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दुबई एयर शो 2025 ने साफ कर दिया कि खाड़ी देशों की सुरक्षा सोच बदल चुकी है. अमेरिका पर भरोसा कम हो रहा है, खतरे बढ़ रहे हैं और यही वजह है कि अब पूरा क्षेत्र एफ-35 जैसी ताकत की तरफ दौड़ रहा है.
Image Source: Wikipedia
नवंबर 2025 में हुआ दुबई एयर शो मध्य-पूर्व एशिया के विमानन क्षेत्र में एक मील का पत्थर साबित हुआ. दुबई एयर शो में सिर्फ विमानों के करतब ही नहीं दिखे बल्कि इसने ये भी दिखाया कि कैसे इस क्षेत्र में सुरक्षा की रणनीतिक संस्कृति बदल रही है. एक ऐसी संस्कृति, जिसमें खाड़ी देश अब ये मानने लगे हैं कि अमेरिका उनकी सुरक्षा चिंताओं पर ज़्यादा ध्यान नहीं दे रहा. ये देश अब अमेरिका से अलग होकर अपने हिसाब से नीति बना रहे हैं. 2023 में इज़राइल के ख़िलाफ़ हमास के आतंकी हमले, उसके बाद गाज़ा में जारी युद्ध और जून 2025 में ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर अमेरिकी हमलों के बीच, इस क्षेत्र की सुरक्षा चिंताएं बदल रही हैं.
सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (एमबीएस) ने हाल ही में वाशिंगटन का दौरा किया. 2018 के बाद ये उनकी पहली अमेरिकी यात्रा थी. इस यात्रा के एजेंडे में कई मुद्दे शामिल थे जिनमें अमेरिका के साथ एक नए सुरक्षा समझौते की तलाश और उच्च-स्तरीय रक्षा तकनीकों को अपनाना शामिल था. 1945 में, सऊदी अरब के तत्कालीन राजा अब्दुलअज़ीज़ इब्न सऊद ने अमेरिकी राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डी. रूज़वेल्ट से मुलाकात की थी. इन दोनों की मुलाकात, उस समय स्वेज़ नहर में तैनात अमेरिकी युद्धपोत यूएसएस क्विंसी पर हुई. इसी के बाद मध्य पूर्व में अमेरिकी सुरक्षा गारंटियों के एक नए अध्याय की शुरुआत हुई. इराक युद्ध का नेतृत्व भी अमेरिका ने किया लेकिन 9/11 को न्यूयॉर्क के ट्विन टावर पर हुए आतंकवादी हमले ने अमेरिकी भू-राजनीति से संबंधित मांगों और आवश्यकताओं दोनों को बदल दिया. हालांकि, सऊदी अरब के लिए मुख्य सुरक्षा ज़रूरतें, राजा अब्दुलअज़ीज़ से लेकर अब उनके उत्तराधिकारी मोहम्मद बिन सलमान तक यानी पिछले 80 साल में एक समान रही हैं.
मोहम्मद बिन सलमान की अमेरिकी यात्रा के दौरान कई समझौते हुए लेकिन इसमें सबसे महत्वपूर्ण थी ट्रंप प्रशासन की रियाद को अपने उच्चतम श्रेणी के एफ-35 स्टेल्थ फाइटर जेट बेचने की योजना. अक्टूबर 2023 को इज़राइल पर हमले के बाद से इस क्षेत्र में कई बड़े बदलाव हुए जिसने खाड़ी देशों को अपनी सैन्य और सामरिक नीतियों पर पुनर्विचार के लिए मज़बूर किया. इज़राइल द्वारा हमास और हिज़्बुल्लाह को नेस्तनाबूद करना ज़्यादातर अरब देशों के लिए अच्छी ख़बर है लेकिन इस क्षेत्र में इज़राइल का इकलौती हवाई शक्ति बनना खाड़ी देशों के लिए चिंता की बात है जो अब इस क्षेत्र से पर्शिया की खाड़ी तक फैला है. हालांकि, क़तर अब शांति वार्ता में एक मध्यस्थ बन चुका है लेकिन दो महीने पहले क़तर की राजधानी दोहा में हमास के ठिकाने पर इज़राइल का हवाई हमला इस क्षेत्र के सामरिक समीकरणों के लिए एक बहुत महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ. इज़राइल हमले से नाखुश क़तर ने तुरंत अमेरिका का रुख़ किया और अपनी सुरक्षा की गारंटी देने वाला ट्रंप के कार्यकारी आदेश को हासिल करने में कामयाबी पाई लेकिन इस घटना के बाद दूसरे खाड़ी देशों को मुश्किल विकल्पों का सामना करना पड़ा है.
अरब देश अपनी निवारक सैन्य क्षमता तेज़ी से बढ़ा रहे हैं।
मध्य-पूर्व में इस समय इज़राइल इकलौता देश है जो एफ-35 लड़ाकू विमानों का इस्तेमाल कर रहा है. इज़रायल शायद पहला ऑपरेटर भी है जिसने इन फाइटर जेट्स का सक्रिय युद्धक्षेत्रों में उपयोग किया है. फिर चाहे वो ईरान के परमाणु कार्यक्रम ठिकानों पर किया गया हमला हो या फिर लेबनान में मारे गए हिज़्बुल्लाह प्रमुख हसन नस्रल्लाह के अंतिम संस्कार के ऊपर एफ-35 उड़ाना हो. एफ-35 विमानों की ताक़त के इस प्रदर्शन से इज़राइल जल्दी ही इस क्षेत्र में वायुशक्ति में बढ़त का पर्यायवाची बन गया. इज़राइल के इस आक्रामक रुख़ से अब दूसरे अरब देश असहज महसूस कर रहे हैं. इनमें वो देश भी शामिल हैं जिन्होंने अब्राहम समझौतों के तहत इज़राइल के साथ अपने संबंध सामान्य किए हैं. इन देशों को भी इस बात का एहसास हो रहा है कि ये समझौता इज़राइली आक्रामण को रोकने की गारंटी नहीं है. यही वजह है कि अब ये देश भी अपनी निवारक क्षमताओं यानी प्रतिरोधक शक्ति को तेज़ी से बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं.
एफ-35 लड़ाकू विमानों का मध्य पूर्व में पहले से ही एक शानदार राजनीतिक इतिहास रहा है. अब्राहम समझौतों के बाद, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) इसे अपनी नौसैनिक ताकत में एक अग्रिम रक्षक विमान के रूप में जोड़ने का इच्छुक था. यूएई अपने पुराने अमेरिकी एफ-16 विमानों को एफ-35 से बदलना चाहता था. इससे इज़राइल के सामने मुश्किल खड़ी हो गई क्योंकि उसके लिए इस क्षेत्र में अपनी गुणात्मक सैन्य बढ़त बनाए रखना ज़रूरी है. इसके साथ ही, इज़राइल अरब दुनिया की सबसे शक्तिशाली राज्यों में से यानी संयुक्त अरब अमीरात के साथ अपने नए सामान्य संबंधों को बनाए रखना चाहता है. हालांकि शुरुआत में, इज़राइल को एफ-35 विमान यूएई को देने पर कोई आपत्ति नहीं जताई. इज़राइल बस यही चाहता था कि उसके पास इस विमान के जो संस्करण हैं, वो 'अदीर' (हिब्रू में मज़बूत या भव्य) बने रहें. इज़राइल चाहता था कि उसे दिए गए एफ-35 विमानों की तकनीकी विशेषताएं यूएई की तुलना में श्रेष्ठ बनी रहें. हालांकि, यूएई की एफ-35 विमान पाने की कोशिश नाकाम रही क्योंकि इज़राइल ने सार्वजनिक रूप से भले ही अबू धाबी की इच्छा का समर्थन किया लेकिन पर्दे के पीछे इसे विफल करने की कोशिश की. सऊदी अरब अमीरात तो एफ-35 लड़ाकू विमान पाने में नाकाम रहा लेकिन सऊदी अरब को ये विमान मिल सकते हैं. हालांकि, ट्रंप ने दावा किया है कि सऊदी अरब को मिलने वाले विमान वैसे ही होंगे, जैसे इज़राइल के पास हैं लेकिन इज़राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने पहले ही इस तरह के डर को खारिज़ कर दिया है. नेतन्याहू ने कहा कि अमेरिका ने दुनिया के इकलौते यहूदी देश को इज़राइल को संस्थागत समर्थन दिया है. ऐसे में अमेरिका ऐसा कोई काम नहीं करेगा, जिससे इज़राइल की सैन्य बढ़त कमज़ोर पड़े.
एक बात तय है, अगर ये सौदा सफल होता है, तब भी सऊदी अरब को शायद उतने उन्नत एफ-35 विमान मिलें, जितने इज़राइल के पास है. ये एक ऐसा सच है जिसे ज्यादातर अरब देश जानते हैं. उन्हें इस वास्तविकता का अहसास है कि अमेरिका हर कीमत पर इज़राइल को मज़बूत बनाए रखेगा. वैसे भी अधिकांश अरब देश इज़राइल की बजाए ईरान को अपने लिए ख़तरा मानते हैं. इनका मानना है कि जिन देशों को अमेरिका ने सुरक्षा की गारंटी दी है, उन पर इज़राइल हमला नहीं करेगा. हालांकि, क़तर के ख़िलाफ इज़राइल के हमले ने इस अवधारणा पर सवाल खड़े किए हैं. स्कॉलर गलीप डालय कहते हैं कि अरब देशों में अब अमेरिकी प्रभाव और शक्ति को ‘अनिवार्य लेकिन अविश्वास’ के रूप में देखा जाने लगा है. अमेरिका पर अविश्वास अरब शक्तियों को अपनी सैन्य क्षमता का नए सिरे से निर्माण करने के लिए प्रेरित करेगा. यही वजह है कि एक तरफ कई अरब देशों ने एफ-35 फाइटर जेट्स खरीदने की इच्छा दिखाई है, वहीं दूसरी तरफ पाकिस्तान–सऊदी के बीच सुरक्षा समझौते का नवीनीकरण हुआ है. पाकिस्तान परमाणु हथियारों की क्षमता वाला इकलौता मुस्लिम राष्ट्र है, इसके अलावा उसके पास एक विशाल और अनुभवी सेना है. ये सब सामरिक बदलाव अरब देशों के बीच सुरक्षा की चिंताओं से जुड़ी नई वास्तविकताओं के संकेत हैं.
अमेरिका पर अविश्वास, अरब देशों को अपनी सैन्य क्षमता नए सिरे से गढ़ने की ओर धकेल रहा है।
ट्रंप प्रशासन अपने पहले कार्यकाल में एफ-35 को एक ऐसा महंगा प्रोजेक्ट बताता था, जो अपने लक्ष्यों को पाने में असमर्थ था, लेकिन वहीं एफ-35 आज अमेरिकी शक्ति का प्रतीक बनता जा रहा है. सबसे खास बात ये है कि, एफ-35 अपनी सामर्थ्य उस मध्य-पूर्व क्षेत्र में दिखा रहा है, जहां से अमेरिका चाहकर भी ध्यान नहीं हटा पा रहा. हालांकि, गलीप डालय डेली के अनुसार इस क्षेत्र में अमेरिकी शक्ति अनिवार्य लेकिन अविश्वसनीय है, लेकिन अरब शक्तियों ने वास्तव में अपने दीर्घकालिक रणनीतिक निर्भरता को फिर से संतुलित करना शुरू कर दिया है. अरब देश अब सैन्य उपकरण की खरीद के मामले में रणनीतिक स्वतंत्रता और बहुध्रुवीयता की अवधारणाओं के आधार पर विविधता लाने की दिशा में बढ़ रहे हैं.
उदाहरण के लिए, यूएई पांचवीं पीढ़ी के फाइटर विमान परियोजनाओं में निवेश करने पर विचार कर रहा है, विशेष रूप से उन परियोजनाओं में जो दक्षिण कोरिया द्वारा संचालित हैं. सियोल अपने केएफ-21 बोरमाए फाइटर विमान कार्यक्रम में अबू धाबी से 15 अरब डॉलर के निवेश को लक्षित कर रहा है. केएफ-21 ने 2022 में ही अपनी पहली उड़ान भर ली थी. इस कार्यक्रम में सफलतापूर्वक निवेश करने से यूएई को विविधता मिलेगी, और साथ ही वो पश्चिमी सैन्य तकनीकों के ढांचे के भीतर भी रहेगा. दूसरी ओर, सऊदी अरब अपनी घरेलू रक्षा तकनीक, ड्रोन से लेकर लड़ाकू विमान तक, में अपने क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वी तुर्किए की सफलता को देख रहे हैं. विडंबना ये है कि, तुर्किए भी एफ-35 कार्यक्रम का हिस्सा था, लेकिन रूस की सबसे उन्नत S-400 मिसाइल प्रणाली खरीदने के फैसले की वजह से उसे एफ-35 कार्यक्रम से बाहर कर दिया गया. अगर सऊदी अरब-अमेरिका का सौदा सफल होता है, तो तुर्किए एक बार फिर से एफ-35 के लिए पात्र हो सकता है. फिलहाल, उसने अस्थायी उपाय के रूप में यूरोप के यूरोफाइटर को चुना है.
अंकारा और रियाद के बीच प्रस्तावित 6 अरब डॉलर के समझौता से सऊदी अरब को दो फायदे होंगे. पहला, ये उसके देशी रक्षा क्षेत्र के उद्देश्य को बढ़ावा देगा. दूसरा, तुर्किए के साथ बढ़ते आर्थिक सहयोग से दोनों देशों के बीच क्षेत्रीय मामलों पर किसी बड़े मतभेद की आशंका भी कम हो जाएगी. रिपोर्ट्स के अनुसार, सऊदी अरब का 2030 तक 50 प्रतिशत देशीकरण का लक्ष्य है. 2024 तक यह संख्या लगभग 19 प्रतिशत थी. चीन और रूस जैसे दूसरे हथियार आपूर्तिकर्ता देश भी मध्य-पूर्व के बाज़ार में अपनी पैठ बढ़ाने के मामले में अच्छी स्थिति में हैं. इसीलिए कुछ लोग ये मानते हैं कि हथियार बाज़ार में बढ़ती प्रतिस्पर्धा अमेरिका को अपने शर्तों और नियमों में ढील देने के लिए मज़बूर करेगी. अमेरिका उन नियमों में कुछ रियायत दे सकता है कि हथियार खरीदने वाले देश कब और कैसे उन्हे ऑपरेट कर सकते हैं.
अरब देश हथियारों की खरीद में रणनीतिक स्वतंत्रता और बहुध्रुवीयता के आधार पर विविधता ला रहे हैं।
अरब देशों की तुलना में एफ-35 इज़राइल के लिए ज़्यादा महत्वपूर्ण हैं. रियाद और अबु धाबी की तुलना में इज़राइल के लिए विविधीकरण के विकल्प गंभीर रूप से सीमित हैं. हालांकि, अमेरिकी कोशिश कर रहा है कि अरब देशों के सामने विविधीकरण के विकल्प कम रहें, लेकिन अब तक इसमें ज़्यादा कामयाबी नहीं मिली है. ये ज़रूरी नहीं कि, इसकी वजह अमेरिका और मध्य पूर्व के बीच बढ़ती खाई हो. अरब देशों द्वारा विदेश नीति की दृष्टिकोण में संरचनात्मक बदलाव भी इसकी एक वजह हैं, जिन्होंने अपनी स्थिति को सभी के लिए लाभकारी के रूप में पेश किया है. अपनी इस रणनीति की बदौलत, अरब देशों ने पहले अफ़ग़ानिस्तान और अब गाज़ा से लेकर यूक्रेन तक अंतर्राष्ट्रीय मध्यस्थता के केंद्र बनने की कोशिश की है.
फ़िलहाल वायु शक्ति और वायु रक्षा ही इस क्षेत्र में अवसरों और ख़तरों को नियंत्रित कर रही हैं।
कुल मिलाकर ये कहा जा सकता है कि, अल्पकाल में वायु शक्ति और वायु रक्षा ही वो घटक हैं, जो अवसरों और डर दोनों को नियंत्रित कर रहे हैं. मध्य-पूर्व क्षेत्र में पारंपरिक युद्धों की भूख, अनुभव और क्षमता असंतोषजनक बनी हुई है. इसीलिए वायु शक्ति, विशेष रूप से बिना पायलट वाली तकनीकों और मिसाइलों के इस्तेमाल, को मुख्य संकट बिंदु के रूप में देखा जा रहा है. एफ-35 विमानों की खरीद में रुचि का कारण भी युद्ध का डर है. विश्लेषक लगातार ये भविष्यवाणी कर रहे हैं कि, इस क्षेत्र में एक और युद्ध जैसी स्थिति कभी भी बन सकती है, इसे हमेशा के लिए टाला नहीं जा सकता.
कबीर तनेजा ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन के मिडिल ईस्ट और स्ट्रैटजिक स्टडीज़ प्रोग्राम में डिप्टी डायरेक्टर हैं.
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Kabir Taneja is a Deputy Director and Fellow, Middle East, with the Strategic Studies programme. His research focuses on India’s relations with the Middle East ...
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