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बढ़ते जलवायु और साइबर ख़तरों के साथ भारत और ऑस्ट्रेलिया फाइव आइज़ को इंडो-पैसिफिक सामर्थ्य के एक नए युग में ले जा सकते हैं.
Image Source: Getty
फाइव आइज़ अलायंस- जिसमें ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, न्यूज़ीलैंड, यूनाइटेड किंगडम (UK) और अमेरिका शामिल हैं- को लंबे समय से सबसे प्रभावी खुफिया साझा करने वाला नेटवर्क माना जाता है. द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान स्थापित ये संगठन सिग्नल इंटेलिजेंस (SIGINT), मानवीय इंटेलिजेंस (HUMINT) और भू-स्थानिक (जियोस्पेशियल) इंटेलिजेंस (GEOINT) का लाभ उठाता है जो कि आतंकवाद का मुकाबला करने, साइबर सुरक्षा प्रदान करने और भू-राजनीतिक निगरानी में मददगार हैं. हालांकि हाल के दिनों में सदस्य देशों के बीच भू-राजनीतिक बदलावों और रणनीतिक मतभेदों के कारण उसकी इस क्षमता पर दबाव पड़ा है.
इंडो-पैसिफिक के रणनीतिक चौराहे पर स्थित ऑस्ट्रेलिया और उभरती क्षेत्रीय ताकत भारत के लिए ये स्थिति जोखिम और अवसर दोनों पेश करती है. जलवायु सुरक्षा से जुड़े इंटेलिजेंस के केंद्र के रूप में फाइव आइज़ को बदलना एक साहसिक कदम लग सकता है लेकिन ऐसा करने से संसाधनों को लेकर जलवायु से प्रेरित संघर्षों, प्रवासन (माइग्रेशन) संकट और गलत सूचनाओं को रोका जा सकता है. दोनों देशों के लिए ये नेतृत्व करने का एक रणनीतिक अवसर है जिसमें लैंगिक एवं मानवीय प्राथमिकताओं को मज़बूती से खुफिया साझा करने के साथ मिलाया जा सकता है.
फाइव आइज़ गठबंधन पिछले कई दशकों से उल्लेखनीय रूप से स्थिर रहा है लेकिन हाल के समय में सदस्य देशों के बीच तनाव ने उसके दीर्घकालिक अस्तित्व को लेकर चिंता पैदा कर दी है. राजनीतिक मोर्चे पर अमेरिका की विदेश नीति की बदलती प्राथमिकताएं, जिनमें यूक्रेन जैसे सहयोगियों के साथ खुफिया जानकारी साझा करने पर रोक लगाने की उसकी इच्छा शामिल है, इस गठबंधन को लेकर लेन-देन से जुड़े दृष्टिकोण का संकेत देती हैं. ऐसी भी ख़बरें आई हैं कि अमेरिका सुरक्षा चिंताओं की वजह से कनाडा को गठबंधन से बाहर करने की योजना बना रहा है. आर्थिक दृष्टिकोण से ऑस्ट्रेलिया के इस्पात और एल्युमीनियम पर अमेरिकी टैरिफ जैसे व्यापार से जुड़े विवादों का नतीजा तनाव में और बढ़ोतरी के रूप में निकला. इसके कारण इस सुरक्षा सहयोग में असहमति और तेज़ होने को लेकर चिंता बढ़ गई है.
वर्तमान ख़तरे फाइव आइज़ के लिए एक अवसर उत्पन्न करते हैं कि वो भारत की डिजिटल फॉरेंसिक विशेषज्ञता और ऑस्ट्रेलिया की सिग्नल इंटेलिजेंस की क्षमताओं को जोड़कर जलवायु सुरक्षा की दिशा में अपने ध्यान का विस्तार करें ताकि प्रमाणित, निष्पक्ष खुफिया जानकारी सुनिश्चित की जा सके.
वास्तविक समय में ख़तरे की निगरानी को आसान बनाने वाली खुफिया जानकारी को साझा करने वाले समझौते राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण हैं. इस सुरक्षा ढांचे का एक और महत्वपूर्ण घटक जलवायु सुरक्षा तक फैला हुआ है. हिमालय में पानी से जुड़े विवाद, मॉनसून में बदलाव और तटीय विस्थापन जैसे कारणों से भारत जलवायु प्रेरित अस्थिरता का सामना करता है. कमज़ोर फाइव आइज़ से महत्वपूर्ण खुफिया जानकारी तक ऑस्ट्रेलिया की पहुंच कम हो जाती है जो कि क्षेत्र में जलवायु से जुड़े तनावों जैसे कि बाढ़, सूखा और समुद्र के स्तर में बढ़ोतरी से निपटने के लिए आवश्यक है. इसके अलावा संसाधनों की कमी से सबसे ज़्यादा महिलाएं और देसी समुदाय प्रभावित होते हैं जिन्हें सबसे अधिक नुकसान उठाना पड़ता है.
अप्रैल 2025 में प्रकाशित जेंडर स्नैपशॉट 2024 रिपोर्ट के अनुसार जलवायु परिवर्तन 2050 तक 15.80 करोड़ अतिरिक्त महिलाओं और लड़कियों को ग़रीबी में धकेल देगा. ये पुरुषों और लड़कों के लिए इसी आंकड़े की तुलना में लगभग 1.6 करोड़ ज़्यादा है. भारत में पहले से मौजूद सामाजिक कमज़ोरियां- जैसे कि संसाधनों तक पहुंच की कमी और फैसला लेने का हिस्सा नहीं होना- दलित और आदिवासी समूहों के लिए जलवायु आपदा के बाद समर्थन और पुनर्वास प्राप्त करना मुश्किल बनाती हैं. ऑस्ट्रेलिया में जलवायु परिवर्तन की वजह से समुद्र के स्तर में बढ़ोतरी और तटीय कटाव ने टोरेस स्ट्रेट में पहले ही एबोरिजिनल समुदाय को प्रभावित किया है. इसकी वजह से उनके घरों, सांस्कृतिक स्थलों और आजीविका को ख़तरा पैदा हो गया है.
इसके अलावा विदेशी दुष्प्रचार, जिसमें तेज़ी से जलवायु को लेकर गलत सूचना भी शामिल हो रही है, का मुकाबला करने के लिए भी खुफिया जानकारी वाले गठबंधन में एकजुटता महत्वपूर्ण है. जलवायु के असर, संसाधनों की उपलब्धता और जलवायु से प्रेरित माइग्रेशन को लेकर गलत नैरेटिव राष्ट्रीय कमज़ोरी का फायदा उठा सकता है और जलवायु को लेकर सरकार के कदमों को कमज़ोर कर सकता है. भारत में 2020-2021 के किसान आंदोलन के दौरान दुष्प्रचार में उछाल- जिनमें छेड़छाड़ कर बनाई गई तस्वीरें और गुमराह करने वाले दावे शामिल हैं- ने इसे अलगाववादी तत्वों से प्रभावित आंदोलन बताया. दूसरी तरफ ऑस्ट्रेलिया में जलवायु को लेकर ग़लत सूचना वाले अभियानों का स्वरूप बदल गया है. अब वो पूरी तरह से इनकार के बदले आर्थिक चिंताओं और ऊर्जा सुरक्षा पर ज़ोर दे रहे हैं.
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चीन और रूस राजनीतिक नैरेटिव और जनमत को गढ़ने के लिए सक्रिय रूप से साइबर टूल और दुष्प्रचार का इस्तेमाल करते हैं. ऑस्ट्रेलियन स्ट्रैटिजिक पॉलिसी इंस्टीट्यूट की 2023 की रिपोर्ट के अनुसार चीन ने कथित तौर पर राज्य प्रायोजित मीडिया और गुप्त प्रभाव नेटवर्क (कोवर्ट इन्फ्लुएंस नेटवर्क) के ज़रिए ऑस्ट्रेलिया में लोगों की भावनाओं को प्रभावित करने के लिए सूचना युद्ध की रणनीति का इस्तेमाल किया. 2023-24 के बीच ऑस्ट्रेलिया की सरकार ने साइबर अपराध की गतिविधियों में भूमिका के लिए पहली बार रूस के दो नागरिकों पर पाबंदी लगाने के उद्देश्य से स्वायत्त साइबर प्रतिबंध ढांचे का उपयोग किया.
‘जलवायु से प्रेरित कट्टरपंथ’- ऐसा शब्द जो अभी तक व्यापक रूप से स्थापित नहीं हुआ है- का इंटरनेशनल सेंटर फॉर काउंटर-टेररिज़्म (ICCT), स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) और संयुक्त राष्ट्र अंतरक्षेत्रीय अपराध एवं न्याय अनुसंधान संस्थान (UNICRI) जैसी संस्थाओं ने काफी हद तक एक अवधारणा के रूप में पता लगाया है.
ये रणनीतियां लैंगिक और परस्पर विरोधी दुष्प्रचार से जुड़ी हुई हैं क्योंकि जलवायु को लेकर चिंता व्यक्त करते समय महिलाएं लक्षित उत्पीड़न का सामना करती हैं और हेरफेर वाले नैरेटिव के ख़िलाफ़ कमज़ोर समूहों का सामर्थ्य कम होता है. ये वर्तमान ख़तरे फाइव आइज़ के लिए एक अवसर उत्पन्न करते हैं कि वो भारत की डिजिटल फॉरेंसिक विशेषज्ञता और ऑस्ट्रेलिया की सिग्नल इंटेलिजेंस की क्षमताओं को जोड़कर जलवायु सुरक्षा की दिशा में अपने ध्यान का विस्तार करें ताकि प्रमाणित, निष्पक्ष खुफिया जानकारी सुनिश्चित की जा सके.
जैसे-जैसे जलवायु परिवर्तन ऊर्जा ग्रिड और पानी की प्रणाली जैसे महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे पर तेज़ी से दबाव डाल रहा है, वैसे-वैसे ये प्रणालियां अत्याधुनिक साइबर हमलों के लिए प्रमुख लक्ष्य बन रही हैं. 2022 में चीन के हैकर्स ने भारत के बिजली केंद्रों को निशाना बनाया, हालांकि भारत ने इस अभियान की सफलता से इनकार किया. मई 2025 में भारत सरकार ने इस दुष्प्रचार का खंडन किया कि पाकिस्तान ने साइबर हमले के ज़रिए भारत के 70 प्रतिशत बिजली ग्रिड का काम-काज ठप कर दिया है. 2021 में ऑस्ट्रेलिया की न्यू साउथ वेल्स यूनिवर्सिटी (UNSW) और कैनबरा के साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ नाइजेल फेयर के अनुमानों के मुताबिक साइबर अपराध की वजह से हर साल ऑस्ट्रेलिया की अर्थव्यवस्था को लगभग 42 अरब ऑस्ट्रेलियाई डॉलर का नुकसान होता है. इसके अलावा सख्त नियमों के बावजूद ऑस्ट्रेलिया के साइबर सुरक्षा केंद्र की 2023-2024 की रिपोर्ट से पता चलता है कि साइबर हमलों में बिजली और स्वास्थ्य देखभाल समेत ज़रूरी सेवाओं का हिस्सा 11 प्रतिशत है.
भारत के लिए फाइव आइज़ के साथ अधिक तालमेल से क्षेत्रीय नेतृत्व, समुद्री सुरक्षा और तकनीकी क्षमताओं में बढ़ोतरी होगी. इसके अलावा, दोनों देशों के द्वारा जलवायु सुरक्षा को राष्ट्रीय सुरक्षा के विस्तार के रूप में व्यापक तौर पर स्वीकार करने को देखते हुए ये ज़रूरी हो जाता है कि पर्यावरण से जुड़े नए ख़तरों का समाधान करने के लिए पारंपरिक इंटेलिजेंस के ढांचे को नया रूप दिया जाए.
फिर भी जलवायु से संबंधित साइबर सुरक्षा सामान्य समाधानों से कहीं आगे है. इसलिए बंटा हुआ फाइव आइज़ अलायंस साझा साइबर सुरक्षा की पहल को कमज़ोर करेगा. यहां भारत-ऑस्ट्रेलिया की केंद्रित साझेदारी भारत की सूचना तकनीक (IT) की विशेषज्ञता और ऑस्ट्रेलिया के साइबर बुनियादी ढांचे का लाभ उठाकर एक व्यावहारिक तालमेल पेश कर सकती है. दोनों देश मिलकर AI संचालित टूल जैसे कि बिजली ग्रिड के लिए ऑटोमेटेड इंट्रूज़न डिटेक्शन सिस्टम या अनुमान लगाने वाली बाढ़ चेतावनी प्रणाली का साझा विकास करने के लिए तालमेल कर सकते हैं ताकि लोगों की सुरक्षा को प्राथमिकता देने के साथ-साथ दोनों देशों की महत्वपूर्ण संपत्तियों की रक्षा की जा सके.
सूखा, अनाज की कमी या ज़मीन की उपज में गिरावट जैसे जलवायु झटके समुदायों के बीच प्रतिस्पर्धा और संघर्ष बढ़ा सकते हैं जिससे ऐसी आर्थिक शिकायतें पैदा हो सकती हैं जिनका हिंसक चरमपंथी समूह लाभ उठा सकते हैं. वैसे तो सीधा नुकसान जटिल है लेकिन जलवायु परिवर्तन को तेज़ी से ‘कई गुना ख़तरा बढ़ाने वाला’ माना जा रहा है जिससे मौजूदा कमज़ोरियां और बढ़ती हैं. ‘जलवायु से प्रेरित कट्टरपंथ’- ऐसा शब्द जो अभी तक व्यापक रूप से स्थापित नहीं हुआ है- का इंटरनेशनल सेंटर फॉर काउंटर-टेररिज़्म (ICCT), स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) और संयुक्त राष्ट्र अंतरक्षेत्रीय अपराध एवं न्याय अनुसंधान संस्थान (UNICRI) जैसी संस्थाओं ने काफी हद तक एक अवधारणा के रूप में पता लगाया है.
2016 में एडेल्फी थिंक टैंक ने बताया था कि कैसे आतंकी समूह प्राकृतिक आपदाओं एवं संसाधनों की कमी का फायदा उठाकर आसानी से लोगों की भर्ती करते हैं और उन्हें काबू में रखते हैं. 2019 के अपने नीतिगत विवरण में ICCT ने इस बात पर भी विचार किया कि कैसे सूखा और पानी की कमी जैसी जलवायु से प्रेरित चुनौतियों ने प्रभावित लोगों के लिए गैर-सरकारी हथियारबंद समूहों में शामिल होना और अधिक आकर्षक बना दिया है. चाड में UNICRI ने 2020 और 2022 की अपनी रिपोर्ट में बताया कि हिंसक चरमपंथ की दिशा में समुदायों को प्रेरित करने में संसाधनों की कमी और पर्यावरण को नुकसान ने एक भूमिका निभाई है. 2024 में हार्वर्ड इंटरनेशनल रिव्यू ने इंडोनेशिया में इसी तरह के पैटर्न के बारे में बताया जहां पर्यावरण से जुड़ी तबाही और विस्थापन कट्टरपंथी इस्लामिक संगठनों के विकास के साथ जुड़ा हुआ था.
2025 का ग्लोबल टेररिज़्म इंडेक्स ऑस्ट्रेलिया को आतंकवाद के मामले में सबसे 50 ख़राब देशों में से एक मानता है, ऐसे में प्रवासियों, स्थानीय समूहों और जलवायु कार्यकर्ताओं पर निशाना साधने वाली अस्तित्ववादी विचारधाराओं के लिए जलवायु से प्रेरित अभाव और आर्थिक झटके उपजाऊ ज़मीन बन सकते हैं. इसलिए आतंकवाद के ख़िलाफ़ भारत का अनुभव और ऑस्ट्रेलिया की समुद्री इंटेलिजेंस की क्षमता जलवायु से प्रेरित कट्टरपंथ का मिल-जुलकर पता लगा सकती हैं. जलवायु सुरक्षा का एक केंद्र, जो कि इन ख़तरों का पता लगाने के लिए इंटेलिजेंस यूनिट में कर्मियों के आदान-प्रदान और GEOINT एवं HUMINT को मिलाता है, ये सुनिश्चित करेगा कि कोई भी संकेत छूट नहीं जाए.
जापान और अमेरिका के साथ ऑस्ट्रेलिया और भारत पहले से ही क्वॉड्रिलेटरल सुरक्षा संवाद के ज़रिए सहयोग कर रहे हैं. जहां फाइव आइज़ गठबंधन खुफिया जानकारी पर केंद्रित एक समूह बना हुआ है, वहीं क्वॉड जलवायु सामर्थ्य को इंडो-पैसिफिक सुरक्षा सहयोग में जोड़ने के लिए एक व्यापक, मददगार रूप-रेखा की पेशकश करता है.
2021 में शुरू क्वॉड का जलवायु कार्य समूह (QCWG) जलवायु सामर्थ्य पर सहयोग को मज़बूत करने का प्रयास करता है. 2022 में साझेदारों ने आपदा के ख़तरे को कम करने और जलवायु सूचना सेवा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में साझा कार्रवाई को आगे ले जाने के लिए Q-CHAMP (क्वॉड क्लाइमेट चेंज एडेप्टेशन एंड मिटिगेशन पैकेज) की शुरुआत की. ये विषय फाइव आइज़ से जुड़ी उभरती हुई चिंताओं को दिखाते हैं. उदाहरण के लिए, समुद्री सामर्थ्य, समुद्री तस्करी पर निगरानी की GEOINT की प्राथमिकताओं को छूते हैं और स्वच्छ ऊर्जा प्रणालियां एवं पानी तक पहुंच साइबर सुरक्षा के ख़तरों के साथ सख्ती से जुड़ी हुई हैं, विशेष रूप से जलवायु के मामले में संवेदनशील क्षेत्रों में.
इसलिए फाइव आइज़ और क्वॉड के बीच तालमेल को मज़बूत करने से इंटेलिजेंस क्षमता और जलवायु सामर्थ्य के प्रयासों को बल मिल सकता है. दोनों संगठनों के सदस्य के रूप में अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया खुफिया जानकारी पर आधारित जलवायु सामर्थ्य कार्यक्रमों को सुविधाजनक बनाने के लिए संस्थागत पुल के रूप में काम कर सकते हैं. इसके अतिरिक्त भारत और जापान को विशेष जलवायु इंटेलिजेंस कार्यक्रमों जैसे कि समुद्री और साइबर निगरानी में जोड़ा जा सकता है. साझा जलवायु इंटेलिजेंस वर्किंग ग्रुप शुरुआती मंच के रूप में काम कर सकते हैं जिसमें फाइव आइज़ की तकनीकी मज़बूती को क्वॉड की विषयगत व्यापकता के साथ जोड़कर वास्तविक समय में खुफिया जानकारी को न्यायसंगत पहुंच और क्षेत्रीय कूटनीति से मिलाया जा सकता है.
फाइव आइज़ में सुधार करके जलवायु सुरक्षा के निर्देश को शामिल करते हुए भारत के साथ साझेदारी को मज़बूत करना ऑस्ट्रेलिया की इंडो-पैसिफिक स्थिरता, जलवायु सामर्थ्य और क्षेत्रीय प्रभाव के राष्ट्रीय हितों के साथ मेल खाता है. भारत के लिए फाइव आइज़ के साथ अधिक तालमेल से क्षेत्रीय नेतृत्व, समुद्री सुरक्षा और तकनीकी क्षमताओं में बढ़ोतरी होगी. इसके अलावा, दोनों देशों के द्वारा जलवायु सुरक्षा को राष्ट्रीय सुरक्षा के विस्तार के रूप में व्यापक तौर पर स्वीकार करने को देखते हुए ये ज़रूरी हो जाता है कि पर्यावरण से जुड़े नए ख़तरों का समाधान करने के लिए पारंपरिक इंटेलिजेंस के ढांचे को नया रूप दिया जाए.
वैसे खुफिया जानकारी से जुड़े मेल-जोल में स्वाभाविक रूप से जटिलताएं शामिल होती हैं. डिजिटल संप्रभुता भारत के लिए एक प्रमुख चिंता बनी हुई है जिसने ऐतिहासिक रूप से बाहरी इंटेलिजेंस के ढांचे के साथ सावधानीपूर्वक भागीदारी को प्राथमिकता दी है. इसी तरह, फाइव आइज़ को लेकर ऑस्ट्रेलिया की प्रतिबद्धता किसी और से डेटा साझा करने की सीमा को सीमित करती है. इस समस्या से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए संयुक्त रूप से विकसित डेटा प्रोटोकॉल, साझा नैतिक दिशा-निर्देश और आपसी क्षमता निर्माण में सहयोग ज़मीनी स्तर पर होना चाहिए.
ऑस्ट्रेलिया और भारत दो प्रमुख रास्तों के ज़रिए फाइव आइज़ को जलवायु सुरक्षा की खुफिया जानकारी के केंद्र के रूप में अधिक महत्वपूर्ण बना सकते हैं:
डिजिटल फॉरेंसिक में भारत की मज़बूती को ऑस्ट्रेलिया की SIGINT क्षमताओं के साथ मिलाने से जलवायु को लेकर दुष्प्रचार और पूर्वाग्रह से प्रेरित नैरेटिव का मुकाबला किया जा सकता है. दोनों देश महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे को सुरक्षित करने और महिलाओं, देसी समूहों एवं प्रवासी समुदायों को निशाना बनाने वाले ग़लत जलवायु नैरेटिव का पता लगाने के लिए मिलकर AI टूल विकसित कर सकते हैं.
जलवायु से प्रेरित कट्टरपंथ को कमज़ोर करने के लिए ऑस्ट्रेलिया और भारत एक साझा जलवायु सुरक्षा मेलजोल (फ्यूज़न) सेल बनाने की पहल कर सकते हैं जो उभरते ख़तरों का पता लगाएगा, एक-दूसरे की विशेषज्ञता का लाभ उठाएगा और HUMINT एवं GEOINT को साझा करेगा. कर्मियों के आदान-प्रदान और सीमित दायरे वाले समझौतों के माध्यम से दोनों देश संप्रभुता से जुड़ी चिंताओं का सम्मान करते हुए कार्रवाई योग्य खुफिया जानकारी साझा कर सकते हैं.
दोनों देश पूरे इंडो-पैसिफिक में जलवायु केंद्रित क्षमता निर्माण में भी निवेश कर सकते हैं. इससे क्षेत्रीय सुरक्षा प्रदान करने वाले देश के रूप में उनकी प्रतिष्ठा मज़बूत होगी और ये उनकी अपनी पहुंच (आउटरीच) की रणनीतियों के अनुसार होगा जैसे कि भारत की एक्ट ईस्ट पॉलिसी और ऑस्ट्रेलिया का पैसिफिक स्टेप-अप प्रोग्राम.
फाइव आइज़ एक निर्णायक मोड़ पर है जो उसे अपनी खुफिया जानकारी की क्षमताओं को फिर से केंद्रित करने और जलवायु से जुड़ी सुरक्षा चुनौतियों का समाधान करने के लिए उन्हें नई दिशा देने का अवसर प्रदान करता है. ऑस्ट्रेलिया और भारत अच्छी तरह से तैयार ढांचे के ज़रिए अलग-अलग खुफिया जानकारी के स्रोतों को मिलाकर रणनीतिक रूप से इसका नेतृत्व करने की स्थिति में हैं. इसमें डिजिटल संप्रभुता का कड़ाई से ध्यान रखा गया है. इससे दोनों देशों को संसाधनों से जुड़े संघर्षों, प्रवासन संकट और दुष्प्रचार को कम करने में मदद मिलेगी. इसमें जलवायु प्रभाव और कट्टरपंथ के बीच बारीक लेन-देन का समाधान करना भी शामिल है. इसके अलावा लैंगिक और मानवीय प्राथमिकताओं को जोड़ने से महिलाओं और दूसरे कमज़ोर समूहों की सुरक्षा और न्यायसंगत बर्ताव सुनिश्चित होगा. इस तरह का रणनीतिक बदलाव आवश्यक दूरदर्शिता का प्रतिनिधित्व करता है जो जलवायु से परिवर्तित विश्व का सामना करने के लिए एक मज़बूत और महत्वपूर्ण खुफिया जानकारी का उदाहरण देता है.
जीतू चेरियन यूनाइटेड नेशन फेलो (UNITAR ग्लोबल डिप्लोमेसी इनिशिएटिव) और जेन्स में एशिया-पैसिफिक लीड एनेलिस्ट हैं.
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Jeethu Cherian is a United Nations Fellow (UNITAR Global Diplomacy Initiative) and an Asia-Pacific Lead Analyst at Janes. ...
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