Authors : Shoba Suri | Rohini Saran

Expert Speak Health Express
Published on May 05, 2026 Updated 0 Hours ago

भारत में एक बच्चे की कहानी गर्भ में ही शुरू हो जाती है. पहले 1000 दिनों में उसे सही पोषण, देखभाल और प्यार मिले तो उसका दिमाग और शरीर मजबूत बनता है. लेकिन अभी भी कई बच्चों को सही खाना और आदतें नहीं मिल पातीं इसलिए अब फोकस सिर्फ पहुंच नहीं बल्कि बेहतर गुणवत्ता पर है. जानें, कैसे छोटे-छोटे बदलाव बच्चों की पूरी जिंदगी बदल सकते हैं.

हर बच्चे के लिए क्यों खास हैं ये 1000 दिन

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जैसे ही भारत पोषण पखवाड़ा 2026  मना रहा है, पहले 1000 दिनों-गर्भावस्था से लेकर बच्चे के दूसरे जन्मदिन तक-पर राष्ट्रीय ध्यान हमें अपनी प्रगति की समीक्षा करने और प्राथमिकताओं को और स्पष्ट करने का अवसर देता है. यह अवधि व्यापक रूप से मानव पूंजी निर्माण की आधारशिला मानी जाती है जो न केवल जीवन रक्षा बल्कि संज्ञानात्मक विकास, सीखने के परिणामों और दीर्घकालिक उत्पादकता को भी प्रभावित करती है. भारत ने सेवाओं का विस्तार और संस्थागत मजबूती हासिल की है,अब फोकस आहार गुणवत्ता, व्यवहार परिवर्तन और कमजोर वर्गों तक लाभ पहुंचाने पर है.

पहले 1000 दिनों-गर्भावस्था से लेकर बच्चे के दूसरे जन्मदिन तक-पर राष्ट्रीय ध्यान हमें अपनी प्रगति की समीक्षा करने और प्राथमिकताओं को और स्पष्ट करने का अवसर देता है. यह अवधि व्यापक रूप से मानव पूंजी निर्माण की आधारशिला मानी जाती है जो न केवल जीवन रक्षा बल्कि संज्ञानात्मक विकास, सीखने के परिणामों और दीर्घकालिक उत्पादकता को भी प्रभावित करती है.

भारत की प्रगति को समझने का एक उपयोगी तरीका यह है कि पहले 1000 दिनों को एक निरंतर प्रक्रिया के रूप में देखा जाए, जिसमें मातृ स्वास्थ्य, शिशु आहार, आहार विविधीकरण और देखभाल के वातावरण शामिल हैं. इन सभी चरणों में सार्वजनिक प्रणालियों ने अपनी पहुंच का विस्तार किया है. अब जो उभर रहा है, वह एक दूसरी पीढ़ी का एजेंडा है, जो केवल पहुंच पर नहीं बल्कि गुणवत्ता और प्रभाव पर भी केंद्रित है. भारत ने सेवाओं का विस्तार किया है, अब आगे की प्रगति आहार गुणवत्ता, व्यवहार परिवर्तन और कमजोर वर्गों तक पहुँच पर निर्भर है.

सरकार द्वारा नीतिगत कदम  

मातृ स्वास्थ्य इस पूरी प्रक्रिया का प्रारंभिक बिंदु बना हुआ है. स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5, 2019–21) के आंकड़े प्रसवपूर्व देखभाल (एएनसी) के उपयोग में सुधार दिखाते हैं, जो अग्रिम पंक्ति के स्वास्थ्य तंत्र के साथ बेहतर जुड़ाव को दर्शाता है. महिलाओं में उच्च एनीमिया स्तर दर्शाता है कि सेवाओं के साथ आहार विविधता और सूक्ष्म पोषक तत्वों जैसे पोषण हस्तक्षेप भी जरूरी हैं.

सांख्यिकी एवं कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय के हालिया साक्ष्य, जो घरेलू उपभोग व्यय सर्वेक्षण (HCES, 2022–23 और 2023–24) पर आधारित है, इस चर्चा में एक महत्वपूर्ण आयाम जोड़ते हैं. जबकि औसत कैलोरी सेवन सामान्यतः पर्याप्त है, आहार पैटर्न अभी भी असंतुलित हैं-जिसमें अनाज पर अधिक निर्भरता बनी हुई है और दालों, फलों तथा सब्जियों जैसे पोषक तत्वों से भरपूर खाद्य पदार्थों का सेवन पर्याप्त नहीं है. ये निष्कर्ष इस ओर संकेत करते हैं कि अब नीति का ध्यान केवल खाद्य उपलब्धता सुनिश्चित करने से हटकर आहार की गुणवत्ता सुधारने पर होना चाहिए.

NFHS-5 के आंकड़े बताते हैं कि 6–23 महीने के बच्चों में केवल एक सीमित हिस्से को ही न्यूनतम स्वीकार्य आहार मिल पाता है. यह अंतर आर्थिक सीमाओं, आहार विविधता की कमी, समय की कमी और पारंपरिक प्रथाओं से जुड़ा है, जबकि पोषण पखवाड़ा का जोर स्थानीय पौष्टिक भोजन और बेहतर आहार व्यवहार पर है.

सकारात्मक रूप से, शुरुआती आहार प्रथाएँ यह दिखाती हैं कि निरंतर नीतिगत ध्यान से ठोस परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं. स्तनपान प्रथाओं में सुधार राष्ट्रीय पहलों और समुदाय स्तर पर पोषण अभियान (POSHAN Abhiyaan) के तहत किए गए प्रयासों के संयुक्त प्रभाव को दर्शाता है. ये उपलब्धियां महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि पर्याप्त साक्ष्य बताते हैं कि स्तनपान से बाल मृत्यु दर में कमी और संज्ञानात्मक विकास में सुधार होता है. साथ ही, संरचनात्मक बाधाएं-विशेषकर असंगठित क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं के लिए-अब भी आहार प्रथाओं को प्रभावित करती हैं, जो मातृत्व सुरक्षा और कार्यस्थल पर सहूलियत जैसी सहायक नीतियों की आवश्यकता को उजागर करती हैं. 

पूरक आहार  वह क्षेत्र है जहाँ सबसे अधिक तेजी से प्रगति की आवश्यकता है. NFHS-5 के आंकड़े बताते हैं कि 6–23 महीने के बच्चों में केवल एक सीमित हिस्से को ही न्यूनतम स्वीकार्य आहार मिल पाता है. यह अंतर आर्थिक सीमाओं, आहार विविधता की कमी, समय की कमी और पारंपरिक प्रथाओं से जुड़ा है, जबकि पोषण पखवाड़ा का जोर स्थानीय पौष्टिक भोजन और बेहतर आहार व्यवहार पर है.

पोषण को प्राथमिकता देना आवश्यक

भारत का खाद्य परिवेश भी तेजी से बदल रहा है. NSSO के उपभोग आंकड़े बताते हैं कि आहार में धीरे-धीरे विविधता आ रही है, लेकिन साथ ही प्रसंस्कृत और पैकेज्ड खाद्य पदार्थों का सेवन भी बढ़ रहा है. यह बदलता परिदृश्य नए जोखिम पैदा कर रहा है, जिससे कुपोषण का दोहरा बोझ बढ़ रहा है. शिशु एवं बाल आहार (IYCF) से जुड़े संकेतकों में सुधार मुख्यतः अधिक समृद्ध और शिक्षित परिवारों में केंद्रित है. सबसे गरीब वर्गों के बच्चों को अभी भी पर्याप्त आहार और देखभाल तक कम पहुँच मिलती है. क्षेत्रीय असमानताएँ भी स्पष्ट हैं-केरल और तमिलनाडु जैसे राज्य अधिकांश संकेतकों पर बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं, जबकि कई मध्य और पूर्वी राज्य पीछे हैं. यह असमान प्रगति इस बात को रेखांकित करती है कि एक समान राष्ट्रीय दृष्टिकोण के बजाय स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार रणनीतियाँ बनानी होंगी.

पोषण पखवाड़ा 2026 इस एजेंडा को नई गति देता है, अब ध्यान प्रभाव को गहरा करने पर होना चाहिए, ताकि हर बच्चे को केवल सेवाओं की उपलब्धता ही नहीं, बल्कि बेहतर पोषण, देखभाल और विकास का लाभ मिल सके. पहले 1000 दिन एक सीमित लेकिन परिवर्तनकारी अवसर प्रदान करते हैं.

नीतिगत स्तर पर, भारत ने इस दिशा में कदम बढ़ाना शुरू कर दिया है. पोषण को प्रारंभिक प्रोत्साहन, संवेदनशील देखभाल और स्वास्थ्य के साथ जोड़ते हुए ‘नर्चरिंग केयर’ ढांचे की ओर बढ़ना वैश्विक और राष्ट्रीय सोच में बदलाव को दर्शाता है. सक्षम आंगनवाड़ी और पोषण ट्रैकर जैसी पहलें सेवा वितरण और निगरानी को मजबूत कर रही हैं, जबकि पोषण पखवाड़ा जैसे अभियान बड़े स्तर पर व्यवहार परिवर्तन को बढ़ावा दे रहे हैं.

तीन प्रमुख प्राथमिकताएँ 

पहली, नीति का फोकस अब कैलोरी से आगे बढ़कर आहार की गुणवत्ता, विविधता और सूक्ष्म पोषक तत्वों पर होना चाहिए.  दूसरी, पूरक आहार को बाल पोषण रणनीतियों का मुख्य स्तंभ बनाना होगा, जिसे आपूर्ति पक्ष के उपायों और व्यवहार परिवर्तन संचार से समर्थन मिले. तीसरी, निरंतर व्यवहार परिवर्तन को कार्यक्रमों के केंद्र में रखना होगा. भारत ने पहले 1000 दिनों में पोषण सुधार के लिए एक मजबूत आधार तैयार कर लिया है. जैसे ही पोषण पखवाड़ा 2026 इस एजेंडा को नई गति देता है, अब ध्यान प्रभाव को गहरा करने पर होना चाहिए, ताकि हर बच्चे को केवल सेवाओं की उपलब्धता ही नहीं, बल्कि बेहतर पोषण, देखभाल और विकास का लाभ मिल सके. पहले 1000 दिन एक सीमित लेकिन परिवर्तनकारी अवसर प्रदान करते हैं. निरंतर प्रतिबद्धता, सामुदायिक भागीदारी और राष्ट्रीय व क्षेत्रीय अनुभवों से सीख के साथ, भारत इस अवसर को एक स्वस्थ और अधिक उत्पादक भविष्य की नींव में बदल सकता है.


शोबा सूरी ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में हेल्थ इनिशिएटिव की सीनियर फेलो हैं.

रोहिणी सरन जन स्वास्थ्य पोषण और सीएसआर विशेषज्ञ हैं.

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