अफ्रीका का भविष्य सिर्फ विदेशी मदद और कर्ज़ से तय नहीं होगा. जानिए क्यों वास्तविक विकास के लिए उसे अपनी पूंजी व्यवस्था और घरेलू निवेश को मजबूत करना होगा.
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दशकों से अफ्रीका में विकास की कहानी सहायता, रियायती वित्तीय व्यवस्थाओं और ऋण स्थिरता की भाषा में बताई जाती रही है. बहुपक्षीय मंचों में होने वाली चर्चाएँ आज भी राजकोषीय गुंजाइश, ऋण पुनर्गठन ढाँचों और अगली तरलता सहायता पर केंद्रित रहती हैं लेकिन यही दृष्टिकोण स्वयं समस्या को उजागर करता है. यदि महाद्वीप का भविष्य इस बात से तय होता रहेगा कि वह बाहरी वित्तीय प्रवाहों का प्रबंधन कितनी अच्छी तरह करता है, तो वह संरचनात्मक रूप से प्रतिक्रियात्मक ही बना रहेगा.
अब प्रश्न यह नहीं है कि अफ्रीका सहायता का प्रबंधन अधिक कुशलता से कैसे करे. वास्तविक प्रश्न यह है कि अफ्रीका अपनी पूंजी संरचना को कैसे पुनः डिज़ाइन करे ताकि सहायता विकास की आधारशिला बनने के बजाय उत्प्रेरक की भूमिका निभाए.
अब प्रश्न यह नहीं है कि अफ्रीका सहायता का प्रबंधन अधिक कुशलता से कैसे करे. वास्तविक प्रश्न यह है कि अफ्रीका अपनी पूंजी संरचना को कैसे पुनः डिज़ाइन करे ताकि सहायता विकास की आधारशिला बनने के बजाय उत्प्रेरक की भूमिका निभाए. सहायता से स्वायत्तता की ओर यह परिवर्तन वैचारिक नहीं, बल्कि संस्थागत है.
पिछले दो दशकों में अवसंरचना निर्माण, व्यापक आर्थिक स्थिरता और सामाजिक व्यय के वित्तपोषण के लिए संप्रभु ऋण प्रमुख साधन बन गया है. विश्व बैंक के अंतरराष्ट्रीय ऋण सांख्यिकी के अनुसार 2010 के बाद से उप-सहारा अफ्रीका का बाहरी सार्वजनिक ऋण काफी बढ़ा है, जिसका एक कारण अवसंरचना वित्तपोषण और आर्थिक मंदी के दौरान उधारी है.
अफ्रीका में अंतरराष्ट्रीय सहायता का भविष्य उसकी मात्रा से नहीं, बल्कि उसके कार्य से तय होगा.
जब किसी देश का विकास ज़्यादातर सरकारी ऋण से होता है, तो अर्थव्यवस्था बार-बार जोखिम में पड़ सकती है. ऋण लेना अपने आप में गलत नहीं है, क्योंकि यह विकास के लिए एक सामान्य वित्तीय साधन है. समस्या तब होती है जब देश अत्यधिक रूप से ऋण पर निर्भर हो जाता है. इसलिए केवल ऋण को संभालने की बजाय, देशों को अपनी पूंजी व्यवस्था (कैपिटल स्ट्रक्चर) को बेहतर तरीके से तैयार करना चाहिए ताकि अर्थव्यवस्था अधिक स्थिर और मजबूत बन सके.
अफ्रीका में अंतरराष्ट्रीय सहायता का भविष्य उसकी मात्रा से नहीं, बल्कि उसके कार्य से तय होगा. सहायता को खर्चों के वित्तपोषण से आगे बढ़कर पूंजी संरचना बनाने का माध्यम बनना होगा. इसे उत्पादक निवेश के जोखिम को कम करना चाहिए, घरेलू पूंजी को आकर्षित करना चाहिए और इक्विटी भागीदारी को बढ़ावा देना चाहिए. दूसरे शब्दों में, सहायता को केवल बैलेंस-शीट समर्थन से आगे बढ़कर निवेश प्लेटफॉर्म के निर्माण में योगदान देना चाहिए.
विकास वित्त संस्थान (DFIs) और बहुपक्षीय विकास बैंक पहले से ही ब्लेंडेड फाइनेंस जैसे मॉडलों पर प्रयोग कर रहे हैं, जिनमें प्रथम-हानि गारंटी, व्यवहार्यता अंतर अनुदान और जोखिम-साझेदारी उपकरणों का उपयोग कर निजी निवेश को आकर्षित किया जाता है. OECD के ब्लेंडेड फाइनेंस सिद्धांत इस दृष्टिकोण के लिए नीति ढांचा प्रदान करते हैं, हालांकि उनका कार्यान्वयन अभी असमान है. फिर भी, कई बार ब्लेंडेड फाइनेंस वास्तविक जोखिम हस्तांतरण के बजाय संप्रभु देनदारियाँ ही पैदा करता है. यदि लक्ष्य स्वायत्तता है, तो सहायता को संप्रभु गारंटी पर संरचनात्मक निर्भरता कम करनी होगी.
अफ्रीका के पेंशन फंड दीर्घकालिक बचत की बड़ी मात्रा का प्रबंधन करते हैं. OECD के अनुसार पिछले दशक में अफ्रीकी पेंशन परिसंपत्तियाँ लगातार बढ़ी हैं, लेकिन उनका बहुत छोटा हिस्सा ही अवसंरचना या औद्योगिक परियोजनाओं में निवेश किया जाता है.
अफ्रीका में अंतरराष्ट्रीय सहायता का भविष्य इस बात से नहीं मापा जाएगा कि कितनी राशि वितरित हुई, बल्कि इस बात से कि क्या उसने मजबूत घरेलू वित्तीय पारिस्थितिकी तंत्र को जन्म दिया.
निवेश में कमी की वजह सिर्फ पैसों की कमी नहीं होती, बल्कि नियमों और संस्थाओं से जुड़ी समस्याएँ भी होती हैं. कड़े नियम, कमजोर या अलग-अलग पूंजी बाजार, कम तैयार परियोजनाएँ और शासन से जुड़े जोखिम निवेशकों को निवेश करने से रोकते हैं. घरेलू पूंजी बढ़ाने के लिए स्पष्ट नियम, तैयार परियोजनाएँ और पेंशन फंड, क्षेत्रीय निवेश तथा सह-निवेश जैसे मॉडल जरूरी हैं, जिससे देश के अंदर से ही वित्तपोषण मजबूत हो सके.
पारंपरिक संप्रभु ऋण कठोर होते हैं. उनकी पुनर्भुगतान समय-सारिणी आर्थिक प्रदर्शन से स्वतंत्र होती है. वैश्विक आर्थिक अस्थिरता के समय यह कठोरता राजकोषीय दबाव को बढ़ा देती है. अंतरराष्ट्रीय संस्थानों, जैसे अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, ने GDP-लिंक्ड बॉन्ड और राज्य-निर्भर ऋण साधनों की संभावना पर विचार किया है. कुछ संप्रभु ऋणों में जलवायु-संवेदनशील प्रावधान भी शामिल किए जा रहे हैं.
अफ्रीका में पूंजी से जुड़े नए प्रयोग केवल कुछ खास प्रावधानों तक सीमित नहीं रहने चाहिए. अगर राजस्व साझा करने के मॉडल, इक्विटी निवेश और लंबी अवधि की रियायतों को मिलाकर वित्तीय व्यवस्था बनाई जाए, तो निवेशकों का लाभ केवल सरकारी गारंटी पर नहीं बल्कि परियोजना की वास्तविक सफलता पर निर्भर होगा. ऊर्जा, परिवहन और डिजिटल अवसंरचना जैसी परियोजनाएँ नियमित आय पैदा करती हैं, इसलिए इनके लिए ऐसी वित्तीय व्यवस्था बनाई जा सकती है जिसमें ऋण के साथ-साथ अन्य निवेश के तरीके भी शामिल हों.
मुद्रा जोखिम अफ्रीका की सबसे बड़ी संरचनात्मक कमजोरियों में से एक है. विदेशी मुद्रा में लिया गया ऋण सरकारों को विनिमय दर के झटकों के प्रति संवेदनशील बना देता है. स्थानीय मुद्रा में बॉन्ड बाजारों को मजबूत करना इस जोखिम को कम कर सकता है. अफ्रीकी विकास बैंक की अफ्रीकी वित्तीय बाज़ार पहल ने घरेलू ऋण बाजारों को विकसित करने और पारदर्शिता बढ़ाने में प्रगति की है. इसके साथ ही अफ्रीकी महाद्वीपीय मुक्त व्यापार क्षेत्र (AfCFTA) क्षेत्रीय पूंजी बाजारों और सीमा-पार निवेश प्लेटफार्मों के लिए नए अवसर प्रदान करता है. बड़े और एकीकृत बाजार बेहतर तरलता, पारदर्शी मूल्य निर्धारण और निवेशकों के विश्वास को बढ़ाते हैं.
सहायता से स्वायत्तता की ओर परिवर्तन केवल अफ्रीका की जिम्मेदारी नहीं है. वैश्विक वित्तीय शासन को भी विकसित होना होगा. G20 द्वारा बहुपक्षीय विकास बैंकों की पूंजी पर्याप्तता पर किए गए स्वतंत्र समीक्षा ने दिखाया कि ये बैंक अपनी क्रेडिट रेटिंग को प्रभावित किए बिना अधिक ऋण दे सकते हैं. विशेष आहरण अधिकार (SDRs) को विकास बैंकों की ओर पुनर्निर्देशित करने का विचार भी गति पकड़ रहा है.
वैश्विक वित्तीय व्यवस्था को केवल संकट संभालने के बजाय लंबे समय के सस्ते निवेश और जोखिम साझा करने पर ध्यान देना चाहिए, तभी अंतरराष्ट्रीय सहायता निर्भरता बढ़ाने के बजाय देशों को मजबूत बना सकती है.
आवश्यक परिवर्तन तकनीकी से अधिक वैचारिक है. ऋण प्रबंधन का उद्देश्य मौजूदा दायित्वों को संभालना और वित्तीय स्थिरता बनाए रखना होता है. इसके विपरीत, पूंजी डिज़ाइन यह प्रश्न पूछता है कि वित्तपोषण को शुरुआत से ही इस तरह कैसे संरचित किया जाए कि दीर्घकालिक जोखिम और बाहरी झटकों की संवेदनशीलता कम हो.
अफ्रीका के विकास के लिए एक विविध पूंजी संरचना में कई वित्तीय परतें शामिल हो सकती हैं—घरेलू पेंशन बचत, अधिक इक्विटी भागीदारी, जोखिम कम करने वाली रियायती पूंजी, राजस्व-संबद्ध वित्तीय साधन, स्थानीय मुद्रा बॉन्ड बाजार और सीमित लेकिन रणनीतिक संप्रभु ऋण. संप्रभु ऋण सार्वजनिक सेवाओं और सामाजिक अवसंरचना के लिए आवश्यक रहेगा, लेकिन इसे विकास की आधारशिला नहीं बल्कि व्यापक वित्तीय ढांचे की एक परत होना चाहिए.
सहायता से स्वायत्तता की ओर परिवर्तन मूलतः एक राजनीतिक प्रक्रिया है. इसके लिए संस्थागत समन्वय, नियामकीय सुधार और मजबूत परियोजना तैयारी आवश्यक है. सरकारों को निवेश योग्य परियोजनाओं और क्रियान्वयन क्षमता को प्राथमिकता देनी होगी, जबकि बहुपक्षीय संस्थानों को जोखिम हस्तांतरण से आगे बढ़कर वास्तविक जोखिम-साझेदारी को बढ़ावा देना होगा.
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि विकास की कहानी को बदलना होगा. अफ्रीका को उसके वित्तीय अंतराल से नहीं, बल्कि उसकी पूंजी संरचना से परिभाषित किया जाना चाहिए. यदि सहायता को इस प्रकार पुनर्गठित किया जाए कि वह पूंजी संरचना के निर्माण में मदद करे, तो वह निर्भरता का साधन नहीं बल्कि आर्थिक संप्रभुता का उत्प्रेरक बन सकती है. अफ्रीका में अंतरराष्ट्रीय सहायता का भविष्य इस बात से नहीं मापा जाएगा कि कितनी राशि वितरित हुई, बल्कि इस बात से कि क्या उसने मजबूत घरेलू वित्तीय पारिस्थितिकी तंत्र को जन्म दिया. स्वायत्तता तब शुरू होती है जब विकास योजनाबद्ध और सुविचारित वित्तीय संरचनाओं से संचालित होता है. तभी पूंजी भविष्य को गिरवी रखे बिना वास्तविक परिवर्तन ला सकती है.
पामला गोपाल, AUDA-NEPAD की आर्थिक विश्लेषण और दूरदर्शिता इकाई में अफ्रीका नीति ब्रिज टैंक कार्यक्रम की प्रमुख हैं।
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Pamla Gopaul is Head, Africa Policy Bridge Tank Programme, AUDA-NEPAD Economic Analysis and Foresight Unit. ...
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