Author : Neha Parti

Expert Speak India Matters
Published on Aug 07, 2025 Updated 0 Hours ago

अब जबकि नई शिक्षा नीति (NEP) 2020 के पांच साल पूरे हो गए हैं, तो तकनीक पर निर्भर शिक्षा पर भारत के ज़ोर देने की समीक्षा करें, तो पता चलता है कि इसमें प्रगति तो हुई है, लेकिन महत्वाकांक्षाओं, पहुंच और वास्तविक इस्तेमाल के बीच काफ़ी फ़ासला है

एडटेक के जरिए शिक्षा सुधार: NEP 2020 की डिजिटल दिशा

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ये लेख, हमारी ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020: कल्पना से हकीकत तक’ सीरीज़ का एक भाग है.


नई शिक्षा नीति 2020 भारत की शिक्षा व्यवस्था को तकनीक से जोड़ने के मामले में एक विचारशील, व्यापक और महत्वाकांक्षी दृष्टिकोण उपलब्ध कराती है. लागू होने के पांच साल पूरे होने पर ये अच्छा मौक़ा है जब हम तकनीक के ज़रिए शिक्षा को परिवर्तन करने के इसकी साहसिक दूरदृष्टि पर एक नज़र डालें. NEP 2020 केवल किस्तों में लागू होने वाला अपडेट भर नहीं थी; ये एक बुनियादी परिवर्तन की शुरुआत थी, जिसमें तकनीक को सार्वभौमिक, समावेशी और भविष्य के लिए तैयार करने वाली शिक्षा का एक अहम औज़ार और संस्थागत सहयोगी है.

 

सुगमता से उपलब्ध डिजिटल कंटेंट के ज़रिए अध्यापन और पढ़ाई को अधिक भागीदारी वाला बनाने में तकनीक की भूमिका- जिसमें अनुवाद और ऑडियो विज़ुअल सहायता भी शामिल हो- को स्वीकार करते हुए नई शिक्षा नीति ये भी बताती है कि तकनीक किस तरह योजना निर्माण और प्रशासन में योगदान दे सकती है. जैसे कि इसके ज़रिए ये अनुमान लगाया जा सकता है कि भविष्य में किसी विषय के अध्यापक की 20 वर्षों बाद कितनी ज़रूरत होगी. इससे सार्वजनिक डेटा प्लेटफॉर्म के मध्यम से पारदर्शिता को भी बढ़ाया जा सकता है. शिक्षा नीति उभरते हुए तकनीकी चलन और स्कूल के पाठ्यक्रम पर उनके प्रभाव को स्वीकार करते हुए हर उम्र के छात्रों के लिए साइबर सुरक्षा, आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस (AI), नैतिकता और तकनीक के पूर्वाग्रह से जुड़े ज्ञान के नए विषय मुहैया कराने की बात भी करती है. NEP 2020 पेशेवर और व्यवसायिक पाठ्यक्रमों में सुधार करके उन्हें कामकाज की दुनिया में आए बदलावों के मुताबिक़ ढालना चाहती है. नई शिक्षा नीति नेशनल एजुकेशन टेक्नोलॉजी फोरम (NETF) और नेशनल डिजिटल एजुकेशन आर्किटेक्चर (NDEAR) जैसे संस्थागत ढांचों की स्थापना का भी प्रस्ताव रखती है, ताकि शिक्षा के लिए आपस में तालमेल वाले सार्वजनिक मूलभूत डिजिटल ढांचे का निर्माण किया जा सके.

 नई शिक्षा नीति नेशनल एजुकेशन टेक्नोलॉजी फोरम (NETF) और नेशनल डिजिटल एजुकेशन आर्किटेक्चर (NDEAR) जैसे संस्थागत ढांचों की स्थापना का भी प्रस्ताव रखती है, ताकि शिक्षा के लिए आपस में तालमेल वाले सार्वजनिक मूलभूत डिजिटल ढांचे का निर्माण किया जा सके.

अब तक हुई प्रगति

 

पिछले पांच वर्षों में भारत ने शिक्षा में तकनीक के एकीकरण और ख़ास तौर से डिजिटल मूलभूत ढांचे तक पहुंच के विस्तार के मामले में काफ़ी प्रगति की है. यूनिफाइड डिस्ट्रिक्ट इनफार्मेशन सिस्टम फॉर एजुकेशन प्लस (UDISE+) के आंकड़े के मुताबिक़ स्कूलों में डिजिटल हार्डवेयर की उपलब्धता 2019-20 में 34 प्रतिशत की तुलना में 2023-24 में 57 प्रतिशत तक बढ़ गई थी. इंटरनेट सुविधा की उपलब्धता में भी सुधार आया है, विशेष रूप से 2021 के बाद से ये 22 प्रतिशत से बढ़कर 54 फ़ीसद हो गया है. हालांकि, सरकारी स्कूल इस मामले में अभी भी पीछे हैं. देश के केवल 44 फ़ीसद सरकारी स्कूल ऐसे हैं, जहां डिजिटल मूलभूत ढांचा है और 2023-24 तक इनमें से केवल 30 प्रतिशत स्कूलों में ही इंटरनेट कनेक्टिविटी थी. इसके अलावा, इन संसाधनों की उपलब्धता के मामले में व्यापक क्षेत्रीय असमानताएं भी दिखती हैं. केरल और दिल्ली में जहां लगभग हर स्कूल में ये सुविधाएं मौजूद हैं. वहीं, बिहार, उत्तर प्रदेश और मिज़ोरम में अभी भी स्कूलों को इन सुविधाओं के मामले में काफ़ी दिक़्क़तों का सामना करना पड़ रहा है.

Five Years Of Nep 2020 And The Promise Of Edtech

Source: Prepared by the author using UDISE data from different years

दिव्यांग छात्रों की दिक़्क़तों से पार पाने के मामले में कुछ प्रयास तो किए गए हैं. दिसंबर 2024 में शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने सुन पाने में दिक़्क़त वाले समुदाय को समर्पित प्रधानमंत्री (PM) ई-विद्या डायरेक्ट टू होम (DTH) चैनल (चैनल नंबर 31) का उद्घाटन किया था. दृष्टिहीन और सुनने की क्षमता नहीं रखने वालों के लिए डिजिटली एक्सेसिबल इन्फॉर्मेशन सिस्टम (DAISY) भी विकसित किया गया है. वहीं नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर ओपेन स्कूलिंग (NIOS) की वेबसाइट और यू-ट्यूब चैनल के लिए साइन लैंग्वेज पर आधारित व्यवस्था का भी विकास किया गया है.

 

दीक्षा प्लेटफ़ॉर्म में अब बढ़कर 1.89 करोड़ रजिस्टर्ड यूज़र हो गए हैं. इसमें सबसे ज़्यादा उछाल कोविड-19 महामारी के दौरान आया था. हालांकि, रोज़ाना सक्रिय होने वाले यूज़र अभी भी एक फ़ीसद से भी कम हैं. इससे टिकाऊ रूप से संपर्क में चुनौतियों का अंदाज़ा होता है. कोविड-19 महामारी के दौरान ही NCERT ने डिजिटल शिक्षा के लिए अध्यापकों के लिए प्रज्ञता के नाम से दिशा-निर्देश तैयार किए थे, ताकि वो आसानी से ऑनलाइन शिक्षा को डिज़ाइन कर सकें. दीक्षा पोर्टल पर छात्रों, अध्यापकों, टीचर एडुकेटर्स और अभिभावकों के लिए भी 21,558 ई-कोर्स उपलब्ध हैं. इस पोर्टल पर उपलब्ध पाठ्यक्रम 133 भाषाओं में प्राथमिक जानकारी देता है, जिनमें सात विदेशी भाषाएं भी शामिल हैं. दीक्षा पोर्टल पर 63 लाख से ज़्यादा अध्यापकों ने निष्ठा (NISHTHA) ट्रेनिंग भी पूरी कर ली है. 

 

दीक्षा और नेशनल डिजिटल एजुकेशन आर्किटेक्चर (NDEAR) की प्रगति से उम्मीदें दिख रही हैं. इन्हें सेंट्रल स्क्वॉयर फाउंडेशन और EkStep जैसे संगठनों से मदद भी मिल रही है. लेकिन, नेशनल टेक-इनैबल्ड एजुकेशन फ्रेमवर्क (NTEF) जैसी अन्य पहलें अभी भी कामयाब नहीं हैं. इसकी वजह इनकी जिम्मेदारियों और दायरों में स्पष्टता न होना और निवेश का अभाव है. परमानेंट एजुकेशन नंबर (PEN) जैसी पहलें भी कई राज्यों में लागू की गई है. हालांकि, इनको लागू करने के मामले में अनियमितता नज़र आती है और अब तक हुई प्रगति का एकीकृत आंकड़ा भी उपलब्ध नहीं है.

 

तकनीक के एकीकरण से जुड़े पाठ्यक्रम के हिसाब से राज्यों के शिक्षा विभागों ने अपने कंप्यूटर साइंस के पाठ्यक्रम में बदलाव करने भी शुरू कर दिए हैं. इस रूप-रेखा के तहत ओडिशा ने 21वीं सदी के आकांक्षी पाठ्यक्रम के मुताबिक़ कंप्यूटेशनल थिंकिंग का एक पाठ्यक्रम स्थापित किया है. वहीं, आंध्र प्रदेश की सरकार कक्षा सात से 12 तक के कंप्यूटर साइंस के पाठ्यक्रम में AI को जोड़ने पर काम कर रही है. व्यवसायिक शिक्षा के लिए इंडस्ट्रियल ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट्स (ITIs) में AI मॉड्यूल लागू किया गया है और इसके साथ साथ AI पर आधारित कौशल विकास के कार्यक्रम भी शुरू किए गए हैं.

 

धीमी गति के बावजूद, डिजिटल परिवर्तन की बुनियादें रखी जा रही हैं. इससे डेटा के प्रशासन के एक मज़बूत ढांचे की ज़रूरत को भी बल मिला है, ताकि छात्रों के डेटा सुरक्षित रखे जा सकें और AI का उत्तरदायी इस्तेमाल सुनिश्चित किया जा सके.

 

सीखने के लिए डिजिटल कंटेंट की मांग

जहां नई शिक्षा नीति शिक्षा में तकनीक के एकीकरण को लेकर एक व्यापक दूरदृष्टि को रेखांकित करती है. वहीं, कक्षाओं में जो कुछ होता है, वो अक्सर एक अलग ही कहानी बताता है. जिन स्कूलों में मूलभूत डिजिटल ढांचा है, वहां डिजिटल कंटेंट सबसे आसान चीज़ हो गई है. दीक्षा जैसे कार्यक्रमों ने 7000 किताबों को कई भाषाओं में डिजिटलीकृत किया है और 3.75 लाख से ज़्यादा ई-कंटेंट को अपलोड किया है. इनमें वीडियो, यू-ट्यूब चैनल और इंटरएक्टिव मैटेरियल शामिल है. लेकिन, इस विस्तार में एक संरचनात्मक तौर तरीक़े का अभाव नज़र आता है.

 

अध्यापकों को अक्सर बुनियादी तकनीकी बाधाओं का सामना करना पड़ता है. इनमें लैपटॉप को स्मार्ट बोर्ड से कनेक्ट करना शामिल है. इससे वो उपलब्ध मूलभूत ढांचे का भी इस्तेमाल करने से बचते हैं. जो लोग कंटेंट का इस्तेमाल करते भी रहते हैं, वो भी किसी निर्देशक रूपरेखा के अभाव में आम तौर पर इनका चुनाव अपनी निजी पसंद के मुताबिक़ करते हैं. इसका नतीजा ये हुआ है कि सीखने के लिए जो मैटेरियल उपलब्ध है उनमें जोधा अकबर फिल्म की क्लिप से लेकर खान सर जैसे यू-ट्यूब से शोहरत पाने वाले व्यक्ति शामिल हैं. इनमें से कुछ कंटेंट तो आकर्षक है. लेकिन, इससे अक्सर खपत वाले मटेरियल को बढ़ावा मिलता है और अनजाने में ही सही, मगर लैंगिक, मज़हबी और क्षेत्रीय पूर्वाग्रहों को बढ़ावा मिलता है.

 

बहुत से उत्साही अध्यापक अपना डिजिटल कंटेंट तैयार करके उसे साझा कर रहे हैं, जिससे तकनीक पर आधारित शिक्षा की खपत का संकेत मिलता है.

 तकनीक पर आधारित और पारंपरिक पढ़ाई को मिलाकर शिक्षा देने के लिए हौले से प्रोत्साहन देना और इंसानी संपर्क ज़रूरी हो जाता है. इससे एक ऐसे समुदाय का निर्माण करने में मदद मिलती है, जिसमें अध्यापकों को ये महसूस हो कि उनकी मदद की जा रही है, उनको देखा और सुना जा रहा है.

जैसे जैसे डिजिटल कंटेंट आसानी से उपलब्ध हो रहा है, वैसे में अर्थपूर्ण संपर्क के मायने क्या हैं, ये समझने के लिए गहराई से पड़ताल करना आवश्यक हो जाता है. खपत पर आधारित सोच से आगे बढ़कर भी डिजिटल कंटेंट का निर्माण करना आवश्यक हो जाता है, जिससे प्रयोगधर्मिता, जिज्ञासा, विचार विमर्श और अर्थ निकालने को बढ़ावा मिले. मास्टरकोच नाम के मिले जुले पेशेवराना विकास के कोर्स के ज़रिए रिसर्च ने ये दिखाया है कि छात्रों को लुभाने वाला कंटेंट ऐसा हो, जिससे वो जुड़ाव महसूस करें, जो कक्षा की सच्चाईयों पर आधारित हो और सीखने के लिए तैयार किया गया हो. तकनीक पर आधारित और पारंपरिक पढ़ाई को मिलाकर शिक्षा देने के लिए हौले से प्रोत्साहन देना और इंसानी संपर्क ज़रूरी हो जाता है. इससे एक ऐसे समुदाय का निर्माण करने में मदद मिलती है, जिसमें अध्यापकों को ये महसूस हो कि उनकी मदद की जा रही है, उनको देखा और सुना जा रहा है.

 

उपयोग से आविष्कार की ओर: रचना के लिए तकनीक का इस्तेमाल

तकनीक पर आधारित पढ़ाई का एक उभरता हुआ आयाम इसको STEM (विज्ञान, तकनीक, इंजीनियरिंग और गणित) की शिक्षा से जोड़ने का है, जिससे समतावादी और समुदायों की अगुवाई में आविष्कार को बढ़ावा मिल सके. 2020 की शिक्षा नीति ऐसे वैज्ञानिक और तकनीकी समाधानों पर बल देती है, जो सामाजिक, सांस्कृतिक और पर्यावरण के संदर्भों पर आधारित हों. इस दृष्टिकोण को बढ़ाने वाली एक पहल अटल टिंकरिंग लैब्स (ATLs) है, जो टिंकरिंग और इनोवेशन से सहजता से सीखने को बढ़ावा देती है.

 

साल 2020 से अटल टिंकरिंग प्रयोगशालाओं की संख्या 5 हज़ार से बढ़कर 10,000 पहुंच गई है, जिनमें से लगभग 60 प्रतिशत तो सरकारी स्कूलों में हैं. हालांकि, यूनिफाइड डिस्ट्रिक्ट इनफार्मेशन सिस्टम फॉर एजुकेशन प्लस (UDISE+) द्वारा उपलब्ध गाए गए रिसर्च के मुताबिक़ ज़्यादातर ATL उन स्कूलों में हैं, जिन्हें केंद्र सरकार चलाती है. जैसे कि केंद्रीय विद्यालय और नवोदय विद्यालय. राज्यों के सरकारी स्कूलों में पांच प्रतिशत से कम ही अटल टिंकरिंग लैब हैं. हो सकता है कि ये फ़ासला इस साल (2025-26) के बजट के एलान से कम हो सकेगा, जिसमें अगले पांच वर्षों के दौरान 50 हज़ार अतिरिक्त प्रयोगशालाएं स्थापित करने का प्रावधान किया गया है.

 

अटल टिंकरिंग लैब्स छात्रों को तकनीक का इस्तेमाल सिर्फ़ खपत के लिए करने के बजाय रचना के लिए भी करने को प्रोत्साहित करके एक परिवर्तनकारी भूमिका निभा सकती हैं. जिससे छात्र वास्तविक जीवन की सामुदायिक समस्याओं के समाधान हैकाथॉन और डिज़ाइन की दूसरी चुनौतियों के ज़रिए कर सकें. ऐसी प्रयोगात्मक पढ़ाई, छात्रों को समाज में तकनीक की भूमिका समझने में मदद करती है, तकनीक की डिज़ाइन में पूर्वाग्रह और प्रतिनिधित्व को लेकर अहम सवाल खड़े करती है. जब तकनीकी पढ़ाई स्थानीय परिस्थितियों पर आधारित होगी, तो ये क्षेत्र छात्रों को सिर्फ़ ग्राहक नहीं, बल्कि बदलाव के रचनाकार भी बनाएगी.

 

इस वक़्त अटल टिंकरिंग लैब स्थापित करने के लिए हार्डवेयर और मूलभूत ढांचे में भारी निवेश की ज़रूरत पड़ती है. इनको उन स्कूलों के चुनाव के ज़रिए स्थापित किया जा रहा है, जो कुछ ख़ास पैमानों पर खरे उतरते हैं. कम लागत वाली हैकाथॉन जैसी प्रयोगात्मक प्रक्रियाओं के ज़रिए इनोवेशन की मानसिकता का निर्माण करके इन तरीक़े में बदलाव लाया जा सकता है. क्योंकि हैकाथॉन जैसे आयोजन सरकारी व्यवस्थाओं में आसानी से बढ़ाए जा सकते हैं. दूसरा, चुनाव का एक तय पैमाना अपनाने के बजाय, अटल टिंकरिंग लैब्स को उन स्कूलों को भी दिया जा सकता है, जो इनोवेशन का इरादा रखते हैं और जिन्होंने तकनीक पर आधारित शिक्षा को बढ़ावा देने के प्रयास किए हैं. इससे इनके प्रभावी इस्तेमाल को बढ़ावा मिलेगा. ज़्यादा से ज़्यादा जुड़ने और रख-रखाव की प्रेरणा मिलेगी और कुछ ख़ास प्रतिष्ठित केंद्रीय संस्थानों के बजाय, सभी तरह के स्कूलों में ATL का बराबरी से वितरण हो सकेगा.

 

आगे की राह 

नई शिक्षा नीति 2020 ये स्वीकार करती है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, अनुकूलित मूल्यांकन और स्मार्टबोर्ड जैसी उभरती तकनीकें न सिर्फ़ इस बात को बुनियादी तौर पर बदल सकते हैं कि छात्र क्या पढ़ते हैं, बल्कि वे क्या पढ़ते हैं. इस संभावना का दोहन करने के लिए भारत को तकनीक को बढ़ावा देने वाला पढ़ाई का इकोसिस्टम निर्मित करना चाहिए जो समावेशी और समतामूलक हो, और सम्मान, लोकतंत्र, शांति और क्रिटिकल थिंकिंग पर आधारित हो. इसके साथ साथ ये छात्रों को तकनीकी कौशल और ऐसी मानसिकता से लैस करे, जो आगे चलकर उनको उज्जवल करियर बनाने में भी मददगार हो.

 

इसके लिए चार मोर्चों पर क़दम उठाने की ज़रूरत है. पहला तकनीक और शिक्षा के क्षेत्र में रिसर्च और विकास में निवेश करना, ताकि आविष्कार सबूतों के आधार पर हों और संदर्भों के लिहाज से प्रासंगिक हों. दूसरा, स्कूल स्तर के डिजिटल मूलभूत ढांचे में निवेश बढ़ाना. पिछले कुछ वर्षों के दौरान इसमें लगातार बढ़ोतरी के बावजूद UDISE+ की साल 2023-24 की रिपोर्ट बताती है कि देश के केवल 57.2 प्रतिशत स्कूलों में कंप्यूटर हैं, जो काम कर रहे हैं. जबकि 53.9 प्रतिशत स्कूलों में ही इंटरनेट की सुविधा है. तीसरा, मौजूदा पेशेवर विकास के ज़रिए अध्यापकों की क्षमता का निर्माण करना. अध्यापकों को न केवल तकनीक का उपयोग खपत के लिए करना आना चाहिए, बल्कि उससे आगे जाकर अन्वेषण, खेल और छात्रों को लगातार डिजिटल होती दुनिया में रचनाशीलता, हमदर्दी, क्रिटिकल थिंकिंग और नैतिक तर्कवाद के लिए निर्देशित करना भी आए.

 

चौथा, अलग अलग क्षेत्रों के बीच सहयोग को बढ़ावा देना है. जिसमें तकनीकी विशेषज्ञ, शिक्षक, सामाजिक वैज्ञानिक और नीति निर्माता मिलकर पढ़ना सीखने के भविष्य की नए सिरे से कल्पना करें. तकनीक को एक लक्ष्य के तौर पर नहीं देखना चाहिए, बल्कि इसे ऐसा माध्यम समझना चाहिए जो अधिक मानवीय, न्यायोचित और भविष्य के लिए तैयार शिक्षा व्यवस्था का निर्माण करे. इससे निजी और सार्वजनिक क्षेत्र की भागीदारी की आवश्यकता रेखांकित होती है, जिसे हम दीक्षा प्लेटफॉर्म के साथ देख चुके हैं. ऐसी साझेदारियों को तकनीक को आगे रखने वाला तरीक़ा अपनाने के बजाय तकनीक की डिज़ाइन और एकीकरण को शैक्षणिक और सीखने पर केंद्रित नज़रियों को प्राथमिकता देनी चाहिए.

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