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समुद्र पर तैरते शहर, जो कभी कल्पना थे, अब बढ़ते समुद्र-स्तर के बीच असली विकल्प बन रहे हैं लेकिन सवाल यही है: क्या ये भविष्य की सुरक्षा हैं, या बड़े पर्यावरणीय फैसलों से बचने का बहाना?
समुद्र पर तैरते शहर एक ज़माने में विज्ञान कथाओं की कल्पना मात्र रहे थे, लेकिन अब ये हकीक़त में बदलने की तरफ बढ़ रहे हैं. समुद्र पर तैरते शहर अब जलवायु अनुकूलन और शहरी विस्तार रणनीतियों में एक व्यावहारिक समाधान के रूप में उभर रहे हैं. जलवायु परिवर्तन और बढ़ते जलस्तर ने समुद्र के 100 किलोमीटर के दायरे में रहने वाले 2.4 अरब से ज़्यादा लोगों के विस्थापित होने का ख़तरा बढ़ा दिया है. इस ख़तरे ने भी इंजीनियरों और वैज्ञानिकों को तैरते शहरों की परियोजना पर काम करने को प्रेरित किया है.
“बड़े पैमाने पर तैरती बस्तियों को तूफान, सुनामी, जंग, जैव प्रदूषण और संरचनात्मक थकान का सामना करने से बचाने की ज़रूरत होगी.”
जापान के ओशिन स्पाइरल और डोगेन सिटी से लेकर नीदरलैंड के फ्लोटिंग फ्यूचर कंसोर्टियम, दक्षिण कोरिया के ओशियनिक्स और सऊदी अरब के ऑक्सागॉन तक, ये कुछ ऐसी परियोजनाएं हैं जहां तैरते शहर की परिकल्पना को ज़मीन पर उतारने या यूं कहें कि समंदर पर उतारने की कोशिश की जा रही है. अब सवाल है कि क्या ये विचार मानवीय प्रयासों और तकनीकी नवाचार की सीमाओं को आगे बढ़ाते हुए, लचीलेपन और आर्थिक अवसरों की एक नई सीमा का वादा करते हैं? क्या ऐसे वैचारिक डिज़ाइन तैरते शहरों की नई अनुकूलनशीलता को उजागर करते हैं या फिर ये हानिकारक गैसों के उत्सर्जन, भूमि उपयोग और सामाजिक समता के प्रबंधन के लिए ज़रूरी मुश्किल विकल्पों को टालने का एक बहाना मात्र हैं?
तैरते शहर का विचार सबसे पहले जापान से आया. जापान के शिमिज़ु कॉर्पोरेशन द्वारा 2014 में ओशिन स्पाइरल का आइडिया दिया गया. इस परियोजना में, गहरे समुद्र के थर्मल ग्रेडिएंट द्वारा संचालित एक स्पाइरल आकार में पानी के नीचे एक शहर की कल्पना की गई है. जनवरी 2024 में शिमिज़ु, नीदरलैंड के मैरीटाइम रिसर्च इंस्टीट्यूट नीदरलैंड्स (एमएआरआईएन) के नेतृत्व वाले फ्लोटिंग फ्यूचर कंसोर्टियम का हिस्सा बन गया. इस कंसोर्टियम का उद्देश्य बढ़ते समुद्र स्तर के कारण भूमि की संभावित कमी को दूर करना है, जिसका लगभग एक तिहाई भूभाग औसत समुद्र तल से नीचे है.
“प्रकृति का इस तरह का दोहन पहले से ही वैश्विक पर्यावरणीय और सामाजिक-आर्थिक चिंताओं को बढ़ा रहा है.”
जापानी डिज़ाइन स्टूडियो और समुद्री प्रौद्योगिकी स्टार्टअप ने भी तैरते द्वीपसमूह के रूप में डिजाइन किए गए मॉड्यूलर और पानी के नीचे आंशिक रूप डूबे प्लेटफार्मों का प्रस्ताव दिया है. इसमें जलकृषि, नवीकरणीय ऊर्जा, स्वास्थ्य सेवा, नौकरी से रिटायर होने के बाद लोगों की बस्तियों और चिकित्सा पर्यटन के लिए तैरते द्वीपसमूह को डिज़ाइन करने की योजना है.
सिद्धांत रूप में, तैरते शहरों की अवधारणा सतत विकास के लक्ष्य 11 (सतत शहर और समुदाय) और 13 (जलवायु कार्रवाई) के अनुरूप है. इन स्थायी विकास के लक्ष्यों में ज़मीन पर पहले से बने आवासों को नष्ट किए बिना दुर्लभ तटीय क्षेत्रों पर दबाव कम करने की बात कही गई है. तैरते शहरों का उद्देश्य मज़बूत, स्थानांतरणीय बुनियादी ढांचा और सर्कुलर अर्थव्यवस्थाएं बनाना है. ऐसे शहर, जो अपतटीय जलवायु-सुरक्षित वातावरण प्रदान करें, महानगरीय नेटवर्क के करीब होने के साथ-साथ जापान और कई यूरोपीय देशों में बढ़ती उम्र की आबादी की जनसांख्यिकीय चुनौतियों का भी समाधान भी करें.
शासन, इंजीनियरिंग और पर्यावरण से जुड़ी चुनौतियां
हालांकि, तैरते शहरों की बात सुनने में बहुत अच्छी लगती है लेकिन उनके तकनीकी, पारिस्थितिकी और सामाजिक प्रभावों को देखते हुए तैरते शहरों से जुड़े आशावाद को कम करना होगा. बड़े पैमाने पर तैरती बस्तियों को तूफान, सुनामी, जंग, जैव प्रदूषण और संरचनात्मक थकान का सामना करने से बचाने की ज़रूरत होगी. इसकी लिए विशाल मात्रा में स्टील, कंक्रीट और मिश्रित सामग्री के साथ-साथ लंगर प्रणालियों की भी आवश्यकता होती है. यहां तक कि शहर के आंशिक हिस्से को फिर से पाने के लिए भारी मात्रा में सामग्री की ज़रूरत है. , ज़ाहिर है, इसके लिए ड्रेजिंग (पानी के नीचे से कीचड़-मिट्टी साप करना) और रेत खनन का काम करना होगा. प्रकृति का इस तरह का दोहन पहले से ही वैश्विक पर्यावरणीय और सामाजिक-आर्थिक चिंताओं को बढ़ा रहा है. इन चिंताओं में विस्थापन, डेल्टा अस्थिरता, जैव विविधता की हानि और अपरिवर्तनीय तटीय क्षरण शामिल हैं.
ओसाका खाड़ी में एक कृत्रिम द्वीप पर 1990 के दशक में बना जापान का कंसाई अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा इस चिंता की एक गंभीर मिसाल कायम करता है. कभी इंजीनियरिंग के चमत्कार के रूप में इस एयरपोर्ट की तारीफ होती थी, लेकिन अब धंसाव के कारण ये द्वीप लगातार धीरे-धीरे डूब रहा है. यही वजह है कि इस एयरपोर्ट का रखरखाव लगातार महंगा हो रहा है, मृदा स्थिरीकरण का काम करने में बहुत पैसे खर्च हो रहे हैं.
“तैरते शहर विशिष्ट वर्गों की ज़रूरतों को पूरा करके असमानता को बढ़ा सकते हैं.”
इसी तरह दूसरे देशों में भी समुद्र या दूसरे जलीय ईकाइयों में ज़मीन हासिल करने के हानिकारक प्रभाव सामने आए हैं. उदाहरण के लिए, व्यापक भूमि पुनर्ग्रहण की वजह से सिंगापुर के तटीय वनों और मैंग्रोव दलदलों के बड़े हिस्से का क्षरण हुआ है. इसी प्रकार, दुबई के समुद्र की ओर व्यापक विस्तार ने लवणता बढ़ा दी है, समुद्री प्रजातियों का क्षरण हुआ है और प्राकृतिक ज्वारीय धाराओं में बाधा उत्पन्न हुई है.
इस बीच, नीदरलैंड अपनी सदियों पुरानी पोल्डर प्रणाली के साथ सफल रहा. पोल्डर भूमि के बड़े टुकड़े होते हैं, जो तटबंधों से घिरे होते हैं. इनमें ज़मीन की ऊंचाई औसत समुद्र तल से नीचे होती है. ये टाइडल गेट या पम्पिंग के ज़रिए पोल्डर के जल स्तर को नियंत्रित करते हैं. हालांकि, इसकी सफलता का श्रेय मजबूत संस्थागत तंत्र, समर्पित वित्त पोषण, निरंतर निगरानी और एक मज़बूत सामाजिक अनुबंध के साथ लगातार हो रहे तकनीकी नवाचार को जाता है.
तटीय समुदायों पर पड़ने वाले प्रभाव को ध्यान में रखने वाले संस्थागत और प्रशासनिक ढांचों के अभाव में इन शहरों का प्रकृति पर विपरीत असर पड़ सकता है. तैरते शहरों के राष्ट्रीय प्राथमिकताओं की बजाए विशेषाधिकार प्राप्त यानी अमीर लोगों के गढ़ बनने का ख़तरा है. जब तक इन्हें आवास, श्रम और पर्यावरण नीतियों में स्पष्ट रूप से शामिल नहीं किया जाता, तैरते शहर विशिष्ट वर्गों की ज़रूरतों को पूरा करके असमानता को बढ़ा सकते हैं. पैसे वाले लोग यहां अपनी विलासिता का सामान जुटा लेंगे, जबकि तटीय समुदायों, खासकर छोटे मछुआरों और निम्न-आय वर्ग, को और अधिक असुरक्षित बना सकते हैं. इसके विपरीत, अगर इन्हें जलवायु अनुकूलन उद्देश्यों के हिसाब से ढाला जाए तो ये तैरते शहर समावेशी अपतटीय आवासों का निर्माण कर सकते हैं. ऐसा होने पर इन शहरों से तटरेखाओं और आवास पर दबाव को कम करके, उन्नत सामाजिक मूल्य हासिल हो सकते हैं.
तैरते शहरों को वित्तीय समझौतों पर भी विचार करना होगा. तैरती हुई मेगा परियोजनाओं के लिए ज़रूरी बजट का होना निर्माण सामग्री और संस्थागत तंत्र, ज़मीन पर लचीलेपन और अनुकूलन रणनीतियों के लिए भी आवश्यक है.
समुद्री शहरीकरण के प्रति बढ़ता आकर्षण, शहरी जीवन को नए सिरे से परिभाषित करने की एक व्यापक वैश्विक खोज का हिस्सा है. सऊदी अरब के 'द लाइन' शहर को इसके उदाहरण के रूपय में लिया जा सकता है. द लाइन शहर सऊदी अरब की NEOM परियोजना का हिस्सा है. NEOM का अर्थ है एक नया भविष्य. 170 किलोमीटर लंबे और एक सीधी लाइन में बस रहे इस शहर को 'फ्यूचरिस्टिक सिटी' के तौर पर विकसित किया जा रहा है. यहां कार नहीं होंगी, सिर्फ सार्वजनिक परिवहन होगा. ये पूरा शहर नवीकरणीय ऊर्जा से संचालित है और अति-घने ऊर्ध्वाधर जीवन यानी ऊंची-ऊंची इमारतों वाले शहर और डिजिटल शासन का वादा करता है. फिर भी, वित्तीय मुश्किलों और ज़मीनी हकीकतों के साथ-साथ लॉजिस्टिक से जुड़ी जटिलताओं की वजह से इस शहर का दायरा तेज़ी से कम हो रहा है. मज़बूरी में इसे नए सिरे से डिज़ाइन करना पड़ रहा है. इसी तरह, दक्षिण कोरिया ने भी पीले सागर (येलो सी) के पास 1,500 एकड़ ज़मीन पर सोंगडो शहर बसाया. हालांकि, ये तकनीकी रूप से संपन्न स्मार्ट शहर है, लेकिन ये अभी अधूरा बना है. कम आबादी वाला और सामाजिक समावेशन की कमी के कारण भी इस शहर की आलोचना हो रही है.
भारत की 11,098 किमी तटरेखा—तटीय/अपतटीय विकास अत्यंत जटिल चुनौती.
विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों में, विज्ञान कथाओं की कल्पना की तरह बसे इन महानगरों में असमान सामाजिक लाभ मिलते हैं. इन शहरों में आम तौर पर बहुत ज़्यादा अमीर लोग ही बसते हैं, जबकि इनकी दीर्घकालिक पर्यावरणीय लागतें भी आती हैं.
दूसरी तरफ, भारत के शहरों के सामने नई तरह की समस्याएं हैं. गांवों से बड़े पैमाने पर शहरों की तरफ हो रहे प्रवास ने आवास और बुनियादी ढांचे के विकास की मांग पैदा कर दी है. भारत को सीमित वित्तीय संसाधनों, जटिल भूमि राजनीति और तीव्र मानसून, चक्रवातों और भीषण गर्मी जैसी अनोखी और जटिल चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है. हालांकि, 920 वर्ग किलोमीटर में धोलेरा विशेष निवेश क्षेत्र बसाया जा रहा है, जिसमें लगभग 6,000 एकड़ ज़मीन शहरी विकास के लिए निर्धारित है. इसी तरह आंध्रप्रदेश की राजधानी अमरावती को भी भविष्य के शहर के तौर पर विकसित किया जा रहा है. ये दोनों ही शहर इनकी संभावनाओं और ख़तरों, दोनों को दिखाता है.
धोलेरा का चरणबद्ध विकास ये दिखाता है कि क्रमिक और बुनियादी ढांचे को प्राथमिकता देने वाली योजना कितनी महत्वपूर्ण होती है. हालांकि, 217 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में विकसित की जा रही है आंध्र प्रदेश की राजधानी अमरावती का विकास राजनीतिक और भूमि अधिग्रहण विवादों में उलझा रहा. इस विवाद की वजह से पांच साल तक इसके विकास का काम रुका रहा. इसी तरह महाराष्ट्र में मुंबई के नजदीक महत्वाकांक्षी लवासा परियोजना का नतीजा भी बहुत उत्साहजनक नहीं रहा. लवासा को इटली के पोर्टोफिनो जैसी जीवनशैली वाला भारत का पहला निजी शहर बताया जा रहा था. ये सारे विवाद इस बात का एक और उदाहरण है कि कैसे बिना सोचे-समझे शहरी विकास एक स्वप्नलोक बनकर रह सकता है. अपनी शुरुआत से ही विवादों में घिरी लवासा परियोजना आज दिवालिया कार्यवाही में उलझी हुई है.
भारत की घनी आबादी वाले और पर्यावरण के प्रति संवेदनशील 11098.81 किलोमीटर लंबी तटरेखा पर तटीय या अपतटीय विकास के लिए चुनौतियां और भी जटिल हैं. इसे बड़े पैमाने पर इंजीनियरिंग समाधानों को चक्रवातों, समुद्र-स्तर में वृद्धि, नाज़ुक डेल्टाई पारिस्थितिकी तंत्र और असुरक्षित आबादी से जुड़े ज़ोखिमों से निपटना होगा. इसलिए, तैरते शहर या इस तरह की बस्तियों को बसाने की किसी भी योजना को लेकर भारतीय को बहुत सावधानी बरतनी होगी. इसके लिए एक संतुलित राष्ट्रीय दृष्टिकोण अपनाना होगा.
जापान की तैरते शहरों की महत्वाकांक्षाएं और सऊदी अरब का द लाइन शहर एक संकेत हैं. ये बताते हैं कि बढ़ती पर्यावरणीय बाधाओं के बीच शहर बसाने की कल्पना मानवता के विकास का प्रतिनिधित्व करते हैं. ये उसी सोच की अभिव्यक्ति हैं, जो चांद और मंगल ग्रह पर इंसानी बस्ती बसाने की बात करती है. मनुष्य अब उन सीमाओं के पार जाने की कोशिश कर रहा है, जो अब तक विज्ञान कथाओं के दायरे में ही रही हैं.
हालांकि, ये सबक वास्तविकता पर आधारित हैं. इसलिए इंजीनियरिंग की महत्वाकांक्षा को पर्यावरण के साथ संतुलन बिठाना होगा. ऐसे तैरते शहरीकरण का विकास करना होगा, जो समुद्री तकनीकों, नवीकरणीय केंद्रों और अनुकूली बुनियादी ढांचे से आगे जाए. ऐसी तकनीकी जो पर्यावरण की पूरक बने, समुद्री और ज़मीन दोनों पर लचीलेपन को मज़बूत करें.
इसलिए, नीतिगत ढांचे में तैरते शहरीकरण को एक क्रमिक तकनीकी मार्ग के रूप में देखा जाना चाहिए. समुद्र पर बड़ी मानव बस्तियों को बसाने से पहले उपयोगिता को प्राथमिकता दी जानी चाहिए. इसमें रखरखाव निधि, बीमा गारंटी और पारिस्थितिकी की सुरक्षा जैसी लागतों को शामिल किया जाना चाहिए. एक और महत्वपूर्ण बात ये है कि, इसमें सामाजिक समावेशन को शामिल किया जाना चाहिए. ऐसे शहरों में किफायती आवास या विस्थापित आबादी को बसाना अनिवार्य होना चाहिए. इन सिद्धांतों की अनदेखी करने से आम शहरो की जैसी कमज़ोरियां तैरते शहरों में भी फैल जाएंगी.
भारत और ग्लोबल साउथ के अन्य तटीय देशों के लिए इस तरह का शहरीकरण एक दिन अनुकूलन रणनीतियों का पूरक बन सकता है. हालांकि, इन देशों की तात्कालिक प्राथमिकता मौजूदा बस्तियों में ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को बसाकर उन्हें अनुकूल, सुरक्षित और अधिक समावेशी समाज बनाने की होनी चाहिए. भारत में, राष्ट्रीय औद्योगिक गलियारा विकास कार्यक्रम के तहत 12 हरित क्षेत्रों का विकास करने की योजना है. ये देश के शहरी परिदृश्य का स्थायी और समतापूर्ण विस्तार करने का एक सुनहरा अवसर पेश करता है.
बढ़ते समुद्री जलस्तर और बढ़ती महत्वाकांक्षाओं वाली सदी में, तैरते शहर वास्तव में मानवता के अस्तित्व में सहायक की भूमिका निभा सकते हैं. हालांकि, ये तभी होगा, जब वे कल्पना के बजाय विज्ञान, शासन और सामाजिक उद्देश्य पर आधारित हों.
धवल देसाई ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन के वाइस प्रेसीडेंट और सीनियर फेलो हैं.
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Dhaval is a Vice President - Platforms and Communities at Observer Research Foundation, Mumbai. His spectrum of work covers diverse topics ranging from urban renewal ...
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