इस महीने, जब फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों भारत आएंगे तो यह सिर्फ राजनैतिक मुलाकात नहीं है. यह आर्टिकल दिखाता है कि भारत–फ्रांस अंतरिक्ष सहयोग दशकों से कैसे मजबूत होकर अब नए मिशन और निजी पहल के साथ आगे बढ़ रहा है.
भारत–फ्रांस अंतरिक्ष सहयोग रणनीतिक स्वायत्तता और लंबे समय से बने तकनीकी भरोसे पर आधारित है. दोनों देशों ने दशकों से मिलकर रॉकेट, उपग्रह, पृथ्वी अवलोकन और प्रक्षेपण तकनीक के क्षेत्र में काम किया है. यह साझेदारी केवल वैज्ञानिक सहयोग तक सीमित नहीं रही बल्कि सुरक्षा और रणनीतिक जरूरतों से भी जुड़ी रही है. अब जब अंतरिक्ष क्षेत्र में निजी कंपनियों की भागीदारी और व्यावसायिक गतिविधियां बढ़ रही हैं तो यह सहयोग नए रूप में आगे बढ़ रहा है. भारत और फ्रांस मिलकर नई तकनीक, संयुक्त मिशन और व्यावसायिक अवसरों के जरिए बदलती अंतरिक्ष व्यवस्था को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं.
छह दशकों से अधिक समय से भारत और फ्रांस अंतरिक्ष क्षेत्र में सहयोग कर रहे हैं और वैज्ञानिक व रणनीतिक उद्देश्यों पर आधारित साझेदारी बना रहे हैं. इस महीने के अंत में फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों भारत–फ्रांस नवाचार वर्ष की शुरुआत और नई दिल्ली में एआई इम्पैक्ट समिट के लिए भारत आ रहे हैं. इस दौरान द्विपक्षीय सहयोग के एक और महत्वपूर्ण लेकिन अपेक्षाकृत शांत क्षेत्र-अंतरिक्ष-पर भी ध्यान देने की जरूरत है.
शीत युद्ध के दौरान नई दिल्ली और पेरिस दोनों रणनीतिक स्वायत्तता के मजबूत समर्थक थे. रक्षा और परमाणु ऊर्जा के साथ अंतरिक्ष को तीसरा ऐसा स्तंभ माना गया, जिसमें दोनों देशों के हित गहराई से जुड़े थे. इसी संदर्भ में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) और फ्रांस की संस्था सेंटर नेशनल डी’एट्यूड स्पैटियल (CNES) ने 1964 में सहयोग शुरू किया.
इस महीने के अंत में फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों भारत–फ्रांस नवाचार वर्ष की शुरुआत और नई दिल्ली में एआई इम्पैक्ट समिट के लिए भारत आ रहे हैं. इस दौरान द्विपक्षीय सहयोग के एक और महत्वपूर्ण लेकिन अपेक्षाकृत शांत क्षेत्र-अंतरिक्ष-पर भी ध्यान देने की जरूरत है.
दोनों संस्थाओं-इसरो और सीएनईएस-के इस सहयोग के पीछे स्पष्ट उद्देश्य थे. सीएनईएस के पास प्रशिक्षित मानव संसाधन की कमी थी और उसे कुशल तकनीशियन व इंजीनियरों की जरूरत थी. फ्रांस की अंतरिक्ष एजेंसी सीएनईएस उस समय अपने सेंटौर साउंडिंग रॉकेटों के परीक्षण के लिए उपयुक्त स्थान की तलाश में थी. केरल में स्थित थुंबा भूमध्य रॉकेट प्रक्षेपण केंद्र (TERLS) भूमध्य रेखा के पास होने के कारण वैज्ञानिक प्रयोगों और रॉकेट परीक्षणों के लिए बहुत अनुकूल माना जाता था. इसलिए फ्रांस इसे अपने सेंटौर साउंडिंग रॉकेट के परीक्षण स्थल के रूप में उपयोग करना चाहता था. इससे उसे बेहतर परीक्षण सुविधाएँ और वास्तविक परिस्थितियों में डेटा प्राप्त करने का अवसर मिलता.
दूसरी तरफ, भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) अपने अंतरिक्ष कार्यक्रम की शुरुआती अवस्था में था और उसे तकनीकी ज्ञान व विशेषज्ञता की जरूरत थी. इसरो का लक्ष्य स्वदेशी साउंडिंग रॉकेट विकसित करना और आगे चलकर तरल प्रणोदन इंजन बनाने की क्षमता हासिल करना था. इसलिए दोनों पक्षों के हित एक-दूसरे से मेल खाते थे-फ्रांस को परीक्षण स्थल चाहिए था और भारत को तकनीकी सहयोग. इसी समान जरूरत ने दोनों देशों के बीच मजबूत अंतरिक्ष सहयोग की नींव रखी.
1960 के दशक के मध्य तक फ्रांस भारत में 50 सेंटौर प्रकार के साउंडिंग रॉकेट बनाने पर सहमत हो गया. इस समझौते के साथ हुए तकनीक हस्तांतरण ने इसरो को 1967 में सेंटौर के स्वदेशी संस्करण ‘रोहिणी’ रॉकेट को प्रक्षेपित करने में सक्षम बनाया, जिसका उपयोग आज भी मौसम और वायुमंडलीय अध्ययन के लिए होता है. फ्रांसीसी सेंटौर और भारतीय रोहिणी रॉकेट 1960, 1970 और 1980 के दशकों में कई बार साथ-साथ सफलतापूर्वक प्रक्षेपित हुए.
इसके बाद भारत–फ्रांस अंतरिक्ष सहयोग का फोकस इसरो के कक्षीय रॉकेट कार्यक्रम के लिए तरल इंजन बनाने पर चला गया. 1974 में इसरो और सोसाइटी यूरोपियन डी प्रोपल्शन (SEP, बाद में सफरान) के बीच समझौता हुआ, जिसके तहत एरियन कार्यक्रम के लिए इसरो के वैज्ञानिकों के 100 मानव-वर्ष के योगदान के बदले तरल रॉकेट इंजन तकनीक धीरे-धीरे भारत को हस्तांतरित की गई. 1980 के दशक के मध्य तक एरियन रॉकेट में प्रयुक्त फ्रांसीसी वाइकिंग इंजन तकनीक को इसरो ने ‘विकास’ इंजन के रूप में स्वदेशी बना लिया. आगे चलकर यही इंजन पीएसएलवी का आधार बना.
फ्रांस की अंतरिक्ष एजेंसी सीएनईएस उस समय अपने सेंटौर साउंडिंग रॉकेटों के परीक्षण के लिए उपयुक्त स्थान की तलाश में थी. केरल में स्थित थुंबा भूमध्य रॉकेट प्रक्षेपण केंद्र भूमध्य रेखा के पास होने के कारण वैज्ञानिक प्रयोगों और रॉकेट परीक्षणों के लिए बहुत अनुकूल माना जाता था. इसलिए फ्रांस इसे अपने सेंटौर साउंडिंग रॉकेट के परीक्षण स्थल के रूप में उपयोग करना चाहता था.
एरियन और पीएसएलवी/जीएसएलवी की सफलता, जिसने अंतरिक्ष प्रक्षेपण में अमेरिका–सोवियत एकाधिकार को तोड़ा, इसरो–सीएनईएस सहयोग का परिणाम थी. भारत का पहला भूस्थिर संचार उपग्रह APPLE 1981 में फ्रेंच गयाना के कौरू से एरियन-1 द्वारा प्रक्षेपित हुआ. तब से दर्जनों GSAT उपग्रह एरियन से छोड़े गए, जबकि सीएनईएस के SPOT पृथ्वी अवलोकन उपग्रह श्रीहरिकोटा से पीएसएलवी द्वारा प्रक्षेपित हुए.
2000 के दशक में दोनों एजेंसियों ने पृथ्वी अवलोकन उपग्रहों के संयुक्त विकास के लक्ष्य के साथ सहयोग बढ़ाया. 2008 के समझौते के बाद 2011 में मेघा-ट्रॉपिक्स और 2013 में सरल/अल्टिका मिशन सफल रहे. 2013 में सीएनईएस ने बेंगलुरु में अपना कार्यालय खोला. आज नासा के बाद इसरो उसका दूसरा सबसे बड़ा साझेदार है.
नवीनतम संयुक्त कार्यक्रम ‘त्रिश्ना’ इन्फ्रारेड थर्मल अवलोकन मिशन है. सीएनईएस 2027 के गगनयान मानव अंतरिक्ष मिशन में प्रशिक्षण व विशेषज्ञता दे रहा है. यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ESA) भी भारत–फ्रांस के संयुक्त अंतरिक्ष प्रयासों में सहयोग दे रही है, खासकर मानव अंतरिक्ष उड़ान और उन्नत तकनीकी प्रशिक्षण जैसे क्षेत्रों में. इससे परियोजनाओं को अंतरराष्ट्रीय अनुभव और अतिरिक्त तकनीकी मजबूती मिलती है. दूसरी ओर, अंतरिक्ष क्षेत्र अब केवल सरकारी एजेंसियों तक सीमित नहीं रहा. कई निजी कंपनियां और स्टार्टअप भी रॉकेट, उपग्रह और डेटा सेवाओं में सक्रिय हो रहे हैं, जिससे यह क्षेत्र अधिक विविध और प्रतिस्पर्धी बन गया है. इस बदलते माहौल में भारत और फ्रांस मिलकर ज्यादा लचीला, साझा और विकेंद्रीकृत सहयोग मॉडल तैयार कर रहे हैं जिसमें सरकारी और निजी दोनों क्षेत्र शामिल हों.
नई निजी कंपनियों की बढ़ती भागीदारी और रणनीतिक चुनौतियों के कारण अंतरिक्ष अब केवल वैज्ञानिक अनुसंधान तक सीमित नहीं रहा. ऐसे जटिल माहौल में भारत और फ्रांस अपने लंबे समय से चले आ रहे सहयोग के अनुभव का सहारा ले रहे हैं. यह साझेदारी रणनीतिक स्वायत्तता की साझा सोच पर आधारित है और दशकों से बने तकनीकी भरोसे से मजबूत हुई है.
2018 के संयुक्त दृष्टि दस्तावेज ने नए ढांचे को बढ़ावा दिया. 2023 से वार्षिक स्ट्रैटेजिक स्पेस डायलॉग शुरू हुआ, जिसमें सुरक्षा और जिम्मेदार अंतरिक्ष उपयोग पर चर्चा होती है. रक्षा क्षेत्र में स्पेस सिचुएशनल अवेयरनेस (SSA) पर सहयोग बढ़ाया गया है. 2019 से दोनों देश समुद्री निगरानी उपग्रहों के समूह पर काम कर रहे हैं, जो भारत की समुद्री सीमाओं की निगरानी के लिए महत्वपूर्ण है. व्यावसायिक दृष्टिकोण भी मजबूत हुआ है. 2023 और 2025 में फ्रेंच स्पेस डेज़ इंडिया आयोजित हुए. 2024 में एरियनस्पेस और न्यू स्पेस इंडिया लिमिटेड (NSIL) ने व्यावसायिक प्रक्षेपण सहयोग के लिए समझौता किया. दोनों देश पुन: प्रयोज्य प्रक्षेपण यान-कैलिस्टो और आरएलवी-पर भी काम कर रहे हैं.
राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की भारत यात्रा के दौरान मुख्य रूप से रक्षा, उभरती हुई तकनीकों और पिछले वर्ष पेरिस में हस्ताक्षरित द्विपक्षीय एआई रोडमैप की प्रगति पर ध्यान केंद्रित किया जा सकता है. इन विषयों के कारण सुर्खियाँ बनना स्वाभाविक है, लेकिन फ्रांस–भारत सहयोग का एक ऐसा पहलू भी है जो कम चर्चा में रहते हुए भी लगातार मजबूत होता जा रहा है. यह पहलू है-अंतरिक्ष सहयोग, जो पर्दे के पीछे चुपचाप आगे बढ़ रहा है और दोनों देशों के रिश्तों में दीर्घकालिक महत्व रखता है.
आज के समय में अंतरिक्ष क्षेत्र पहले की तुलना में कहीं अधिक प्रतिस्पर्धी और व्यावसायिक हो चुका है. नई निजी कंपनियों की बढ़ती भागीदारी और रणनीतिक चुनौतियों के कारण अंतरिक्ष अब केवल वैज्ञानिक अनुसंधान तक सीमित नहीं रहा. ऐसे जटिल माहौल में भारत और फ्रांस अपने लंबे समय से चले आ रहे सहयोग के अनुभव का सहारा ले रहे हैं. यह साझेदारी रणनीतिक स्वायत्तता की साझा सोच पर आधारित है और दशकों से बने तकनीकी भरोसे से मजबूत हुई है.
यही मजबूत आधार दोनों देशों को भविष्य के अंतरिक्ष सहयोग को दिशा देने में सक्षम बनाता है. बिना ज्यादा शोर-शराबे के, यह सहयोग भारत और फ्रांस की अंतरिक्ष महत्वाकांक्षाओं को आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभा रहा है और आने वाले वर्षों में द्विपक्षीय रिश्तों को और गहराई देने की पूरी क्षमता रखता है.
गुइलौम गैंडेलिन ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के स्ट्रेटेजिक स्टडीज प्रोग्राम में विजिटिंग फेलो हैं.
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Guillaume Gandelin is a Visiting Fellow with the Strategic Studies Programme, Observer Research Foundation. His research focuses on the India-EU and India-France security and defence ...
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