Expert Speak Raisina Debates
Published on Feb 23, 2026 Updated 22 Hours ago

साहेल के जंगल अब उग्रवादियों का मजबूत गढ़ बन गए हैं, जहां वे छिपने, भर्ती करने, धन जुटाने और स्थानीय समाज में अपने शासन को फैलाने के लिए काम कर रहे हैं. समझें पूरी कहानी.

उग्रवादियों का नया गढ़ ‘साहेल’

दुनिया भर के विद्रोहों में जंगलों ने सशस्त्र समूहों को छिपने की जगह, सुरक्षित आश्रय और संचालन संबंधी बढ़त प्रदान की है. दक्षिणी लेबनान के जंगलों में हिजबुल्लाह के छिपे बंकरों से लेकर लंबे संघर्षों में पाइरो-आतंकवाद (आगजनी आधारित हमलों) के उपयोग तक, जंगल लंबे समय से असममित युद्ध का हिस्सा रहे हैं. लेकिन साहेल में आतंकवादी समूह जैसे जेएनआईएम  और आईएसएसपी-जिसे पहले आईएसजीएस (ISGS) कहा जाता था-ने वन क्षेत्र के व्यवस्थित उपयोग के माध्यम से इस रणनीति को एक नए स्तर तक पहुँचा दिया है.

जंगल अब सिर्फ छिपने की जगह नहीं, बल्कि उग्रवादी समूहों के मजबूत गढ़ बन गए हैं. साहेल और आसपास के क्षेत्रों में ये भर्ती, धन जुटाने, रसद और समानांतर शासन के केंद्र बन चुके हैं, जिससे आतंकवादी हिंसा का विस्तार तेजी से बढ़ा है. जंगल अब केवल छिपने के ठिकाने नहीं रहे; वे सोच-समझकर चुने गए मजबूत आधार क्षेत्र हैं जो सशस्त्र समूहों को सैन्य दबाव का सामना करने और स्थानीय अर्थव्यवस्था व समाज में जड़ें जमाने में मदद करते हैं. इसलिए आम धारणा के विपरीत, यह घटना ‘अशासित क्षेत्रों‘ के संयोगवश उपयोग का परिणाम नहीं बल्कि एक रणनीतिक चुनाव को दर्शाती है.

Forests As The New Insurgent Front In The Sahel

Source: Sahel-based terror groups expand to coastal West Africa, DW

आश्रय, राजस्व और क्षेत्रीय विस्तार

साहेल के आतंकवादी समूहों ने यह समझ लिया है कि शहरों पर नियंत्रण रखना महंगा और टिकाऊ नहीं होता, जबकि जंगलों पर नियंत्रण अपेक्षाकृत आसान है. जंगल हवाई निगरानी से छिपाव प्रदान करते हैं और सीमित सड़क पहुँच के कारण यंत्रीकृत सैन्य प्रतिक्रिया को बाधित करते हैं. साथ ही, यहाँ वन रक्षकों और नियमित सेना के बीच अधिकारों का ओवरलैप भी रहता है, जिससे प्रशासनिक अस्पष्टता पैदा होती है. जंगल आतंकवादी समूहों को तीन निर्णायक लाभ देते हैं.

साहेल में आतंकवादी समूह जैसे जेएनआईएम  और आईएसएसपी-जिसे पहले आईएसजीएस (ISGS) कहा जाता था-ने वन क्षेत्र के व्यवस्थित उपयोग के माध्यम से इस रणनीति को एक नए स्तर तक पहुँचा दिया है.

पहला, साहेल के कई वन क्षेत्रों की सुरक्षा हल्के हथियारों से लैस रेंजर करते हैं जिनका मुख्य उद्देश्य संरक्षण होता है, न कि आतंकवाद-रोधी अभियान. सीमित धन, कम गश्त, अलग-थलग चौकियाँ और धीमी प्रतिक्रिया समय के कारण सशस्त्र समूह कई बार रेंजर चौकियों पर कब्जा कर चुके हैं, जिससे स्थायी सुरक्षा शून्य पैदा हुआ है.

दूसरा, घनी वनस्पति, कमजोर अवसंरचना और जंगल के रास्तों की स्थानीय जानकारी के कारण उग्रवादी घात लगाकर हमले, आईईडी लगाना और तेज़ी से बिखर जाना आसान पाते हैं. जंगल का आवरण राज्य की तकनीकी बढ़त-विशेषकर वायुशक्ति और बख्तरबंद वाहनों-को कम कर देता है.

तीसरा, कई जंगल लंबे समय से चल रही अवैध और अनौपचारिक अर्थव्यवस्थाओं-जैसे ईंधन तस्करी, कारीगर खनन, पशु चराई और शिकार-के ऊपर स्थित हैं. आतंकवादी समूह इन व्यवस्थाओं में घुसकर बिना विदेशी दान पर निर्भर हुए राजस्व उत्पन्न करते हैं.

JNIM और ISSP साहेल के जंगलों में गहराई से जमे दो प्रमुख समूह हैं. 2017 में गठन के बाद से JNIM ने शहरों की बजाय ग्रामीण क्षेत्रों, सीमा पट्टियों और संरक्षण क्षेत्रों को प्राथमिकता दी है. W-Arly-Pendjari Complex (ड्ब्ल्यूएपी कॉम्प्लेक्स), जो बेनिन, बुकरिना और फासो में फैला है, इस रणनीति का केंद्र बन गया है. पार्क प्रणाली के भीतर खुद को स्थापित कर जेएनआईएम ने एक सीमा-पार आश्रय बना लिया है जहां से उसके लड़ाके विभिन्न अधिकार क्षेत्रों के बीच आसानी से आ-जा सकते हैं.

2025 के दौरान JNIM और ISSP ने बेनिन–बुर्किना फासो–नाइजर त्रि-सीमा क्षेत्र में अपनी जड़ें और मजबूत कीं, जिससे यह साहेल के सबसे अस्थिर इलाकों में बदल गया. उत्तरी बेनिन ने अपने इतिहास का सबसे घातक वर्ष देखा क्योंकि JNIM ने पूर्वी बुर्किना फासो से लगातार सीमा-पार हमले किए. केवल अप्रैल में पार्क W में 54 बेनिनी सैनिक मारे गए.वर्ष के मध्य तक उग्रवादी दक्षिण की ओर बोर्गू विभाग तक पहुँच गए, जो नाइजीरिया सीमा के पास है-यह पहले से प्रभावित क्षेत्रों से आगे भौगोलिक विस्तार का संकेत है.

आतंकवादी काम करने का तरीका

जमाअत नुसरत अल-इस्लाम वल-मुस्लिमीन जंगल ठिकानों से समानांतर शासन चलाता, खनिकों-चरवाहों से कर लेता, तस्करी रास्ते नियंत्रित करता और बंधकों को गहरे वन क्षेत्रों में छिपाकर दबाव बनाता है. 

रिपोर्टों के अनुसार 2025 में संयुक्त अरब अमीरात ने एक अमीराती शाही सदस्य की रिहाई के लिए 2 करोड़ अमेरिकी डॉलर से अधिक का भुगतान किया. छापों में जब्त हथियार जंगलों में बिखरे भंडारों में रखे जाते हैं, जबकि प्रशिक्षण शिविर पारंपरिक सैन्य पहुँच से दूर चलते हैं.

जैसे-जैसे साहेल में दबाव बढ़ रहा है, उग्रवादी संरक्षण गलियारों के रास्ते दक्षिण की ओर फैलते हुए घाना तक पहुंच रहे हैं. जंगल इस विस्तार के लिए आगे के संचालन अड्डे बन गए हैं और संरक्षण क्षेत्र अब क्षेत्रीय असुरक्षा शुरू करने के लॉन्च पैड में बदलते जा रहे हैं. 

यह व्यवस्था समूहों को वैधता का दावा करने का अवसर देती है. जहाँ सरकारें सुरक्षा या संरक्षण के नाम पर खनन और चराई पर रोक लगाती हैं, वहाँ उग्रवादी खुद को आजीविका के सहायक के रूप में पेश करते हैं और पाबंदियाँ ढीली करते हैं. ये जंगल सैन्य ठिकानों पर हमलों के लिए लॉन्च पैड का काम भी करते हैं. सुरक्षा बल यदि किसी क्षेत्र को खाली भी करा लें, तो अक्सर स्थायी मौजूदगी नहीं रख पाते, जिससे उग्रवादी कहीं और फिर से संगठित हो जाते हैं.

वन क्षेत्र निरंतर भर्ती को भी संभव बनाते हैं. बेरोजगारी, विस्थापन या सरकारी नीतियों के कारण अपराधीकरण झेल रहे युवाओं को ऐसे समूह आकर्षित करते हैं जो निश्चित आय और सुरक्षा का वादा करते हैं. जबरन भर्ती और अपहरण भी स्वैच्छिक भर्ती के साथ चलते हैं, खासकर बुर्किना फासो में, जहाँ नागरिक मिलिशिया के उभरने के बाद अपहरण बढ़े हैं.

राज्य सत्ता और क्षेत्रीय सुरक्षा पर प्रभाव

साहेल में उग्रवादी नेटवर्क आपस में जुड़ रहे हैं. माली और बुर्किना फासो और नाइजीरिया के संघर्ष क्षेत्र मिलकर एक बड़ा हिंसक ज़ोन बन रहे हैं. जमात नुसरत अल-इस्लाम वाल-मुस्लिमिन , इस्लामिक स्टेट साहेल प्रांत और इस्लामिक स्टेट पश्चिम अफ्रीका प्रांत सक्रिय हैं जबकि विस्तार टोगो, घाना, कोटे डी आइवर की ओर बढ़ रहा है.

शहरों पर पकड़ कमजोर होने की भरपाई वे इन इलाकों से करते हैं. केवल सैन्य गश्त से समस्या हल नहीं होगी. जरूरी है कि संरक्षित क्षेत्रों में राज्य की वैध उपस्थिति बढ़े, स्थानीय अर्थव्यवस्था औपचारिक बने और संरक्षण नीति को सुरक्षा व आजीविका से जोड़ा जाए, तभी उग्रवाद की जड़ें कमजोर होंगी.

साहेल की सैन्य सरकारों के लिए यह विस्तार आंतरिक कमजोरी को और बढ़ाता है. माली और बुर्किना फासो में लगातार हमले, घेराबंदी और नाकेबंदी ने राज्य नियंत्रण को कमजोर किया है और संस्थागत सीमाएँ उजागर की हैं. बुर्किना फासो में सेना और वीडीपी (Volunteers for the Defence of the Homeland) पर अत्यधिक दबाव है, जिससे पूर्वी क्षेत्रीय राजधानियों पर खतरा बढ़ गया है. लगातार झटके सत्ता संघर्ष और नए तख्तापलट चक्रों का जोखिम बढ़ा सकते हैं.

अंत में, जंगलों पर आधारित आतंकवाद तटीय क्षेत्रों की स्थिरता के लिए खतरा बन रहा है. जैसे-जैसे साहेल में दबाव बढ़ रहा है, उग्रवादी संरक्षण गलियारों के रास्ते दक्षिण की ओर फैलते हुए घाना तक पहुंच रहे हैं. जंगल इस विस्तार के लिए आगे के संचालन अड्डे बन गए हैं और संरक्षण क्षेत्र अब क्षेत्रीय असुरक्षा शुरू करने के लॉन्च पैड में बदलते जा रहे हैं. 

साहेल में आतंकवादी समूह जंगलों का उपयोग छिपने, धन जुटाने, भर्ती और समानांतर शासन के लिए कर रहे हैं. शहरों पर पकड़ कमजोर होने की भरपाई वे इन इलाकों से करते हैं. केवल सैन्य गश्त से समस्या हल नहीं होगी. जरूरी है कि संरक्षित क्षेत्रों में राज्य की वैध उपस्थिति बढ़े, स्थानीय अर्थव्यवस्था औपचारिक बने और संरक्षण नीति को सुरक्षा व आजीविका से जोड़ा जाए, तभी उग्रवाद की जड़ें कमजोर होंगी.


समीर भट्टाचार्य ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में एसोसिएट फेलो हैं.

श्रेष्ठा मेधी ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में रिसर्च इंटर्न हैं.

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