Author : Ayjaz Wani

Published on Jul 25, 2022 Updated 29 Days ago

कराकलपकस्तान के स्वायत्त दर्जे में कटौती के प्रस्ताव के चलते उज़्बेकिस्तान में व्यापक विरोध-प्रदर्शनों का दौर शुरू हो गया है.

उज़्बेकिस्तान के कराकलपकस्तान में तेज़ होती विरोध की लपटें: सोवियत विरासत से जुड़े हैं तार!

1 जुलाई को उज़्बेकिस्तान के कराकलपकस्तान  प्रांत की राजधानी नुकुस में हिंसक प्रदर्शनों की ज्वाला भड़क उठी. उज़्बेक राष्ट्रपति शौकत मिर्ज़ियोयेव द्वारा इस इलाक़े के स्वायत्त दर्जे में कटौती किए जाने के बाद हिंसा का दौर शुरू हो गया. हिंसक झड़पों में कम से कम 18 लोगों की मौत हो गई और कुछ सुरक्षा अधिकारियों समेत 243 लोग चोटिल हुए. उज़्बेक सरकार ने प्रदर्शनकारियों के नेताओं समेत 516 लोगों को हिरासत में ले लिया. चारों ओर फैले प्रदर्शनों के चलते राष्ट्रपति मिर्ज़ियोयेव ने इलाक़े की स्वायत्तता में कटौती के फ़ैसले को मुल्तवी कर दिया. साथ ही इस स्वायत्त क्षेत्र में एक महीने के लिए इमरजेंसी लगाने का एलान भी कर दिया. यहां इंटरनेट सेवाओं में कटौती कर दी गई. सरकार ने “नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने, उनके अधिकारों और आज़ादियों का बचाव करने और क़ानून और व्यवस्था का राज बहाल करने” का मक़सद बताकर इस कार्रवाई को जायज़ ठहराया. 

ऐतिहासिक तौर पर उज़्बेकिस्तान की एकाधिकारवादी सत्ता के ख़िलाफ़ विरोध-प्रदर्शन, असहमति और आलोचनाओं की क़वायद कभी-कभार ही दिखाई पड़ी है. दरअसल राष्ट्रपति मिर्ज़ियोयेव ने देश में आर्थिक और सामाजिक बदलाव लाया है. इससे सिविल सोसाइटी को और अधिक आज़ादी मिली है. 

ऐतिहासिक तौर पर उज़्बेकिस्तान की एकाधिकारवादी सत्ता के ख़िलाफ़ विरोध-प्रदर्शन, असहमति और आलोचनाओं की क़वायद कभी-कभार ही दिखाई पड़ी है. दरअसल राष्ट्रपति मिर्ज़ियोयेव ने देश में आर्थिक और सामाजिक बदलाव लाया है. इससे सिविल सोसाइटी को और अधिक आज़ादी मिली है. 

सोवियत विरासत

ऐतिहासिक रूप से कराकलपकस्तान  और काराकलपाक्स का मूल स्रोत साफ़ नहीं है. इतिहास खंगालने पर पहली बार 16वीं शताब्दी के अंत में इनका ज़िक्र दिखाई देता है. आमतौर पर खीव के खानाटे से इनका रिश्ता जोड़ा जाता है. रूसियों ने 1873 में इस इलाक़े को जीत लिया था. रूसी राजाओं ने आर्थिक और राजनीतिक वजहों से समूचे मध्य एशिया पर नियंत्रण क़ायम कर रखा था. 1917 की बोल्शेविक क्रांति के बाद 1918 में तुर्किस्तान स्वायत्त सोवियत समाजवादी गणराज्य बन गया. बुख़ारा और खीव (2 भूतपूर्व संरक्षित राज्यों) को 1920 में पीपुल्स रिपब्लिक घोषित कर दिया गया. 

बदलते वक़्त के साथ इस्लामिक और तुर्क-समर्थक आंदोलनों के चलते मध्य एशिया में पूर्ववर्ती सोवियत संघ के ख़िलाफ़ प्रतिरोध दिखाई देने लगा. इन आंदोलनों का मक़सद एक स्वतंत्र इस्लामिक/तुर्क देश की स्थापना करना था. सोवियत संघ ने मध्य एशिया में अपना दबदबा बनाए रखने के लिए बांटो और राज करो के साम्राज्यवादी नुस्ख़े का सहारा लिया. इसके तहत प्रशासकीय इकाइयों में फेरबदल करते हुए तमाम नस्ली समुदायों के बीच बंटवारा कर अनेक अल्पसंख्यक समुदाय खड़े कर दिए गए. सोवियत शासकों ने मध्य एशिया में समाजवादी सोवियत गणराज्य (SSR) तैयार कर दिए. इनमें से हरेक गणराज्य नस्ली तौर पर अलग था और उनके नामों से इन प्रतीकात्मक नस्लीय पहचान की फ़र्जी झलक भी मिल रही थी. 1925 में सोवियत शासकों ने काराकालपाक स्वायत्त प्रांत (Oblast) की स्थापना की. शुरुआत में इसे कज़ाक SSR के भीतर रखा गया. 1930 से 1936 के बीच ये इलाक़ा रूसी महासंघ के मातहत रहा. आगे चलकर 1936 में काराकालपाक स्वायत्त प्रांत को स्वायत्त दर्जे के साथ उज़्बेकिस्तान SSR का हिस्सा बना दिया गया. ताजिक और किर्गि प्रांत क्रमश: 1929 और 1936 में पूर्णकालिक SSR बन गए.

सोवियत संघ ने मध्य एशिया में अपना दबदबा बनाए रखने के लिए बांटो और राज करो के साम्राज्यवादी नुस्ख़े का सहारा लिया. इसके तहत प्रशासकीय इकाइयों में फेरबदल करते हुए तमाम नस्ली समुदायों के बीच बंटवारा कर अनेक अल्पसंख्यक समुदाय खड़े कर दिए गए.

चौतरफ़ा भ्रष्टाचार, मंद पड़ते आर्थिक विकास और आपूर्ति और निर्यातों में गिरावट के चलते 1985 के बाद से सोवियत संघ के सामने भयंकर मुश्किलें पेश आने लगीं. राष्ट्रपति गोर्बाचेव ने ग्लासनोस्त और पेरेस्त्रोइका की नीति सामने रखी, जिससे आख़िरकार सोवियत संघ का विघटन हो गया. अलगाववादी आंदोलनों के चलते रूस के पहले राष्ट्रपति बोरिस येल्तसिन को सोवियत संघ के गणराज्यों और संघों से पूर्ण स्वतंत्रता का वादा करने पर मजबूर होना पड़ा. सोवियत संघ के विघटन से कराकलपकस्तान को भी स्वतंत्रता हासिल हो गई. 1990 में यहां की संसद ने संप्रभुता के घोषणा पत्र को मंज़ूरी दे दी. हालांकि 1993 में इस इलाक़े को उज़्बेकिस्तान के साथ मिला लिया गया. साथ ही 20 साल के बाद इस क्षेत्र की आज़ादी के लिए जनमत संग्रह कराने का वादा भी किया गया. उज़्बेकिस्तान के संविधान के तहत कराकलपकस्तान के पास अपने अलग प्रतीक, संस्थाएं और वैधानिक ढांचा मौजूद है. हालांकि जनमत संग्रह को लेकर किया गया वादा कभी पूरा नहीं किया गया.  

सामाजिक-आर्थिक ढांचा

उज़्बेकिस्तान का 40 प्रतिशत इलाक़ा कराकलपकस्तान के दायरे में आता है. यहां काराकलपाक्स और कज़ाक लोगों की साझा आबादी उज़्बेक नस्ल के लोगों से कहीं ज़्यादा है. इनकी आधिकारिक भाषा (कज़ाक से मिलती-जुलती) को राजकीय दर्जा हासिल है. इलाक़े की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से खेती पर आधारित है. बहरहाल अरल सागर के सूखने से खारेपन के 10/g से बढ़कर 100/g हो जाने के चलते यहां के जीवन स्तर में गिरावट दर्ज की गई है. दरअसल सोवियत संघ के ज़माने में कपास के उत्पादन के लिए कीटनाशकों और रसायनों का अंधाधुंध इस्तेमाल किया गया. सोवियत युग में खेतीबाड़ी के ग़लत तौर-तरीक़ों की वजह से इलाक़े के कृषि उत्पादन और लोगों की सेहत पर मार पड़ी है. मछली उद्योग पूरी तरह से लुप्त हो गया है. यहां की कठोर जलवायु के चलते कृषि उत्पादन की मियाद छोटी हो गई है. लचर बुनियादी ढांचे और बेरोज़गारी के ऊंचे स्तर के चलते ये इलाक़ा आर्थिक तौर पर उज़्बेकिस्तान पर निर्भर हो गया. इस इलाक़े के लोगों की प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत से 1.4 गुणा कम है. इतना ही नहीं कराकलपकस्तान के लोगों की निर्धनता का स्तर उज़्बेकिस्तान में सबसे ज़्यादा है.   

सोवियत युग में खेतीबाड़ी के ग़लत तौर-तरीक़ों की वजह से इलाक़े के कृषि उत्पादन और लोगों की सेहत पर मार पड़ी है. मछली उद्योग पूरी तरह से लुप्त हो गया है. यहां की कठोर जलवायु के चलते कृषि उत्पादन की मियाद छोटी हो गई है. लचर बुनियादी ढांचे और बेरोज़गारी के ऊंचे स्तर के चलते ये इलाक़ा आर्थिक तौर पर उज़्बेकिस्तान पर निर्भर हो गया.

बढ़ते खारेपन और ज़हरीली धूल की वजह से यहां स्वास्थ्य के मोर्चे पर कई ख़तरनाक रुझान देखने को मिले हैं. इनमें कैंसर, टीबी और बच्चों में दिल और किडनी से जुड़ी बीमारियों के बढ़ते मामले शामिल हैं. हालांकि 2016 के बाद राष्ट्रपति मिर्ज़ियोयेव द्वारा लाए गए आर्थिक और सामाजिक सुधारों और निवेश के बढ़े स्तर से कराकलपकस्तान को काफ़ी लाभ पहुंचा है. सुधारवादी उपायों और निवेश के फ़ायदे राजधानी नुकुस के साथ-साथ बाक़ी इलाक़ों तक भी पहुंचे हैं. आमतौर पर काराकलपाक्स लोग संविधान के तहत मिली स्वायत्तता से ख़ुश थे. यहां तक कि उज़्बेकिस्तान के बाहर केंद्रीय शक्तियों के ख़िलाफ़ चल रहे आंदोलनों का भी राष्ट्रपति मिर्ज़ियोयेव के रसूख़ पर बेहद मामूली असर पड़ा. 

शौकत मिर्ज़ियोयेव द्वारा संविधान में तंग नज़रिए से किए गए संशोधन  

दूसरे कार्यकाल के लिए चुने जाने के बाद राष्ट्रपति मिर्ज़ियोयेव ने नागरिक स्वतंत्रताओं की रक्षा के लिए एक नया संविधान तैयार करने का प्रस्ताव रखा. 2016 में सत्ता में आने के बाद मिर्ज़ियोयेव ने सामाजिक और आर्थिक सुधारों के लिए एक के बाद एक कई क़दम उठाए. इससे आर्थिक वृद्धि को बढ़ावा मिला और देश में विदेशी निवेश की आमद हुई. नतीजतन देश की अर्थव्यवस्था और सिविल सोसाइटी जीवंत हो गई. मिसाल के तौर पर मध्य एशिया के दूसरे गणराज्यों की तुलना में उज़्बेकिस्तान की सिविल सोसाइटी सोशल और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर कहीं ज़्यादा सक्रिय है. मिर्ज़ियोयेव ने पड़ोसी देशों के साथ उज़्बेकिस्तान के रिश्तों पर ध्यान देते हुए उन्हें सुधारने से जुड़े कई उपाय किए. साथ ही पश्चिमी दुनिया से भी मेलजोल बढ़ाने की क़वायद की. इससे उनकी लोकप्रियता बढ़ती चली गई. 

2016 में सत्ता में आने के बाद मिर्ज़ियोयेव ने सामाजिक और आर्थिक सुधारों के लिए एक के बाद एक कई क़दम उठाए. इससे आर्थिक वृद्धि को बढ़ावा मिला और देश में विदेशी निवेश की आमद हुई. 

इस बीच प्रस्तावित संविधान संशोधनों ने विरोध-प्रदर्शनों की आग भड़का दी. दरअसल इन संशोधनों का मुख्य मक़सद मिर्ज़ियोयेव के लिए राष्ट्रपति का कार्यकाल 5 साल से बढ़ाकर 7 साल करना था. मौजूदा संविधान में राष्ट्रपति के लिए 5-5 साल के 2 कार्यकालों की सीमा तय है. संविधान में इन प्रस्तावित संशोधनों को जून के अंत में सार्वजनिक किया गया था. हालांकि मिर्ज़ियोयेव के रुतबे और लोकप्रियता के चलते तब किसी तरह का ग़ुस्सा या विरोधी प्रतिक्रियाएं नज़र नहीं आईं थीं. हालांकि लोग तब हक्केबक्के रह गए जब उन्हें ये एहसास हुआ कि प्रस्तावित संशोधनों से कराकलपकस्तान का स्वायत्त दर्जा भी छिन जाएगा. जनता इस बात से आशंकित है कि इस संशोधन से उनका दर्जा सोवियत युग जैसा हो जाएगा. नुकुस में दिखाई दिए प्रचंड विरोध से ज़ाहिर है कि यहां के लोग भारी जद्दोजहद से हासिल स्वायत्तता और आज़ादी की हिफ़ाज़त करने को तैयार हैं, चाहे इसके लिए उन्हें कोई भी क़ीमत क्यों न चुकानी पड़े.

2018 में कराकलपकस्तान में गैस के बड़े भंडार की खोज हुई थी, जिससे ये इलाक़ा उज़्बेकिस्तान के लिए एक आर्थिक परिसंपत्ति बन गया है. लिहाज़ा हालिया वाक़यों से उज़्बेकिस्तान की सरकार यहां के भविष्य को लेकर निश्चित रूप से बेचैन रहेगी.

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