Author : Shoba Suri

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Published on Mar 27, 2026 Updated 1 Hours ago

इंटरनेशनल डे ऑफ ज़ीरो वेस्ट पर विशेष

एक तरफ प्लेट में बचा हुआ खाना कूड़े में जाता है और दूसरी तरफ कोई भूखा सो जाता है- यही आज का सबसे बड़ा विरोधाभास है. यह कहानी सिर्फ व्यक्तिगत व्यवहार की नहीं बल्कि एक ऐसे फूड सिस्टम की है जहाँ उत्पादन तो भरपूर है, पर सही जगह तक पहुँच नहीं पाता- जानें आखिर गलती कहाँ हो रही है और समाधान क्या हो सकता है.

Food Waste: प्लेट भरी, पेट खाली क्यों?

हर वर्ष 30 मार्च को दुनिया इंटरनेशनल डे ऑफ ज़ीरो वेस्ट मनाती है. यह एक नया लेकिन तेजी से चर्चित होता जा रहा वैश्विक दिवस है जो एक बड़ी समस्या की ओर ध्यान दिलाता है-जहाँ एक तरफ लोगों को खाने की जरूरत है और दूसरी तरफ बहुत सारा खाना बर्बाद हो जाता है. वर्ष 2026 में इस दिन का मुख्य विषय खाद्य बर्बादी है. यह मुद्दा इसलिए अहम है क्योंकि आज भी दुनिया के कई हिस्सों में लोग भूख और कुपोषण से जूझ रहे हैं, जबकि काफी खाना बेकार चला जाता है.  खाने योग्य भोजन की भारी बर्बादी यह दिखाती है कि यह समस्या सिर्फ लोगों की आदतों तक सीमित नहीं है. दरअसल, भोजन की आपूर्ति व्यवस्था, सरकारी नीतियों और हमारे खाने-पीने के तरीकों में भी कई कमियाँ हैं, जिनकी वजह से बड़े पैमाने पर खाना बर्बाद होता है.

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) की फूड वेस्ट इंडेक्स रिपोर्ट 2024 के अनुसार, वर्ष 2022 में वैश्विक स्तर पर लगभग 1.05 अरब टन भोजन बर्बाद हुआ, जो उपभोक्ता स्तर पर उपलब्ध कुल भोजन का लगभग 19 प्रतिशत है. यह बर्बादी घरों (60 प्रतिशत), खाद्य सेवा क्षेत्र (28 प्रतिशत) और खुदरा क्षेत्र (12 प्रतिशत) में फैली हुई है, जिससे स्पष्ट होता है कि समस्या पूरे तंत्र में मौजूद है. वहीं, खाद्य और कृषि संगठन (FAO) के अनुसार वर्ष 2023 में लगभग 733 मिलियन लोग भूख का सामना कर रहे थे, और वैश्विक दक्षिण के कई हिस्सों में खाद्य असुरक्षा बढ़ती जा रही है.

खाने की बर्बादी

खाद्य बर्बादी केवल नैतिक या आर्थिक मुद्दा नहीं है; यह एक पर्यावरणीय समस्या भी है. यदि खाद्य अपशिष्ट को एक देश माना जाए, तो वह दुनिया के सबसे बड़े ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जकों में शामिल होगा, जो कुल मानवजनित उत्सर्जन का लगभग 8–10 प्रतिशत योगदान देता है. लैंडफिल में सड़ने वाला भोजन मीथेन गैस छोड़ता है, जिसकी वैश्विक तापन क्षमता 100 वर्षों की अवधि में CO₂ से लगभग 28 गुना अधिक होती है. इस दृष्टि से, खाद्य अपशिष्ट को कम करना जलवायु कार्रवाई का महत्वपूर्ण हिस्सा है और यह संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन रूपरेखा अभिसमय तथा पेरिस समझौते के तहत की गई प्रतिबद्धताओं के अनुरूप है.

वर्ष 2026 में इस दिन का मुख्य विषय खाद्य बर्बादी है. यह मुद्दा इसलिए अहम है क्योंकि आज भी दुनिया के कई हिस्सों में लोग भूख और कुपोषण से जूझ रहे हैं, जबकि काफी खाना बेकार चला जाता है.  खाने योग्य भोजन की भारी बर्बादी यह दिखाती है कि यह समस्या सिर्फ लोगों की आदतों तक सीमित नहीं है.

वर्ष 2026 की थीम संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्य 12 को भी सीधे आगे बढ़ाती है, खासकर लक्ष्य 12.3, जिसमें 2030 तक खुदरा और उपभोक्ता स्तर पर वैश्विक खाद्य अपशिष्ट को आधा करने का आह्वान किया गया है. हालांकि प्रगति असमान बनी हुई है. UNEP की 2024 की रिपोर्ट बताती है कि कुछ अमीर देशों ने खाने की बर्बादी कम करने के लिए सख्त नियम बनाए हैं, जैसे खाद्य अपशिष्ट की रिपोर्ट देना और बचे हुए भोजन को जरूरतमंदों तक पहुँचाने की व्यवस्था. भारत में यह स्थिति और साफ दिखाई देती है. अनुमान बताते हैं कि भारत हर वर्ष अपने कुल खाद्य उत्पादन का लगभग 30 से 40 प्रतिशत खो देता है, विशेष रूप से फल और सब्जियों जैसी जल्दी खराब होने वाली वस्तुओं में. केवल प्रमुख फसलों में फसल कटाई के बाद होने वाली हानि ही हर साल लगभग 1.53 ट्रिलियन रुपये की होती है, जो भंडारण, परिवहन और प्रसंस्करण में मौजूद कमियों को दर्शाती है. 

ये हानियाँ आर्थिक ही नहीं, बल्कि पोषण संबंधी भी हैं. भारत में जहाँ पाँच वर्ष से कम आयु के 35.5 प्रतिशत बच्चे अविकसित (स्टंटेड) हैं और 57 प्रतिशत महिलाएँ एनीमिया से ग्रस्त हैं, वहाँ खाद्य बर्बादी का अर्थ है पोषण विविधता और पोषक तत्वों की उपलब्धता को बेहतर बनाने के अवसरों का खो जाना. ग्लोबल न्यूट्रिशन रिपोर्ट 2024 के अनुसार, खाद्य प्रणालियों का मूल्यांकन केवल उत्पादन के आधार पर नहीं, बल्कि इस आधार पर भी किया जाना चाहिए कि वे सस्ते, विविध और पौष्टिक आहार उपलब्ध कराने में कितनी सक्षम हैं. इसी संदर्भ में शिओलॉजी (Shiology)-अर्थात ‘भोजन और खाने का अध्ययन’-की अवधारणा उपयोगी बनती है. घरों के अलावा, संस्थागत और व्यावसायिक खाद्य वातावरण भी बर्बादी में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं. अध्ययनों से पता चलता है कि शहरी भारत में उपभोक्ता स्तर पर खाद्य बर्बादी बढ़ रही है. अपर्याप्त कोल्ड स्टोरेज क्षमता, अवसंरचना की कमी और गलत भंडारण पद्धतियाँ जल्दी खराब होने वाली वस्तुओं के नष्ट होने का कारण बनती रहती हैं.

अपनानी होगी नीति

नई संभावनाएँ-जैसे परिपत्र अर्थव्यवस्था (सर्कुलर इकोनॉमी) के मॉडल, फूड रिकवरी नेटवर्क, और आपूर्ति श्रृंखला लॉजिस्टिक्स में नवाचार-अब गति पकड़ रहे हैं. भारत में भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने ‘सेव फूड, शेयर फूड, शेयर जॉय‘ जैसी पहल शुरू की है, जो व्यवसायों और लोगों को अतिरिक्त भोजन जरूरतमंदों तक पहुँचाने के लिए प्रेरित करती है. खाद्य दान के लिए कर प्रोत्साहन, मानकीकृत डेट लेबलिंग और कोल्ड-चेन अवसंरचना में निवेश जैसी नीतिगत पहलें बेहद महत्वपूर्ण हैं.

अनुमान बताते हैं कि भारत हर वर्ष अपने कुल खाद्य उत्पादन का लगभग 30 से 40 प्रतिशत खो देता है, विशेष रूप से फल और सब्जियों जैसी जल्दी खराब होने वाली वस्तुओं में. केवल प्रमुख फसलों में फसल कटाई के बाद होने वाली हानि ही हर साल लगभग 1.53 ट्रिलियन रुपये की होती है, जो भंडारण, परिवहन और प्रसंस्करण में मौजूद कमियों को दर्शाती है. 

खाद्य अपशिष्ट कम करने को जलवायु रणनीति, शहरी योजना और पोषण कार्यक्रमों से जोड़ने पर कई क्षेत्रों में एक साथ लाभ मिल सकते हैं. खाद्य हानि कम करने से संसाधनों के उपयोग की दक्षता बढ़ सकती है, उत्सर्जन घट सकता है और भोजन की उपलब्धता बढ़ सकती है. 

खाद्य हानि और बर्बादी को कम करना खाद्य प्रणालियों को पुनर्गठित करने का एक महत्वपूर्ण रणनीतिक अवसर है. यह रैखिक ‘लो-बनाओ-फेंको‘ मॉडल से हटकर ऐसे परिपत्र और पुनर्योजी दृष्टिकोण की ओर बढ़ने की आवश्यकता बताता है, जो भोजन को उसके पूरे जीवनचक्र में महत्व देता है. इसका मूल उद्देश्य यही है कि हम जो भोजन पैदा करते हैं, वह अपने सबसे महत्वपूर्ण लक्ष्य को पूरा करे-लोगों का पोषण करना.


शोबा सूरी ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में हेल्थ इनिशिएटिव की सीनियर फेलो हैं. 

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Shoba Suri

Shoba Suri

Dr. Shoba Suri is a Senior Fellow with ORFs Health Initiative. Shoba is a nutritionist with experience in community and clinical research. She has worked on nutrition, ...

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