Author : Nilanjan Ghosh

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Published on May 08, 2026 Updated 0 Hours ago

पश्चिम बंगाल अब ऐसे मोड़ पर है जहाँ सियासी बदलाव राज्य के आर्थिक ढांचे को फिर से दुरुस्त कर सकता है. सही शासन, बेहतर बुनियादी ढांचा और कृषि- शहरी विकास का संतुलन ही राज्य की विकास कहानी को नई तकदीर दे सकता है. जानें कैसे यह बदलाव बंगाल को फिर से देश की तरक़्क़ी की राह का अहम मरकज़ बना सकती है.

बंगाल: सियासत के मोड़ पर खड़ा नया दौर

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4 मई 2026 को हुए पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों से एक निर्णायक जनादेश सामने आया. भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की जीत ने 49 वर्षों से चले आ रहे टकरावपूर्ण संघवाद के दौर का अंत कर दिया-ऐसा केंद्र–राज्य संबंध जो विवादों, विरोधाभासों और वैचारिक तनावों से चिह्नित रहा है, और जो हाल के वर्षों में और अधिक तीव्र हो गया था. पश्चिम बंगाल में यह राजनीतिक परिवर्तन केवल सीमित प्रशासनिक सुधारों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि इसे एक संरचनात्मक आर्थिक पुनर्गठन में बदलना आवश्यक है. दशकों के नीतिगत ठहराव, संस्थागत क्षरण और औद्योगिक अवसरों के चूक जाने के बाद, नई सरकार के पास बंगाल को भारत की विकास गाथा में पुनः स्थापित करने का अवसर है. संभावनाएं मौजूद हैं, लेकिन अब तक आवश्यक समन्वय का अभाव रहा है, जिसे सुधारने की आवश्यकता है.

आज पश्चिम बंगाल भारत की छठी सबसे बड़ी राज्य अर्थव्यवस्था है, जिसका 2025–26 में अनुमानित सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP) लगभग 20.3 लाख करोड़ रुपये है. फिर भी, इस आकार के भीतर एक संरचनात्मक असंतुलन छिपा है. राज्य के उत्पादन में सेवाक्षेत्र का योगदान लगभग 55 प्रतिशत है, जबकि उद्योग का लगभग 24 प्रतिशत और कृषि का लगभग 21 प्रतिशत है. यद्यपि अर्थव्यवस्था सेवा-प्रधान दिखाई देती है. परिणामस्वरूप, यह समयपूर्व तृतीयकरण का एक क्लासिक उदाहरण है, जिसमें छिपी हुई बेरोजगारी और ठहरी हुई उत्पादकता भी शामिल है.

पश्चिम बंगाल में यह राजनीतिक परिवर्तन केवल सीमित प्रशासनिक सुधारों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि इसे एक संरचनात्मक आर्थिक पुनर्गठन में बदलना आवश्यक है. दशकों के नीतिगत ठहराव, संस्थागत क्षरण और औद्योगिक अवसरों के चूक जाने के बाद, नई सरकार के पास बंगाल को भारत की विकास गाथा में पुनः स्थापित करने का अवसर है.

आगे, राज्य के सापेक्ष आर्थिक पतन को भी समझना आवश्यक है. 1960–70 के दशक में पश्चिम बंगाल प्रति व्यक्ति शुद्ध राज्य घरेलू उत्पाद (NSDP) के मामले में लगातार तीसरे स्थान के आसपास रहता था, जहाँ आय स्तर राष्ट्रीय औसत का लगभग 115–125 प्रतिशत था. लेकिन 1970 के दशक के उत्तरार्ध से इसकी स्थिति में गिरावट शुरू हुई, जब उस समय की आर्थिक नीतियों ने औद्योगीकरण में गिरावट, आर्थिक अलगाव, धीमी संरचनात्मक परिवर्तन प्रक्रिया और पश्चिमी तथा दक्षिणी राज्यों की तुलना में कमजोर निवेश प्रवृत्तियों को जन्म दिया. आज पश्चिम बंगाल प्रति व्यक्ति NSDP रैंकिंग में लगभग 23वें से 28वें स्थान के बीच पहुँच गया है, जहाँ प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत का लगभग 80–85 प्रतिशत है. फिर भी, प्राकृतिक संसाधनों, प्रारंभिक आधार और कनेक्टिविटी के रूप में इसमें अभी भी छिपी हुई क्षमता मौजूद है. इसलिए, आगे की चुनौती पूरी तरह से नए सिरे से निर्माण करने की नहीं, बल्कि आर्थिक ढांचे को पुनः संतुलित करने की है.

संतुलित आर्थिक संरचना की आवश्यकता 

सबसे पहली और मूलभूत प्राथमिकता कानून-व्यवस्था को बहाल करना और आर्थिक शासन को एक विश्वसनीय सार्वजनिक वस्तु के रूप में स्थापित करना है. निवेश केवल प्रोत्साहनों से नहीं, बल्कि स्थिरता और पूर्वानुमेयता से आता है. हालांकि बंगाल निवेश प्रस्तावों को आकर्षित करता रहा है और हाल के वर्षों में कर संग्रह तथा औद्योगिक विकास में सुधार भी हुआ है, लेकिन भ्रष्टाचार, ‘सिंडिकेट राज’ (संगठित वसूली और भ्रष्टाचार की व्यवस्था), नियामकीय अनिश्चितता और संस्थागत विश्वसनीयता को लेकर चिंताओं ने निवेशकों के भरोसे को प्रभावित किया है. बंगाल का आर्थिक पुनर्जीवन संस्थागत विश्वसनीयता की संप्रभुता से ही शुरू होगा.

दूसरा, बंगाल को फिर से उद्योगों को मजबूत करना होगा. पहले जूट और इंजीनियरिंग जैसे उद्योग कमजोर हो गए और नए मौके भी छूट गए. आज उद्योग का योगदान कम है, लेकिन बढ़ने की संभावना है. अलग-अलग क्षेत्रों में उद्योग क्लस्टर बनाकर, अच्छी सुविधाएं, आसान अनुमति और श्रमिकों के लिए सुरक्षा के साथ विकास को तेज किया जा सकता है. इसके अतिरिक्त, सरकार को एमएसएमई के लिए उत्पादन और निर्यात से जुड़ी प्रोत्साहन योजनाएं विकसित करनी होगी. हाल ही में एक ORF पेपर इस दिशा में मार्गदर्शन देता है. अब ध्यान भूमि राजनीति से हटाकर भूमि उत्पादकता की अर्थव्यवस्था पर केंद्रित करना होगा.

पश्चिम बंगाल को फिर से उद्योगों को मजबूत करना होगा. पहले जूट और इंजीनियरिंग जैसे उद्योग कमजोर हो गए और नए मौके भी छूट गए. आज उद्योग का योगदान कम है, लेकिन बढ़ने की संभावना है. अलग-अलग क्षेत्रों में उद्योग क्लस्टर बनाकर, अच्छी सुविधाएं, आसान अनुमति और श्रमिकों के लिए सुरक्षा के साथ विकास को तेज किया जा सकता है.

तीसरा, कृषि को केवल आजीविका (subsistence) क्षेत्र के रूप में नहीं, बल्कि कृषि-औद्योगिक मूल्य श्रृंखलाओं की आधारशिला के रूप में पुनर्परिभाषित करना होगा. पश्चिम बंगाल भारत के अग्रणी कृषि राज्यों में से एक है-यह चावल और सब्जियों का सबसे बड़ा उत्पादक है तथा मछली और आलू के उत्पादन में भी शीर्ष राज्यों में शामिल है. इसके बावजूद, राष्ट्रीय उत्पादन में महत्वपूर्ण योगदान देने के बाद भी कृषि से अपेक्षाकृत कम आय होती है, जिसका कारण खंडित मूल्य श्रृंखलाएं और सीमित प्रसंस्करण क्षमता है. इसके अलावा, संचालन के विस्तार की अपार संभावनाएं अभी भी मौजूद हैं. पश्चिम बंगाल भूमि सुधार अधिनियम 1955 के तहत भूमि-सीमा प्रावधानों (1960–70 के दशक में और सुदृढ़ किए गए) ने अतिरिक्त भूमि को छोटे स्वामित्व इकाइयों में बांटकर लघु और सीमांत जोतों का विस्तार किया. उत्तराधिकार और जनसंख्या दबाव से भूमि छोटे-छोटे हिस्सों में बंट गई, जिससे उत्पादन क्षमता घटी. समाधान है-खेती का विस्तार और बेहतर बाजार पहुँच. इसके लिए सुरक्षित भूमि-लीज, मजबूत FPOs, मशीनरी और सिंचाई जैसी साझा सुविधाएं, तथा कृषि-प्रसंस्करण, कोल्ड-चेन और निर्यात को बढ़ावा देना जरूरी है. मत्स्य और जलीय कृषि, जिनका वार्षिक उत्पादन 2 मिलियन टन से अधिक है, उच्च मूल्य की दिशा प्रदान करते हैं. अब तक मूल्य श्रृंखला की अक्षमताओं ने बंगाल की कृषि को पीछे रखा है; समाधान इन्हें दूर करने में है.

चौथा, शहरीकरण-विशेषकर कोलकाता महानगर क्षेत्र-को राज्य के विकास इंजन के रूप में स्थापित करना होगा. यद्यपि सेवाक्षेत्र पहले से ही अर्थव्यवस्था में प्रमुख है, फिर भी कोलकाता एक वैश्विक प्रतिस्पर्धी शहरी अर्थव्यवस्था के रूप में विकसित नहीं हो पाया है. इसके बावजूद, इसकी आर्थिक क्षमता स्पष्ट है: दुर्गा पूजा जैसे एक सांस्कृतिक-आर्थिक आयोजन से ही प्रतिवर्ष लगभग 65,000 करोड़ रुपये की आर्थिक गतिविधि उत्पन्न होती है, जिसमें लगभग 70 प्रतिशत योगदान कोलकाता का होता है. एक वैश्विक प्रतिस्पर्धी कोलकाता के बिना बंगाल राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धी अर्थव्यवस्था नहीं बन सकता. दशकों तक टकरावपूर्ण संघवाद के कारण कोलकाता की उपेक्षा हुई है; अब समय है कि केंद्र और राज्य मिलकर इसे BIMSTEC क्षेत्र में एक विकास इंजन बनाने के लिए नई समिति गठित करें, ठीक वैसे ही जैसे मुंबई को अंतरराष्ट्रीय वित्तीय केंद्र बनाने के लिए उच्च स्तरीय विशेषज्ञ समिति (HPEC) बनाई गई थी.

पाँचवाँ, राज्य को भारत के पूर्वी प्रवेश द्वार के रूप में अपनी भू-आर्थिक स्थिति का लाभ उठाना चाहिए. वार्षिक निर्यात 1.09 लाख करोड़ रुपये से अधिक होने और बांग्लादेश तथा पूर्वोत्तर के निकट होने के कारण हल्दिया और कोलकाता में बंदरगाह-आधारित विकास को मजबूत करना, अंतर्देशीय जलमार्गों का विस्तार करना, और बहु-मोडल लॉजिस्टिक्स कॉरिडोर का निर्माण राज्य को एक क्षेत्रीय व्यापार केंद्र में बदल सकता है. बंगाल को अपनी ऐतिहासिक पहचान-एक ‘गेटवे अर्थव्यवस्था’-को पुनः स्थापित करना होगा.

छठा, मानव पूंजी विकास इस संरचनात्मक परिवर्तन की आधारशिला होना चाहिए. लगभग 10 करोड़ की जनसंख्या राज्य के लिए अवसर भी है और चुनौती भी. राज्य में काम करने वाले लोगों की संख्या तो ज्यादा है, लेकिन उनके कौशल नए अवसरों के हिसाब से नहीं हैं, इसलिए सही दिशा में कौशल विकास जरूरी है. विश्वविद्यालयों में सुधार और निजी कॉलेजों की बेहतर निगरानी भी जरूरी है. साथ ही ध्यान रखना होगा कि बिना काम से जुड़ी सरकारी मदद लोगों को पूरी तरह रोजगार नहीं देती, बल्कि कई बार आधा-अधूरा रोजगार ही बढ़ाती है. 

कई अर्थव्यवस्थाओं में यह देखा गया है कि बेरोज़गारी आधारित सहायता निष्क्रिय श्रम को बढ़ावा देती है. इसलिए, ऐसी योजनाओं को सावधानीपूर्वक डिजाइन किया जाना चाहिए, ताकि वे अल्परोज़गार को बढ़ाने के बजाय मानव पूंजी निर्माण को प्रोत्साहित करें. बंगाल की एक स्थायी समस्या अवसरों की कमी के कारण मानव पूंजी का पलायन रही है-जिसका समाधान केवल औद्योगिकीकरण और उससे जुड़े सेवाक्षेत्र के विस्तार से ही संभव है.

सरकार को अपने खर्च को ऐसे क्षेत्रों में बढ़ाना चाहिए जो लंबे समय में विकास को मजबूत करें, जैसे सड़क, बिजली, परिवहन और अन्य बुनियादी ढांचा. साथ ही, उद्योग और निवेश को बढ़ावा देने के लिए पूंजी निर्माण पर भी ध्यान देना होगा, ताकि राज्य की अर्थव्यवस्था स्थायी रूप से मजबूत बन सके. 

सातवाँ, राज्य की वित्तीय नीति को सिर्फ खर्च बढ़ाने पर नहीं, बल्कि खर्च की गुणवत्ता सुधारने पर ध्यान देना चाहिए. हाल के वर्षों में कर से मिलने वाली आय, जैसे GST संग्रह, अच्छी दर से बढ़ी है, जो सकारात्मक संकेत है. लेकिन इस पैसे का सही उपयोग भी उतना ही जरूरी है. सरकार को अपने खर्च को ऐसे क्षेत्रों में बढ़ाना चाहिए जो लंबे समय में विकास को मजबूत करें, जैसे सड़क, बिजली, परिवहन और अन्य बुनियादी ढांचा. साथ ही, उद्योग और निवेश को बढ़ावा देने के लिए पूंजी निर्माण पर भी ध्यान देना होगा, ताकि राज्य की अर्थव्यवस्था स्थायी रूप से मजबूत बन सके.  पिछले 15 वर्षों में गहराए पश्चिम बंगाल के राजकोषीय दबाव एक संरचनात्मक असंतुलन को दर्शाते हैं-पुराने ऋण जाल, लगातार राजस्व घाटे, कम राजस्व वृद्धि क्षमता, और विभिन्न लोकलुभावन योजनाओं के तहत अनिवार्य तथा हस्तांतरण व्यय में वृद्धि ने विकासोन्मुख निवेश को पीछे धकेल दिया है. सब्सिडी का युक्तिकरण और उन्हें उत्पादकता बढ़ाने वाले परिणामों से जोड़ना, ऐसे निवेशों के लिए राजकोषीय स्थान तैयार कर सकता है.

विकास की नई दिशा का अवसर 

आखिर में, शासन को सिर्फ लोकलुभावन वादों से हटाकर भरोसेमंद और मजबूत नीतियों पर ध्यान देना होगा. सिंगल-विंडो क्लीयरेंस जैसी व्यवस्थाएं  सिर्फ कागजों पर नहीं, बल्कि जमीन पर भी सही तरीके से काम करें-यह बहुत जरूरी है. सरकार का कामकाज डेटा के आधार पर, पारदर्शी और जवाबदेह होना चाहिए, ताकि लोगों और निवेशकों का भरोसा बढ़े. साथ ही, स्वतंत्र नियामक संस्थाओं को मजबूत बनाना भी जरूरी है, क्योंकि इससे लंबे समय के निवेश को बढ़ावा मिलता है. आज के प्रतिस्पर्धी माहौल में, भरोसा खुद एक बड़ी आर्थिक ताकत बन जाता है.

नई सरकार के सामने एक बड़ा मौका है, जो सिर्फ सत्ता बदलने तक सीमित नहीं है. यह पश्चिम बंगाल के विकास मॉडल को पूरी तरह बदलने का अवसर है-जहाँ ठहराव की जगह तेजी हो, बिखराव की जगह समन्वय हो, और सिर्फ छवि के बजाय असली प्रदर्शन के आधार पर विकास आगे बढ़े.


निलंजन घोष ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में विकास अध्ययन के उपाध्यक्ष हैं.
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Dr Nilanjan Ghosh heads Development Studies at the Observer Research Foundation (ORF) and serves as the operational and executive head of ORF’s Kolkata Centre. He ...

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