Author : Gopalika Arora

Expert Speak Raisina Debates
Published on Jan 31, 2026 Updated 0 Hours ago

हाल ही में हुए भारत–EU मुक्त व्यापार समझौते ने स्वच्छ ऊर्जा, ग्रीन हाइड्रोजन और जलवायु लक्ष्यों को व्यापार के केंद्र में ला दिया है. इस लेख में जानें कि CBAM में लचीलापन और तकनीक–वित्त सहयोग कैसे इस ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ को विकास और डी-कार्बनाइजेशन के बीच संतुलन बनाने वाला समझौता बनाते हैं.

भारत–EU FTA: सबसे चर्चित डील क्यों?

EU-भारत मुक्त व्यापार समझौता (FTA) स्वच्छ ऊर्जा सहयोग और कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज़्म (CBAM) में संतुलित लचीलेपन को एक व्यापक रणनीतिक साझेदारी के केंद्र में रखता है. इस समझौते का वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि नियमों, वित्तीय सहायता और मानकों को ज़मीन पर कैसे लागू किया जाता है.

लगभग दो दशकों तक रुक-रुक कर चली बातचीत के बाद, भारत और यूरोपीय संघ (EU) ने 27 जनवरी 2026 को अपने लंबे समय से लंबित मुक्त व्यापार समझौते को औपचारिक रूप से अंतिम रूप दिया. यह समझौता दोनों पक्षों द्वारा की गई सबसे लंबी और जटिल व्यापार वार्ताओं में से एक था. इस समझौते के तहत वस्तुओं और सेवाओं में व्यापक स्तर पर शुल्क में कटौती की जाएगी और सुरक्षा सहयोग के लिए एक समानांतर ढांचा भी तैयार किया गया है. यह दुनिया की चौथी और दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच रिश्तों में एक बड़ा कदम माना जा रहा है.

नई दिल्ली में आयोजित 16वें भारत–EU शिखर सम्मेलन में इस समझौते को अंतिम रूप दिया गया. इसे ऐसे समय में एक रणनीतिक कदम माना जा रहा है जब वैश्विक व्यवस्था बढ़ते संरक्षणवाद, भू-राजनीतिक तनाव और कार्बन आधारित व्यापार उपायों के कारण अधिक अस्थिर हो रही है. ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ कहे जा रहे इस FTA को व्यापार और जलवायु लक्ष्यों के बीच एक सेतु के रूप में भी देखा जा रहा है.

इस समझौते के तहत वस्तुओं और सेवाओं में व्यापक स्तर पर शुल्क में कटौती की जाएगी और सुरक्षा सहयोग के लिए एक समानांतर ढांचा भी तैयार किया गया है. यह दुनिया की चौथी और दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच रिश्तों में एक बड़ा कदम माना जा रहा है.

भारत और EU दुनिया के तीसरे और चौथे सबसे बड़े ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जक हैं. ऐसे में दोनों पर यह जिम्मेदारी है कि वे आर्थिक विकास और ऊर्जा सुरक्षा को बनाए रखते हुए वैश्विक स्तर पर डी-कार्बनाइजेशन को आगे बढ़ाएं. जलवायु कार्रवाई और स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण इस साझेदारी का एक अहम हिस्सा है. भारत ने 2070 तक नेट-ज़ीरो उत्सर्जन का लक्ष्य रखा है, जबकि EU ने 2050 तक जलवायु-तटस्थ बनने का संकल्प लिया है. इन लक्ष्यों को पूरा करने के लिए स्वच्छ तकनीकों, ऊर्जा ढांचे और मजबूत आपूर्ति श्रृंखलाओं में बड़े निवेश की आवश्यकता होगी.

जलवायु-केंद्रित व्यापार समझौता

FTA से पहले ही भारत और EU के बीच जलवायु और ऊर्जा सहयोग मौजूद था. 2016 में शुरू की गई EU–भारत स्वच्छ ऊर्जा और जलवायु साझेदारी (CECP) नवीकरणीय ऊर्जा, ऊर्जा दक्षता, ऑफशोर पवन ऊर्जा, स्मार्ट ग्रिड और ग्रीन हाइड्रोजन जैसे क्षेत्रों में सहयोग का मुख्य मंच रही है. यह साझेदारी पेरिस समझौते और सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) पर आधारित है. इस समझौते का एक अहम परिणाम ग्रीन हाइड्रोजन पर एक विशेष टास्क फोर्स का गठन है, जिसका उद्देश्य स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन को बढ़ावा देना, तकनीक साझा करना और औद्योगिक उत्सर्जन को कम करना है.

ग्रीन हाइड्रोजन भारत–EU सहयोग का एक प्रमुख क्षेत्र बनकर उभरा है. भारत खुद को यूरोप के लिए ग्रीन हाइड्रोजन और उससे बने उत्पादों का संभावित आपूर्तिकर्ता मान रहा है. इसके लिए 2030 तक 10 गीगावाट इलेक्ट्रोलाइज़र क्षमता विकसित करने हेतु लगभग 10 अरब डॉलर का विदेशी निवेश जुटाने की योजना है.

दोनों पर यह जिम्मेदारी है कि वे आर्थिक विकास और ऊर्जा सुरक्षा को बनाए रखते हुए वैश्विक स्तर पर डी-कार्बनाइजेशन को आगे बढ़ाएं. जलवायु कार्रवाई और स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण इस साझेदारी का एक अहम हिस्सा है. भारत ने 2070 तक नेट-ज़ीरो उत्सर्जन का लक्ष्य रखा है, जबकि EU ने 2050 तक जलवायु-तटस्थ बनने का संकल्प लिया है.

इस दिशा में भारत ने अपने पूर्वी तट पर ग्रीन हाइड्रोजन आधारित अमोनिया परियोजना शुरू की है, जिसका उद्देश्य यूरोपीय बाजारों को निर्यात करना है. यह परियोजना सालाना 15 लाख टन ग्रीन अमोनिया उत्पादन की क्षमता रखेगी. इसमें 2 गीगावाट इलेक्ट्रोलाइज़र, 7.5 गीगावाट नवीकरणीय ऊर्जा और 2 गीगावाट पंप्ड स्टोरेज हाइड्रोपावर का उपयोग होगा, ताकि लगातार उत्पादन संभव हो सके. यह दिखाता है कि भारत लागत के साथ-साथ भरोसेमंद आपूर्ति पर भी ध्यान दे रहा है. EU ने भारत के स्टील और एल्युमिनियम उद्योगों को डी-कार्बनाइज़ करने के लिए तकनीकी और वित्तीय सहायता देने का भी वादा किया है, जिसमें 500 मिलियन यूरो का ‘ग्रीन ट्रांजिशन असिस्टेंस पैकेज’ शामिल है. हालांकि, इस सहायता के नियम, पात्रता और समय-सीमा अभी स्पष्ट नहीं हैं और फंडिंग संभवतः प्रदर्शन आधारित होगी.

FTA के तहत CBAM में लचीलापन

इस समझौते का एक अहम मुद्दा EU का कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज़्म (CBAM) रहा है, जिसका उद्देश्य अधिक प्रदूषण फैलाने वाले आयात पर शुल्क लगाकर ‘कार्बन लीकेज’ को रोकना है. CBAM फिलहाल संक्रमण चरण में है और इसी वर्ष पूरी तरह लागू होने की संभावना है.

हालांकि CBAM के दायरे में आने वाला भारत का निर्यात GDP का केवल 0.2 प्रतिशत है, लेकिन इसका प्रभाव कुछ खास क्षेत्रों पर केंद्रित है. इनमें लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा केवल लौह और इस्पात का है. आशंका है कि CBAM से भारत के स्टील, एल्युमिनियम और सीमेंट जैसे उद्योगों पर सालाना 2-4 अरब डॉलर का अतिरिक्त बोझ पड़ सकता है. FTA के तहत भारत ने CBAM से जुड़ी कुछ अहम गारंटियाँ हासिल की हैं. समझौते में यह प्रावधान है कि EU अगर किसी अन्य देश को CBAM में छूट देता है, तो वही छूट भारत पर भी लागू होगी. इसके अलावा, घरेलू कार्बन प्राइसिंग सिस्टम और सत्यापन एजेंसियों की मान्यता, तकनीकी सहयोग और वित्तीय सहायता पर भी सहमति बनी है.

EU ने भारत के स्टील और एल्युमिनियम उद्योगों को डी-कार्बनाइज़ करने के लिए तकनीकी और वित्तीय सहायता देने का भी वादा किया है, जिसमें 500 मिलियन यूरो का ‘ग्रीन ट्रांजिशन असिस्टेंस पैकेज’ शामिल है. हालांकि, इस सहायता के नियम, पात्रता और समय-सीमा अभी स्पष्ट नहीं हैं और फंडिंग संभवतः प्रदर्शन आधारित होगी.

वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि सरकार ने CBAM के मुद्दे पर निर्यातकों के हितों की रक्षा के लिए संवाद और भरोसे के ज़रिए रचनात्मक समाधान निकाले हैं. हालाँकि यह दिशा सकारात्मक है, लेकिन अभी तक CBAM के तहत किसी औपचारिक छूट या सरल प्रक्रिया की अधिसूचना जारी नहीं की गई है.

आगे की राह

भारत–EU मुक्त व्यापार समझौता (FTA) निस्संदेह एक ऐतिहासिक कदम है, लेकिन यह एक लंबी प्रक्रिया की सिर्फ शुरुआत है. ग्रीन हाइड्रोजन, स्वच्छ ऊर्जा विनिर्माण या CBAM से जुड़ी सुरक्षा व्यवस्थाओं में इस समझौते की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि इसे ज़मीन पर कैसे लागू किया जाता है, फंडिंग और सत्यापन की प्रक्रिया कितनी स्पष्ट होती हैं, और तकनीक, मानकों व निवेश के क्षेत्र में सहयोग कितना लगातार बना रहता है.

दोनों पक्षों को स्वच्छ ऊर्जा से जुड़े व्यावहारिक समाधान तेजी से विकसित करने के लिए संयुक्त शोध और नवाचार पर भी अधिक ध्यान देना होगा. इस संदर्भ में भारत–EU ट्रेड एंड टेक्नोलॉजी काउंसिल (TTC) अहम भूमिका निभा सकता है, यदि इसके दायरे में स्वच्छ ऊर्जा विनिर्माण और मजबूत आपूर्ति श्रृंखलाओं को शामिल किया जाए. खास तौर पर सोलर पीवी मॉड्यूल, पवन ऊर्जा उपकरण और उन्नत बैटरी तकनीक जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर फोकस आवश्यक होगा.

तकनीक हस्तांतरण और जलवायु वित्त, दोनों देशों की क्षमताओं में मौजूद असमानताओं को दूर करने और न्यायसंगत नेट-ज़ीरो संक्रमण को तेज़ करने के लिए बेहद ज़रूरी रहेंगे. EU ने भारत के हरित संक्रमण के लिए बड़े वित्तीय समर्थन के संकेत दिए हैं, जिसमें यूरोपीय निवेश बैंक द्वारा जलवायु-संवेदनशील अवसंरचना के लिए 2 अरब यूरो की प्रतिबद्धता शामिल है.

इसके अलावा, EU की 300 अरब यूरो की ‘ग्लोबल गेटवे’ रणनीति और सह-वित्तपोषण ढांचे डी-कार्बनाइज़ेशन परियोजनाओं में बड़े पैमाने पर निवेश जुटाने में मदद कर सकते हैं. यदि भारत–EU मुक्त व्यापार समझौते और उससे जुड़े सभी पूरक कदमों को प्रभावी, पारदर्शी और समयबद्ध ढंग से लागू किया जाता है, तो यह समझौता वैश्विक स्तर पर एक महत्वपूर्ण नीतिगत मॉडल के रूप में उभर सकता है. यह दिखा सकता है कि किस प्रकार व्यापार समझौते केवल शुल्क कटौती तक सीमित न रहकर स्वच्छ तकनीक, नवाचार और जलवायु लक्ष्यों को आगे बढ़ाने का साधन बन सकते हैं. कार्बन-सचेत वैश्विक अर्थव्यवस्था में व्यापार, तकनीक और जलवायु नीति को अलग-अलग क्षेत्रों के बजाय एक समग्र ढांचे के रूप में देखा जाना आवश्यक है. इस समझौते के माध्यम से स्वच्छ ऊर्जा विनिर्माण, ग्रीन हाइड्रोजन, और डी-कार्बनाइजेशन से जुड़े क्षेत्रों में निवेश और तकनीक हस्तांतरण को बढ़ावा मिल सकता है. साथ ही, CBAM जैसे उपायों के संदर्भ में लचीलापन और सहयोग यह सुनिश्चित कर सकता है कि विकासशील अर्थव्यवस्थाओं पर अनुचित बोझ न पड़े. यदि भारत और EU पारस्परिक विश्वास, संस्थागत सहयोग और संयुक्त नवाचार को प्राथमिकता देते हैं, तो यह मॉडल न केवल द्विपक्षीय साझेदारी को मजबूत करेगा बल्कि वैश्विक जलवायु शासन और सतत विकास के लिए भी एक नई दिशा प्रदान करेगा.


गोपालिका अरोरा ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के सेंटर फॉर इकोनॉमी एंड ग्रोथ में उप निदेशक हैं.

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