
पूरे खाड़ी क्षेत्र में सरकारें और राज्य समर्थित कंपनियाँ बड़े पैमाने पर हाइड्रोजन परियोजनाओं को विकसित कर रही हैं. इन परियोजनाओं में नवीकरणीय ऊर्जा संसाधनों, जैसे सौर और पवन ऊर्जा, का उपयोग करके हाइड्रोजन उत्पादन पर जोर दिया जा रहा है. साथ ही, क्षेत्र की मजबूत औद्योगिक अवसंरचना, बंदरगाह सुविधाएँ और ऊर्जा निर्यात का अनुभव इन योजनाओं को और अधिक व्यावहारिक बनाते हैं.
इन पहलों का उद्देश्य न केवल स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन बढ़ाना है, बल्कि हाइड्रोजन और उससे जुड़े उत्पादों को वैश्विक बाजारों तक निर्यात करना भी है, जिससे खाड़ी की ऊर्जा अर्थव्यवस्था भविष्य में भी प्रभावशाली बनी रह सके. सऊदी अरब की निओम ग्रीन हाइड्रोजन परियोजना के चालू होने पर प्रतिदिन लगभग 600 टन हरित हाइड्रोजन उत्पादन की उम्मीद है, जिसे 4 गीगावाट से अधिक सौर और पवन ऊर्जा से समर्थन मिलेगा.
भविष्य में एचवीडीसी लाइनों के माध्यम से खाड़ी से दक्षिण एशिया, उत्तरी अफ्रीका और यूरोप तक नवीकरणीय बिजली पहुँचाने की योजनाएँ भी चर्चा में हैं.
संयुक्त अरब अमीरात में मसदर और एडीएनओसी हरित और नीले हाइड्रोजन परियोजनाओं को आगे बढ़ा रहे हैं, जबकि ओमान का हाइड्रोम ढाँचा और सूर हाइड्रोजन क्लस्टर देश को यूरोप और एशिया के लिए हरित ईंधन का प्रमुख निर्यातक बनाने का लक्ष्य रखते हैं. फिर भी, एलएनजी की तुलना में हाइड्रोजन निर्यात अभी अधिक अनिश्चित है, क्योंकि इसके लिए इलेक्ट्रोलाइज़र की लागत में कमी, विश्वसनीय जल आपूर्ति, और दीर्घकालिक खरीद समझौतों की आवश्यकता है.
अमोनिया को कम-कार्बन हाइड्रोजन के निर्यात का सबसे व्यावहारिक माध्यम माना जाता है. इसके परिवहन, भंडारण और उपयोग के लिए वैश्विक स्तर पर अवसंरचना पहले से विकसित है, इसलिए यह हाइड्रोजन ऊर्जा को अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों तक पहुँचाने का एक प्रभावी और व्यवहारिक विकल्प बन रहा है. सऊदी अरब की निओम परियोजना लगभग 1.2 मिलियन टन प्रति वर्ष हरित अमोनिया उत्पादन के लिए बनाई जा रही है.
इसने जापान को 40 टन ब्लू अमोनिया भेजकर दुनिया के शुरुआती अंतरराष्ट्रीय कम-कार्बन अमोनिया व्यापारों में से एक को भी पूरा किया. इसी तरह यूएई से जुड़ी कंपनी फर्टिग्लोब ने जर्मनी की हाइड्रोजन आयात निविदाओं के माध्यम से यूरोप में आपूर्ति समझौते हासिल किए हैं.
स्वच्छ बिजली का व्यापार अभी प्रारंभिक चरण में है, लेकिन भविष्य में यह ऊर्जा निर्यात मॉडल का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकता है. जीसीसी इंटरकनेक्शन ग्रिड पहले से ही खाड़ी देशों की बिजली प्रणालियों को जोड़ता है, जिससे बिजली साझा करना और स्थिरता बढ़ाना संभव होता है. भविष्य में एचवीडीसी (उच्च वोल्टेज डायरेक्ट करंट) लाइनों के माध्यम से खाड़ी से दक्षिण एशिया, उत्तरी अफ्रीका और यूरोप तक नवीकरणीय बिजली पहुँचाने की योजनाएँ भी चर्चा में हैं.
कार्बन कैप्चर, उपयोग और भंडारण (CCUS) खाड़ी देशों के लिए एक महत्वपूर्ण रणनीति के रूप में उभर रहा है. कतर के रास लफ्फान संयंत्र, यूएई की अल रेयादाह परियोजना, और सऊदी अरब के जुबैल सीसीएस हब जैसी परियोजनाएँ दिखाती हैं कि कार्बन प्रबंधन को ऊर्जा निर्यात ढांचे में शामिल किया जा रहा है.
यदि यह रणनीति सफल होती है, तो खाड़ी क्षेत्र केवल कच्चे तेल के बैरल निर्यात करने वाला क्षेत्र नहीं रहेगा. इसके बजाय वह ऊर्जा के अणुओं, स्वच्छ बिजली और कार्बन प्रबंधन समाधानों का वैश्विक केंद्र बन सकता है. इससे वैश्विक ऊर्जा व्यापार की संरचना और दिशा दोनों में महत्वपूर्ण बदलाव संभव है.
यह तकनीक हाइड्रोकार्बन उद्योग को पूरी तरह समाप्त किए बिना उसके पर्यावरणीय प्रभाव को कम करने में सहायक हो सकती है. इसके माध्यम से ऊर्जा उत्पादन जारी रखते हुए कार्बन उत्सर्जन को नियंत्रित किया जा सकता है, जिससे उद्योग अधिक टिकाऊ और जलवायु लक्ष्यों के अनुरूप बन सकता है.
खाड़ी क्षेत्र आज वैश्विक ऊर्जा व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है. यहां के देश हाइड्रोकार्बन को पूरी तरह समाप्त करने के बजाय उनके साथ नई ऊर्जा प्रणालियों को जोड़ने की रणनीति अपना रहे हैं. तेल और गैस से होने वाली आय, संप्रभु निवेश कोष और पहले से मौजूद मजबूत औद्योगिक अवसंरचना का उपयोग कम-कार्बन ऊर्जा प्रणालियों में निवेश और विस्तार के लिए किया जा रहा है. इसका उद्देश्य ऊर्जा निर्यात के पारंपरिक मॉडल को धीरे-धीरे आधुनिक और टिकाऊ मॉडल में बदलना है.
यह परिवर्तन अचानक या क्रांतिकारी तरीके से नहीं हो रहा, बल्कि योजनाबद्ध और क्रमिक रूप से आगे बढ़ रहा है. खाड़ी देश ऊर्जा संक्रमण को अवसर के रूप में देख रहे हैं, जिसमें वे हाइड्रोजन, स्वच्छ बिजली, कार्बन कैप्चर और अन्य कम-कार्बन तकनीकों के क्षेत्र में अग्रणी भूमिका निभाने की कोशिश कर रहे हैं. यदि यह रणनीति सफल होती है, तो खाड़ी क्षेत्र केवल कच्चे तेल के बैरल निर्यात करने वाला क्षेत्र नहीं रहेगा. इसके बजाय वह ऊर्जा के अणुओं, स्वच्छ बिजली और कार्बन प्रबंधन समाधानों का वैश्विक केंद्र बन सकता है. इससे वैश्विक ऊर्जा व्यापार की संरचना और दिशा दोनों में महत्वपूर्ण बदलाव संभव है.
इस संदर्भ में असली प्रश्न यह नहीं है कि खाड़ी क्षेत्र भविष्य की ऊर्जा प्रणाली में महत्वपूर्ण रहेगा या नहीं, बल्कि यह है कि कार्बन-मुक्त होती दुनिया में उसकी केंद्रीय भूमिका किस नए रूप में उभरेगी.
पारुल बख्शी ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन (ओआरएफ) मिडिल ईस्ट में एनर्जी एंड क्लाइमेट फेलो हैं.
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Parul Bakshi is Fellow – Energy and Climate at the Observer Research Foundation (ORF) Middle East, where her research spans the themes of energy transition, ...
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