विश्व प्राथमिक चिकित्सा दिवस फर्स्ट एड को लेकर फैली भ्रांतियों और ग़लत जानकारियों के प्रति जागरूकता का अवसर है. यह दिवस याद दिलाता है कि भारत को ऑनलाइन मंचों पर फैली प्राथमिक चिकित्सा से जुड़ी भ्रामक सूचनाओं का प्रसार रोकने के लिए न केवल गंभीर प्रयास करने की ज़रूरत है, बल्कि साक्ष्य-आधारित प्रशिक्षण को बढ़ावा देकर दूसरों की मदद के लिए तत्पर रहने वाले लोगों की सहायता से इस दिशा में अपनी तैयारियों को भी पुख्ता करने की आवश्यकता है.
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सोशल मीडिया के जमाने में भारत में प्राथमिक उपचार यानी फर्स्ट एड से जुड़ा कंटेंट खूब वायरल हो रहा है. कार्डियो-पल्मोनरी रिससिटेशन (CPR) और हार्ट अटैक से पीड़ित लोगों को बचाने की कोशिश करने वाले व उन्हें राहत पहुंचने जैसे कई वीडियो ऑनलाइन मीडिया प्लेटफॉर्म पर जमकर प्रसारित किए जा रहे हैं और ऐसा करने वालों को हीरो के तौर पेश किया जा रहा है. लेकिन हृदयाघात से पीड़ित मरीज़ को राहत पहुंचाने वाले इन वीडियो क्लिप्स में, जो तरीक़ा अपनाया जा रहा है, उनमें से कई तकनीक़ें चिकित्सीय लिहाज़ ठीक नहीं हैं. कई ऐसे वीडियो भी देखने को मिल जाते हैं, जिनमें हार्ट अटैक से पीड़ित मरीज़ होशोहवास में है और उसे सीपीआर दिया जा रहा है, या फिर पीड़ितों को कफ सीपीआर यानी उन्हें ज़ोर-ज़ोर से खांसने के लिए कहा जा रहा है. हालांकि, वर्तमान दौर ऐसा है जिसमें किसी भी जानकारी को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाने की ज़ल्दबाज़ी है और बगैर सोचे-समझे लोग मदद करने वालों की तारीफ करने में जुट जाते हैं. लेकिन अक्सर ऑनलाइन दिख जाने वाले इन वीडियो से यह साफ जाहिर होता है कि ज़्यादातर लोगों को न तो सीपीआर तकनीक़ की पूरी जानकारी है और न ही प्राथमिक चिकित्सा के बारे में पता है. भारत में अगर अस्पताल के बाहर पड़ने वाले दिल के दौरे (OHCAs) में प्राथमिक उपचार से जुड़े आंकड़ों पर नज़र डालें, तो साफ हो जाता है कि सिर्फ़ 1.3 से 9.8 प्रतिशत मामलों में ही बाईस्टैंडर सीपीआर देने की कोशिश की जाती है. वहीं जापान और अमेरिका जैसे देशों में ऐसे मामलों में बाईस्टैंडर सीपीआर देने का आंकड़ा क़रीब 40 प्रतिशत है. इसके अलावा, एक चिंताजनक पहलू यह भी है कि भारत में 2 प्रतिशत से भी कम नागरिकों को सीपीआर देने का तरीक़ा पता है या उन्हें इसका समुचित प्रशिक्षण मिला है.
सिर्फ़ 1.3 से 9.8 प्रतिशत मामलों में ही बाईस्टैंडर सीपीआर देने की कोशिश की जाती है. वहीं जापान और अमेरिका जैसे देशों में ऐसे मामलों में बाईस्टैंडर सीपीआर देने का आंकड़ा क़रीब 40 प्रतिशत है. इसके अलावा, एक चिंताजनक पहलू यह भी है कि भारत में 2 प्रतिशत से भी कम नागरिकों को सीपीआर देने का तरीक़ा पता है या उन्हें इसका समुचित प्रशिक्षण मिला है.
भारत में सड़क हादसों में होने वाली मौतों के आंकड़े देखें तो हर साल देश में 2,00,000 से ज़्यादा लोग सड़क दुर्घटनाओं में मारे जाते हैं. इसके अलावा, अगर इन सड़क हादसों के शिकार लोगों को समय पर प्राथमिक चिकित्सा मिल जाए, तो इनमें से क़रीब आधे लोगों को बचाया जा सकता है. दुर्घटनाओं के अलावा, भारत में हृदय रोग भी लोगों की मौत की एक प्रमुख वजह बनी हुई है. अनुमान है कि वर्ष 2030 तक भारत की 60 वर्ष से अधिक आयु के लोगों की जनसंख्या 19.3 करोड़ तक हो जाएगी. इसके अलावा, सार्वजनिक जगहों पर मेडिकल इमरजेंसी जैसे हालातों में ख़ासी बढ़ोतरी होने की उम्मीद है. भारत में भीड़भाड़ वाली जगहों पर स्वचालित बाहरी डिफाइब्रिलेटर (AEDs) यानी एक प्रकार की जीवन रक्षक मेडिकल डिवाइस की तैनाती भी क़रीब-क़रीब न के बराबर है. उदाहरण के तौर पर साल 2024 के एक आरटीआई (सूचना का अधिकार) के जवाब में मिली जानकारी के मुताबिक़ दिल्ली में मेट्रो के 288 स्टेशनों में से केवल छह स्टेशनों पर ही डिफाइब्रिलेटर स्थापित किए गए थे. इतना ही नहीं, उभरते सर्विस क्षेत्रों यानी आईटी, फिनटेक, हेल्थकेयर, लॉजिस्टिक्स एवं ट्रांसपोर्टेशन जैसे सेक्टरों की कंपनियों के ऑफिसों में चिकित्सा आपातकाल के दौरान मदद के लिए प्रशिक्षित कर्मचारियों की कमी बनी हुई है. स्कूलों की बात करें, तो भारत में छात्र-छात्रों के पाठ्यक्रम में तो सीपीआर शामिल है, लेकिन शायद ही उन्हें इसके बारे में कभी व्यावहारिक रूप से बताया जाता है यह प्रशिक्षित किया जाता है. इन वास्तविकताओं के कारण फिलहाल भारत में जब ग़लत सूचनाओं का बोलबाला है और सोशल मीडिया पर आधी-अधूरी जानकारी भरी पड़ी है, तब प्राथमिक चिकित्सा के बारे में भ्रामक तौर-तरीक़ों को बढ़ावा मिलने का ख़तरा और ज़्यादा है. इसके कारण, आपात स्थिति में ऐसे कई ज़िंदगियाँ बचाने का अवसर चूक जाता है, जिन्हें प्राथमिक चिकित्सा देकर बचाया जा सकता है. लेख में आगे दिए गए चित्र 1 में सही जानकारी के लिए प्राथमिक चिकित्सा से संबंधित प्रमुख शब्दों के बारे में बताया गया है. इनमें सीपीआर, बेसिक लाइफ सपोर्ट (BLS) और ओएचसीए जैसे शब्द शामिल हैं.
चित्र 1: आपातकालीन स्थितियों में तैयारी को पुख्ता करने वाले प्राथमिक चिकित्सा से संबंधित प्रमुख शब्द

स्रोत: प्राथमिक चिकित्सा को प्राथमिकता: स्वस्थ भारत के लिए सीपीआर और बीएलएस प्रशिक्षण
प्राथमिक चिकित्सा उपलब्ध कराने के मामले में भारत की तैयारी बहुत कम है और यह बेहद चिंताजनक है. प्राथमिक चिकित्सा को लेकर जागरूकता और प्रशिक्षण की कमी की वजह से ही भारत में अस्पताल के बाहर हार्ट अटैक (ओएचसीए) के मामले में पीड़ित के जीवित रहने की दर 10 प्रतिशत से भी कम है. वहीं जिन देशों में लोगों को सीपीआर का समुचित प्रशिक्षण दिया जाता है, वहां ओएचसीए के दौरान मरीज़ों की जान बचने की दर 20 से 30 प्रतिशत है. भारत में लोगों के बीच केवल सीपीआर के प्रशिक्षण की ही कमी नहीं है, बल्कि जिन्हें सीपीआर की थोड़ी-बहुत जानकारी भी है, उन्हें इसका उपयोग करने की पर्याप्त तकनीक़ी जानकारी नहीं है और उन्हें सार्वजनिक स्थानों पर किसी को सीपीआर देने में झिझक भी महसूस होती है. इसके अलावा सार्वजनिक स्थानों पर हार्ट अटैक से पीड़ित व्यक्ति को सीपीआर देने में लोगों को डर भी लगता है कि कहीं वे किसी क़ानूनी झमेले में न फंस जाए. इतना ही नहीं, ज़रूरत पड़ने पर आपातकालीन डिस्पैचर यानी सीपीआर का तरीक़ा जानने वाले से फोन पर मार्गदर्शन भी नहीं मिल पाता है. इन सभी कारणों से हार्ट अटैक से पीड़ित ऐसे हज़ारों लोगों की मौत हो जाती है, जिनकी जान सीपीआर देकर बचाई जा सकती है. ज़ाहिर है कि भारत में वर्ष 2016 में गुड सेमेरिटन क़ानून लागू किया गया, जिसके तहत दुर्घटना में पीड़ित व्यक्ति को तत्काल मदद पहुंचाने वालों को क़ानूनी कार्रवाई और उत्पीड़न से सुरक्षा प्रदान की गई थी. इस क़ानून के बावज़ूद भारत में दुर्घटना के शिकार लोगों की मदद के लिए हिचक और डर का माहौल बना हुआ है. इस क़ानून के बारे में लोगों की समझ कम होने और संदेह की वजह से इससे जो फायदा होना था, वो नहीं मिल पा रहा है. नतीज़तन हादसे के शिकार व्यक्तियों को जब सबसे ज़्यादा मदद की ज़रूरत होती है, तब वे अक्सर आपातकालीन सहायता से वंचित रह जाते हैं और डॉक्टर या चिकित्साकर्मी के पहुंचने पर ही उन्हें दुर्घटनास्थल पर प्राथमिक उपचार मिल पाता है.
भारत में वर्ष 2016 में गुड सेमेरिटन क़ानून लागू किया गया, जिसके तहत दुर्घटना में पीड़ित व्यक्ति को तत्काल मदद पहुंचाने वालों को क़ानूनी कार्रवाई और उत्पीड़न से सुरक्षा प्रदान की गई थी. इस क़ानून के बावज़ूद भारत में दुर्घटना के शिकार लोगों की मदद के लिए हिचक और डर का माहौल बना हुआ है.
सीपीआर नहीं मिलने पाने की वजह से होने वाली मौतों को रोकने की चुनौती के पीछे कहीं न कहीं सरकारी तंत्र की कमज़ोरी भी ज़िम्मेदार है. देश में जितने भी औद्योगिक सेक्टर हैं, उनमें कुछ को छोड़कर बाक़ी में प्राथमिक चिकित्सा प्रशिक्षण को कभी भी तवज्जो नहीं दी गई और इसे जागरूकता या कार्यस्थल सुरक्षा के लिए ज़रूरी नहीं बनाया गया है. राष्ट्रीय चिकित्सा विज्ञान परीक्षा बोर्ड ने वर्ष 2023 में देश भर में एक सीपीआर जागरूकता अभियान चलाया था. इस अभियान में एक दिन में 20 लाख से ज़्यादा लोगों ने हिस्सा लिया था. यह संख्या बताती है कि लोग प्राथमिक चिकित्सा के बारे में जानना चाहते हैं और मौक़ा मिलने पर वे इसे ज़रूर सीखते हैं. यहां तक कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने भी विश्वविद्यालयों को अपने पाठ्यक्रम में बेसिक लाइफ सपोर्ट की शिक्षा को शामिल करने का निर्देश दिया था. इतना ही नहीं, वर्ष 2022 में एक प्राइवेट मेंबर बिल (PMB) के ज़रिए स्कूलों में सीपीआर प्रशिक्षण को अनिवार्य किए जाने का प्रस्ताव पेश किया गया था. 15 स्कूलों में 4,500 से अधिक विद्यार्थियों को प्राथमिक चिकित्सा के प्रशिक्षण और उसके परिणामों के बारे में किए गए एक अध्ययन से यह पता चला है कि किशोरों को सीपीआर देने का तरीक़ा अच्छे से सिखाया जा सकता है. कहने का मतलब है कि अगर इस तरह की पहलें की जाती हैं, तो इनके सकारात्मक नतीज़े ज़रूर मिलते हैं, लेकिन इन पहलों को व्यापक स्तर पर लागू करना और इन्हें जीवन का एक अनिवार्य हिस्सा बनाना सबसे बड़ी चुनौती है.
फर्स्ट एड और सीपीआर देते हुए वायरल वीडियो एवं इसकी ज़मीनी सच्चाई में बहुत अंतर है. यानी किसी घटना का वीडियो जितना तेज़ी से वायरल होता है, उतनी तेज़ी से लोग पीड़ितों की सीपीआर देने के लिए तैयार नहीं दिखते हैं. ज़ाहिर है कि इस अंतर को समाप्त करने के लिए भारत को एक बहुआयामी नज़रिया अपनाने की ज़रूरत है. यानी भारत को क़ानून और शिक्षा के साथ ही इसके लिए ज़रूरी इन्फ्रास्ट्रक्चर विकसित करके प्राथमिक चिकित्सा को लोगों के रोज़मर्रा के जीवन का हिस्सा बनाना होगा. हालांकि, देश में कुछ उपाय पहले से मौज़ूद हैं, लेकिन उनका ज़मीनी स्तर पर कार्यान्वयन अच्छी तरह से नहीं किया जा रहा है, वहीं कुछ उपाय ऐसे हैं, जो बहुत मुश्किल नहीं हैं, लेकिन उनको अमल में लाने के लिए गंभीरता से आगे बढ़ाने की आवश्यकता है. आगे इस लेख में कुछ सुझाव और पहलों के बारे में विस्तार से बताया गया है, जिन पर अमल करके प्राथमिक चिकित्सा के लिए न केवल आम लोगों को प्रशिक्षित किया जा सकता है, बल्कि लोगों में इससे जुड़े डर को भी समाप्त किया जा सकता है.
1. सीपीआर और बुनियादी प्राथमिक उपचार को स्कूल व कॉलेजों के पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाना: नॉर्वे और जापान जैसे देशों ने इस दिशा में गंभीरता से क़दम उठाते हुए स्कूलों में बच्चों को सीपीआर का प्रशिक्षण देना शुरू किया है. इसी का नतीज़ा है कि इन देशों में भारत की तुलना में अब हार्ट अटैक से पीड़ित व्यक्तियों के जीवित बचने की दर बहुत ज़्यादा है. भारत को दूसरे देशों की इन पहलों से सीख लेनी चाहिए. हालांकि, भारत में विश्वविद्यालयों में बेसिक लाइफ सपोर्ट की शिक्षा को अनिवार्य बनाकर इस दिशा में शुरुआत की गई है. लेकिन इस तरह की पहलों को स्कूलों में भी लागू किया जाना चाहिए और इसे राष्ट्रीय शिक्षा नीति में शामिल कर स्कूली बच्चों को सीपीआर आदि की ट्रेनिंग देनी चाहिए. ज़ाहिर है कि जब बच्चों को कम उम्र से ही दूसरों की मदद करने और प्राथमिक चिकित्सा देने में प्रशिक्षित किया जाता है, तो इससे न केवल उन्हें इसकी पूरी जानकारी मिलती है, बल्कि उनमें ज़रूरतमंदों की सहायता देने की भावना भी पैदा होती है. युवाओं की उम्र जब गाड़ी चलाने वाली हो जाती है और वो नौकरी करने के लिए तैयार हो जाते हैं, तब तक वे प्रमाणित रूप से प्राथमिक चिकित्सा में प्रशिक्षित होने चाहिए, यानी उनके पास फर्स्ट एड का कोई स्किल सर्टिफिकेट होना चाहिए, जो एक डिप्लोमा की तरह होगा.
2. कार्यस्थल पर प्राथमिक चिकित्सा के इंतज़ाम और कर्मचारियों का प्रशिक्षण: भारत के औद्योगिक प्रतिष्ठानों में कारखाना अधिनियम 1948 के अनुसार क़ानूनी रूप से हर 150 कर्मचारियों के लिए एक फर्स्ट एड बॉक्स और प्राथमिक चिकित्सा में प्रशिक्षित कर्मियों का होना अनिवार्य है. हालांकि, इसी तरह के क़ानूनी प्रावधान सेवा क्षेत्र एवं दूसरे सेक्टरों से जुड़े ऑफिसों में लागू नहीं होते हैं. ऐसे में नियोक्ताओं को खुद ही अपने ऑफिसों में काम करने वाले कर्मचारियों को प्राथमिक चिकित्सा में प्रशिक्षित करने की नीति बनानी चाहिए. सिफ़ारिश की जाती है कि ऑफिस में हर दस कर्मचारियों के लिए एक प्रशिक्षित कर्मचारी होना चाहिए. यह बेहद ज़रूरी भी है, क्योंकि जैसे-जैसे कर्मचारियों की आयु बढ़ती है, तो उनमें जीवनशैली से जुड़ी बीमारियां बढ़ना और कार्यस्थल में आपात चिकित्सीय स्थितियां (दिल का दौरा, स्ट्रोक, डायबिटीज) पैदा होना सामान्य हो जाता है. ज़ाहिर है कि ऑफिस में मीटिंग के दौरान अचानक किसी वरिष्ठ अधिकारी की तबीयत ख़राब हो जाती है और वो गिर पड़ता है या फिर फैक्ट्री में काम के दौरान किसी कर्मचारी को हार्ट अटैक आ जाता है, इन हालातों में एंबुलेंस के आने तक अगर कोई साथी प्रशिक्षित कर्मचारी पीड़ित को प्राथमिक चिकित्सा दे देता है, तो उसके बचने की संभावना बढ़ जाती है.
3. सार्वजनिक जगहों पर इमरजेंसी चिकित्सा उपकरण तैनात करना: भारत में कई ऐसी सार्वजनिक जगहें हैं, जहां बड़ी संख्या में लोगों की आवाजाही रहती है, लेकिन वहां आपातकालीन चिकित्सीय उपकरण उपलब्ध नहीं होते हैं. भारतीय रेलवे ने 2025 में ऐलान किया है कि वो हर रेलवे स्टेशन पर और सभी यात्री ट्रेनों में मेडिकल किट यानी ज़रूरी दवाएं, चिकित्सीय उपकरण और ऑक्सीजन सिलेंडर जैसी ज़रूरी चिकित्सीय सुविधाएं उपलब्ध कराएगा. इसके अलावा, रेलवे ने यह भी कहा है कि वो अपने सभी फ्रंटलाइन कर्मचारियों को प्राथमिक चिकित्सा देने का प्रशिक्षण देगा. ज़ाहिर है कि प्राथमिक चिकित्सा से जुड़ी भारतीय रेलवे की यह पहलें अगर ज़मीनी स्तर पर लागू होती हैं, तो इससे परिवहन के दूसरे सेक्टरों के लिए मानक स्थापित होगा और वे भी अपने यहां ऐसे उपाय करने के लिए प्रेरित होंगे. साथ ही सिटी बस सेवाओं और इंटर-सिटी बसों को भी सुरक्षा मानदंडों का पालन करना होगा. भारत में 1988 के मोटर वाहन अधिनियम के अंतर्गत पहले से ही गाड़ियों में फर्स्ट एड किट रखना अनिवार्य किया गया है. लेकिन दुर्भाग्य से इस क़ानून का पालन नहीं किया जाता है. पुणे में पब्लिक ट्रांसपोर्ट माध्यमों पर किए गए सर्वेक्षण में सामने आया है कि 50 में से केवल 17 पब्लिक बसों में ज़रूरी मेडिकल किट मौज़ूद थी और जिन बसों में चिकित्सा किट उपलब्ध भी थीं, उनमें से कई खाली थीं. ज़ाहिर है कि इस तरह के क़ानूनों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करने के प्रयास करने होंगे और नियमित जांच की व्यवस्था भी बनानी होगी, साथ ही क़ानून के उल्लंघन पर ज़ुर्माने का प्रावधान करना होगा. ऐसा करने से ही सार्वजनिक परिवहन को प्राथमिक चिकित्सा सुविधा इंतज़ामों से लैस किया जा सकता है और दुर्घटनाओं में होने वाली मौतों को कम किया जा सकता है. इसी तरह से सरकारी इमारतों, शॉपिंग मॉल, एयरपोर्ट्स और बस टर्मिनलों में भी प्राथमिक चिकित्सा केंद्र और ऑटोमेटिक एक्सटर्नल डेफिब्रिलेटर्स का इंतज़ाम किया जाना चाहिए. इसके अलावा, सुरक्षा गार्ड एवं अटेंडेंट जैसे कर्मचारियों को इन चिकित्सा उपकरणों का इस्तेमाल करने के लिए प्रशिक्षित किया जाना चाहिए.
नॉर्वे और जापान जैसे देशों ने इस दिशा में गंभीरता से क़दम उठाते हुए स्कूलों में बच्चों को सीपीआर का प्रशिक्षण देना शुरू किया है. इसी का नतीज़ा है कि इन देशों में भारत की तुलना में अब हार्ट अटैक से पीड़ित व्यक्तियों के जीवित बचने की दर बहुत ज़्यादा है. भारत को दूसरे देशों की इन पहलों से सीख लेनी चाहिए.
4. परिवार और सोसाइटी में प्राथमिक चिकित्सा को लेकर तैयारी: परिवार के भीतर और समाजिक स्तर पर भी प्राथमिक चिकित्सा के पूरे इंतज़ाम करना चाहिए और ज़रूरी प्रशिक्षण प्रदान करना चाहिए. इसके लिए ज़रूरी है कि हर घर में एक फर्स्ट एड किट होनी चाहिए, हालांकि सच्चाई यह है कि ज़्यादातर परिवारों में यह किट नहीं होती है. उदाहरण के तौर पर केरल के ग्रामीण इलाक़ों में किए गए सर्वेक्षण में सामने आया था कि वहां सिर्फ़ 38 प्रतिशत घरों में ही प्राथमिक चिकित्सा किट उपलब्ध हैं. जन जागरूकता अभियान भी इस दिशा में कारगर साबित हो सकते हैं और इनसे न केवल परिवारों को अपने घरों में आवश्यक दवाएं और दूसरी चीज़ें रखने की जानकारी मिलेगी, बल्कि उन्हें आपात स्थितियों से निपटने के लिए, यानी सामान्य चोट और अचानक होने वाली बीमारियों से निपटने का बुनियादी प्रशिक्षण हासिल करने की प्रेरणा भी मिलेगी. ऐसा होने पर इमरजेंसी सेवाओं के आने तक मरीज़ की समुचित देखभाल की जा सकती है. इसके अलावा, सामुदायिक हेल्थ वर्कर और स्थानीय अस्पतालों की ओर से भी वर्कशॉप आयोजित कर लोगों को अपने घरों पर इमरजेंसी इंतज़ाम करने की जानकारी दी जा सकती है, ख़ास तौर पर बुजुर्गों और छोटे बच्चों के लिए आपात चिकित्सा सुविधा के बारे में बताया जा सकता है. इतना ही नहीं, आवासीय सोसाइटियों और गांवों में रहने वाले लोग मिलजुल कर प्राथमिक चिकित्सा प्रशिक्षण शिविर आयोजित कर सकते हैं.
5. प्राथमिक चिकित्सा को लेकर लोगों में जागरूकता बढ़ाना: आपात परिस्थितियों में दूसरों की मदद करने वाले लोगों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए, साथ ही उनकी फर्स्ट एड की जानकारी और तरीक़े पर भी भरोसा होना चाहिए. जो लोग दूसरों की मदद के लिए आगे बढ़ते हैं, उन्हें भी यह विश्वास होना चाहिए कि वे किसी क़ानूनी पचड़े में नहीं फंसेंगे और उन्हें पूरी मदद मिलेगी. ज़ाहिर है कि इसके लिए सबसे बड़ी ज़रूरत यह है कि आधिकारिक रूप से जन-जन तक प्राथमिक चिकित्सा के सही तरीक़ों और इससे जुड़े सरकारी नियम-क़ानूनों का प्रचार किया जाना चाहिए. इसके लिए सबसे पहले सरकार और हेल्थकेयर संगठन स्कूली पाठ्यक्रमों, टेलीविज़न अभियानों और सोशल मीडिया माध्यमों के ज़रिए प्रमाणिक प्राथमिक उपचार तकनीक़ों का प्रचार-प्रसार कर लोगों को इसके प्रति व्यापक रूप से जागरूक कर सकते हैं. इसके अलावा, रेड क्रॉस, सेंट जॉन एम्बुलेंस और एम्स जैसी विश्वसनीय संस्थाओं की ओर से सीपीआर, हेमलिच विधि और चोट की देखभाल से जुड़े माणिक जानकारी वाले वीडियो बनाकर उन्हें प्रसारित किया जा सकता है और सोशल मीडिया पर वायरल किया जा सकता है. इससे ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर भ्रामक और ग़लत जानकारियों वाले वीडियो की तरफ लोग आकर्षित नहीं होंगे. दूसरा ज़रूरी क़दम सीपीआर और फर्स्ट एड से जुड़ी भ्रामक जानकारियों से सीधे निपटने का होना चाहिए. यानी अगर किसी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर कोई भ्रामक वीडियो चल रहा है, तो उसी मंच पर चिकित्सा विशेषज्ञों को भी उसकी सच्चाई के बारे में लोगों को बताना चाहिए. आख़िर में, सरकार को संचार माध्यमों के ज़रिए लगातार सेमेरिटन क़ानून के बारे में लोगों को बताना चाहिए और व्यापक रूप से यह संदेश प्रसारित करना चाहिए कि आपात स्थिति में पीड़ित की मदद करने वालों को परेशान नहीं किया जाएगा. रेडियो और टीवी पर ऐसे संदेश प्रसारित करने के अलावा, सड़कों, मेट्रो स्टेशनों और दूसरी ऐसी जगहों पर जहां ट्रैफिक बहुत अधिक होता है और लोगों की आवाजाही बहुत ज़्यादा होती है, वहां होर्डिंग्स और साइनेज लगाकर भी यह संदेश प्रसारित करना चाहिए और लोगों को इस बारे में जागरूक करना चाहिए. कहने का मतलब है कि लोगों के मन से दूसरों की मदद करने के बाद सामने आने वाले विपरीत नतीज़ों का डर समाप्त करना और नागरिक कर्तव्य की भावना जगाना बेहद ज़रूरी है.
भारत को एक स्वास्थ्य-सुरक्षित समाज बनाने की दिशा में आगे बढ़ने के लिए जहां लाखों आम नागरिकों को प्राथमिक चिकित्सा तकनीक़ में प्रशिक्षित करना ज़रूरी होगा, वहीं सार्वजनिक इन्फ्रास्ट्रक्चर को फर्स्ट एड सुविधाओं से लैस करना और इसके बारे में फैली भ्रांतियों को समाप्त करना भी बेहद आवश्यक होगा. अगर सोशल मीडिया जैसे माध्यमों का बेहतर तरीक़े से उपयोग किया जाए और प्राथमिक चिकित्सा उपायों से जुड़े सही कंटेंट को वायरल कराया जाए तो यह काफ़ी लाभदायक साबित हो सकता है. इस वर्ष विश्व प्राथमिक चिकित्सा दिवस के अवसर पर सबसे बड़ा संदेश यही हो सकता है कि नीति निर्माता, सोशल मीडिया कंटेट क्रिएटर और आम लोग फर्स्ट एड से जुड़ी भ्रामक जानकारियों से बचें और प्रमाणिक प्राथमिक चिकित्सा जानकारियों को ही प्रसारित करें और उन्हीं पर भरोसा करें. यानी देश में नागरिकों को प्राथमिक चिकित्सा तकनीक़ में प्रशिक्षित करने की ही ज़रूरत नहीं है, बल्कि उनके भीतर आत्मविश्वास बढ़ाने की भी आवश्यकता है, ताकि जब भी कोई हेल्थ इमरजेंसी की घड़ी आए तो वहां कोई न कोई ऐसा व्यक्ति ज़रूर मौज़ूद हो, जो मदद करने में सक्षम भी हो और इसके लिए इच्छुक भी हो. इसके साथ ही, यह भी ज़रूरी है कि सोशल मीडिया और ऑनलाइन माध्यमों पर फर्स्ट एड से जुड़ा कोई भी कंटेंट प्रसारित हो, वो चिकित्सा विज्ञान के तथ्यों पर आधारित हो, यानी उसमें भ्रामक जानकारी न हो. ज़ाहिर है कि इन क़दमों के ज़रिए ही सही मायने में ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को सटीक प्राथमिक चिकित्सा दी जा सकेगी और उनकी जान बचाई जा सकेगी.
के.एस. उपलब्ध गोपाल ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन की स्वास्थ्य पहल में एसोसिएट फेलो हैं.
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Dr. K. S. Uplabdh Gopal is an Associate Fellow with the Health Initiative at the Observer Research Foundation. He writes and researches on how India’s ...
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