टैरिफ पर ट्रंप और मोदी के टकराव ने यूरोपियन यूनियन के लिए एक रास्ता खोल दिया है. क्या ब्रुसेल्स और नई दिल्ली आखिरकार यूरोपीय संघ-भारत गतिरोध को तोड़ सकते हैं?
4 अगस्त 2025 को, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत के खिलाफ टैरिफ में संभावित "काफ़ी" वृद्धि की घोषणा की. ट्रंप ने भारत पर रूस से रियायती दरों पर तेल खरीदने और उसे वैश्विक बाजारों में मुनाफे के लिए बेचने का आरोप लगाया. ट्रंप ने अपनी सोशल मीडिया पोस्ट में अपने फैसले को राजनीतिक रूप से उचित ठहराते हुए लिखा कि, "भारत को इस बात की परवाह नहीं है कि यूक्रेन में रूसी युद्ध मशीन द्वारा कितने लोग मारे जा रहे हैं". भारत की प्रतिक्रिया कुछ ही घंटों बाद आ गई. भारतीय विदेश मंत्रालय ने अपने आधिकारिक बयान में पश्चिमी देशों के "दोहरे मानदंडों" की निंदा की और कहा गया कि अमेरिका और यूरोपीय संघ (ईयू) दोनों ही गैर-महत्वपूर्ण क्षेत्रों में मॉस्को के साथ आर्थिक संबंध बनाए हुए हैं, लेकिन जब भारत ऐसा करता है तो उसकी आलोचना करते हैं.
भारत और अमेरिका के बीच ये टकराव एक गहरी बात का संकेत देता है. दोनों देशों के बीच व्यापारिक संवाद की स्थिति अभी भी नाज़ुक बनी हुई है. तीखी बयानबाज़ी, गंभीर मतभेदों और गैर-व्यापारिक गतिशीलता ने रिश्तों को और बिगाड़ा है. ये स्थिति यूरोपीय संघ (ईयू)के लिए एक अवसर साबित हो सकती है, जो लंबे समय से भारत के साथ एक सफल समझौते की तलाश में है. यूरोपियन यूनियन के लिए ये वास्तविक राजनीतिक मौका एक बार फिर से उभरा है. भारत के साथ ईयू के मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) पर बातचीत 2014 में स्थगित कर दी गई थी. 2022 में ये फिर से शुरू हुई. इस समय भू-राजनीतिक तात्कालिकता, रणनीतिक समानताओं और आर्थिक दबाव का एक ऐसा दुर्लभ मिश्रण हो रखा है, जहां भारत और यूरोपियन यूनियन में बात बन सकती है. भारत के बयान में तीन प्रमुख कारणों से यूरोपीय संघ का विशेष रूप से उल्लेख किया गया है. पहला, ब्रुसेल्स को भी नई दिल्ली उन्हीं दोहरे मानदंडों वाला मानती है, जिनका वो वाशिंगटन पर आरोप लगाती है. दूसरा, यूरोपीय संघ का ज़िक्र अमेरिका के साथ संभावित टकराव को टालने में मदद करता है. तीसरा, ये संदेश यूरोपीय संघ को राष्ट्रीय हितों पर आधारित एक पारस्परिक सम्मानपूर्ण संबंध की आवश्यकता का संकेत दे सकता है.
बड़े पैमाने वाले क्वांटम कंप्यूटर को हक़ीक़त बनने में अभी एक दशक और लग सकता है, लेकिन सुरक्षा संबंधी ख़तरा आज से ही पैदा हो गया है. विरोधी अब एन्क्रिप्टेड, यानी सुरक्षित डेटा को इकट्ठा कर सकते हैं और आने वाले दिनों में क्वांटम क्षमताएं उपलब्ध होने पर उसका तोड़ निकाल सकते हैं.
इस लिहाज़ से देखें तो, यूरोपीय संघ के लिए समझदारी इसी में होगी कि वो पहले से तैयार और नौकरशाही द्वारा बनाई गई कूटनीतिक योजनाओं के ज़रिए काम करने से बचें, विशेष रूप से भारत पर प्रतिबंध लगाने के अमेरिकी दबाव का विरोध करके. ऐसा करने से ईयू की अपनी विश्वसनीयता कमज़ोर होने का ख़तरा होगा. वाशिंगटन के लेन-देन संबंधी तर्क से प्रेरित अमेरिकी प्रतिबंधों को बाद में रणनीतिक रियायतों के बदले में हटाया जा सकता है, जबकि यूरोपीय संघ को भारत के साथ व्यापार समझौता करने में अपने रणनीतिक हित के बारे में एक व्यापक, अधिक स्वायत्त दृष्टिकोण अपनाना चाहिए. इस तरह के समझौते के ज़रिए, ब्रुसेल्स भारत के ज़ोखिम कम करने और रूस से धीरे-धीरे अलग होने के ठोस तरीकों पर बातचीत का रास्ता भी खोल सकता है.
भारत और यूरोपीय संघ में मुक्त व्यापार समझौते पर वार्ता सात साल की बातचीत के बाद 2014 में विफल हो गई. इसकी वजह राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी और भारत द्वारा अपने विनिर्माण क्षेत्र को बचाने पर ध्यान केंद्रित करना था. इस रणनीतिक साझेदारी को "दावे तो बढ़ा-चढ़ाकर, लेकिन ठोस मुद्दों में कमज़ोर" करार दिया गया. मई 2021 में पोर्टो शिखर सम्मेलन में निर्णायक मोड़ आया, जब दोनों पक्ष फिर से बातचीत शुरू करने पर सहमत हुए. 2022 में, एक द्विपक्षीय व्यापार और प्रौद्योगिकी परिषद की स्थापना की गई. पहले ऐसी परिषद सिर्फ अमेरिका के लिए आरक्षित थी. फरवरी 2025 में, यूरोपियन कमीशन की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन और भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच एक उच्च-स्तरीय बैठक में "वर्ष के अंत तक" सहमति बनाने के साझा लक्ष्य की पुष्टि की गई.
ये महत्वाकांक्षा ज़रूरी है. भारत, दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था है. यूरोपीय संघ के साथ मुक्त व्यापार समझौता (एफटीए) किसी बड़े आर्थिक साझेदार के साथ उसका पहला समझौता होगा. ब्रुसेल्स के लिए, ये एशिया में एक रणनीतिक साझेदार के साथ संबंधों को मज़बूत करेगा. इससे उसे दक्षिण कोरिया और जापान जैसे देशों से खोई हुई बाज़ार हिस्सेदारी वापस पाने में मदद मिलेगी. ये दोनों देश , जो पहले से ही भारत के साथ तरजीही व्यापार समझौतों का लाभ उठा रहे हैं. मशीनी सामान और मध्यवर्ती उत्पादों पर शुल्क हटाने से भारत के निर्यात-उन्मुख विनिर्माण आधार के विकास को बढ़ावा मिलेगा, साथ ही यूरोपीय संघ को ऑटोमोटिव जैसे प्रमुख क्षेत्रों में अपना प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त फिर हासिल करने में मदद मिलेगी. भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारे (आईएमईसी) पर प्रगति से इन कमियों को और दूर किया जा सकता है.
अमेरिका ने अपने राष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी नीतियों में AI को भी शामिल किया है, ताकि त्वरित ख़तरों का विश्लेषण हो सके और सुरक्षित संचार को आगे बढ़ाया जा सके.
फिर भी, ये समझौता व्यापार से कहीं आगे जाता है. भारत और यूरोपीय संघ दोनों ही अधिक रणनीतिक स्वायत्तता, मूल्य श्रृंखला विविधीकरण और प्रणालीगत स्थिरता चाहते हैं. एक खंडित विश्व में, मुक्त व्यापार समझौता (एफटीए) परिपक्व लोकतंत्रों के बीच साझेदारी के माध्यम से एक नियम-आधारित बहुध्रुवीय व्यवस्था के निर्माण में योगदान देगा, फिर भले ही इसके मानदंडों और प्रणालियों में कुछ विविधताएं हों. दोनों पक्ष विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) में सुधार, पर्यावरण मानकों, आर्थिक शासन और कुछ भू-राजनीतिक एकरूपता लाने पर समन्वय कर सकते हैं. इससे चीन के एकतरफावाद और अमेरिकी अनिश्चितता का एक विकल्प मिल सकता है.
हालांकि, चुनौतियां बहुत हैं. इस समझौते से पहले उन्हीं संरचनात्मक बाधाओं को दूर करना होगा, जिनकी वजह से पहले बातचीत पटरी से उतर गई थी. भारत का औसत टैरिफ 17 प्रतिशत है, जो हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सबसे ज़्यादा टैरिफ में से एक है. ऑटोमोटिव क्षेत्र विशेष रूप से विवादास्पद बना हुआ है. यूरोपीय संघ के कार निर्माता भारतीय बाज़ार तक बेहतर पहुंच की मांग कर रहे हैं, जबकि भारत और ज़्यादा उदारीकरण का विरोध कर रहा है, इसमें उसे कोरियाई और जापानी निवेशकों का समर्थन मिल रहा है. उत्पत्ति के नियम (उत्पाद का मूल निर्माता देश)अभी भी अड़चन बने हुए हैं, और भारत के गुणवत्ता नियंत्रण आदेश (क्यूसीओ) यूरोपीय उत्पादों के व्यावसायीकरण में काफ़ी बाधा डालते हैं.
इसके अलावा, नियामक संस्थाओं के काम करने का तरीका एक और बाधा उत्पन्न करता है. भारत में व्यापार करने की लागत अक्सर टैरिफ के बोझ से ज़्यादा होती है. सेवा क्षेत्र काफ़ी हद तक बंद है, और भारत अब तक डिजिटल व्यापार, डेटा स्थानीयकरण या ई-कॉमर्स पर शुल्क प्रतिबंध लगाने की प्रतिबद्धताओं से बचता रहा है. पर्यावरण नीति के मामले में भी भारत और यूरोपीय संघ में कार्बन सीमा समायोजन तंत्र (सीबीएएम) पर मतभेद हैं. भारत ने इसमें छूट का अनुरोध किया है, लेकिन ब्रुसेल्स की मज़बूरी है कि वो विश्व व्यापार संगठन के नियमों और ग्रीन डील के उद्देश्यों को कमज़ोर किए बिना इसकी मंजूरी नहीं दे सकता. वनों की कटाई से संबंधित नियमों पर भी गतिरोध उतने ही महत्वपूर्ण है.
निवेश और भी जटिलताएं पैदा करता है. भारत ने कई यूरोपीय संघ के सदस्य देशों के साथ अपनी द्विपक्षीय निवेश संधियां ख़त्म कर दी है. इससे प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में बाधा आ रही है. हालांकि, एक नए निवेश समझौते पर चर्चा चल रही है, लेकिन निवेशक-देश विवाद निपटान (आईएसडीएस) के प्रावधानों के लिए यूरोपीय संघ के सदस्यों के बीच सर्वसम्मति की आवश्यकता होगी. आज तक, यूरोपीय संघ की भारत के साथ कोई निवेश संधि लागू नहीं है, जिसमें आईएसडीएस के प्रावधान भी शामिल हैं. सार्वजनिक खरीद भी विवादास्पद है. भारतीय कानून घरेलू उत्पादों को प्राथमिकता देता है, वहीं गैर-भेदभाव धाराओं के अभाव में, यूरोपीय संघ पारस्परिक प्रतिबंध लगाने का अपना अधिकार सुरक्षित रख सकता है.
इसके अलावा, सतत विकास लक्ष्य (टीएसडी) भी है. यूरोपीय संघ बाध्यकारी प्रतिबद्धताओं और संभावित प्रतिबंधों के साथ एक प्रवर्तन तंत्र (इंफोर्समेंट मैकेनिज्म)की मांग करता है, लेकिन भारत इसके लिए तैयार नहीं है. नागरिक समाज की भागीदारी की आवश्यकता वाले प्रावधान भी विवादास्पद हैं. ऐसे में अन्य यूरोपीय संघ समझौतों की तुलना में भारत के साथ समझौते में अधिक लचीली शर्तों की ज़रूरत हो सकती है.
फिर भी, समझौते के लिए राजनीतिक अवसर खुला हुआ है, खासकर अमेरिका और भारत टकराव के मद्देनज़र. 2025 के अंत तक आंशिक समझौता होना संभावना से ज़्यादा ज़रूरी लगता है. एक 'शीघ्र-प्राप्ति' समझौता यानी अर्ली हार्वेस्ट डील इस अंतर को कम कर सकता है और लंबित विवादों को सुलझाने की गुंजाइश बना सकता है. अर्ली हार्वेस्ट डील का अर्थ ऐसे समझौते से है, जहां आखिरी समझौता होने से पहले कुछ शुरुआती बिंदुओं पर सहमति बन जाती है. अगर समझौता समझदारी से तैयार किया जाए, तो ये भारतीय विनिर्माण क्षेत्र में यूरोपीय संघ के निवेश को आकर्षित कर सकता है. इतना ही नहीं ये स्वच्छ व्यापार एवं निवेश साझेदारी (सीटीआईपी) के ज़रिए हरित उद्योगों को बढ़ावा दे सकता है. व्यापक रूप से देखें तो, ये यूरोपीय संघ-भारत धुरी को मजबूत करेगा. वैश्विक शासन को आकार देने में भी ये सक्षम होगा, विशेष रूप से भारत-भूमध्यसागरीय क्षेत्र में, जिसमें लाल सागर और खाड़ी क्षेत्र शामिल होंगे. ये क्षेत्र महत्वपूर्ण माने जाने वाले यूरोप-एशिया व्यापार प्रवाह को आधार प्रदान करते हैं.
हालांकि, सफलता की गारंटी अभी दूर की बात है, लेकिन राजनीतिक, आर्थिक और रणनीतिक परिस्थितियां इतनी स्पष्ट शायद ही पहले कभी हुई हों. इस वक्त, भारत और यूरोपियन यूनियन, दोनों को ही डोनाल्ड ट्रंप के दबावपूर्ण रुख़ का जवाब देने की ज़रूरत है. विकल्प तो बहुत जाना-पहचाना है. बड़े-बड़े वादे और बीच-बीच में ठोस बातों का अंतहीन सिलसिला. दोनों ही साझेदारों के लिए एक गंवाया हुआ अवसर है.
इमानुएल रॉसी अंतर्राष्ट्रीय मामलों के विश्लेषक हैं. उनके अध्ययन का मुख्य क्षेत्र भूमध्य सागर के वैश्विक संबंधों पर केंद्रित है. इमानुएल रॉसी डिकोड39, फ़ॉर्मिश और मेड-ऑर इटैलियन फाउंडेशन में वरिष्ठ विश्लेषक हैं. विभिन्न अंतरराष्ट्रीय थिंक टैंकों और मीडिया संस्थानों के लिए वो लेख लिखते हैं.
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Emanuele Rossi is an international affairs analyst with a focus on the global connections of the Enlarged Mediterranean. He is a senior analyst at Decode39, ...
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