Author : Shruti Jain

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Published on Feb 20, 2026 Updated 0 Hours ago

AI सिर्फ टेक्नोलॉजी के लिए नहीं बल्कि किसानों की मदद भी कर सकता है. फसल बढ़ाने, सही कीमत पाने और आय बढ़ाने में AI समाधान कैसे कारगर हैं, ये जानिए इस लेख में.

किसान का नया साथी AI: कैसे करें स्मार्ट खेती?

पिछले एक दशक में, तकनीकी प्रगति, खेती के लिए बेहतर इनपुट और उन्नत कृषि पद्धतियों के कारण भारत के अनाज उत्पादन में काफ़ी बढ़ोत्तरी हुई है. वित्त वर्ष 2016 से 2025 के बीच 4.45 प्रतिशत की दशकीय वार्षिक वृद्धि दर में कृषि उत्पादन में बढ़ोत्तरी का सबूत है. हालांकि, इस वृद्धि के बावजूद, मक्का, सोयाबीन, दालें और अनाज जैसी फसलों की पैदावार के मामले में भारत अभी भी वैश्विक औसत से पीछे है. अनाज की घरेलू खपत में वृद्धि के साथ, बढ़ते बाहरी दबावों के बीच कृषि उत्पादन को और ज़्यादा बढ़ाने की ज़रूरत होगी. शहरीकरण, बुनियादी ढांचे के विकास, भूमि क्षरण और मिट्टी में प्रदूषण के कारण भारत में खेती लायक ज़मीन लगातार घट रही है. कृषि योग्य भूमि का सिर्फ 40.6 प्रतिशत ही सिंचित क्षेत्र है. भारत में 60 प्रतिशत खेती अभी भी मॉनसून पर निर्भर है, जिससे उत्पादन काफी प्रभावित होता है. फसल में गिरावट से कीमतों में वृद्धि होती है और इसका असर खाद्य मुद्रास्फीति में दिखता है. मौसम का अनिश्चित पैटर्न कृषि और वैश्विक खाद्य सुरक्षा के लिए गंभीर ख़तरा पैदा करता है. इससे सबसे ज़्यादा एशिया और अफ्रीका में बारिश पर आधारित खेती के बुरी तरह प्रभावित होने की आशंका है. एक अनुमान के मुताबिक सूखे से साल 2050 तक गेहूं और मक्का की पैदावार क्रमशः 19.3 प्रतिशत और 18 प्रतिशत तक कम हो सकती है. ज़ाहिर है, ऐसी स्थिति में कृषि उत्पादन में वृद्धि उच्च पैदावार पर निर्भर करेगी यानी कम ज़मीन से ज़्यादा फसल उगानी होगी. नवाचार आधारित जलवायु-अनुकूल कृषि समाधानों की ओर नीतिगत बदलाव के ज़रिए उच्च पैदावार हासिल की जा सकती है.

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) जैसी उभरती तकनीक कृषि क्षेत्र के लिए क्रांतिकारी साबित हो रही हैं जो रोग प्रबंधन, संसाधन अनुकूलन, वित्तीय समावेशन, फसल नियोजन और कटाई के बाद गुणवत्ता नियंत्रण को सक्षम बनाकर उत्पादन को बढ़ावा दे रही हैं. खेती में एआई के इस्तेमाल से श्रम और इनपुट लागत में सुधार के माध्यम से 100 अरब डॉलर की बचत का अनुमान है. इसी तरह बिक्री, उत्पादकता और परिचालन दक्षता में वृद्धि के माध्यम से उद्यमों के लिए 150 अरब डॉलर का सृजन किया जा सकता है. इसके अलावा, इस क्षेत्र में नवाचार ने निजी कंपनियों के लिए आर्थिक लाभ की अपार संभावनाएं खोली हैं. रिसर्च से पता चलता है कि एग्रीटेक स्टार्टअप्स ने पिछले पांच साल में 800 मिलियन डॉलर से ज़्यादा का राशि जुटाई है. वर्तमान में, एआई समाधान कृषि मूल्य श्रृंखला के चार प्रमुख बिंदुओं पर केंद्रित हैं: इनपुट प्रबंधन, उत्पादन, फसल कटाई के बाद का प्रबंधन और बाज़ार संपर्क.


एक अनुमान के मुताबिक सूखे से साल 2050 तक गेहूं और मक्का की पैदावार क्रमशः 19.3 प्रतिशत और 18 प्रतिशत तक कम हो सकती है. ज़ाहिर है, ऐसी स्थिति में कृषि उत्पादन में वृद्धि उच्च पैदावार पर निर्भर करेगी यानी कम ज़मीन से ज़्यादा फसल उगानी होगी. नवाचार आधारित जलवायु-अनुकूल कृषि समाधानों की ओर नीतिगत बदलाव के ज़रिए उच्च पैदावार हासिल की जा सकती है.

डीप लर्निंग और इमेज रिकग्निशन के माध्यम से एआई द्वारा इनपुट उपयोग को बढ़ाया जा सकता है जिससे मिट्टी की जांच, बीज का चयन और उर्वरक के इस्तेमाल में आसानी होती है. मशीन लर्निंग, सैटेलाइट इमेजरी और कंप्यूटर विज़न, कीटों की पहचान और मौसम की निगरानी को सक्षम बनाकर खेती में सुधार करते हैं. इससे किसानों को सही फैसला लेने में मदद मिलती है. फसल कटाई के बाद के समाधान गुणवत्ता मूल्यांकन, सुरक्षित भंडारण और संरक्षण की सुविधा प्रदान करते हैं. बाज़ार संपर्क स्तर पर, एआई-संचालित कृषि-बाज़ार प्लेटफॉर्म खरीदारों और विक्रेताओं को जोड़ते हैं. उचित मूल्य निर्धारण को सक्षम बनाते हैं और बेचने की प्रक्रियाओं में सुधार करते हैं.

चित्र 1: कृषि मूल्य श्रृंखला के लिए एआई आधारित समाधान

Empowering Agricultural Communities Through Ai Powered Solutions

स्रोत: लेखक की जुटाई जानकारी

कृषि में एआई को अपनाने के फायदे 

कृषि क्षेत्र में एआई की संभावना को पहचानते हुए, तेलंगाना जैसे भारतीय राज्यों ने किसानों को नई तकनीकों का फायदा देने की पहल शुरू कर दी है. हाल ही में, केंद्रीय कृषि मंत्रालय ने तेलंगाना सरकार के सहयोग से कृषि नवाचार के लिए एआई यानी एआई फॉर एग्रीकल्चर इनोवेशन (AI4AI ) पहल का शुभारंभ किया है. ये पहल एआई-आधारित गुणवत्ता परीक्षण को सक्षम बनाती है, खरीदारों और विक्रेताओं को जोड़ने वाला एक डिजिटल मंच प्रदान करती है और मिट्टी की जांच में ममद करती है. शुरुआती अध्ययन में, ये पाया गया कि इस पहल के माध्यम से क्षेत्र के किसानों ने एक फसल सीज़न में प्रति एकड़ आय में 800 डॉलर तक की शानदार वृद्धि दर्ज की. तेलंगाना सरकार ने कृषि डेटा प्रबंधन ढांचे के तहत भारत का पहला कृषि डेटा एक्सचेंज (ADeX) भी शुरू किया है. ये एक्सचेंज फसल संबंधी सलाह, ऋण मूल्यांकन और बाज़ार संबंधी मार्गदर्शन को सुविधाजनक बनाने के लिए गैर-व्यक्तिगत डेटा सेट उपलब्ध कराता है. झारखंड ने जीआईएस-आधारित जलवायु-स्मार्ट कृषि और एग्रीस्टैक योजना शुरू की है, जो जलवायु-सूचित कृषि स्तर की योजना सुनिश्चित करती है. हालांकि, ये योजना अभी प्रारंभिक चरण में है. इसी तरह एक निजी एआई-सक्षम कृषि बाज़ार किसानों को 3,200 से ज़्याजा इनपुट तक पहुंच प्रदान करता है. इसके साथ ही, ये मोबाइल ऐप और कॉल सेंटर के माध्यम से कीट और रोग प्रबंधन पर एआई-संचालित, अनुकूलित फसल सलाह भी देता है. ये निजी प्लेटफ़ॉर्म अपने किसान नेटवर्क से 30 से अधिक फसलों को एकत्रित करता है. यहां से रीटेल चेन, ई-कॉमर्स फर्मों, एफएमसीजी कंपनियों और लघु एवं मध्यम उद्यम फूड प्रोसेसिंग समेत 600 से ज़्यादा थोक वस्तुएं खरीदारों को सीधे वितरित करता है. कृषि क्षेत्र के लिए उद्योग जगत द्वारा किया गया एक और नवाचार एआई आधारित बुवाई एप्लिकेशन है जो किसानों को फसल बोने संबंधी सलाह प्रदान करता है. इसमें बुवाई की गहराई, बीज उपचार, नमी मापन और उर्वरक का सही इस्तेमाल संबंधी सलाह शामिल है. ये सभी जानकारियां सीधे किसानों के फीचर फोन पर पहुंचाई जाती हैं.

इसके अलावा, सरकार ने 'भारत के लिए एआई को कारगर बनाना' के विज़न के तहत, किसान ई-मित्र जैसी पहल शुरू की हैं. ये एक वॉयस-बेस्ड एआई-संचालित चैटबॉट है, जो क्षेत्रीय भाषाओं में किसानों को सरकारी योजनाओं से संबंधित सवालों का जवाब देने के लिए डिज़ाइन किया गया है. एग्री-स्टैक पहल कम लागत वाले कृषि ऋण प्रदान करके, सूचना की विषमता को कम करता है. इतना ही नहीं, प्रमाणीकरण के लिए एक वर्चुअल इंटरफ़ेस बनाकर और गुणवत्तापूर्ण डेटा तक पहुंच प्रदान करके किसानों की समस्याओं का समाधान करने का काम भी एग्री-स्टैक के ज़रिया किया जाता है.

ये पहल एआई-आधारित गुणवत्ता परीक्षण को सक्षम बनाती है, खरीदारों और विक्रेताओं को जोड़ने वाला एक डिजिटल मंच प्रदान करती है और मिट्टी की जांच में ममद करती है. शुरुआती अध्ययन में, ये पाया गया कि इस पहल के माध्यम से क्षेत्र के किसानों ने एक फसल सीज़न में प्रति एकड़ आय में 800 डॉलर तक की शानदार वृद्धि दर्ज की.

केंद्रीय बजट 2026-27 में एआई पर आधारित भारत-विस्तार डिजिटल प्लेटफॉर्म की शुरुआत का भी प्रस्ताव रखा गया है. ये एक सूचना नेटवर्क है जो किसानों के लिए निर्णय लेने और दक्षता बढ़ाने के लिए परस्पर जुड़े डेटाबेस का लाभ उठाता है. इस एक प्लेटफॉर्म पर एग्रीस्टैक, भारतीय मौसम विज्ञान विभाग का डेटा, सरकारी और निजी कंपनियों की जुटाई सारी जानकारी मिल जाती है.

चित्र 2: एआई पर आधारित भारत-विस्तार इकोसिस्टम

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स्रोत: भारत-विस्तार

एआई को अपनाने में आने वाली बाधाएं

नई तकनीकी को अपनाना भारत जैसी विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के लिए आम तौर पर बड़ी चुनौतियां पेश करता है, वो भी तब, जब लगातार बिजली, पानी मुहैया कराने की कोशिशों में जुटा है. इसके अलावा, उच्च गुणवत्ता वाले कृषि इनपुट समेत बुनियादी ज़रूरतों का पूरा करना अभी बाकी है. हालांकि, भारत की हरित क्रांति की सफलता देश की कृषि क्षेत्र को बदलने की क्षमता को दिखाती है. इससे ये साबित होता है कि कि समावेशी और लक्षित रणनीतियों के साथ सीमित संसाधनों के बावजूद भी सार्थक परिवर्तन संभव है. विभिन्न विकासशील देशों में परिस्थितियां अलग होती है, ऐसे में कृषि प्रौद्योगिकी के लक्ष्य और इस्तेमाल भी अलग होते हैं. विकसित अर्थव्यवस्थाओं में डिजिटलीकरण और स्वचालन का उपयोग अक्सर श्रम की कमी को दूर करने के लिए किया जाता है. भारत जैसी विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में नई कृषि तकनीक को उत्पादकता बढ़ाने के साथ-साथ किफायती बने रहना चाहिए. इसके साथ ही, ये भी ज़रूरी है कि श्रम का विस्थापन ना हो, वर्ना बेरोजगारी की समस्या पैदा हो जाएगी. कृषि प्रौद्योगिकी को तभी सही मायने में समावेशी माना जा सकता है, जब इन समाधानों का लाभ किसानों के विभिन्न समूहों, विशेष रूप से लघु किसानों तक पहुंचाया जा सके.

इस बात को सुनिश्चित करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि एआई समाधानों का निर्माण निजी क्षेत्र के लिए व्यावसायिक रूप से फायदे का सौदा हो, तभी वो इस क्षेत्र में काम करने को तैयार होंगे. नियामक प्राधिकरण एक इनोवेशन सैंडबॉक्स भी मुहैया करा सकते हैं, जो निजी उद्यमों को वास्तविक परिस्थितियों में एआई तकनीकी का परीक्षण, सत्यापन और विकास करने की अनुमति देता है.

डिजिटल साक्षरता की निम्न दर, उच्च लागत,  डेटा की कमी और डिजिटल बुनियादी ढांचे तक सीमित पहुंच भारत में कृषि में एआई को बड़े पैमाने पर अपनाने में बाधक साबित हो सकते हैं.

कृषि में एआई की कमियों को दूर करना

तीन मुख्य हितधारकों की भागीदारी से एआई समाधानों का लोकतांत्रिकरण किया जा सकता है. ये तीन प्रमुख खिलाड़ी हैं, किसान संगठनों, निजी क्षेत्र और सरकार. कृषि में बड़े पैमाने पर एआई अपनाने के लिए इसके इकोसिस्टम को मज़बूत करना महत्वपूर्ण है. निम्नलिखित तीन बातों पर ध्यान देना ज़रूरी है.

  • किफायती: प्रौद्योगिकी को किसानों तक पहुंचाने के लिए किसान-उत्पादक संगठन (एफपीओ) या स्वयं सहायता समूह (एसएचजी) जैसे समूहों को हाथ मिलाना चाहिए. क्लस्टर-आधारित दृष्टिकोण अपनाकर ये समूह अंतिम छोर तक सेवाओं की आपूर्ति को आसान बना सकते हैं. इससे ये सुनिश्चित किया जा सकेगा कि कृषि समुदाय को नई तकनीक तक पहुंचने की पूरी लागत वहन ना करनी पड़े. वर्तमान में, किसान-उत्पादक संगठन कस्टम हायरिंग सेंटर (सीएचसी) संचालित करते हैं. इन केंद्रों से संगठन के सदस्यों और गैर-सदस्यों दोनों को मशीनरी और उपकरण किराए पर दिए जाते हैं. राज्य सरकारों को चाहिए कि वो इस प्रावधान को सब्सिडी पाने वाले एआई टूल्स और बुनियादी ढांचे तक विस्तारित करें. 

  • उपलब्धता: स्टार्टअप और निजी कंपनियां तकनीकी जानकारी और स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल नए उपकरण विकसित कर सकती हैं. भारतीय कृषि की परिस्थितियों के हिसाब से तैयार किए गए एआई समाधानों में क्षेत्रीय भाषाओं को शामिल किया जा सकता है. कम बैंडविड्थ और कम क्षमता वाले उपकरणों पर बेहतर प्रदर्शन सुनिश्चित किया जा सकता है. निजी कंपनियां कृषि विज्ञान केंद्रों (केवीके), राज्य विश्वविद्यालयों और किसान-उत्पादक संगठनों के सहयोग से क्षमता निर्माण में भी योगदान दे सकती हैं. 

  • आसान पहुंच: कृषि क्षेत्र के लिए पब्लिक डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर (डीपीआई) प्रणाली विकसित करने में केंद्र और राज्य सरकारों में तालमेल बहुत ज़रूरी है. ये सहयोग एप्लिकेशंस को आपस में जोड़ने, सहमति-आधारित डेटा साझाकरण और डिजिटल रिकॉर्ड्स की उपलब्धता के माध्यम से प्रदान किया जा सकता है. इस बात को सुनिश्चित करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि एआई समाधानों का निर्माण निजी क्षेत्र के लिए व्यावसायिक रूप से फायदे का सौदा हो, तभी वो इस क्षेत्र में काम करने को तैयार होंगे. नियामक प्राधिकरण एक इनोवेशन सैंडबॉक्स भी मुहैया करा सकते हैं, जो निजी उद्यमों को वास्तविक परिस्थितियों में एआई तकनीकी का परीक्षण, सत्यापन और विकास करने की अनुमति देता है. सैंडबॉक्स दृष्टिकोण एक ऐसा परीक्षण वातावरण प्रदान करता है, जो तकनीकी ज्ञान, प्रतिक्रिया और डेटा स्रोतों तक पहुंच प्रदान करके कृषि-तकनीक स्टार्टअप के लिए उपयोगी हो सकता है. इसके अलावा, मंत्रालयों, उद्योग, शिक्षा जगत और नागरिक समाज के बीच समन्वय एक साझा लक्ष्य की इस दिशा में विकास के लिए महत्वपूर्ण होगा. डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम (डीपीडीपी) के अनुसार, कानूनों का मज़बूती से पालन करवाकर और सहमति-आधारित डेटा शेयरिंग जैसी एआई प्रथाओं को बढ़ावा देने में सरकार की भी महत्वपूर्ण भूमिका है.


श्रुति जैन ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन के सेंटर फॉर डेवलपमेंट स्टडीज़ में एसोसिएट फेलो हैं.

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