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हिमालयी राज्यों में वनों का क्षेत्र बढ़ा है लेकिन बढ़ती जंगल की आग और मोनोकल्चर वृक्षारोपण से कार्बन स्थिरता खतरे में है. कुछ पेड़ कम कार्बन संग्रहीत करते हैं और तेजी से जल जाते हैं, जिससे हिमालय धीरे-धीरे कार्बन सिंक से रिसाव की ओर बढ़ रहा है. इससे कैसे निपटा जा सकता है...समझने के लिए पूरा लेख पढ़ें.
भारतीय वन सर्वेक्षण की हर दो साल में एक बार प्रकाशित होने वाली भारत में वनों की स्थिति रिपोर्ट (आईएसएफआर) से अच्छी ख़बर आई है. रिपोर्ट के मुताबिक हिमालयी राज्यों में वनों के आवरण में उत्साहजनक वृद्धि हुई है. हालांकि, अन्य अध्ययन चेतावनी देते हैं कि यह स्पष्ट सफलता एक गहरे जलवायु और पारिस्थितिक संकट को छुपाती है, जिससे अनजाने में बढ़ती जंगल की आग से शांत कार्बन रिसाव शुरू हो जाता है. नवंबर 2023 से जून 2024 के बीच हिमाचल प्रदेश में जंगल की आग में 1,339 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई. इसी अवधि के दौरान, जम्मू और कश्मीर में 2,822 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई. जंगल की आग की बढ़ती घटनाओं ने पहाड़ी राज्यों के कार्बन शोषित करने के प्रदर्शन को कम कर दिया है, जिससे हरित आवरण में वृद्धि से मिलने वाले लाभ कम हो गए हैं.
भारत में वनों की स्थिति रिपोर्ट जंगलों के क्षेत्र का आकलन करने के लिए उपग्रह चित्रों की व्याख्या करता है. 1987 में पहले आईएसएफआर ने 1:1 मिलियन के पैमाने पर 80 मीटर के स्थानिक रिज़ॉल्यूशन के साथ लैंडसैट-एमएसएस सेटेलाइट डेटा का इस्तेमाल किया. इसके विपरीत, 2023 में प्रकाशित आईएसएफआर की नवीनतम रिपोर्ट, 23.5 मीटर के स्थानिक रिज़ॉल्यूशन और 1:50,000 के पैमाने के साथ रिसोर्ससैट -2 LISS III उपग्रह छवियों पर आधारित है. नए मानकों का इस्तेमाल पार्टियों के सम्मेलन यानी कॉन्फ्रेंस ऑफ पार्टीज़ 9 के निर्णय 19 के तहत अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृत मानदंडों का उपयोग करते हुए किया गया है. आईएसएफआर 10 प्रतिशत से ज़्यादा की हरित छतरी के साथ एक हेक्टेयर से अधिक भूमि क्षेत्रों के लिए ग्रीन कवर का मानचित्रण करता है, फिर चाहे उनका स्वामित्व, भूमि उपयोग या कानूनी स्थिति कुछ भी हो.
“चीड़, नीलगिरी और सागौन के पेड़ अन्य किस्मों की तुलना में कम कार्बन संग्रहीत करते हैं और इनमें आग लगने की आशंका भी बहुत ज़्यादा होती है.””
हालांकि, आईएसएफआर के वन आवरण अनुमान प्राकृतिक वनों और मोनोकल्चर वृक्षारोपण के बीच अंतर नहीं करते हैं. मोनोकल्चर वृक्षारोपण एक ऐसी कृषि प्रणाली है, जहां एक बड़े क्षेत्र में एक ही फसल प्रजाति, जैसे पाम ऑयल, रबर या पॉपुलर या इसी तरह के कमाई करने वाले पेड़ों की खेती की जाती है. उपग्रह चित्र में प्राकृतिक वन और मोनोकल्चर वृक्षारोपण भी जंगल के रूप में ही दिखाई देते हैं, क्योंकि वे हरित छतरी की 10 प्रतिशत सीमा से अधिक हैं. सेटेलाइट इमेजरी में दोनों ही एक समान हरे क्षेत्र के तौर पर दिखते हैं. उदाहरण के लिए, राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (एनजीटी)को दिए अपने 2024 के हलफनामे में, उत्तराखंड सरकार ने पुष्टि की थी कि 2000 के बाद से राज्य के वन आवरण में 16 प्रतिशत का लाभ वृक्षारोपण की वजह से हुआ है. इसके विपरीत, भूमि उपयोग, भूमि-उपयोग परिवर्तन और वानिकी के लिए इंटर गवर्नमेंटल पैनल ऑफ क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी)की गुड प्रैक्टिस गाइडेंस (जीपीजी-एलयूएलयूसीएफ)के मानक अलग हैं. यूरोपीय संघ के कार्बन निष्कासन प्रमाणन ढांचे और ब्राजील के वन-कार्बन लेखांकन, सभी प्राकृतिक वनों और वृक्षारोपण को अलग-अलग मानते हैं. ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन और प्रबंधन की सटीक और पारदर्शी रिपोर्टिंग के लिए ऐसा अंतर होना महत्वपूर्ण है.
जलवायु सम्मेलन में भारत के लिए राष्ट्रीय निर्धारित योगदान (एनडीसी) का जो लक्ष्य रखा गया है, उसके हिसाब से भारत को बढ़े हुए वन और हरित आवरण के माध्यम से 2030 तक 3 अरब टन कार्बन डाईऑक्साइड के बराबर अतिरिक्त कार्बन सिंक बनाना है. हालांकि, हिमालय में जंगल की आग की बढ़ती घटनाओं के मद्देनजर इस लक्ष्य का पुनर्मूल्यांकन करने की आवश्यकता है. कार्बन सिंक एक ऐसी प्राकृतिक या कृत्रिम प्रणाली है, जो वायुमंडल में जितना कार्बन छोड़ती है, उससे ज़्यादा कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करती है. इससे वातावरण में ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा कम हो जाती है और जलवायु संतुलन बना रहता है. कार्बन सिंक के सामान्य उदाहरणों में जंगल, महासागर और मिट्टी शामिल हैं.
कार्बन संतुलन में विकृतियां मुख्य रूप से इसलिए उत्पन्न होती हैं, क्योंकि वन स्थिति रिपोर्ट में चीड़, नीलगिरी और सागौन के पेड़ समेत मोनोकल्चर वृक्षारोपण को भी वनों का विकास माना जाता है, लेकिन हकीक़त कुछ और है. पेड़ों की ये प्रजातियां अन्य किस्मों की तुलना में कम कार्बन संग्रहित करती हैं. इतना ही नहीं, इनमें आग लगने की भी आशंका भी बहुत ज़्यादा होती है. जब वे जलते हैं, तो उनका संग्रहीत कार्बन तेज़ी से वायुमंडल में वापस चला जाता है. ये प्रजातियां तेज़ी से पुनर्जीवित भी होती हैं, जिससे जलने और पुनर्जनन का एक ऐसा दुष्चक्र बनता है, जो मिट्टी के स्वास्थ्य और अन्य प्रजातियों की कार्बन स्थिरता को प्रभावित करता है. समय के साथ, वे कार्बन-रिसाव प्रणाली के रूप में कार्य करते हैं. ये जंगलों की मात्रा बढ़ाने में तो योगदान करते हैं, लेकिन किसी प्राकृतिक असंतुलन की स्थिति में ये उसका मुकाबला नहीं कर पाते.
““समय के साथ, वे कार्बन-रिसाव प्रणाली के रूप में कार्य करते हैं.”
पूर्वोत्तर भारत में, झूम खेती ने जंगल की आग की घटनाओं को ऐतिहासिक 20-30-वर्षीय चक्र से बढ़ाकर केवल 2-3 साल में कर दिया है. झूम खेती का अर्थ एक ऐसी कृषि पद्धति से है, जहां किसान एक जगह पर कुछ साल खेती करने के बाद, मिट्टी की उर्वरता खत्म होने पर उस जमीन को छोड़कर दूसरी जगह चले जाते हैं और वहां खेती शुरू कर देते हैं. पुरानी जगह की ज़मीन को प्राकृतिक रूप से ठीक होने के लिए छोड़ दिया जाता है. ये स्थिति पारिस्थितिकी तंत्र के लचीलेपन के तेज़ी से क्षरण का संकेत देता है. अब यही प्रवृत्ति हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में पश्चिमी हिमालय की चिर-पाइन बेल्ट में भी दिख रही है. जल्दी-जल्दी आग लगने की ये घटनाएं जंगलों को परिपक्व होने, उन्हें उच्च-कार्बन अवस्था तक पहुंचने से रोकते हैं. इतना ही नहीं, ये मिट्टी के कार्बन को खराब करते हैं, और जंगलों को दीर्घकालिक कार्बन बैंकों के बजाय आवर्ती कार्बन उत्सर्जकों में बदल देते हैं. इसके विपरीत, क्षेत्रीय पारिस्थितिकी प्रणालियों में महत्वपूर्ण भिन्नता के बावजूद, भूमध्यसागरीय जंगलों में औसत आग लगने की घटनाओं का अंतराल 20 साल से कम है, और पश्चिमी अमेरिका के मिश्रित शंकुधारी प्रणालियों में यह 9-29 साल है.
जंगल की आग की घटनाओं में बढ़ोत्तरी अचानक नहीं हुई है. यह कई पारिस्थितिक, मानवशास्त्रीय और संस्थागत कमियों के एक साथ आने का परिणाम है. सरकारी वन विभागों ने ऐतिहासिक रूप से तेज़ी से बढ़ने वाले, लेकिन अत्यधिक ज्वलनशील चीड़-देवदार और अन्य मोनोकल्चर वृक्षारोपण को प्रोत्साहित किया है. इसकी वजह से देशी और लचीले ओक-रोडोडेंड्रोन वन प्रणालियों का विस्थापन हुआ है. चीड़ की सुइयां मोटी, सूखी परतों में जमा हो जाती हैं, और इनमें आसानी से आग लग जाती है. इससे वनों में आग की घटनाए जल्दी-जल्दी हो रही हैं. ऐसी ही प्रथा के कारण ब्राज़ील, चिली और इंडोनेशिया में पारंपरिक पशुचारण का विस्थापन हुआ है, जो कभी जंगल के कूड़े को साफ करने का एक महत्वपूर्ण तंत्र था.
जलवायु परिवर्तन ने इस प्रवृत्ति को और बढ़ा दिया है. पश्चिमी हिमालय में लंबे समय तक शुष्क अवधि और प्री-मानसून अवधि में अधिक गर्मी का अनुभव होता है. इससे नमी काफ़ी कम हो जाती है और आग लगने की संभावना बढ़ जाती है.
इसके अलावा, अचानक या जानबूझकर की गई मानवीय गतिविधियां, जैसे कि पराली जलाना, झूम खेती, पर्यटन और मशरूम की वृद्धि को बढ़ावा देना में जंगलों में आग की बढ़ती घटनाओं के लिए जिम्मेदार है. हालांकि, आग की घटनाएं सिर्फ इन्हीं तक सीमित नहीं हैं, लेकिन हिमालय क्षेत्र में 95 प्रतिशत जंगल की आग के लिए मुख्य रूप से यही जिम्मेदार हैं. समुदाय-प्रबंधित वन प्रणालियों के कमज़ोर होने से आग पर रोकथाम के पारंपरिक तरीकों और प्रारंभिक प्रतिक्रिया प्रथाओं का और भी क्षरण हुआ है.
हिमालयी कार्बन रिलीज को प्रबंधित करने के लिए भारत को 'हरित आवरण' की एक संकीर्ण, संख्या-संचालित व्याख्या से हटकर इस बात की और अधिक गहरी समझ विकसित करनी होगी. ये समझना होगा कि, जंगल वास्तव में कार्बन को कैसे संग्रहीत करते हैं, उसे बनाए रखते हैं और खोते हैं. वन आवरण का वर्तमान अनुमान आशाजनक लग सकता है, लेकिन कार्बन मास (द्रव्यमान) के लिए दशकों तक बायोमास स्थिरता की आवश्यकता होती है. भारत का विशाल हिमालयी क्षेत्र पहले से ही सबसे नाजुक पर्वतीय क्षेत्रों में से एक है. ऐसे में जंगल की आग को बढ़ावा देने वाला वृक्षारोपण, बढ़ता तापमान, जनसंख्या वृद्धि, शहरीकरण और कमज़ोर सामुदायिक वन संस्थानों के कारण ये वन आवरण तेज़ी से अपनी स्थिरता खो रहा है. एक सार्थक समाधान के लिए वृक्षारोपण लक्ष्यों से आगे बढ़ना चाहिए, हिमालय में भारत की वन नीतियों में कार्बन स्थायित्व, अग्नि लचीलापन और पारिस्थितिक अखंडता को एकीकृत करना चाहिए.
““जलवायु परिवर्तन ने इस प्रवृत्ति को और बढ़ा दिया है.”
सबसे ज़रूरी काम ये करना होगा कि, मोनोकल्चर वृक्षारोपण को देशी मिश्रित और चौड़ी पत्ती वाले पारिस्थितिक तंत्र से बदलना होगा. सागौन, नीलगिरी और देवदार के बागान डिजिटल और कागज़ पर वन क्षेत्र को बढ़ाते हुए प्रतीत हो सकते हैं, लेकिन वे कम कार्बन संग्रहीत करते हैं, ज़्यादा तेज़ी से सूखते हैं और अत्यधिक ज्वलनशील भी हैं. दूसरी ओर, देशी चौड़ी पत्ती वाले जंगल, जैसे कि ओक, रोडोडेंड्रोन और अन्य मिश्रित हिमालयी मज़बूत लकड़ी वाले जंगलों को बढ़ने में समय लगता है, लेकिन वे नमी बनाए रखते हैं, गहरी मिट्टी में कार्बन जमा करते हैं, जैव विविधता का समर्थन करते हैं, और मोनोकल्चर वृक्षारोपण की तुलना में कम ज्वलनशील होते हैं. अध्ययन लगातार ये दिखाते हैं कि ओक पेड़ों की बहुतायत वाले जंगल, देवदार के वनों की तुलना में 2-3.5 गुना ज़्यादा कार्बन संग्रहीत करते हैं. इन देशी प्रणालियों में परिवर्तन से हिमालय क्षेत्र में दीर्घकालिक कार्बन कटौती हो सकती है.
वर्तमान में वन स्थिति रिपोर्ट सिर्फ कैनोपी यानी हरित आवरण की सीमा को मापता है, इसकी स्थिरता या आग के प्रति इसकी संवेदनशीलता को ध्यान में नहीं रखता. इसलिए, भारत के द्विवार्षिक वन मूल्यांकन में इस बात का भी उल्लेख किया जाना चाहिए कि वन क्षेत्र में आग लगने की आवृति क्या है. निगरानी को एकीकृत करने से नीति निर्माताओं को दीर्घकालिक पारिस्थितिकी की रिकवरी और कार्बन पृथक्करण के साथ-साथ तेज़ी से बढ़ने वाली, अग्नि-संभावित प्रजातियों के बीच अंतर करने में मदद मिलेगी.
ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और कनाडा अपनी राष्ट्रीय भूमि-उपयोग, भूमि-उपयोग परिवर्तन और वानिकी (LULUCF) सूची में प्राकृतिक गड़बड़ी से उत्सर्जन का अलग-अलग उल्लेख करते हैं. आईएफएसआर को भी भारत के शुद्ध सिंक अनुमानों को बढ़ाने से रोकने के लिए शुद्ध वन-आधारित कार्बन पृथक्करण से वृक्षारोपण-आधारित कार्बन लाभ से उत्सर्जन को घटाना चाहिए.
समुदाय के नेतृत्व वाले वन प्रशासन को फिर से शुरू करना उतना ही महत्वपूर्ण है. वन पंचायतों को पैसा देने और क्षमता निर्माण के साथ सशक्त बनाने से पारंपरिक प्रथाओं को फिर से जीवित किया जा सकता है. अलग-अलग जगहों पर पशुओं की चराई, नियंत्रित शीतकालीन दहन और सामूहिक निगरानी प्रणाली से ईंधन भार को कम करने में मदद मिल सकती है. भारत के संयुक्त वन प्रबंधन (जेएफएम) समूह और वन अधिकार अधिनियम (एफआरए) के तहत पारंपरिक समुदाय के नेतृत्व वाले वन संसाधन प्रबंधन से पता चलता है कि स्थानीय प्रबंधन आग के जोखिम को कैसे कम करता है. नेपाल के सामुदायिक वानिकी उपयोगकर्ता समूह (सीएफयूजी), मेक्सिको के सामुदायिक वन उद्यमों और ऑस्ट्रेलिया के स्वदेशी सांस्कृतिक दहन ने भी जंगलों में आग की घटनाओं को रोकने में सफलता हासिल की है.
“हिमालय धीरे-धीरे कार्बन सिंक से कार्बन रिसाव की ओर बढ़ रहा है.”
भारत को जंगल की आग की भविष्यवाणी और शमन के लिए जिला स्तर पर उपग्रह-आधारित और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई)सक्षम प्रारंभिक चेतावनी और त्वरित-प्रतिक्रिया प्रणालियों में भी निवेश करना चाहिए. यूरोप की जंगल की आग सूचना प्रणाली (ईएफएफआईएस), नासा की अग्नि सूचना संसाधन प्रबंधन प्रणाली (एफआईआरएमएस), और ऑस्ट्रेलिया की एआई-आधारित बुशफायर भविष्यवाणी प्रणाली से सबक सीखा जा सकता है. ये प्रणालियां वास्तविक समय में जंगल की आग की चेतावनी प्रदान करने के लिए रीयल टाइम सैटेलाइट डेटा और एआई मॉडल का उपयोग करती हैं.
बार-बार जंगलों में आग का ये हिमालयी संकट अब सिर्फ पेड़ लगाने के बारे में नहीं है, बल्कि कार्बन स्थिरता, पारिस्थितिक लचीलेपन और पृथ्वी की दीर्घकालिक सुरक्षा के बारे में भी है. जैसे-जैसे वनों में आग बढ़ती जा रही है, और मोनोकल्चर का विस्तार हो रहा है, वैसे-वैसे हिमालय धीरे-धीरे कार्बन सिंक से कार्बन रिसाव की ओर बढ़ रहा है. हिमालय के जंगल भी जलवायु परिवर्तन से प्रभावित हैं, जो एंडीज़, रॉकी पर्वत और आल्प्स के रुझान को प्रतिबिंबित करता है. इन क्षेत्रों में भी जलवायु परिवर्तन से प्रेरित आग दशकों के कार्बन लाभ को मिटा रही है.
इस संकट से निपटने के लिए प्रारंभिक चेतावनी, पारदर्शी लेखांकन और पारिस्थितिक निगरानी की सर्वोत्तम वैश्विक प्रथाओं को अपनाने की ज़रूरत है. इससे पहले कि, हिमालय की पहाड़ियां क्षेत्रीय जलवायु लचीलेपन और राष्ट्रीय जलवायु प्रतिबद्धताओं दोनों को कमज़ोर कर दें, भारत को अपनी नीतियों पर तुरंत और फिर से विचार करना चाहिए.
धवल देसाई ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन में वाइस प्रेसीडेंट और सीनियर फेलो हैं.
साहिल कपूर ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन के अर्बन स्टडीज़ प्रोग्राम में रिसर्च इंटर्न हैं.
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Dhaval is a Vice President - Platforms and Communities at Observer Research Foundation, Mumbai. His spectrum of work covers diverse topics ranging from urban renewal ...
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Sahil Kapoor is an Intern with the Urban Studies Programme at the Observer Research Foundation. ...
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