Author : Amrita Narlikar

Expert Speak Raisina Debates
Published on Jan 20, 2026 Updated 0 Hours ago

यूरोप अब पहले जैसा सुरक्षित महसूस नहीं करता क्योंकि अमेरिका पर भरोसा कम हुआ है. साथ ही नाटो व वैश्विक तनाव उसे अपनी सुरक्षा और नीति खुद तय करने पर मजबूर कर रहे हैं. आर्टिकल के जरिए जानें कि किस तरह से यूरोप फिर से सुरक्षित और प्रभावशाली बन सकता है.

बदलते वैश्विक परिदृश्य में यूरोप के लिए चार विकल्प

यूरोप के लिए यह सोचना भी असहज है कि अमेरिका, जो लंबे समय से उसका विश्वसनीय सहयोगी रहा है, भविष्य में उसके लिए चुनौती या आक्रामक शक्ति बन सकता है. नाटो की संरचना और सुरक्षा व्यवस्था में अमेरिका की केंद्रीय भूमिका को देखते हुए यह आशंका यूरोप में गहरी बेचैनी पैदा करती है. यह चिंता स्वाभाविक है क्योंकि इससे यूरोप की सुरक्षा, पहचान और वैश्विक स्थिति पर सवाल खड़े होते हैं. हालांकि, इस अनिश्चितता को केवल भय के रूप में देखने के बजाय इसे आत्ममंथन का अवसर बनाया जा सकता है. यही बेचैनी यूरोप को अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करने, संस्थानों को मजबूत करने और बदलती वैश्विक परिस्थितियों में खुद को नए सिरे से प्रासंगिक बनाने की प्रेरणा दे सकती है. 

यूरोपीय संघ (EU) की विदेश और सुरक्षा नीति की उच्च प्रतिनिधि काजा कालास ने हाल ही में मज़ाक में कहा कि शायद अब शराब पीना शुरू करने का अच्छा समय आ गया है. यह टिप्पणी भले ही हँसी में कही गई हो लेकिन इसमें छिपा गहरा तनाव साफ झलकता है. यूरोप लंबे समय से खुद को शांति का क्षेत्र मानता आया है लेकिन उसकी सीमाओं पर चल रहा युद्ध इस आत्मछवि को हिला चुका है. अब यूरोप के भीतर ही मौजूद असहज सच्चाइयाँ उसकी एक उदारवादी शक्ति के रूप में पहचान को चुनौती दे रही हैं.

अगर अमेरिका के एक भरोसेमंद मित्र से संभावित विरोधी बनने की आशंका भी हो तो यह यूरोप के लिए गहरी चिंता का कारण है लेकिन यही चिंता यूरोप के लिए सुधार और पुनर्निर्माण की दिशा में एक एजेंडा भी बन सकती है. यह लेख ऐसे चार कदम सुझाता है.

अगर म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन में अमेरिकी उपराष्ट्रपति जे.डी. वेंस द्वारा यूरोप की सार्वजनिक आलोचना कम नहीं थी तो राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा ग्रीनलैंड पर खुले तौर पर दावा जताने की बात ने यह साफ कर दिया कि अटलांटिक पार की साझेदारी कितनी नाज़ुक हो चुकी है. नाटो (NATO) के वित्तपोषण और संचालन में अमेरिका की भूमिका केंद्रीय है. ऐसे में अगर अमेरिका के एक भरोसेमंद मित्र से संभावित विरोधी बनने की आशंका भी हो तो यह यूरोप के लिए गहरी चिंता का कारण है लेकिन यही चिंता यूरोप के लिए सुधार और पुनर्निर्माण की दिशा में एक एजेंडा भी बन सकती है. यह लेख ऐसे चार कदम सुझाता है.

चार मूलभूत चुनौतियां 

पहला, पुराने भरोसों का टूटना यूरोप के लिए स्वाभाविक रूप से दुख और आत्ममंथन का क्षण है. लेकिन दुनिया के अधिकांश देशों-खासतौर पर ग्लोबल साउथ-के लिए अस्थिरता हमेशा से ही भू-राजनीतिक और आर्थिक जीवन का हिस्सा रही है. अब समय है कि यूरोप अपने श्रेष्ठता-बोध को त्यागे और अपने पूर्व उपनिवेशों से सीखने का साहस करे. इन देशों ने दशकों और सदियों में शक्तिशाली लेकिन अनिश्चित महाशक्तियों के बीच टिके रहने, आगे बढ़ने की कला सीख ली है.

दूसरा, अंतरराष्ट्रीय राजनीति की उथल-पुथल में रास्ता निकालने के लिए भारत ने बहु-संरेखण (मल्टी-अलाइनमेंट) की रणनीति अपनाई है. पश्चिमी बहसों में इसे अक्सर अवसरवाद या दोहरेपन के रूप में देखा गया लेकिन आज इसकी दूरदर्शिता साफ दिखती है. इसी नीति के कारण यूक्रेन युद्ध के बावजूद भारत को बाइडन काल में अमेरिका और रूस-दोनों का समर्थन और संवाद मिला. यही रणनीति भारत को यूरोपीय संघ और रूस से अच्छे संबंध बनाए रखने, चीन के साथ रिश्तों में धीरे-धीरे सुधार करने और अमेरिका के साथ मुक्त व्यापार समझौते (FTA) जैसे अहम मुद्दों पर बातचीत जारी रखने में मदद करती है.

अगर यूरोप खुद को एक उदार और नैतिक शक्ति मानता है और योग्य तथा कानूनी प्रवासियों के लिए खुला रहना चाहता है तो इन मुद्दों को ईमानदारी से सुलझाना होगा.

भारत यह संतुलन लंबे समय तक बनाए रख सकता है क्योंकि उसकी रणनीतिक सोच में गहराई से “अद्वैतवाद” समाया हुआ है. भारतीय दर्शन की यह अवधारणा “हम बनाम वे” जैसी सोच से बचती है और संवाद को प्राथमिकता देती है, बिना अपनी सीमाएँ छोड़े. गठबंधन संभव हैं,  लेकिन पश्चिमी दुनिया की तरह टकराव वाली मानसिकता के साथ नहीं. नाटो और ट्रांस-अटलांटिक साझेदारी की अनिश्चितता को देखते हुए, यूरोप के लिए ज़रूरी है कि वह ऐसे वैकल्पिक दृष्टिकोणों से सीख ले और उन्हें अपनी रणनीतिक सोच में शामिल करें.

तीसरा, यूरोप को अपने समाज के भीतर मौजूद समस्याओं पर गंभीरता से विचार करना होगा. कई यूरोपीय देशों में ऐसे समूह बढ़ रहे हैं जो ट्रंप प्रशासन की आव्रजन-विरोधी सोच से सहमत दिखाई देते हैं. अगर यूरोप खुद को एक उदार और नैतिक शक्ति मानता है और योग्य तथा कानूनी प्रवासियों के लिए खुला रहना चाहता है तो इन मुद्दों को ईमानदारी से सुलझाना होगा.

अत्यधिक ध्रुवीकरण-जैसा कि जर्मनी में एंजेला मर्केल के हम कर लेंगे वाले दौर में देखा गया-समस्याओं को और बढ़ाता है. तब सीमाओं की सुरक्षा पर सवाल उठाने वालों को अमानवीय कह दिया जाता था. ऐसी सोच से ज़ेनोफोबिया बढ़ेगा, समाज में प्रतिक्रिया होगी और यूरोप अपने घोषित मूल्यों से दूर चला जाएगा. यूरोप को अपने नैतिक घमंड से उतरना होगा लेकिन नैतिकता छोड़े बिना; व्यावहारिक बनना होगा लेकिन आदर्शों से समझौता किए बिना.

अंत में, यूरोपीय देश अब रक्षा पर खर्च बढ़ा रहे हैं और सैन्य क्षमताएँ मजबूत कर रहे हैं. इनमें से कई सुधार ज़रूरी और स्वागतयोग्य हैं लेकिन यूरोप को अपने अतीत को नहीं भूलना चाहिए-जहाँ अत्यधिक सैन्यीकरण ने दो विश्व युद्धों जैसी भयानक त्रासदियां जन्म दीं. ताकि इतिहास और भी विकृत रूप में खुद को न दोहराए, यूरोप को सैन्य शक्ति बढ़ाने के साथ-साथ लोकतांत्रिक संस्थाओं को हर स्तर पर मज़बूत करना होगा. इसके लिए मज़बूत संस्थागत सुरक्षा और सामाजिक संयम दोनों की ज़रूरत होगी, और उन कठिन चर्चाओं से बचा नहीं जा सकता जिनका ज़िक्र पहले किया गया है.


अमृता नारलिकर, विशिष्ट फेलो, ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन और मानद फेलो, डार्विन कॉलेज, कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय.

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