Author : Srijan Shukla

Expert Speak Raisina Debates
Published on Dec 08, 2025 Updated 0 Hours ago

चीन ने रियल एस्टेट और टैक्स नीतियों से अपने आर्थिक मॉडल बदला. बुलबुले के बाद पैसा EV, बैटरी और सौर ऊर्जा जैसे उद्योगों में गया लेकिन कंपनियों को ज्यादा लाभ नहीं हुआ. बाकी दुनिया को अब चीन के अगले लक्षित उद्योग का अनुमान लगाकर अपनी रणनीति बनानी होगी.

रियल एस्टेट से EV तक: चीन कैसे बदल रहा वैश्विक अर्थव्यवस्था?

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1994 में चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ने एक महत्वपूर्ण फैसला लिया जिसने वहां के राजकोषीय संघवाद को मौलिक रूप से बदल दिया. उस समय तक टैक्स लगाने और खर्च करने के मामले में वहां की प्रांतीय सरकारें को ज़्यादातर अधिकार मिले हुए थे. सुधार के बाद प्रांतीय सरकारों को टैक्स राजस्व का एक बड़ा हिस्सा संघीय सरकारों को देना पड़ा जबकि खर्च के मामले में उनका दायित्व पहले की तरह बरकरार रहा. 

  • रियल एस्टेट–टैक्स नीतियों से आर्थिक मॉडल बदला
  • 1994 के फैसले ने राजकोषीय संघवाद बदल दिया
  • 2008 के बाद सस्ते कर्ज़ से रियल एस्टेट बुलबुला बना और 2021–22 में फूट गया

 

चीन का राजनीतिक–आर्थिक मॉडल: वित्तीय दमन और सब्सिडी चक्र

लगभग उसी समय (जब मैन्युफैक्चरिंग के मामले में चीन का चमत्कार आकार ले रहा था) औसत परिवारों ने मध्यम-वर्गीय आय की तरफ बदलाव शुरू कर दिया. फिर भी वित्तीय दमन और अप्रत्याशित बाज़ार को देखते हुए उन्हें अपनी बचत के लिए एक सुरक्षित जगह की आवश्यकता थी. 1998 में चीन ने रिहायशी संपत्ति की ख़रीद और बिक्री को कानूनी बना दिया. स्थानीय सरकारों को तुरंत राजस्व की आवश्यकता थी और परिवारों को संपत्ति की. 

चीन का मॉडल वित्तीय दमन से सब्सिडी उद्योगों तक पहुँचाता है और परिवारों को अपेक्षाकृत ग़रीब रखता है।

रियल एस्टेट कंपनियां सरकारी ज़मीन बेचकर आदर्श बिचौलिए के रूप में उभरीं. अपनी किताब द लैंड ट्रैप: ए न्यू हिस्ट्री ऑफ द वर्ल्ड्स ओल्डेस्ट एसेट में माइक बर्ड दलील देते हैं कि इन दोनों फैसलों ने चीन के रियल एस्टेट सेक्टर में उछाल ला दिया. 2008 के बाद सस्ते कर्ज़ ने एक विशाल बुलबुले की स्थिति बनाई जो अंतत: 2021-22 में फूट गया. 

ये दो संबंधित समानताएं चीन के रियल एस्टेट के सुपर-साइकिल से कहीं ज़्यादा गहरी बात उजागर करती हैं. चीन पर नज़र रखने वाले बाहरी लोगों में ये सोचने की प्रवृत्ति होती है कि चीन में जो कुछ होता है वो योजनाबद्ध है. इसलिए ये स्पष्ट है कि 90 के दशक में पहले ज़मीन बेचने और फिर 2010 के आसपास इसे बढ़ावा देने का फैसला बीजिंग में बैठे CCP के अभिजात वर्ग ने सोच-समझकर लिया था. लेकिन चीन में ज़्यादातर चीज़ों की तरह वास्तविक नीतिगत नतीजे हमेशा योजनाबद्ध और गैर-योजनाबद्ध का मिलाजुला रूप होते हैं. 

ज़्यादातर विश्लेषक तेज़ी से इस नतीजे पर पहुंच रहे हैं कि छिपा हुआ मुद्दा चीन की राजनीतिक अर्थव्यवस्था का मॉडल है. इस मॉडल की विशेषता है वित्तीय दमन (कम जमा दर और मज़दूरी के माध्यम से) और वो इस अंतर को प्रोत्साहन, सब्सिडी एवं कर्ज़ के रूप में मैन्युफैक्चरिंग उद्योगों तक पहुंचाता है. इस मॉडल के माध्यम से चीन के नीति निर्माता निर्यात केंद्रित विकास को प्राथमिकता देते हैं लेकिन ऐसा करते हुए औसत परिवारों को अपेक्षाकृत ग़रीब बनाए रखते हैं. ये एक स्थिर मॉडल नहीं है. एक बार जब कोई उद्योग चरम के बिंदु पर पहुंच जाता है तो ज़्यादातर सब्सिडी किसी दूसरे उद्योग को दे दी जाती है. इस तरह ये सिलसिला चलता रहता है.   

2023 में उद्योग निवेश 5 ट्रिलियन RMB पहुँचा, रियल एस्टेट निवेश 1 ट्रिलियन से कम रहा।

कुछ वर्ष पहले जब चीन का रियल एस्टेट बुलबुला फूटा तो संघ और प्रांतीय सरकारों ने सभी निवेश को हाई-स्पीड रेल, इलेक्ट्रॉनिक गाड़ियों, सौर ऊर्जा, बैटरी, फार्मास्युटिकल, ड्राइवरलेस कार जैसे सेक्टर की तरफ लगा दिया. ये वो प्राथमिकताएं हैं जो मेड इन चाइना 2025 की योजना में सूचीबद्ध हैं.

2020 तक रियल एस्टेट में अनुमानित 6-7 ट्रिलियन रेनमिनबी (चीन की करेंसी) का निवेश हुआ जबकि उद्योग को लगभग 1 ट्रिलियन रेनमिनबी हासिल हुआ था. 


बात ये है कि मेड इन चाइना पहल 2015 में की गई लेकिन 2020-21 के इर्द-गिर्द (जब रियल एस्टेट सेक्टर में भारी गिरावट आई) जाकर ही इस निवेश को उन उद्योगों की तरफ लगाया गया जो इस समय चीन और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर राज करते हैं. 2023 तक उद्योग में निवेश का हिस्सा बढ़कर लगभग 5 ट्रिलियन रेनमिनबी हो गया जबकि रियल एस्टेट सेक्टर में निवेश एक ट्रिलियन से भी कम था.  

वैश्विक अर्थव्यवस्था पर चीन की औद्योगिक नीति का असर

चीन की औद्योगिक नीति का पैमाना चौंका देने वाला है और अब ये सक्रिय रूप से विकसित देशों की औद्योगिक अर्थव्यवस्था को औद्योगीकरण से दूर ले जा रही है. वहीं विकासशील विश्व अब ख़ुद को और बुरी स्थिति में पा रहा है. चीन की मैन्युफैक्चरिंग क्षमता और औद्योगिक नीति के पैमाने को देखते हुए निर्यात-केंद्रित वृद्धि वाले विकास मॉडल को प्रभावी रूप से समाप्त कर दिया गया है.

चीन की अर्थव्यवस्था ख़ुद भी इस भारी निवेश वाले आर्थिक मॉडल के ख़राब असर से बच पाने में सक्षम नहीं हुई है. चीन की अर्थव्यवस्था एक गंभीर मंदी के चक्र में फंस गई है. इसके अलावा अलग-अलग क्षेत्रों में प्रतिस्पर्धा या “नीजुआन” की समस्या इतनी गंभीर हो गई है कि CCP के पोलित ब्यूरो और सरकार को आधिकारिक रूप से ज़रूरत से ज़्यादा क्षमता, अनियंत्रित मूल्य युद्ध और नीचे की तरफ जाने की रेस के ख़िलाफ़ रुख़ अपनाना पड़ा है. सौर ऊर्जा से लेकर EV और बैटरी तक एक सेक्टर से दूसरे सेक्टर में ये उथल-पुथल देखी जा रही है. राजस्व और मात्रा (ज़्यादातर निर्यात) में वृद्धि तो हो रही है लेकिन कंपनियों के स्तर पर लाभ में लगभग कोई बढ़ोतरी नहीं हुई है. 

चीन की औद्योगिक नीति विकसित देशों को औद्योगीकरण से दूर ले जा रही है।

ऑटो सेक्टर, विशेष रूप से EV, चीन में वास्तविक राजनीतिक अर्थव्यवस्था की समस्या को उजागर करता है. अनुमान है कि 2025 तक ऑटो सब्सिडी संघीय सरकार के कुल वित्तीय राजस्व का 3%  और कुल ऑटो बिक्री के 7% बराबर है. रोडियम ग्रुप की एक रिपोर्ट में कहा गया है, “यहां विडंबना ये है कि ऑटो की बिक्री को बढ़ावा देने वाली सब्सिडी संभवत: ख़ुद ही ऑटो बनाने वाली कंपनियों के बीच प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा दे रही है और इससे पूरे सेक्टर में दाम गिर रहे हैं.”  

यहां चीन के नीति निर्माताओं को दुष्ट के रूप में चित्रित करना और उन्हें घरेलू मंदी को बढ़ावा देने तथा उससे भी बढ़कर बाकी दुनिया के लिए मैन्युफैक्चरिंग को अप्रतिस्पर्धी बनाने के लिए ज़िम्मेदार ठहराना आसान है. लेकिन चीन अब वैश्विक अर्थव्यवस्था में इतना बड़ा हिस्सा बन चुका है कि इस तरह की सीधी बयानबाज़ी वाला नैरेटिव नहीं पेश किया जा सकता. CCP की स्थायी समिति के सदस्यों से लेकर हुबेई के एक नगरपालिका अधिकारी तक, चीन के नीति निर्माता वैकल्पिक विकास मॉडल वाले विश्व की कल्पना भी नहीं कर सकते. उन्हें डर है कि जोखिम बहुत अधिक है और अगर कोई वैकल्पिक मॉडल काम नहीं करता है या उसे साकार करने में बहुत अधिक समय लगता है तो इससे बड़े पैमाने पर राजनीतिक अराजकता फैल सकती है.  

दुनिया के सामने चुनौतियाँ और नीति विकल्प

इससे बाकी दुनिया के पास अपेक्षाकृत कठोर नीतिगत विकल्प बचता है: या तो कुछ नहीं करो या चीन के आयात के ख़िलाफ़ संरक्षणवादी बाधाएं खड़ी करो और सप्लाई चेन के केंद्रित होने तक पुरानी महंगाई को अपनाओ.

फिर भी एक और विकल्प नज़र आता है. मान लीजिए कि निकट भविष्य में चीन के मॉडल के बदलने की संभावना बहुत कम है. चूंकि चीन के एक सेक्टर के बाद दूसरा सेक्टर चरम पर पहुंच रहा है, ऐसे में अलग-अलग देशों को ये अनुमान लगाना शुरू कर देना चाहिए कि आगे किस सेक्टर में चीन की सरकारी सब्सिडी का पैसा और बैंक कर्ज़ लगाया जाएगा. ये पहला कदम है. 

EV सेक्टर दिखाता है कि सब्सिडी प्रतिस्पर्धा बढ़ा रही है और पूरे उद्योग में दाम गिर रहे हैं।

इसका अगला कदम ये पता लगाना है कि पांच साल के बाद किस सेक्टर में आपकी ख़ुद की अर्थव्यवस्था प्रतिस्पर्धी बनने की क्षमता रखती है. चुने गए सेक्टर में मौजूदा वित्तीय मजबूरियों को देखते हुए सरकार को अनुसंधान एवं विकास (R&D), उत्पादन और सस्ते कर्ज़ के लिए प्रोत्साहन देना चाहिए. यदि आवश्यक हो तो व्यापार संरक्षणवाद का उपयोग किया जाना चाहिए लेकिन रणनीतिक रूप से ताकि ये सुनिश्चित किया जा सके कि ज़रूरी पूंजीगत सामानों और कच्चे माल का आयात प्रतिस्पर्धी कीमत पर किया जा सके.

20वीं शताब्दी के दूसरे हिस्से में ज़्यादातर देशों ने अमेरिका की तरह बनने की कोशिश की. इनमें औद्योगिक नीति के मामले में दिग्गज देश दक्षिण कोरिया और जापान भी शामिल हैं. अब ये तेज़ी से स्पष्ट होता जा रहा है कि दुनिया भर के देश अगर अपने नागरिकों की आकांक्षाओं को पूरा करना चाहते हैं तो 21वीं शताब्दी के पहले हिस्से में उन्हें चीन जैसा बनना होगा.

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